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प्रथममाह्निकम्

  • विवेकः * यस्मादेषणवित्क्रिया यदुदिता ह्यानन्दचिद्भूमयो यस्यैवोद्धरशक्तिवैभवमिदं सर्वं यदेवंविधम् । तद्धाम त्रिकतत्त्वमद्वयमयं स्वातन्त्र्यपूर्णप्रथं ___ चित्ते स्ताच्छिवशासनागमरहस्याच्छादनध्वंसि मे ।। १ ।। देहे विमुक्त एवास्मि श्रीमत्कल्याणवारिधेः । यस्य कारुण्यविघुभिः सद्गुरुं तं हृदि श्रये ।। २ ।। मूर्युत्तंस इव मापैः सर्वैर्यस्यानुशासनम् । हृदये भवसम्भारकर्कशेऽप्याशु शिश्रिये ।। ३ ।।
  • ज्ञानवती * मायत्री वेदधात्रीं शतमखफलदां वेदशास्त्रैकवेद्यां चिच्छक्तिं ब्रह्मविद्यां परमशिवपदप्राप्तये सेतुभूताम् । ब्रह्माविष्ण्वादिसेव्यां त्रिभुवनमखिलं तेजसोत्पादयन्ती बिभ्राणां चैतदखिलं मलशमनकृते सन्ततां नताः स्मः ।। १ ।। गायत्रीसाधनासिद्धसिद्धिसाम्राज्यचुञ्चवे । श्रेय:प्राप्तिनिमित्ताय नमश्चैतन्यवर्णिने ।। २ ।। सकलकलानां विदुषी विन्ध्याचलशक्तिभक्तिभूयिष्ठा । सकला ‘सकला’ देवी माताऽनन्या समय॑ते स्वान्ते ।। ३ ।। श्रीतन्त्रालोकः न ग्रन्थकारपदमाप्तुमथासम्यपूर्व वाक्कौशलं च न निदर्शयितुं प्रवृत्तः । किं त्वेतदर्थपरिशीलनतो विकल्प: संस्कारवांश्च समियादिति वाञ्छितं नः ॥ ४ ।। यातायाताः स्थिताः केचिदज्ञा मत्सरिणः परे । संदिग्धाः केऽपि किं ब्रूयां श्रोतारो यदनागताः ।। ५ ।। भागवतो महनीयो मानसवैदुष्यभासितस्वान्तः । सरसमना: सुमनस्वी मुरलीधरपितृपाद आराध्यः ।। ४ ।। आयुर्वेदिकधर्मशास्त्रविषयप्रज्ञानधीः कर्मवित् शाब्दप्रातिभबोधविश्रुतमती रुद्रप्रसाद: सुधीः । यस्य स्नेहमवाप्य संस्कृतगिरोऽध्येतृत्वमासादयं मूर्जा पूतपितृव्यपादमनिशं वन्दे तमेकान्तत: ।। ५ ।। आचार्यवर्यरघुवंशविशिष्टविद्वद् रामानुजाह्वयगुरुद्वयमानतोऽस्मि । साहित्यशास्त्रपदशास्त्रलसत्प्रमाण शास्त्रत्रयं यदनुकम्पनया मयाऽऽपि ।। ६ ।। जिससे इच्छा ज्ञान और क्रिया (उत्पन्न) होती हैं, चित् और आनन्द जहाँ से उदित होते हैं और जो कुछ इस प्रकार का है वह सब जिसका उल्लसित शक्तिवैभव है, स्वातन्त्र्य के पूर्ण विस्तार वाला त्रिकतत्त्व वाला, वह अद्वय तेज मेरे चित्त में वर्तमान शिवशास्त्र आगम के रहस्य के आवरण का नाशक बने ।। १ ।। जिस कल्याणरूपी समुद्र के कारुण्यरूपी बिन्दुसीकरों के द्वारा मैं इस शरीर में ही मुक्त (= जीवन्मुक्त) हूँ उस सद्गुरु का हृदय में ध्यान करता हूँ ।। २ ।। जिसके आदेश को समस्त राजा लोग शिरोमुकुट की भाँति (धारण करते हैं, उस आदेश को मैं) सांसारिक विषयवासनाओं से कर्कश हृदय में धारण करता हूँ ।। ३ ।। मैं (= जयरथ) न तो ग्रन्थकार के अपूर्वपद को प्राप्त करना चाहता हूँ और न (अपनी) वाक्पटुता का प्रदर्शन करने के लिये यहाँ (= व्याख्या रचना में) प्रवृत्त हआ है किन्तु हमारा उददेश्य यह है कि इस अर्थ (= त्रिकशास्त्र) के परिशीलन से मेरा विकल्प संस्कारवान् हो जाय ।। ४ ।। ____ कुछ लोग (अध्ययनार्थ) आते हैं किन्तु चले जाते हैं । कुछ लोग आते हैं और ठहर जाते हैं । कुछ लोग अज्ञानी और ईर्ष्यालु हैं । कुछ लोग (यह शास्त्र अध्येय है अथवा नहीं ऐसा) सन्देह करते हैं और कभी श्रोता ही नहीं आते तो (इस विषय में) मैं क्या कहूँ ।। ५ ।। प्रथममाह्निकम् तदनाकर्ण्य गूढार्थं स्वादु स्वाशयकौशलम् । साकूतमुक्तमन्यैर्यत्तेन दोलायते मनः ।। ६ ।। अत्र मद्वागशक्तापि यन्नियन्त्रणमल्लसेत् । तत्पारमेश्वरं श्रीमन्महानन्दविजृम्भितम् ।। ७ ।। इह खलु शास्त्रादावलौकिकाशीर्वादमुखेन वक्ष्यमाणषडर्धशास्त्रार्थगर्भीकारेण समुचितेष्टदेवतां शास्त्रकारः परामृशति विमलकलाश्रयाभिनवसृष्टिमहाजननी, भरिततनुश्च पञ्चमुखगुप्तरुचिर्जनकः । तदुभययामलस्फुरितभावविसर्गमयं, हृदयमनुत्तरामृतकुलं मम संस्फुरतात् ॥ १ ॥ ‘मम’ आत्मनो ‘हृदयम्’ जगदानन्दादिशब्दवाच्यं तथ्यं वस्तु, सम्यक् गूढ अर्थों वाले, स्वादपूर्ण अपने आशय की चमत्कारिता को बिना समझे जो कुछ लोगों ने (इस विषय में) आश्चर्य के साथ कथन किया है इस कारण मेरा मन (ग्रन्थभाष्य की रचना में) अनिश्चय की स्थिति में है ।। ६ ।। अशक्त भी मेरी वाणी जो इस विषय में निर्बाध उल्लसित हो रही है वह परमेश्वर के महाआनन्द का संवर्द्धन मात्रा है ।। ७ ।। शास्त्र के आरम्भ में अलौकिक आशीर्वाद के माध्यम से आगे कहे जाने वाले त्रिकशास्त्र को अपने हृदय में रखकर शास्त्रकार समुचित (= शास्त्रोचित) इष्ट देवता का परामर्श कर रहे हैं स्वच्छ कलातत्त्व का आश्रयण करने वाली, नूतन सृष्टिरूप उत्सव वाली, विश्वब्रह्माण्ड की जननी शक्ति तथा परिपूर्ण स्वभाव वाले, सृष्टि, स्थिति, संहार, निग्रह एवं अनुग्रह रूप पाँच मुखों अर्थात् शक्तियों के द्वारा अपनी इच्छा को बढ़ाने वाले विश्वजनक शिव, इन दोनों की युगनद्ध अवस्था से प्रकट होने वाले अन्त: उल्लास एवं बाह्य सृष्टि की इच्छा से युक्त तथा सर्वोत्कृष्ट अमर शरीर वाला मेरा हृदय सतत एवं सम्यक् विकसित हो ।। १ ।। (प्रस्तुत श्लोक में श्लेष के माध्यम से निम्नलिखित अर्थ भी ज्ञातव्य हैं विमलकला = विमला-अभिनवगुप्त की माता । अभिनव = अभिनवगुप्त। इस प्रकार यह अर्थ भी जानना चाहिए-अभिनवगुप्त की उत्पत्तिरूप उत्सव वाली मेरी माता विमला एवं स्वस्थ तथा पुष्ट शरीर वाले सिंह के समान तेजस्वी मेरे पिता नरसिंहगुप्त की यामल अवस्था से उत्पन्न अत एव अमाकला स्वरूप सर्वोत्कृष्ट मेरा हृदय भली भाँति स्फुरित हों । पञ्चमुखगुप्त = नरसिंहगुप्त-अभिनवगुप्त के पिता । श्रीतन्त्रालोकः देहप्राणादिप्रमातृतासंस्कारन्यक्कारपुर:सरसमावेशदशोल्लासेन दिक्कालाद्यकलित तया ‘स्फरतात’ कालत्रयावच्छेदशन्यत्वेन विकसतात—इत्यर्थः । तच्च कीदक इत्युक्तम्-‘तदुभय’ इति । ‘तत्’ आद्यार्धव्याख्यास्यमानं च तत् ‘उभयम्’ तस्य ‘यामलम्’ ‘तयोर्यद्यामलं रूपं स सङ्घट्ट इति स्मृतः ।’ इति वक्ष्यमाणनीत्या शक्तिशक्तिमत्सामरस्यात्मा सङ्घट्टः, ततः ‘स्फुरितभावः’ परानपेक्षत्वेन स्वत एवोल्लसितसत्ताको योऽसौ ‘अत एव विसर्गोऽयमव्यक्तहकलात्मकः ।’ इत्युक्तया कुलाकुलोभयच्छटात्मकहकारार्धार्धरूपो ‘विसर्गो’ बहिरुल्लिलसिषा स्वभाव: स प्रकृतिर्यस्य तत्; अत एवाह–‘अनुत्तरामृतकुलम्’ इति । ‘अनुत्तरम्’ कतिपयकालदायकार्यमृतान्तरवैलक्षण्यात् उत्कृष्टं च तत् ‘यत्रास्ति न भयं किञ्चिन्न जरा व्याधयोऽपि वा। न विघ्ना न च वै मृत्युर्न काल: कलयेच्च तम् ।।’ इत्यकालकलितत्त्वात् अविद्यमानं मृतं यत्र तत् ‘कुलम्’ शरीरं यस्य तत् मम = अपना हृदय = जगदानन्द आदि शब्दों का अर्थ अर्थात् यथार्थ वस्तु, भलीभांति देहप्राण आदि की प्रमातृता के संस्कार का अपसारण कर समावेश दशा के उल्लास के द्वारा, दिशा काल आदि से अनवच्छिन्न, स्फुरण करे = कालत्रय के अवच्छेद से शून्य होकर विकसित हो—यह अर्थ है । वह (= हृदय) कैसा है? इस विषय में कहा गया उन दोनों का… | वह = प्रथम अर्थ के रूप में व्याख्यान किये जाने वाला वह दोनों (जननी और जनक) उसका जो यामल ‘उन दोनों का जो यामल रूप है वह सङ्घट्ट कहा गया है ।’ इस वक्ष्यमाण नीति के द्वारा सङ्घट्ट शक्ति और शक्तिमान् का सामरस्य है, उससे स्फुटितभाव वाला = पर निरपेक्ष होकर स्वयं ही उल्लसित सत्ता वाला, जो यह “इसीलिये यह विसर्ग अव्यक्त ‘ह’ कला वाला है ।” इस उक्ति के अनुसार कुल-अकुल दोनों की छटा वाला हकार का आधा रूप विसर्ग = बाहर की ओर उल्लसित होने की इच्छा रूप स्वभाव, वह है प्रकृति जिसकी-वह, इसीलिये कहा-अनुत्तरामृतकुलम्’ । अनुत्तर कुछ समय तक स्थिरताकारी दूसरे अमृतत्व से विलक्षण होने के कारण उत्कृष्ट वह ‘जहाँ कोई भय, जरा व्याधि विघ्न मृत्यु नहीं है और जिसे काल विरचित नहीं करता । इस प्रकार अकालकलित होने से ‘अविद्यमान है मृत (= मृत्यु) जहाँ वह कुलप्रथममाह्निकम् अमाख्यकलास्वरूपम्-इत्यर्थः । तदुक्तम् ___ ‘कला सप्तदशी यासावमृताकाररूपिणी ।’ इति । किं च तदुभयम्-इत्याह— ‘जननी जनकश्च’ इति । कीदृशी जननी ‘विमलकलाश्रया’ इति । विगता ‘मला:’ अवच्छेदका यस्यास्तादृशी या ‘कला’ परविमर्शकस्वभावकर्तृतालक्षणा, सा ‘आश्रयः’ आलम्बनं स्वरूपं यस्याः सा शुद्धस्वातन्त्र्यशक्तिरूपा—इत्यर्थः । अत एव ‘अभिनवायाम्’ आद्यायाम् ‘सृष्टौ’ शुद्धाध्वमागें ___शुद्धेऽध्वनि शिव: कर्ता……………….. । इति नीत्या शिवस्यैव तत्र साक्षात्कारित्वात् ‘महः’ पारिपूर्ण्यलक्षणं तेज: स्फारो यस्याः सा-इत्युक्तम् । इहाद्वयनये हि भगवानेव स्वस्वातन्त्र्यमाहात्म्यात् अभासमात्रसारतया स्वाव्यतिरिक्तमपि व्यतिरिक्तत्वेनेव जगत् आभासयति इत्यनन्यापेक्षिणः स्वातन्त्र्यस्यैव जगद्वैचित्र्यनिमित्तत्वमुक्तम् अविद्यावासनादीनां भेदाभेदविकल्पोपहतत्त्वात् जगद्वैचित्र्यनिमित्तत्वाभिधानानुपपत्तेः । अत एव भगवत श्चिदाद्यनन्तशक्तिसम्भवेऽपि तत्स्फुरणमात्रत्वात् तासां तस्या एव प्राधान्यात् इहाभिधानम् । यद्वक्ष्यति = शरीर है जिसका वह अर्थात् अमाकलारूपी शरीर । वही कहा गया ____ ‘जो सत्रहवीं कला है वह अमृताकाररूपा है ।’ वह उभय क्या है? इस विषय में कहते हैं-जननी और जनक । कैसी जननी? विमलकलाश्रया । विगत हैं मल = अवच्छेदक जिसके वैसी जो कला = परविमर्शमात्र स्वभावरूप कर्तृता वाली, वह है आश्रय = आलम्बन = स्वरूप जिसकी वह अर्थात् शुद्धस्वातन्त्र्यशक्तिरूपा । इसीलिये अभिनवा = नवीन प्रथम सृष्टि में = शुद्ध अध्वा मार्ग में ‘शुद्ध अध्वा के विषय में कर्ता शिव होते हैं ।’ ___ इत्यादि नीति के अनुसार शिव के ही उस (= शुद्धाध्वा) में साक्षात् कर्ता होने से यह = परिपूर्णतारूप तेज = स्फार है जिसका—यह कहा जा चुका है । इस शिवाद्वय शास्त्र में भगवान शिव ही अपने स्वातन्त्र्य की महिमा से आभास रूप में अपने से अभिन्न जगत् को भी भिन्नरूप में अवभासित करते हैं । इसलिये अनन्यापेक्ष स्वातन्त्र्य ही जगत् की विचित्रता का कारण कहा गया है । क्योंकि अविद्या, वासना आदि के भेदाभेदविकल्प से उपहत होने के कारण उन्हें जगत् के वैचित्र्य का कारण नहीं कहा जा सकता इसलिये चिद् आनन्द आदि शक्तियों के भगवान् (शिव) से उत्पन्न होने पर भी उन (चित् आनन्द आदि) के उस (स्फुग्ना = सार = हृदय) की ही प्रधानता यहाँ कही गयी है । जैसा कि कहेंगे श्रीतन्त्रालोकः तेन स्वातन्त्र्यशक्त्यैव युक्त इत्याञ्जसो विधिः । ___ इति । जनकश्च कीदृक्?— इत्युक्तम् ‘भरिततनुः’ इति । ‘भरिता’ सर्वाकाङ्क्षासंक्षयात् पारिपूर्येन पूरिता ‘तनुः’ स्वभावो यस्य सः, अनन्योन् मुखतया स्वतन्त्रः- इति यावत् । अत एव ‘पञ्चभिः’ चिदानन्देच्छाज्ञान क्रियात्मभिः ‘मुखै:’ ………………शैवी मुखमिहोच्यते ।’ इत्युक्त्या शक्तिभिः ‘गुप्ता’ परिपूरिता प्रबन्धेनानुवर्तमाना ‘रुचि:’ अभिलाषो विशेषानुपादानात् कृत्यपञ्चकविषयो यस्यासौ, सदैव पञ्चविधकृत्यकारी–इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘सृष्टिसंहाकर्तारं विलयस्थितिकारकम् । अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।।’ इति । तदेवम् अत्र विसर्गप्रसरस्वभावत्वेन जगद्वैचित्र्यबीजभूतं शिवशक्तिसङ्घट्टात्मक परत्रिकशब्दवाच्यम् अनाख्यात्मकं विघ्नौधप्रध्वंसाय परामृष्टम् । तदुक्तम् ‘तत्रापि शक्तया सहितः स्वात्ममय्या महेश्वरः । ‘इस कारण (वह) स्वातन्त्र्यशक्ति से ही युक्त है—यह सरल (सत्य) विधि है ।’ जनक कैसे हैं-इस विषय में कहा गया-भरिततनु । भरित = समस्त इच्छाओं का संक्षय होने के कारण पूर्ण होने से पूरित, तनु = स्वभाव, है जिसका वह अर्थात् अन्य के प्रति उन्मुख न होने के कारण स्वतन्त्र । अतएव पाँच = चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान, क्रिया रूप, मुखों ‘इस शास्त्र में शैवीमुख कहा जाता है’ इस उक्ति के अनुसार-शक्तियों से गुप्त = परिपूरित = प्रबन्ध के साथ अनुवर्त्तमान, रुचि = विशेष का कथन न होने से पञ्चकृत्यरूप अभिलाषा है जिसकी वह अर्थात् सदैव (सृष्टि स्थिति संहार निग्रह और अनुग्रहरूपी) पाँच कार्यों को करने वाला । वही कहा गया ____“सृष्टि संहार के कर्ता विलय और स्थिति को करने वाले अनुग्रह करने वाले तथा दु:ख का नाश करने वाले देव को प्रणाम करो ।" अथवा प्रणत के दु:ख का नाश करने वाले (शिव को प्रणाम है)। ____इस प्रकार यहाँ विघ्नसमूह के ध्वंस के लिये (= उक्त श्लोक में) विसर्ग के प्रसार के स्वभाव वाला होने के कारण जगविचित्रता के उपादान-कारणस्वरूप शिवशक्तिसङ्घट्ट वाले पर त्रिक शब्द के वाच्य (= अर्थ) स्वरूप ‘अनाख्या’ नाम वाले का परामर्श किया गया । वही कहा गया उस दशा में भी स्वात्ममयी शक्ति के सहित परमेश्वर जब सङ्घट्ट को प्राप्त कर प्रथममाह्निकम् यदा सङ्घट्टमासाद्य समापत्तिं परां व्रजेत् ।। तदास्य परमं वक्त्रं विसर्गप्रसरास्पदम् । अनुत्तरविकासोद्यज्जगदानन्दसुन्दरम् ।। भाविवक्त्राविभागेन बीजं सर्वस्य संस्थितम् । हृत्स्पन्दोद्यत्परासारनिर्नामोादि तन्मतम् ।। एतत्परं त्रिकं सूक्ष्मं सर्वशक्तयविभागवत् ।’ इति । अथ च ‘हृदयम्’ _ ‘हृदयं शक्तिसूत्रं तु…………………… ।’ इत्याधुक्त्या श्रीसृष्टिकाल्याद्यखिलशक्तिचक्रासूत्रणेन प्रस्फुरद्रूपं श्रीकाल सङ्कर्षणीधाम ‘संस्फुरतात्’ तदात्म्येनैक: स्याम्-इत्यर्थः । तच्च कीदृशम् ? - इत्युक्तम्-‘अनुत्तरामृतकुलम्’ इति । सृष्ट्यादीनामत्रैव लयाद् अविद्यमानम् उत्तरम् अन्यत् यस्मात् अत एव ‘अमृतम्’ स्वात्मचमत्कारमात्रपरमार्थम्, अत एव च ‘कुलम्’ ‘कुलं पदनामाख्यं………….. इत्यनाख्यरूपम्-इत्यर्थः । अन्यच्च कीदृक् ?–इत्याह—‘तदुभय’ इति । तच्च तत् व्याख्यास्यमानं सृष्टिसंहारात्मकम् ‘उभयम्’ तस्य ‘यामलम्’ लोलीभावः, तत: परसमापत्ति को प्राप्त होते हैं तब इसके परम वक्त्र में विसर्ग का प्रसरण होता है । अनुत्तर के विकास से प्रकट होने वाले जगदानन्द से सुन्दर, भावीवक्त्र के अविभाग के कारण सबके बीजरूप में स्थित, हृदय, स्पन्द, उद्यत्, परासार, निर्नाम, उर्मि आदि नामवाला यह पर त्रिक है जो कि सूक्ष्म और सर्वशक्ति के अविभाग वाला माना गया है । और ‘हृदय’ “हृदय शक्तिसूत्र है…………….. ।’ इत्यादि उक्ति के अनुसार श्रीसृष्टि काली आदि अखिल शक्तिचक्र के आसूत्रण के द्वारा प्रस्फुरद् रूप वाला श्रीकालसङ्कर्षणी का तेज, संस्फुरित हो = (उसके साथ) तादात्म्य के द्वारा एक हो जाय । वह कैसा है? –इसके उत्तर में कहते हैं-अनुत्तरामृत कुलवाला । सृष्टि आदि का इसी में लय होने के कारण, नहीं विद्यमान है उत्तर = दूसरा जिससे, इस कारण अमृत = स्वात्मचमत्कारमात्र परमार्थ वाला और इसीलिये कुल …………अनाख्यापद ही कुल है ।’ इस प्रकार अनाख्यारूप । और फिर कैसा-इस विषय में कहते है—तदुभय । तत् = वह = व्याख्यास्यमान सृष्टिसंहारवाला उभय उसका यामल = लोलीभाव उससे श्रीतन्त्रालोक: ‘चक्रद्वयेऽन्तः कचति लोलीभूता परा स्थितिः ।’ इति । तथा प्रभवाप्यययोरन्तर्लोलीभावात्क्रमोऽवताराख्यः । इत्यादिनीत्या स्फुरितसत्ताक: स्थित्यात्मा विविध: सर्गस्तन्मयम् । परैव हि अनाख्या भगवती संवित् स्वस्वातन्त्र्यात् स्वात्मनि सृष्ट्यादि अवभासयति विलाययति च-इत्यभिप्रायः । यदुक्तम् ‘यस्य नित्योदिता ह्येकाभासा कालक्षयङ्करी । राजते हृदयाम्भोजविकासिगगनोदरे ।। सृष्टिस्थित्युपसंहाररूपा तद्भरणे रता ।’ इति ।। तच्छब्दपरामृष्टमुभयं व्याचष्टे ‘जननी जनकश्च’ इति । जनयति विश्वम्-इति ‘जननी’ परा पारमेश्वरी सृष्ट्यादिचक्राद्या सा च शुद्धबोधमात्रस्वभावत्वात् ‘विमला’ येयम आदिभता चान्द्रमसी ‘कला’ सा ‘आश्रयः’-आलम्बनं गतिर्यस्याः सा. सकलजगदाप्यायकारिपरामृतमयी-इत्यर्थः । तदुक्तम् ऊर्ध्वं तु संस्थिता सृष्टिः परमानन्दरूपिणी । पीयूषवृष्टिं वर्षन्ती बैन्दवी परमा कला ।।’ इति । ‘दो चक्रों के बीच में लोलीभूत पराशक्ति चमकती है (अथवा अणुओं को बाँधती है) तथा ___ ‘प्रभव (= सृष्टि) और अप्यय (= संहार) के भीतर लोलीभाव (= चंचलता) के कारण अवतार नामक क्रम (का प्रादुर्भाव होता) है’ । इत्यादि नियम के अनुसार स्फुरित सत्ता वाला स्थिति रूप अनेक प्रकार की सृष्टि, उससे भरा हुआ । परा अनाख्या भगवती संवित् अपने स्वातन्त्र्यवश अपने अन्दर ही सृष्टि आदि का अवभासन कराती है और प्रलय भी कराती है-यह अभिप्राय है । जैसा कि कहा गया __जिस (= शिव) की नित्योदित एकमात्र आभास वाली, काल को भी ग्रसित करने वाली (शक्ति, उनके) हृदयकमल में विकसित आकाश के अन्दर विराजमान है, सृष्टिस्थितिसंहाररूपा वह उस (अवकाश) के भरण में रत है। तत् शब्द से परामृष्ट उभय (शब्द) की व्याख्या करते हैं-जननी और जनक । जो विश्व को उत्पन्न करती है वह जननी-परा, परमेश्वर की आद्या शक्ति । वह शुद्धबोधमात्र स्वभाव वाली होने के कारण ‘विमला’ है । ऐसी वह प्रथम चन्द्रकला, वह आश्रय = आलम्बन = गति है जिसकी वह । अर्थात् समस्त संसार को तृप्त करने वाली परअमृतमयी । वही कहा गया है ‘ऊपर में परमानन्दरूपिणी सृष्टि (= अम्बाकला) स्थित है । वह बैन्दवी परमा प्रथममाह्निकम् तथा ‘ऊचे स्थिता चन्द्रकला च शान्ता, पूर्णामृतानन्दरसेन देवी ।’ इति । अत एव ‘अभिनवायाम्’ ‘सदा सृष्टिविनोदाय…………. इत्यादिनीत्या सदा द्योतमानायाम् ‘सृष्टौ’ बहीरूपतायां स्वातन्त्र्यलक्षणम् ‘महः’ तेजो यस्याः सा-इत्युक्तम् । जनयति भावसंहारम्-इति ‘जनक:’ अभिरूप: पर: प्रमाता, स च ‘पञ्चानाम्’ वामेश्यादिवाहशक्तीनाम् ‘मुखैः’ चक्षुरा दीन्द्रियवृत्तिरूपैरिः ‘येन येनाक्षमार्गेण यो योऽर्थः प्रतिभासते । स्वावष्टम्भबलाद्योगी तद्गतस्तन्मयो भवेत् ।। इत्यादिनीत्या तत्तद्विषयाहरणेन ‘गुप्ता’-स्वावष्टम्भबलेन परिरक्षिता ‘रुचिः’ -दीप्तिर्यस्यासौ निखिलभावग्रसिष्णुतया समुद्दीपितपरप्रमातृभाव:-इत्यर्थः । अत एव ‘भरिततनुः तत्तद्भावसञ्चर्वणेन निराकाडक्षतोत्पादात् स्वात्ममात्रविश्रान्त्या पूर्णः -इत्यर्थः । तदेवम् अत्र ग्रन्थकृता सृष्ट्यादिक्रमत्रयरूपतामवभासयन्त्यपि तदति वर्तनेन परिस्फुरन्ती क्रमाक्रमवपुः परैव अनाख्या पारमेश्वरी संवित् परामृष्टा, इत्युक्तं स्यात् । यदुक्तमस्मत् परमेष्ठिगुरुभि: कला अमृत की वर्षा करती रहती है ।’ तथा ‘ऊपर में चन्द्रकला स्थित है । वह देवी शान्त एवं अमृतानन्दरस से परिपूर्ण हैं ।’ इसीलिये अभिनवा अर्थात् ‘सदा सृष्टिरूपी विनोद को करने वाले’ के अनुसार सदा प्रकाशमान बाह्य सृष्टि में स्वातन्त्र्यलक्षण वाला । महः = तेज है जिसका वह ऐसा कहा गया। जो भावसंहार को उत्पन्न करे वह जनक = अभिरूप परप्रमाता वह, पाँच = वामेशी आदि बाह्य शक्तियों के मुख = चक्षु आदि इन्द्रियों की वृत्तिरूपी द्वारों से ‘जिस-जिस इन्द्रिय-मार्ग से जो-जो अर्थ प्रतिभासित होता है, अपने पराक्रम के बल से योगी उसमें प्रवेश करता है और तन्मय हो जाता है ।’ इत्यादि नीति से तत्तद् विषयों के आहरण के द्वारा गुप्त = अपने आधार के बल से परिरक्षित है-रुचि = दीप्ति जिसकी वह अर्थात् समस्त भावों को ग्रसने की इच्छा से परप्रभाव का समुद्दीपन करने वाली । इसीलिये भरिततनु = तत्तद् भावों की सञ्चर्वणा के द्वारा निराकाङ्क्षता के उत्पन्न होने से स्वात्ममात्र में विश्रान्ति के कारण पूर्ण । इस प्रकार ग्रन्थकार ने यहाँ परा अनाख्या पारमेश्वरी संवित् जो कि सृष्टि आदि तीनो क्रमों का अवभासन कराती हुई भी उससे परे होकर स्फुरण करती हुई क्रम और अक्रम श्रीतन्त्रालोकः ‘क्रमत्रयसमाश्रयव्यतिकरण या संततं ___क्रमत्रितयलनं विदधती विभात्युच्चकैः । क्रमैकवपुरक्रमप्रकृतिरेव या द्योतते करोमि हृदि तामहं भगवती परां संविदम् ।।’ इति । अथ च ‘हृदयम्’ निजबलसमुद्भूतिलक्षणं तत्त्वं विशेषानुपादानात् सर्वस्य सम्यक् प्रख्योपाख्यारोहेण ‘स्फुरतात्’ विकसतात्-इत्यर्थः । तच्च कीदृक्? ‘तदुभय’ इति । तत् आद्यार्धव्याख्यास्यमानं मातापितृलक्षणम् ‘उभयम्’ तस्य यत् ‘यामलम्’ आद्ययागाधिरूढं मिथुनं, तस्य परस्परौन्मुख्येन चमत्कारतारतम्ययोगात् ‘स्फुरित:’ सोल्लासो योऽसौ ‘भाव:’ आशयविशेषः, तेन यो ‘विसर्ग:’ क्षेप: कुण्डगोलाख्यद्रव्यविशेषनि:ष्यन्दः, स प्रकृतिर्यस्य तत्; अत एव च ‘अनुत्तरे’ श्वेतारुणात्मदेवतामयताद्यनुसंधानेन पशुशुक्रशोणितवैलक्षण्यादुत्कृष्टे ‘अमृते’ सारे ……………कुलमुत्पत्तिगोचरः ।’ इत्युक्तया ‘कुलम्’ आकारो यस्य तत् । किं तदुभयम् ?–इत्याह-‘जननी जनकश्च’ इति । कीदृशी जननी ? ‘विमलकलाश्रया’ इति । ‘विमला’ इति वर्णकला ‘आश्रयः’ आलम्बनं यस्याः सा, विमलकलाभिधाना-इत्यर्थः । तथा शरीर वाली है, का परामर्श किया है-ऐसा कहना है । जैसा कि हमारे परमेष्ठी गुरु ने कहा है ‘जो निरन्तर क्रमत्रय के आश्रयण के और उसके व्यतिकर के कारण तीनों क्रमों का उल्लङ्गन करती हई उच्चरूप में दीपित होती है, जो क्रम तथा अक्रम स्वभाव के रूप में विराजमान है, मैं उस भगवती परा संवित् को हृदय में धारण करता हूँ। ____ हृदय = अपनी संविद् के विमर्श से प्राप्त अनुभूति से सम्पन्न तत्त्व, विशेष का कथन न करने सबका सम्यक् = प्रख्या (= प्रत्यक्ष) एवं उपाख्या (= प्रवचन) के क्रम से स्फुरित हो = विकसित हो । वह (हृदय) कैसा है?-कहते हैं तद्भय = तत् = आद्ययाग के अर्थ के रूप में व्याख्यायित होने वाले माता पितास्वरूप उभय, उसका जो यामल प्रथम याग पर आधिरूढ़ मिथुन उसकी परस्पर उन्मुखता के कारण चमत्कार के तारतम्य के योग से, स्फुरित = उल्लसित जो यह भाव = आशयविशेष, उसके द्वारा जो विसर्ग = क्षेप = कुण्ड गोल नामक द्रव्य विशेष का निष्यन्द, वह है प्रकृति जिसकी वह । इसीलिये अनुत्तर = श्वेतरक्तरूप देवतामयता आदि के अनुसन्धान के द्वारा पशु के शुक्रशोणित के वैलक्षण्य से उत्कृष्ट, अमृत = सार, में उत्पत्ति के विषय को कुल (कहते हैं)-इस उक्ति के अनुसार कुल है आकार जिसका वह । वह ‘उभय’ क्या है? इसके उत्तर में कहते हैं-जननी और जनक । कैसी जननी? विमलकलाश्रया । विमला = वर्णकला है आश्रय = आलम्बन जिसकी वह अर्थात् विमलकला नाम वाली । तथा प्रथममाह्निकम् ‘अभिनवसृष्टिमहा’ इति । ‘अभिनवस्य’ श्रीमदभिनवगुप्तस्य ‘सृष्टिः’ जन्म सैव ‘नन्दन्ति पितरस्तस्य नन्दन्ति च पितामहाः । अद्य माहेश्वरो जातः सोऽस्मान्संतारयिष्यति ।।’ इत्याद्युक्तेः सत्पुत्रप्रसवेन कृतकृत्यतया चमत्कारातिशयकारित्वेन ‘महः’ उत्सवो यस्याः सा तथा । तथा जनकश्च कीदृश:? ‘पञ्चमुखगुप्तरुचिः’ । ‘पञ्चमुखः’ सिंहः, सिंहगुप्तेति संज्ञया ‘रुचि:’ दीप्तिः सर्वत्र प्रथा यस्यासौ ‘तस्यात्मजश्चखुलकेति जनेप्रसिद्ध श्चन्द्रावदातधिषणो नरसिंहगुप्त: ।’ इति वक्ष्यमाणदृशा नरसिंहगुप्तसंज्ञया ख्यात:-इत्यर्थः । अस्य हि ग्रन्थकृत: श्रीनरसिंहगुप्तविमलाख्यौ पितरौ—इति गुरवः । ‘सन्ति(न्तो) हि पदेषु पदैकदेशान्प्रयुञ्जाना: ।’ इति नीत्या ‘भीमों भीमसेनः’ इतिवत् अत्रापि नरसिंहगुप्तसिंहगुप्तपदयोः प्रयोगः । ‘भरिततनुः’ इति ‘शिवशक्तयात्मकं रूपं भावयेच्च परस्परम् । न कुर्यान्मानवी बुद्धिं रागमोहादिसंयुताम् ।। अभिनवसृष्टिमहा = अभिनव = अभिनवगुप्त की, सृष्टि = जन्म, वही ‘उसके पिता और पितामह आदि प्रसन्न होते हैं कि आज (हमारे कुल में) माहेश्वर उत्पन्न हुआ है वह हम लोगों को (संसार से) पार करेगा ।’ इत्यादि उक्ति के अनुसार सत्पुत्र के उत्पन्न होने से कृतकृत्य होने से चमत्कारातिशयकारी होने के कारण, मह = उत्सव है जिसका वह । पिता कैसे हैं? पञ्चमुखगुप्तरुचि । पञ्चमुख = सिंह । ‘सिंहगुप्त’ इस संज्ञा से रुचि = दीप्ति = सर्वत्र प्रचार है जिसका वह । ‘उसका पुत्र लोगों में चुखुलक नाम से प्रसिद्ध है । वे (चुखुलक) चन्द्रमा के समान स्वच्छ बुद्धिवाले नरसिंहगुप्त हैं ।’ इस वक्ष्यमाण उक्ति के अनुसार ‘नरसिंहगुप्त’ नाम से प्रसिद्ध है । इस ग्रन्थकार के पिता माता नरसिंहगुप्त और विमला थे, ऐसा गुरु लोग (कहते हैं)। ‘पदों के स्थान पर पद का एक अंश प्रयोग करने वाले हैं।’ इस नीति के अनुसार ‘भीमसेन’ के स्थान पर ‘भीम’ की भाँति यहाँ भी नरसिंहगुप्त सिंहगुप्त पदों का प्रयोग हुआ है । भरिततनु: “परस्पर शिवशक्त्यात्मक रूप की भावना करनी चाहिये । (इस शरीर के विषय में) राग, मोह आदि से युक्त मानवी बुद्धि नहीं करनी चाहिये । उत्तम साधकों के श्रीतन्त्रालोकः ज्ञानभावनया सर्व कर्तव्यं साधकोत्तमैः ।’ इत्याधुक्तनीत्या द्वयोरपि शिवशक्तिसमावेशमयत्वाभिधानस्येष्टेः काकाक्षि न्यायेन योज्यम् । तदेवम् एवंविधसिद्धयोगिनीप्रायपितृमेलकसमुत्थतया ‘तादृङमेलककलिका कलिततर्यो भवेद् गर्भे । उक्तः स योगिनीभूः स्वयमेव ज्ञानभाजनं भक्तः ।।’ इत्युक्तनीत्या स्वात्मनि निरुत्तरपादाद्वयज्ञानपात्रतामभिदधता ग्रन्थकृता निखिल षडर्धशास्त्रसारसंग्रहभूतग्रन्थकरणेऽप्यधिकारः कटाक्षीकृतः । अत्र च सम्भवन्त्यपि व्याख्यान्तराणि न कृतानि, ग्रन्थगौरवभयात् प्रकतानुपयोगाच्च । केषांचिदपि व्याख्यान्तराणमासमञ्जस्यमतीव सम्भवदपि न प्रकाशितम् । एवं हि …तस्यै हेतुं न चाचरेत् ।’ इति वक्ष्यमाणदृशा स्वात्मनि समयलोपावहं महात्मनाम् महागुरूणां निन्दाबीजमासूत्रितम्-इति भवेत्; को नाम शान्तिकारभमाणो वेतालोत्थापनं कुर्यात्, इह चास्माभिस्तद्व्याख्यासारोच्चयनस्यैव प्रतिज्ञातत्त्वात् तदेव क्रियते, द्वारा सब कुछ ज्ञानभावना से करना चाहिये ।’ ___इत्यादि उक्त नीति के अनुसार (पिता माता) दोनों के शिवशक्तिसमावेशमयत्व का कथन करने की इच्छा से यहाँ काकाक्षिगोलक न्याय से (वह समावेश पुत्र में भी संक्रान्त होता है ऐसा) समझना चाहिये । इस प्रकार सिद्ध एवं योगिनी जैसे पिता माता के सङ्घट्ट से उत्पन्न होने के कारण ___“जो गर्भ में उस सङ्घट्टरूपी कलिका से रचित शरीरवाला होता है वह योगिनीभू कहा गया है । वह स्वयं (शिव) ज्ञान का पात्र एवं भक्त होता है ।” इस नीति से अपने अन्दर अनुत्तरपद (को प्राप्त कराने वाले) अद्वयज्ञान की पात्रता को कहने वाले ग्रन्थकार के द्वारा समस्त त्रिकशास्त्र के सार का संग्रह रूप (इस) ग्रन्थ की रचना में अधिकार को भी संकेतित किया गया है । यहाँ अन्य व्याख्यायें भी सम्भव हैं किन्तु ग्रन्थविस्तार के भय तथा प्रस्तुत प्रकरण में अनुपयोगी होने के कारण वे नहीं की गयीं । कुछ दूसरी व्याख्याओं की अत्यन्त सम्भावना है तो भी वे प्रकाशित नहीं की गयीं । इस प्रकार ‘उस (= स्वातन्त्र्यशक्ति) के लिये कारण नहीं खोजना चाहिये । इस वक्ष्यमाण रीति से अपने अन्दर समय का लोप करने वाली महात्माओं महागुरुओं की निन्दा हो जाती । शान्तिकर्म का आरम्भ करने वाला कौन व्यक्ति वेताल को जगायेगा ।’ यहाँ हम लोगों ने उसकी सारभूत व्याख्या करने की प्रतिज्ञा की है इसलिये वही किया जा रहा है । इसलिए उससे अतिरिक्त सब प्रथममाह्निकम् १३ इति तदितरत् स्वयमेव सर्वत्रासारतया चिन्वन्तु सचेतसः,—इत्य लमनेनापि वचनेन, प्रस्तुतमिहाभिदध्मः ।। १ ।। तदेवं परं त्रिकं परामृश्य परापरमपि पराम्रष्टमुपक्रममाण: प्रथमं तावत् परां देवी परामृशति नौमि चित्प्रतिभा देवीं परां भैरवयोगिनीम् । मातृमानप्रमेयांशशूलाम्बुजकृतास्पदाम् ॥२॥ ‘पराम्’ पूर्णाम्, अत एव भिन्नमपि जगत् स्वात्मनि अभेदरूपतया पालयन्तीम् अनन्योन्मुखतया च प्रकृष्टाम् ‘या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी ।’ . इत्याद्युक्त्या ‘भैरवयोगिनीम्’ नित्यमेव परप्रमात्रवियुक्तत्वात् तदात्मभूताम्, अत एव ‘इच्छात्वं तस्य सा देवि सिसृक्षोः प्रतिपद्यते ।’ इत्याद्युक्त्या चिद्रूपा चासौ ‘प्रतिभा’ प्रज्ञा, ताम् आद्योच्छलत्तात्मकत्वेन बहिरुल्लिलसिषास्वभावाम्, अत एव ‘देवीम्’ प्रमातुरपि विश्रान्तिधामत्वात् प्रमिति अतात्त्विक है ऐसा सहृदय लोग जानें । यह कथन भी व्यर्थ है। अब प्रस्तुत का कथन करते हैं ।। १ ।। ___ इस प्रकार परत्रिक का परामर्श करने के बाद परापर का भी परामर्श करने के लिये उपक्रम करते हुए पहले परादेवी का परामर्श कर रहे हैं । ____ मैं उस परा अर्थात् पूर्ण तथा परप्रमाता के साथ नित्यसम्बद्ध चित् रूप प्रतिभा देवी को प्रणाम करता हूँ जो प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेय रूप तीन अंशो वाले शूल के ऊपर वर्तमान उन्मना कमल पर आसीन हैं ।। २ ।। परा = पूर्णा । इसलिये भिन्न भी जगत् को अपने अन्दर अभेदरूप से पालती हुई, अनन्यापेक्ष होने से प्रकृष्ट ‘जगत् के पालक की जो वह शक्ति समवायिनी कही गयी है’ इत्यादि उक्ति के अनुसार- ‘भैरवयोगिनी = नित्य ही परप्रमाता से अवियुक्त होने के कारण तदात्मरूपा, इसलिये ‘हे देवि! तुम उस सिसृक्षा वाले की इच्छा बनती हो ।’ इत्यादि उक्ति के अनुसार चिद्रूपा यह प्रतिभा = प्रज्ञा, उसकी प्रथम उच्छलत्तारूप होने के कारण बाहर उल्लसित होने की इच्छारूप स्वभाव वाली, इसलिये देवी = प्रमाता का भी विश्रान्तिधाम होने से प्रमिति के रूप में दीप्यमान, १४ श्रीतन्त्रालोकः रूपतया द्योतमानाम्, अत एव बहिरपि प्रमातृप्रमाणप्रमेयाण्येव ‘अंशा’ अरारूपा भागा यस्य ‘शूलस्य’ तत्र यानि औन्मनसानि अम्बुजानि, तत्र ‘कृतास्पदाम्’ तदत्तीर्णतया भासमानाम ‘नौमि’ देहप्राणादिप्रमातरूपन्यग्भावेन तत्स्वरूपमाविशामि —इत्यर्थः ।। २ ।। एवमुक्तेऽपि परास्वरूपेऽपरास्वरूपमनभिधाय, तदुभयमयस्य परास्वरूपस्य वक्तुमशक्यत्वात् क्रमप्राप्तां परापरां देवीं परिहत्य, प्रथमं तावदपरां देवीमभिमुखयति नौमि देवी शरीरस्थां नृत्यतो भैरवाकृते । प्रावृण्मेघघनव्योमविद्युल्लेखाविलासिनीम् ॥ ३ ॥ ‘नृत्यतो’ ‘नर्तक आत्मा’ (शि०३ उ०९ सू०) इति शिवसूत्रदृष्ट्या निगृहितस्वस्वरूपावष्टम्भमूलं तत्तद्विष्ववैचित्र्यभूमिकाप्रपञ्चं प्रकाशयतो ‘भैरवाकृतेः’ पूर्णस्वरूपस्य परमात्मन: ‘शरीरस्थाम्’ ‘एवभूतमिदं वस्तु भवत्विति यदा पुनः । जाता तदैव तद्वस्तु कुर्वत्यत्र क्रियोच्यते ।।’ इसलिये बाहर भी, प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय ही हैं अंश = अरारूप भाग जिस शूल के, उस पर जो उन्मना वाले कमल उस पर कृतास्पदा = उससे परे रूप में भासमान, को प्रणाम करता हूँ = देह प्राण आदि प्रमाता रूप निम्नभाव से उसके स्वरूप में आविष्ट हो रहा हूँ ।। २ ।। परादेवी के स्वरूप के इस प्रकार कहे जाने पर भी अपरास्वरूप को बिना कहे उभयमय परापरादेवी के स्वरूप का कथन असम्भव होने से क्रमप्राप्त परापरा देवी को छोड़कर पहले अपरा देवी की ओर उन्मुख होते हैं वर्षाकालीन मेघ से व्याप्त आकाश में वर्तमान विद्युल्लेखा के समान विलास (= चमक) वाली, नर्तनशील भैरव के शरीर में रहने वाली (अपरा) देवी को नमस्कार करता हूँ ।। ३ ।। नृत्यत: ‘नर्तक आत्मा इस शिवसूत्र के अनुसार छिपाये गये अपने स्वरूपरूपी स्तम्भ को आधार बनाकर भिन्न-भिन्न विश्ववैचित्र्य की भूमिका के विस्तार को प्रकाशित करने वाले भैरव आकृति = पूर्णस्वरूप परमशिव के शरीर में रहने वाली । _ ‘यह वस्तु इस प्रकार की हो जब ऐसी (इच्छा) उत्पन्न होती है तभी उस वस्तु को बनाने वाली को क्रिया कहते हैं ।‘१५ प्रथममाह्निकम् इत्याद्युक्त्या तत्तत्प्रमातृप्रमेयाद्यनन्ताभासवैचित्र्यकारितया स्वरूपाविष्टाम्, अत एव ‘देवीम्’ जगदुल्लासनक्रीडाकारिणीम् अपरां भगवतीं ‘नौमि’ इति संबन्धः । अत एव बहिरपि विश्वात्मना द्योतमानत्वेऽपि ‘भेदभावकमायीयतेजोंशग्रसनाच्च तत् । सर्वसंहारकत्वेन कृष्णं तिमिररूपधृत् ।।’ इत्याधुक्तस्वरूपे परप्रमातर्येव विश्रान्तत्त्वात् कृष्णपिङ्गलरूपाम्—इत्युक्तम् ‘प्रावृण्मेघघनव्योमविद्युल्लेखाविलासिनीम्’ इति ।। ३ ।। अथ परापरोभयस्वरूपमयीं परापरां देवीं परमृशति दीप्तज्योतिश्छटाप्लुष्टभेदबन्धत्रयं स्फुरत् । । स्ताज्ज्ञानशूलं सत्पक्षविपक्षोत्कर्तनक्षमम् ॥४॥ ‘ज्ञानम्’ ‘एवमेतदिदं वस्तु नान्यथेति सुनिश्चितम् । ज्ञापयन्ती जगत्यत्र ज्ञानशक्तिर्निगद्यते ।।’ इत्यादि उक्ति के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रमाता प्रमेय आदि अनन्त आभास की विचित्रता को करने के कारण स्वरूप में समाविष्ट, इसलिये देवी = संसाररूपी उल्लासन क्रीड़ा को करने वाली अपरा भगवती को प्रणाम करता हूँ—ऐसा अन्वय इसीलिये विश्व के रूप में बाहर प्रस्फुरित होने पर भी ‘भेदभाव को उत्पन्न करने वाले मायीय तैजस अंश का ग्रसन करने के कारण तथा सर्वसंहारक होने से अन्धकार जैसा रूप धारण कर (वह शक्ति) कृष्ण हो जाती है।’ इत्यादि के द्वारा कहे गये स्वरूप वाले पर प्रमाता में ही विश्रान्त होने के कारण कृष्णपिङ्गला रूप वाली हो जाती है । इसलिये कहा गया–प्रावृण्मेघ. इत्यादि ।। ३ ।। अब परा और अपरा दोनों स्वरूप वाली परापरा देवी का परामर्श करते हैं चमकती हुई ज्योति के पुञ्ज से भेदप्रधान तीनों बन्धनों अर्थात् मलों को नष्ट करने वाला एवं शुद्धबोध के रूप में स्फुरित होने वाला ज्ञानशूल सत्पक्ष (= जगदानन्द) एवं विपक्ष (= निजानन्द) को नष्ट करने में समर्थ हो ।। ४ ।। ‘ज्ञान’ - ‘यह वस्तु ऐसी ही है अन्यथा नहीं, इस प्रकार निश्चित रूप से ज्ञापन करने वाली (देवी) इस संसार में ज्ञानशक्ति कहलाती है ।’ श्रीतन्त्रालोकः इत्याधुक्तज्ञानशक्तिस्वभावमपि अन्तरासूत्रितेच्छाक्रियात्मकम्, अत एव परापराशब्दव्यपदेश्यम्, अत एव तत् ‘लोलीभूतमत: शक्तित्रितयं तत्रिशूलकम् ।’ इति वक्ष्यमाणनीत्या ‘त्रिशूलम्’ अत एव ‘दीप्ताभि:’-अप्रतिहताभिः तत्तदिन्द्रियवृत्तिरूपाभि: ‘ज्योतिश्छटाभि: ___ ‘यत्र यत्र मिलिता मरीचयस्तत्र तत्र विभुरेव जृम्भते ।’ इत्यादिनीत्या वक्ष्यमाणस्वरूपस्य भेदप्रधानस्य बन्धहेतुत्वात् बन्धरूपस्य आणवादिमलत्रयस्य प्लोषकम्, अत एव ‘स्फुरत्’ शुद्धबोधैकरूपतयास्फुरत्ता सारम्, अत एव ‘सन्’ च असौ ‘पक्ष:’ जगदानन्दस्तस्य ‘विपक्षा:’-तदप्रथा रूपा निजानन्दाद्या आनन्दा अनानन्दाश्च तेषाम् ‘उत्कर्तनम्’–पूर्णप्रथात्मकत्वेन क्षपणम्, तत्र ‘क्षमम्’–समर्थः ‘स्तात्’ इति वाक्यार्थः–तदुक्तम् ‘जयन्ति जगदानन्दविपक्षक्षपणक्षमाः । परमेशमुखोद्भूतज्ञानचन्द्रमरीचयः ।। इति ।। ४ ।। इदानीमपरमपि त्रिकं पराम्रष्टुमाह स्वातन्त्र्यशक्तिः क्रमसंसिसृक्षा क्रमात्मता चेति विभोर्विभूतिः । इत्यादि में उक्त ज्ञानशक्ति स्वभाव वाला होते हुए भी भीतर भीतर इच्छा क्रिया वाला, इसलिये परापरा शब्द से व्यवहार्य होती है । इसीलिये वह “इसलिये तीनों शक्तियाँ जब लोलीभूत (= चञ्चल, सक्रिय) हो जाती हैं तब वह त्रिशूल कहलाता है।” इस वक्ष्यमाण सिद्धान्त के अनुसार त्रिशूल, इसलिये दीप्त-अप्रतिहत तत्तत् इन्द्रियवृत्तिरूप ज्योति की शोभा से ‘जहाँ-जहाँ किरणें मिलती हैं वहाँ-वहाँ परमात्मा ही उल्लसित होते हैं । इत्यादि रीति से वक्ष्यमाणस्वरूप भेदप्रधान तथा बंधन का कारण होने से बन्धरूप आणव आदि तीन मलों का दाहक, अत एव स्फुरत् = शुद्धबोधमात्र के रूप में स्फुरण करने वाला, अत एव सत्पक्ष-जगदानन्द, उसका विपक्ष-उसके सङ्कोचरूप निजानन्द आदि या आनन्द का अभाव, उनका उत्कर्त्तन—पूर्णविकास के रूप में परिवर्तन, इसमें क्षम = समर्थ, हो-ऐसा वाक्यार्थ है । वही कहा गया ___जगदानन्दरूपी ‘परमेश्वर के मुख से उत्पन्न ज्ञान चन्द्र की किरणें जो कि विपक्ष के उन्मूलन में समर्थ है, सर्वोत्कृष्ट हैं ।’ (मा० वि० वा० १) ।। ४ ।। अब दूसरे त्रिक का परामर्श करने के लिये कहते है प्रथममाह्निकम् तदेव देवीत्रयमन्तरास्ता ____मनुत्तरं मे प्रथत्स्व रूपम् ॥ ५ ॥ स्वतन्त्र्यरूपा शक्तिः यस्यासौ अनन्तशक्तिर्भगवान् शिवः, ‘क्रमस्य’ ‘मूर्तिवैचित्र्यतो देशक्रममाभासयत्यसौ । क्रियावैचित्र्यनिर्भासात् कालक्रममपीश्वरः ।।’ (ई०२।१।५) इत्याधुक्तनीत्या देशकालात्मनो विश्ववैचित्र्यस्य सर्गस्य, सम्यक-भेदेन ‘सिसृक्षा’-जगत्सृष्टिनिमित्तं पारमेश्वरी इच्छारूपा शक्ति: ‘क्रमात्मता’ ‘क्रमो भेदाश्रयो भेदोऽप्याभाससदसत्त्वतः ।’ (ई०२।१।४) इत्यादिनीत्या भेदप्रधानं तत्तदनन्ताभाससंभिन्नं संकुचितात्मरूपं नरत्वम्, इत्येवं येयं नर-शक्ति-शिवात्मिका विभोः’ -भगवतः परस्य-अनुत्तरस्य प्रकाशस्य ‘विभूति:’-तत्तत्स्फुरणात्मत्वेन ऐश्वर्यं तदेव’ क्रमेण तत्स्फारसारत्वात् समनन्तरोक्तस्वरूपं ‘देवीत्रयम्’ परप्रकाशत्मकत्वात् ‘अनुत्तरम्’ ‘स्वम्’ सर्वकर्तृत्वा देरसाधारणम् ‘रूपम्’ ‘प्रथयत्’-तत्तद्भेददशोदयेऽप्यतिरोदधत् मम आत्मनः ‘अन्तरास्ताम्’ ऐकात्म्येन स्फुरतात्-इत्यर्थः ।। ५ ।। स्वातन्त्र्यशक्ति (= शिव), क्रम का सृजन करने की इच्छा (= शक्ति) एवं क्रमात्मता (= नर) ये विभु परमेश्वर की विभूति हैं । उक्त तीनों देवियों का समाहार अपने अनुत्तर स्वरूप को प्रकट करते हुए अन्त:करण में स्फुरित हों ।। ५ ।। स्वातन्त्र्यरूपा है शक्ति जिसकी वह अनन्तशक्ति वाले भगवान् शिव । ‘मूर्तिवैचित्र्य के कारण यह ईश्वर (= शिव) देश क्रम का तथा क्रिया-वैचित्र्य के निर्भास से कालक्रम का आभास करते हैं।’ (ई. १) इत्यादि में कथित रीति से क्रम = देशकाल रूप विश्ववैचित्र्य वाली सृष्टि का, सम्यग् = भेदवाली, सिसृक्षा = जगत् सृष्टि का कारणभूत पारमेश्वरी इच्छारूपा शक्ति, ‘क्रम भेद का आश्रय होता है और भेद भी आभास की सत्ता और असत्ता के कारण होता है । इत्यादि नीति से जो = भेदप्रधान, तत्तत् अनन्त आभास से भिन्न एवं संचित आत्मरूप है वह नर ही क्रम (कहलाता) है । इस प्रकार जो नर शक्ति एवं शिवरूपा, विभु = भगवान् अनुत्तर परप्रकाश रूप की, विभूति = तत्तत् स्फुरण रूप ऐश्वर्य, वही क्रमश: तत्तत् स्फार वाला होने से पूर्वोक्तरूप वाला देवीत्रय, परप्रकाशात्मक होने से अनुत्तर स्व = अपने सर्वकर्तृत्व आदि का असाधारण रूप, प्रथयत् = तत्तद् भेददशा का उदय होने पर भी अतिरोभूत, मम = मेरे भीतर २ त प्र १८ श्रीतन्त्रालोकः एवं स्वदर्शनोचितदेवतापरामर्शानन्तरं तत्स्वरूपानुप्रवेशेनैव युगपद् गणेश वटुकावपि अभिमुखयति तद्देवताविभवभाविमहामरीचि चक्रेश्वरायितनिजस्थितिरेक एव । देवीसतो गणपतिः स्फरदिन्दकान्तिः, सम्यक्समुच्छलयतान्मम संविदब्धिम् ॥ ६ ॥ ‘एक एव’-अनन्यापेक्षतया नि:सहायो ‘गणस्य’-करणचक्रस्य ‘दिनकरसममहदादिकगणपतितां वहति यो नमस्तस्मै ।’ इत्यादिदृशा ‘पति:’-अहङ्काररूपः प्रभुः, अत एव ‘तासाम्’ समनन्तरोक्तानां ‘देवतानाम्’ ‘विभवेन’–परप्रकाशात्मना स्फारेण ‘यत्तत्र नहि विश्रान्तं तन्नभ:कुसुमायते ।’ इति वक्ष्यमाणनीत्या भवनशीला: तन्मयतया परिस्फुरन्त्यो या ‘महामरीचय:’ -तत्तदिन्द्रियदेवता: तासां यत् ‘चक्रम्’ तत्रेश्वरवदाचरन् निजस्थितिर्यो ‘मम’ आत्मन: ‘संविद्’ एव अनवगाह्यत्वात् ‘अब्धि:’ ‘सम्यक्’ विषयकालुष्यविलायनेन आसीन हो = मुझमें अभिन्नरूप से स्फुरित हो ।। ५ ॥ अपने दर्शन के अनुरूप देवता का परामर्श करने के बाद उसके स्वरूप में अनुप्रवेश के लिये गणेश और बटुक का एक साथ आमन्त्रण कर रहे हैं पूर्वोक्त देवताओं के विभव (= परप्रकाशरूप स्फुरण) के द्वारा उत्पन्न होने वाली महामरीचियों (= तत्तत् इन्द्रियदेवताओं) के समूह के अधिपति के रूप में अपनी स्थिति रखने वाले, अनन्य देदीप्यमान चन्द्रमा के समान कान्ति वाले, देवी (= शक्ति) के पुत्र गणेश अथवा बटुक मेरे ज्ञानसिन्धु को उच्छलित करें ।। ६ ।। एक एव = अनन्यापेक्ष होने के कारण नि:सहाय, गण = करणसमूह का ‘जो सूर्य के समान महत् आदि द्रव्यसमूह का स्वामी है उसे नमस्कार है।’ इत्यादि के अनुसार पति = अहङ्काररूप प्रभु । इसलिये उनके = पूर्वोक्त देवताओं के, विभव परप्रकाशरूप स्फार के द्वारा ‘जो उसमें विश्रान्त नहीं होता वह आकाशकुसुम के समान (तुच्छ) है ।’ इस वक्ष्यमाण नीति से भवनशील = तन्मय होकर परिस्फुरण करने वाली जो महामरीचियाँ = तत्तद् इन्द्रियों की देवतायें, उनका जो चक्र, उसमें ईश्वर की भाँति आचरण करता हुआ स्वात्म में स्थित जो मेरा = अपना आत्मा का, संविद् ही अनवगाह्य होने के कारण समुद्र (वह) सम्यक् = विषयरूपीकालुष्य को विलीन कर, १९ प्रथममाह्निकम् समन्तात्-सर्वत एव तत्तदिन्द्रियप्रसृतसंविद्द्वारेण ‘उच्छलयतात्’- विकासयतात्, तदेकमयतामुत्पादयतात्-इत्यर्थः । अब्धिसमुच्छलनसमुचितत्त्वाच्च स्फुरदिन्दु कान्ति:’-इत्युक्तम् । वस्तुतो हि अपानव्याप्तिरस्यास्ति–इत्येवं निर्देशः । अथ च देवीसुतः’ वटुकोऽप्येवंविधः, किन्तु शरीरस्य धवलिम्ना ‘स्फुरदिन्दुकान्ति:’ । अस्य हि प्राणव्याप्तिरस्ति इत्येवं निर्दिशन्ति गुरवः । ‘देवीसुतः’ इत्युभयोरपि कुलशास्त्रोचितोऽयं व्यपदेशः । तदुक्तम् ‘देवीपुत्रोऽत्र वटुकः स्वशक्तिपरिवारितः ।’ इति । ‘गणेशो विघ्नहर्तासौ देवीपुत्र………… ।’ इति च ।। ६ ।। इह खलु शास्त्रादौ ………………..स्त्रोतोभेदं संख्यानमेव च । प्रवर्तयेद् गुरुं स्वं च स्तेयी स्यात् तदकीर्तनात् ।।’ इत्याधुक्तदृशा अवश्यमेव शास्त्रकारैः स्वगुर्वादे: कीर्तनं कार्यम्, अतश्च वक्ष्यमाणशास्त्रस्य कुलतन्त्रप्रकियात्मकत्वेन द्वैविध्येऽपि ‘नभ:स्थिता यथा तारा न भ्राजन्ते रवौ स्थिते। समन्तात् = सर्वतः, तत्तत् इन्द्रियों के रूप में विस्तृत संविद् के द्वारा उच्छलित करे = विकसित करे = तदेकमयता को उत्पन्न करे-यह अर्थ है । समुद्र के समुच्छलन से युक्त होने के कारण ‘स्फुरत् इन्दुकान्ति’ यह कहा गया है । ___ वस्तुतः यहाँ अपानव्याप्ति है-ऐसा निर्देश है । देवी के पुत्र बटुक भी ऐसे ही हैं । किन्तु शरीर की धवलता के कारण स्फुरत् चन्द्रकान्त है । इसकी प्राणव्याप्ति है-ऐसा गुरु ने निर्देश किया है । ‘देवीसुत’ कहने से दोनों (= गणेश और बटुक) के लिये यह कुलशास्त्र के उपयुक्त यह कथन है । वही कहा गया ‘यहाँ देवीपुत्र (का अर्थ है) अपनी शक्ति से परिवारित बटुकभैरव ।’ ‘विघ्नहर्ता गणेश ही देवीपुत्र हैं ।। ६ ।’ शास्त्र के प्रारम्भ में “शास्त्र के स्त्रोत (उसका) भेद, संख्या और अपने गुरु का उल्लेख (शास्त्रकार को) करना चाहिये, ऐसा न करने वाला चोर होता है।” इस नियम के अनुसार शास्त्रकारों के द्वारा अपने गुरु आदि का उल्लेख अवश्य करना चाहिये । इसलिये वक्ष्यमाणशास्त्र के कुलप्रक्रिया एवं तन्त्रप्रक्रिया रूप दो प्रकार होने पर भी, ‘जिस प्रकार सूर्य के रहने पर आकाश में स्थित तारे प्रकाशित नहीं होते उसी श्रीतन्त्रालोकः एवं सिद्धान्ततन्त्राणि न विभान्ति कुलागमे ।। तस्मात्कुलादृते नान्यत्संसारोद्धरणं प्रति ।’ इत्याधुक्तया कुलप्रक्रियायाः प्रक्रियान्तरेभ्य: प्राधान्यात् ‘भैरव्या भैरवात्प्राप्तं योगं व्याप्य ततः प्रिये । तत्सकाशात्तु सिद्धेन मीनाख्येन वरानने ॥ कामरूपे महापीठे मच्छन्देन महात्मना ।’ इत्यादिनिरूपितस्थित्या तदवतारकं तुर्यनाथमेव तावत् प्रथमं कीर्तयति रागारुणं ग्रन्थिबिलावकीर्णं यो जालमातानवितानवृत्ति । कलोम्भितं बाह्यपथे चकार स्तान्मे स मच्छन्दविभुः प्रसन्नः॥ ७ ॥ सः’-सकलकुलशास्त्रावतारकतया प्रसिद्धः ‘मच्छा: पाशा: समाख्याताश्चपलाश्चित्तवृत्तयः । छेदितास्तु यदा तेन मच्छन्दस्तेन कीर्तितः ।।’ प्रकार कौलशास्त्र के (उपस्थित) रहने पर सिद्धान्ततन्त्र आभारहित हो जाते हैं । इस कारण कौल शास्त्र के अतिरिक्त दूसरे शास्त्र संसार से उद्धार करने में (सक्षम) नहीं इत्यादि उक्ति के अनुसार कुलप्रक्रिया के दूसरी प्रक्रियाओं की अपेक्षा प्रधान होने से ‘हे प्रिये ! उसके बाद भैरव से भैरवी के द्वारा प्राप्त योग को व्याप्त कर (= साधना कर) उस (भैरवी) से सिद्ध महात्मा मच्छेन्द्रनाथ ने प्राप्त कर कामरूप नामक महापीठ में (इसकी स्थापना की) ।’ ___ इत्यादि में निरूपित स्थिति के अनुसार उसको अवतरित करने वाले तुर्यनाथ का वर्णन करते हैं ___जिन्होंने राग (= गैरिक आदि द्रव्य अथवा राग तत्त्व) के द्वारा लाल, ग्रन्थि (= बन्धन) तथा बिल (= भगसंज्ञक भोगभूमि) से व्याप्त लम्बे चौड़े रूप से युक्त विश्वरूप में सर्वत्र विस्तीर्ण, कला तत्त्व के द्वारा प्रारब्ध जाल (= माया) को बाह्य रूप में स्फुटित किया वे मच्छन्द विभु (= योगी मत्स्येन्द्रनाथ) मेरे ऊपर प्रसन्न हों ।। ७ ।।। वह = समस्त कुलशास्त्र के अवतारक के रूप में प्रसिद्ध । ‘मच्छ का अर्थ है-पाश अर्थात् चञ्चल चित्तवृत्तियाँ । जब उन्होंने (तुर्यनाथ २१ प्रथममाह्निकम् इत्याद्युक्त्या पाशखण्डनस्वभावो मच्छन्द एव परमेश्वरसमावेशशालित्वात् ‘विभुः’ मम प्रसन्नः ‘स्तात्’–स्वात्मदर्शनसंविभागपात्रतामाविष्कुर्यात्-इत्यर्थः । यो ‘जालम्’ मत्स्यबन्धनम्, इन्द्रजालप्रायां च मायां ‘बाह्यपथे चकार’ ‘अष्टौ सिद्धा महात्मानो जालपृष्ठाः सुतेजस: ।’ इत्याधुक्तया तुरीयतास्वरूपावहितत्त्वेन सङ्कोचापहस्तनादनवधेयतां च निन्ये इत्यर्थः । तच्च ‘रागेण’-गैरिकादिद्रव्येण रागतत्त्वेन च ‘अरुणम’-लोहितीकतम इयर्ति- गच्छति इत्यर्थानुगमात् तत्तद्भेददशाप्रसररूपं च, तथा ग्रन्थिभि:’ बन्धनैः ‘बिलैः च सलिलनिर्गमनस्थानैः ‘ग्रन्थौ’ मायाया द्वितीयस्मिन् भेदे ‘बिलैः’ बिलाकाराभिः भगसंज्ञाभिर्भोगभूमिभिश्च ‘अवकीर्णम्’–व्याप्तम्, तथा ‘आतानवितानवृत्ति’-आयामपार्श्वमानयुक्तं विश्वाकारत्वात् सर्वत: प्रसरद्रूपं च, तथा ‘कलया’ विच्छित्तिविशेषेण कलातत्त्वेन च अर्थात्क्षितिपर्यन्तेन ‘उम्भितम्’ आरब्धम् । यदुक्तम् ‘मायारूपं भवेज्जालं दारयेत्कुलचिन्तकः । विश्वाकारं महाजालं नाडीसूत्रनियोजितम् ।। भुवनाक्षसमोपेतं तत्त्वग्रन्थिदृढीकृतम् । ने) उनका भेदन कर दिया तब से वे मच्छन्द कहलाने लगे ।’ इत्यादि उक्ति के अनुसार पाशखण्डनस्वभाव वाले मच्छन्द ही परमेश्वर समावेश वाला होने से ‘विभू’ मेरे ऊपर प्रसन्न हों अर्थात् स्वात्मदर्शन के संविभाग की पात्रता को आविष्कृत करें । जिन्होंने कि जाल = मत्स्यबन्ध और इन्द्रजाल जैसी माया को बाह्यपथ (= प्रकाशपरिवेश) से बाहर कर दिया । ‘आठ सिद्धमहात्मा ऐसे हैं जो जालपृष्ठ और तेजस्वी हैं ।’ इत्यादि उक्ति के अनुसार तुरीयतास्वरूप में ध्यानस्थ होने से सङ्कोच को हटाने के साथ अनवधानता को दूर कर दिया । वह जाल राग = गेरू आदि द्रव्य और रागतत्व के कारण अरुण = लाल कर दिया गया । (‘अरुण’ शब्द की व्याख्या करते हैं-) इयर्ति = गच्छति इस अर्थ का अनुगमन करने से (अरुण = ) तत्तद् भेददशा का प्रसरण । ग्रन्थियों = बन्धनों बिलों = बन्धनों, पानी निकलने के स्थानों, ग्रन्थि में = माया के द्वितीय भेद में, बिलों = बिल के आकार वाली योनियों तथा भोगभूमियों से, अवकीर्ण = व्याप्त, तथा आतानवितानवृत्ति = लम्बाई चौड़ाई से युक्त और विश्वाकाररूप होने के कारण प्रसार वाले तथा कला = कलाबाजी और कला तत्त्व के द्वारा अर्थात् पृथिवीपर्यन्त, उम्भित = आरब्ध । जैसा कि कहा गया ____ माया ही जाल है । कुल परम्परा में दीक्षित व्यक्ति उसका छेदन करता है । (यह) महाजाल विश्व के आकार वाला है (पक्षान्तर में) नाड़ीरूपी धागे से बना है । श्रीतन्त्रालोकः कलारागयुतं चैव.. ……. ।।’ इत्यादि ।। ७ ।। ‘श्रीमच्छ्रीकण्ठनाथाज्ञावशात्सिद्धा अवातरन् । त्र्यम्बकामर्दकाभिख्यश्रीनाथा अद्वये द्वये । द्वयाद्वये च निपुणा: क्रमेण शिवशासने । आद्यस्य चान्वयो जज्ञे द्वितीयो दुहितृक्रमात् ।। स चार्धत्र्यम्बकाभिख्यः सन्तान: सुप्रतिष्ठितः । अतश्चार्धचतस्त्रोऽत्र मठिकाः सन्ततिक्रमात् ।।’ इति वक्ष्यमाणस्थित्या श्रीसन्तत्यामर्दकत्रैयम्बकार्धत्रयम्बकाख्यासु सार्धासु तिसृषु मठिकासु मध्यात् वक्ष्यमाणतन्त्रप्रक्रियाया: त्रैयम्बकमठिकाश्रयणेन आयाति क्रमोऽस्ति इति सामान्येन तावत् गुरूनभिमुखयति त्रयम्बकाभिहितसन्ततिताम्रपर्णी सन्मौक्तिकप्रकरकान्तिविशेषभाजः । पूर्वे जयन्ति गुरवो गुरुशास्त्रसिन्धु कल्लोलकेलिकलनामलकर्णधाराः ॥८॥ ‘त्रयम्बक’ इति ‘अभिहिता’ ‘सन्ततिः’ मठिका—इत्यर्थः ।। ८ ।। एवम् भुवन रूपी इन्द्रिय से युक्त है और तत्त्वरूपी ग्रन्थि से दृढ़ किया गया है। यह कला राग (आदि) से युक्त है………….इत्यादि ।। ७ ।। श्रीमान् श्रीकण्ठनाथ की आज्ञा से त्र्यम्बक आमर्दक और श्रीनाथ नामवाले सिद्ध अवतरित हये । वे (क्रमश:) अद्वय, द्वय एवं द्वयाद्वय शैवशास्त्र में निपुण थे । प्रथम (त्र्यम्बक) की परम्परा चली । दूसरे (आमर्दक) की पुत्री का वंश चला । यह सन्तान अर्धत्र्यम्बक नाम से सुप्रतिष्ठित हुआ । इस प्रकार सन्तान परम्परा के अनुसार साढ़े तीन मठिकायें प्रवर्तित हुईं । इस वक्ष्यमाण स्थिति के अनुसार श्रीसन्तति, आमर्दक, त्र्यम्बक और अर्धत्र्यम्बक नामक साढ़े तीन मठिकाओं में से वक्ष्यमाण तन्त्रप्रक्रिया, त्र्यम्बकमठिका को आश्रित करके फैली है । इसलिये सामान्यतया उन गुरुओं का स्मरण करते त्र्यम्बक नामक मठिकारूपी ताम्रपर्णी नदी के उज्ज्वल मुक्तासमूह के समान विशेष कान्ति वाले तथा गम्भीर शास्त्रसिन्धु की लहरों की क्रीड़ा के निर्मल कर्णधार प्राचीन गुरुगण सर्वोत्कर्षेण विराजमान हैं ।। ८ ।। यम्बक नामवाली सन्तति अर्थात् मठिका-यह अर्थ है ।। ८ ।। इस प्रकार प्रथममाह्निकम् ‘शैवादीनि रहस्यानि पूर्वमासन्महात्मनाम् । ऋषीणां वक्त्रकुहरे तेष्वेवानुग्रहक्रिया ।। कलौ प्रवृत्ते यातेषु तेषु दुर्गमगोचरम् । कलापियामप्रमुखमुच्छिन्ने शिवशासने ।। कैलासाद्रौ भ्रमन्देवो मूर्त्या श्रीकण्ठरूपया । अनुग्रहायावतीर्णश्चोदयामास भूतले ।। मुनि दुर्वाससं नाम भगवानूर्ध्वरेतसम् । नोच्छिद्यते यथा शास्त्रं रहस्यं कुरु तादृशम् ।। तत: स भगवान्देवादादेशं प्राप्य यत्नतः । ससर्ज मानसं पुत्रं त्र्यम्बकादित्यनामकम् ।।’ (शि०दृ० ७) इत्याद्युक्त्या कलिकालुष्याद्विच्छिन्नस्य निखिलशास्त्रोपनिषद्भूतस्य षडर्धक्रम विज्ञानस्य त्रयम्बकसन्तानद्वारेण अवतारकत्वादाद्यं कैलासस्थं श्रीश्रीकण्ठनाथाख्यं गुरुं प्रसङ्गात् मठिकान्तरगुरुश्चोत्कर्षयति– जयति गुरुरेक एव श्रीश्रीकण्ठो भुवि पथितः । तदपरमूर्तिर्भगवान् महेश्वरो भूतिराजश्च ॥९॥ “एक एव गुरु:’- इत्यनेन अस्य अवतारकत्वं सूचितम् । ‘महेश्वरः’ इति यः श्रीसन्तत्यर्धत्रयम्बकाख्यमठिकयोर्गुरुतया अनेन अन्यत्रोक्तः परमेश इति ईश ‘शैवागम के रहस्य पहले महात्मा ऋषियों के मुख के अन्दर थे । वे ही अनुग्रह भी करते थे । कलियुग के आने पर उन (शैवागमों) के दुर्गम होने पर शिवशास्त्र कलापि ग्राम तक सीमित रह गया (अन्यत्र) उच्छिन्न हो गया । तब कैलाश पर्वत पर पार्वतीजी के साथ घूमते हुए महादेव प्राणियों के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से श्रीकण्ठरूप में पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए और दुर्वासा नामक ऋषि को प्रेरित किया । (उन्होंने कहा कि) जिस प्रकार यह शास्त्र उच्छिन्न न हो ऐसा प्रयत्न करो । इसके बाद भगवान् (दुर्वासा) ने महादेव से आदेश प्राप्त कर प्रयत्नपूर्वक त्र्यम्बकादित्य नामक मानसपुत्र को उत्पन्न किया ।’ इत्यादि उक्ति के अनुसार कलियुग के मालिन्य के कारण उच्छिन्न समस्त शास्त्रो का सारभूत त्रिकक्रम विज्ञान त्रयम्बक सन्तान के द्वारा अवतारित हुआ इस कारण सर्वप्रथम कैलाश में रहने वाले श्री श्रीकण्ठनाथ गुरु की तथा प्रसङ्गत: अन्य मठिका गुरुओं की भी महत्ता बतलाते हैं पृथ्वी पर प्रसिद्ध प्रधान गुरु श्रीकण्ठनाथ सर्वोत्कृष्ट हैं एवं उन्हीं की दूसरी मूर्ति भगवान् महेश्वर भूतिराज भी सर्वप्रसिद्ध हैं ।। ९ ।। ‘एक ही गुरु’ इस कथन से इन (= श्रीकण्ठनाथ) का अवतारी होना सूचित करते हैं । ‘महेश्वर’ पद से जो श्रीसन्तति एवं अर्धत्र्यम्बक मठिकाओं के गुरु के २४ श्रीतन्त्रालोकः इति च । यदाह ‘भट्टारिकादिभूत्यन्तः श्रीमान्सिद्धोदयक्रम: भट्टादिपरमेशान्त: श्रीसन्तानोदयक्रमः श्रीमान्भट्टादिरीशान्तः परमोऽथ गुरुक्रमः । त्रिकरूपस्त्रिकार्थे मे धियं वर्धयतांतराम ।।’ इति । ‘तदपरमूर्तिः’ इत्यनयोर्भगवदावेशमयत्वं दर्शितम् । यद्यपि ‘यो यत्र शास्त्रेऽधिकृत: स तत्र गुरु:…… ।’ इति वक्ष्यमाणनीत्या मठिकान्तरगुरूणां त्रिकार्थे गुरुत्वाभावात् इह नमस्काराप्रस्ताव एव । तथापि ‘तस्य मे सर्वशिष्यस्य नोपदेशदरिद्रता ।’ इत्यादिदृशा सर्वत्रैव गुरूपदेशस्य भावात् आत्मनि भूयोविद्यत्वं दर्शयता ग्रन्थकृता अस्य ग्रन्थस्यापि निखिलशास्त्रान्तरसारसंग्रहाभिप्रायत्वं प्रकाशितम् । यद्वक्ष्यति ___ ‘अध्युष्टसन्ततिस्रोत:सारभूतरसाहृतिम् । रूप में अन्यत्र ‘परमेशः’ एवं ‘ईश:’ पद से कहे गये, उनका सन्दर्भ सङ्केतित है। जैसा कि कहते हैं ___ ‘भट्टारिका से लेकर भूतिराजपर्यन्त श्रीसिद्धोदय का क्रम है । भट्टारिका से लेकर परमेश्वरपर्यन्त श्रीसन्तति का उदयक्रम है । भट्टारिका से लेकर ईशपर्यन्त अन्तिम गुरुक्रम है । (यह) त्रिकरूप गुरुवर्ग त्रिकशास्त्र के ज्ञान के लिये मेरी बुद्धि को अधिक बढ़ायें ।’ ‘तदपरमूर्ति’ पद से इन दोनों (महेश्वर और भूतिराज) की भगवान् के आवेश से पूर्णता दिखलायी गयी । यद्यपि ‘जो जिस शास्त्र का अधिकारी है उस (शास्त्र) में वही गुरु होता है ।’ इस वक्ष्यमाण नीति के अनुसार दूसरी मठिकाओं के गुरु त्रिकशास्त्र के गुरु नहीं हो सकते । इस कारण नमस्कार नहीं करना चाहिये । तथापि “सबको शिष्य बनाने वाले मेरे लिये उपदेश की दरिद्रता नहीं है । - इत्यादि के अनुसार सर्वत्र ही गुरु का उपदेश होने के कारण अपने विषय में अधिक विद्वत्ता को दिखलाने वाले ग्रन्थकार के द्वारा इस ग्रन्थ को भी समस्त शास्त्रों का सारसंग्रह बताना सङ्केतित हो रहा है । जैसा कि कहेंगे मठिकाओं में निवास कर उनके स्रोत का सारभूत रस निचोड़कर यहप्रथममाह्निकम् २५ विधाय तन्त्रालोकोऽयं स्यन्दते सकलानसान् ॥’ इति ।। ९ ।। ‘पूर्वे जयन्ति गुरवः’ इति सामान्येन कृतेऽपि नमस्कारे योगाङ्गत्वेन समानेऽपि ……….तर्को योगाङ्गमुत्तमम् ।’ इत्याधुक्तया परमोपादेयस्वप्रकाशस्वात्मेश्वरप्रत्यभिज्ञापनपरस्य तर्कस्य कर्तारो व्याख्यातारश्च परं नमस्कर्तव्याः इति विशेषप्रयोजकीकारेण गुरुपरमगुरुपरमेष्ठिन: पुनरपि पराम्रष्टुमाह श्रीसोमानन्दबोधश्रीमदुत्पलविनिःसृताः । जयन्ति संविदामोदसन्दर्भा दिक्प्रसर्पिणः ॥ १० ॥ तदास्वादभरावेशबंहितां मतिषट्पदीम् । गुरोर्लक्ष्मणगुप्तस्य नादसंमोहिनी नुमः ॥ ११ ॥ इदानीम् ‘उपाध्यायान् दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता ।’ इत्याधुक्त्या तस्याचार्यादपि गौरवातिरेकस्मृतेर्निजमपि पितरमाशीर्वादमुखेन तन्त्रालोक (बनाया गया जो कि) समस्त रसों का स्यन्दन करता है ।। ९ ।। ___ ‘पूर्वे जयन्ति गुरवः’ - इन शब्दों के द्वारा सामान्यतया (सबको) नमस्कार करने के बाद भी (सभी) योगाङ्गों के समान स्तर वाला होने पर भी ‘तर्क उत्तम योगाङ्ग है ।’ इत्यादि उक्ति के अनुसार परम उपादेय स्वप्रकाश आत्मदेव के प्रत्यभिज्ञापक तर्क की रचना और व्याख्या करने वाले सर्वाधिक नमस्कार योग्य हैं इस विशेष प्रयोजन को (दृष्टि में रखकर) गुरु, परम गुरु एवं परमेष्ठी गुरु का पुन: परामर्श कर रहे हैं श्रीसोमानन्द के बोधस्वरूप श्रीमान् उत्पलदेव से निकले हुए सभी दिशाओं में फैले हुए ज्ञान के सुगन्ध समूह महान् हैं ।। १० ।। उसके आस्वादभार के आवेश से वृद्धि को प्राप्त नाद के द्वारा (समस्त विद्वज्जन को) मुग्ध करने वाली गुरु लक्ष्मणगुप्त की बुद्धिभ्रमरी को (हम) प्रणाम करते हैं ।। ११ ।। अब, ‘दश उपाध्यायों को एक आचार्य सौ आचार्यों के एक पिता (अतिशयित करता है)। इस उक्ति के अनुसार उस (= पिता) के आचार्य से भी बढ़कर गौरव का २६ श्रीतन्त्रालोकः परामृशति यः पूर्णानन्दविश्रान्तसर्वशास्त्रार्थपारगः । स श्रीचुखुलको दिश्यादिष्टं मे गुरुरुत्तमः॥ १२ ॥ ‘चुखुलकः’ इति लोकप्रसिद्धमस्य नामान्तरम् । ‘गुरुरुत्तमः’ इति उत्तमत्वस्य आचार्यगौरवातिरेकस्मृतिरेव निमित्तम्, अत एव अन्यत्रापि ‘गुरुभ्योऽपि गरीयांसं जनकं चुखुलकाभिधम् ।’ इत्याधुक्तम् ।। १२ ।। एवं च तन्त्रप्रक्रियोपासन्नगुर्वभिमुखीकरणानन्तरं विश्रान्तिस्थानतया कुल प्रक्रियागुरुमपि उत्कर्षयति जयताज्जगदुद्धृतिक्षमोऽसौ भगवत्या सह शम्भुनाथ एकः । यदुदीरितशासनांशुभिर्मे प्रकटोऽयं गहनोऽयं शास्त्रमार्गः ॥ १३ ॥ भगवत्याख्या अस्य दूती, कुलप्रक्रियायां हि दूतीमन्तरेण क्वचिदपि कर्मणि स्मरण करने के कारण अपने ही पिता का आशीर्वाद के माध्यम से परामर्श कर रहे हैं जो पूर्ण आनन्द में विश्राम करने वाले तथा समस्त शास्त्रों के पारङ्गत हैं वे मेरे उत्तम गुरु (= पिता) श्रीचुखुलक मेरा मनोरथ पूर्ण करें ।। १२ ।। ‘चुखुलक’ इनका दूसरा लोकप्रसिद्ध नाम है । ‘गुरुरुत्तमः’ में उत्तम पद का कथन, (इनका गौरव) आचार्य के गौरव से बढ़कर है-इस स्मरण के कारण है । इसीलिये अन्यत्र भी… ‘गुरुओं से बढ़कर चुखुलक नामक पिता को……. ।’ इत्यादि कहा गया है ।। १२ ।। इस प्रकार तन्त्रप्रक्रिया की उपासना करने वाले गुरुओं के नमस्कार के बाद कुलप्रक्रिया वाले गुरु का परामर्श करते हैं जगत का उद्धार करने में समर्थ, भगवती (नामक दूती) के साथ शोभायमान आदरणीय शम्भुनाथ, जिनके द्वारा कहे गए उपदेश की किरणों से अत्यन्त गहन भी यह शास्त्रमार्ग आलोकित हुआ, सर्वातिशायी हों ।। १३ ।। भगवती नामक इनकी दूति थी । कौल प्रक्रिया में दूती के बिना किसी भी प्रथममाह्निकम् २७ नाधिकारः इत्यतस्तत्सहभावोपनिबन्धः । ‘योक्ता संवत्सरात्सिद्धिरिह पुंसां भयात्मनाम्। सा सिद्धिस्तत्त्वनिष्ठानां स्त्रीणां द्वादशभिर्दिनैः ।। अत: सुरूपां सुभगां सरूपां भाविताशयाम् । आदाय योषितं कुर्यादर्चनं यजनं हुतम् । इति ।। ‘शास्त्रमार्गो’ विमलो जातः इत्यनेनास्य त्रिकाद्यागमव्याख्यातृत्वमपि प्रकाशितम् । यदुक्तमनेनैव ‘इत्यागमं सकलशास्त्रमहानिधाना ___च्छ्रीशम्भुनाथवदनादधिगम्य सम्यक् । शास्त्रे रहस्यरससंततिसुन्दरेऽस्मिन् ___ गम्भीरवाचि रचिता विवृत्तिर्मयेयम् ।।’ इति ।। १३ ।। इदानीं स्वप्रवृत्तिप्रयोजनादि आचक्षाणो ग्रन्थकारो ग्रन्थकरणं प्रति- जानीते सन्ति पद्धतयश्चित्राः स्त्रोतोभेदेषु भूयसा। अनुत्तरषडर्धार्थक्रमे त्वेकापि नेक्ष्यते ॥१४॥ न चात्र अन्यथा सम्भाव्यम्-इत्यात्मन्याप्तत्वं प्रख्यापयन्नेवं प्रतिज्ञाकरणे सामर्थ्य दर्शयति कर्म में अधिकार नहीं होता इसलिये उसका साहचर्य कहा गया । ‘भययुक्त पुरुषों की जो सिद्धि एक साल में होती है वह सिद्धि तत्त्वनिष्ठ स्त्रियों को बारह दिनों में प्राप्त होती है । इसलिये सुन्दर रूप वाली, सुन्दर अङ्ग वाली या सौभाग्यवती सुन्दर भावनाओं वाली स्त्री को साथ लेकर पूजन, यजन और हवन करना चाहिये ।’ शास्त्रमार्ग निर्मल हो गया-इस कथन से (यह शम्भुनाथ) त्रिक आदि आगम के व्याख्याता है—यह प्रकाशित होता है । जैसा कि इन्होंने ही कहा है ‘इस प्रकार सकलशास्त्र के कोशभूत श्रीशम्भुनाथ के मुख से भलीभाँति अध्ययन कर रहस्य रस परम्परा से सुन्दर तथा गम्भीर शब्दावली वाले इस शास्त्र की विवृति मैने बनायी’ ।। १३ ।। ___ अब अपनी प्रवृत्ति, प्रयोजन आदि को कहने वाले ग्रन्थकार ग्रन्थरचना की प्रतिज्ञा करते हैं यद्यपि ज्ञान धाराओं के भिन्न होने के कारण अनेक चित्रविचित्र पद्धतियाँ हैं तथापि अनुत्तर त्रिकार्थ कर्म के विषय में उनमें से एक भी पद्धति दृष्ट नहीं होती, अर्थात् उत्कृष्ट प्रतीत नहीं होती ।। १४ ।। इस विषय में अन्यथा नहीं समझना चाहिये इसलिये अपनी आप्तता को श्रीतन्त्रालोक: इत्यहं बहुशः सद्भिः शिष्यसब्रहाचारिभिः । अर्थितो रचये स्पष्टां पूर्णार्थी प्रक्रियामिमाम् ॥ १५ ॥ श्रीभट्टनाथचरणाब्जयुगात्तथा श्री ____ भट्टारिकांघ्रियुगलाद् गुरुसन्ततिर्या । बोधान्यपाशविषनुत्तदुपासनोत्थ बोधोज्ज्वलोऽभिनवगुप्त इदं करोति ॥ १६ ॥ तस्य गुरूपरम्परागतस्य ज्ञानस्य ‘उपासनम्’–पुन: पुन: चेतसि विनिवेशनम् तत उत्थितो योऽसावुपदेष्टव्यविषयो ‘बोध:’-साक्षात्कारः, तेन ‘उज्ज्वल:’ सम्यगवगतधर्मा सन्, ‘इदम्’ गुरूपदेशात्संशयविपर्यासादिरहितत्त्वेनाधिगतमनुत्तर त्रिकार्थप्रक्रियालक्षणम् परान्प्रति चिख्यापयिषया ‘करोति’-उपदिशति- इत्यर्थः । ‘अभिनवगुप्तः’ इति सकललोकप्रसिद्धनामोदीरणेनापि आफ्नमेव उमेद्वलितम् । उक्तं हि ‘साक्षात्कृतधर्मा यथादृष्टस्यार्थस्य चिख्यापयिषया प्रयुक्त उपदेष्टा चाप्त: ।’ इति ।। तच्छब्दपरामृष्टं व्याचष्टे ‘या गुरुसन्ततिः’ इति, ‘गुरुसन्ततिः’ गुरुपारम्पर्यम बतलाते हुए इस प्रकार प्रतिज्ञा के करने में सामर्थ्य दिखलाते है ___ इसलिए मैं वर्तमान सभ्य शिष्यों एवं ब्रह्मचारियों के द्वारा अनेकों बार प्रार्थित होने के कारण स्पष्ट एवं परिपूर्ण अर्थवाली इस प्रक्रिया की रचना कर रहा हूँ ।। १५ ।।. श्रीभट्टनाथ के दोनों चरणकमलों तथा श्रीभटारिका के दोनों चरणों से जो महती-गुरु-परम्परा चली, ज्ञान से भिन्न अर्थात् अज्ञानपाशरूपी विष को दूर करने वाली, उस (परम्परा) की उपासना से उत्थित बोध से उज्ज्वल अर्थात् धर्म का सम्यक ज्ञान करने वाला (में) अभिनवगुप्त इस शास्त्र का व्याख्यान कर रहा हूँ ।। १६ ।। ___ गरुपरम्परा से आये हए उस ज्ञान की उपासना = बार-बार चित्त में विनिवेश, उससे निकला जो यह उपदेष्टव्य विषयक बोध = साक्षात्कार, उससे उज्ज्वल = सम्यक् अवगत कर्म वाला, यह = गुरु के उपदेश से संशय-विपर्यय रहित होकर ज्ञात अनुत्तर त्रिक अर्थ की प्रक्रिया वाला, दूसरों को बतलाने की इच्छा से करते हैं = उपदेश देते हैं । ‘अभिनवगुप्त = इस सकललोकप्रसिद्ध नाम कहने से भी आप्तत्व ही कहा गया । कहा भी गया है’ साक्षात्कृतधर्मा = जैसा देखा गया वैसे ही अर्थ को बतलाने की इच्छा से प्रयुक्त उपदेष्टा, प्राप्त होता है । ‘तत्’ शब्द से परामृष्ट की व्याख्या करते हैं—जो गुरु परम्परा… । गरुसन्तति प्रथममाह्निकम् विच्छिन्नतया स्थितं तदुपदिष्टं ज्ञानम्-इत्यर्थः, सा च कीदृक्? इत्युक्तम् बोधान्यपाशविषनुत्’ इति । ‘यत्किंचित्परमाद्वैतसंवित्स्वातन्त्र्यसुन्दरात् । पराच्छिवादुक्तरूपादन्यत्तत्पाश उच्यते ।।’ इत्यादिवक्ष्यमाणनीत्या ‘बोधात्’ पराच्छिवाद्यदख्यात्यात्म भेदप्रथात्मकम् ‘अन्यत्’ तदेव ‘पाश:’ स एव मोहकत्वात् ‘विषम् तत् नुदति या सा । तथा ‘श्रीभट्टनाथः’ इति श्रीशम्भुनाथः । ‘श्रीभट्टारिका’ इति भगवत्याख्या अस्य दूती । यदुक्तमनेनैव ‘भट्ट भट्टारिकानाथं श्रीकण्ठं दृष्टभैरवम् । भूतिकलाश्रिया युक्तं नृसिंह वीरमुत्कटम् ।। नानाभिधानमाद्यन्तं वन्दे शम्भुं महागुरुम् ।’ इति । ‘स्त्रीमुखे निक्षिपेत्प्राज्ञः स्त्रीमुखाद् ग्राहयेत्पुनः ।’ इत्याधुक्तेः कुलप्रक्रियायां दूतीमुखेनैव शिष्यस्य ज्ञानप्रतिपादनाम्नायात् इह गुरुतदूत्योः समस्कन्धतया उपादानम् ।। १६ ।। ननु सामान्येन त्रिकदर्शनप्रक्रियाकरणं प्रतिज्ञाय, सम्भवत्यपि तदर्थाभि = अविच्छिन्नरूप में स्थित गुरुपरम्परा के द्वारा उपदिष्ट ज्ञान । वह (= सन्तति) कैसी है? उत्तर देते हैं-(संविद्) बोध से भिन्न पाशरूपी विष को हटाने वाली । ‘परम अद्वैत संवित्स्वातन्त्र्य से सुन्दर उक्तरूप वाले परशिव से जो भिन्न है, वह पाश है ।’
  • इत्यादि वक्ष्यमाण रीति से बोध = परशिव से भिन्न जो अख्यातिरूप भेदप्रथा है, वही पाश है, वही मोह उत्पन्न करने के कारण विष है, उसको जो दूर करती है, श्रीभट्टनाथ = श्रीशम्भुनाथ । श्रीभट्टारिका = भगवती नामक इनकी दूती । जैसा कि इन्होंने ही कहा _ ‘भट्टारिकानाथ भट्ट श्रीकण्ठ जो कि साक्षाद् भैरवरूप एवं ऐश्वर्य की कला की शोभा से युक्त है । वे नृसिंह हैं, उत्कट वीर हैं, अनेक नामों वाले हैं, आदि और अन्त हैं । ऐसे महागुरु श्रीशम्भुनाथ की मैं वन्दना करता हूँ।’ ‘बुद्धिमान् (गुरु) स्त्री मुख में (उपदेश) को रखे और स्त्रीमुख से ही (शिष्य को) ग्रहण कराये। ____ इत्यादि उक्ति के अनुसार कुलप्रक्रिया में दूती के मुख से ही शिष्य के ज्ञान का प्रतिपादन आगम (में कहा गया) है । इस कारण यहाँ गुरु और उनकी दूती का समान स्तर माना गया है ।। १६ ।। ३० श्रीतन्त्रालोकः धायिनि शास्त्रजाते किमिति श्रीमालिनीविजयोत्तरमेवाधिकृत्य तन्निर्वाहयिष्यते ? इत्याशङ्कयाह न तदस्तीह यन्न श्रीमालिनीविजयोत्तरे । देवदेवेन निर्दिष्टं स्वशब्देनाथ लिङ्गतः ॥ १७ ॥ ‘श्रीमालिनीविजयोत्तरे’ इति नादि-फान्ताया मालिन्या ‘विजयेन’ सर्वोत्कर्षेण, उत्तरतिसर्वस्रोतोभ्य: प्लवते, सारभूतत्त्वात्सर्वशास्त्राणम् ।। १७ ।। एतदेवाह दशाष्टादशवस्वष्टभिन्नं यच्छासनं विभोः। तत्सारं त्रिकशास्त्रं हि तत्सारं मालिनीमतम् ॥ १८ ॥ इह खलु परपरामर्शसारबोधात्मिकायां परस्यां वाचि सर्वभावनिर्भरत्वात्सर्वं शास्त्रं परबोधात्मकतयैव उज्जृम्भमाणं सत्, पश्यन्तीदशायां वाच्यवाचकाविभाग स्वभावत्वेन असाधारणतया अहंप्रत्यवमशाा अन्तरुदेति, अत एव हि तत्र प्रत्यवमर्शकेन प्रमात्रा परामृश्यमानो वाच्योऽर्थोऽहन्ताच्छादित एव स्फुरति, तदनु प्रश्न है कि सामान्य रूप से त्रिकदर्शन की प्रक्रिया के विधान की प्रतिज्ञा कर उस अर्थ को बतलाने वाले अन्य शास्त्रों के रहने पर भी मालिनीविजयोत्तर को ही आधार बनाकर इस (रचना) को क्यों किया जा रहा है?-उत्तर देते हैं इस (ग्रन्थ) में कोई ऐसा (विषय) नहीं है जो श्रीमालिनीविजयोत्तर तन्त्र में न हो, ऐसा स्वयं भगवान देवाधिदेव शङ्कर ने अपने वचनों से तथा प्रमाणों के द्वारा निर्दिष्ट किया है ।। १७ ।। ___ ‘न’ से लेकर ‘फ’ तक की वर्णमाला मालिनी है, उसके विजय से = सर्वोत्कर्ष से, उत्तरण करता है = सभी स्रोतों से बढ़कर है । क्योंकि यह ग्रन्थ सभी शास्त्रों का सार है ।। १७ ।। इसी को कहते हैं भगवान शङ्कर का जो उपदेश दश, अट्ठारह एवं चौंसठ भेदों वाला है, उस सब का तत्त्व त्रिकशास्त्र है और श्रीमालिनीविजयतन्त्र का सिद्धान्त उसका सार है ।। १८ ।। ___ परतत्त्व के परामर्श का सारभूत जो बोध, तत्त्वरूपा परावाक् के भीतर सर्वभाव से पूर्ण होने के कारण समस्त शास्त्र परबोध के रूप में समुल्लसित होते हैं पश्यन्ती दशा में वाच्यवाचक के सम्मिलित रूप होने से असाधारणरूप से (वही शास्त्र) अन्तःकरण में ‘अहम्’ प्रत्यवमर्श के रूप में उदित होता है । इसीलिये उसमें प्रत्यवमर्शक प्रमाता के द्वारा परामृश्यमान वाच्य अर्थ ‘अहम्’ भाव से प्रथममाह्निकम् तदेव मध्यमाभूमिकायामन्तरेव वेद्यवेदकप्रपञ्चोदयाद् भिन्नवाच्यवाचकस्वभावतया उल्लसति । तत्र हि परमेश्वर एव चिदानन्देच्छाज्ञानक्रियात्मकवक्त्रपञ्चकासूत्रणेन सदाशिवेश्वरदशामधिशयानस्तद्वक्त्रपञ्चकमेलनया पञ्चस्रोतोमयम् अभेदभेदाभेद भेददशोट्टङ्कनेन तत्तद्रेदप्रभेदवैचित्र्यात्म निखिलं शास्त्रमवतारयति, यद्बहिर्वैखरी दशायां स्फुटतामियात् । तथाहि प्रथममीशानतत्पुरुषसद्योजातैरेकैकस्य उबुभूषुभिः सद्भिर्भेदत्रयमुल्लासितम्, उद्भूतैश्च इत्येकैकभेदा: षट्, त्रिभिरप्येभिः सम्भूय उल्लासित एको भेदः, ईशतत्पुरुषौ ईशसद्योजातौ सद्योजाततत्पुरुषौ इति द्व्यात्मना सम्भूयापि एभिः त्रिभिर्भेदत्रयं समुल्लासितम्-इत्येते भेदप्रधाना दश शिवभेदाः । तदुक्तम् ‘ईशतत्पुरुषाजातैरुद्भूतैरुबुभूषुभिः । एककैः षड्भिरेकेन त्रिकेण द्व्यात्मकैस्त्रिभिः ।। तदित्थं शिवभेदानां दशानामभवत्स्थितिः ।’ इति । एषामेव च वामदेवाघोरमेलनया अष्टादश रुद्रभेदा भवन्ति । तथा च तत्रैककेन वामदेवाघोरात्मभेदेन भेदद्वयमेव, पञ्चविधत्वेऽपि ईशादेर्वक्त्रत्रयस्य शिवभेदेषु उक्तत्वात् उक्तस्य च पुनर्वचनानुपत्तेः, तथा व्यात्मकत्वेन भेदत्रयस्य, आच्छादित होकर स्फुरित होता है । उसके बाद वही (शास्त्र) मध्यमा राज्य में अन्दर ही अन्दर वेद्यवेदकप्रपञ्च के उदय के कारण वाच्यवाचक के रूप में उल्लसित होता है । उसमें परमेश्वर ही चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान, क्रिया रूप पाँच मुखों को धारण कर सदाशिव ईश्वर दशा को प्राप्त कर उन पाँचो मुखों के मेलन से पाँच स्रोतों वाला अभेद भेद दशा के प्रकटीकार के द्वारा तत्तद् भेद-प्रभेद के कारण विचित्र समस्त शास्त्रों को अवतरित करते हैं । जो कि बाहर वैखरी दशा में स्फुट होता है । वह इस प्रकार-सबसे पहले ईशान तत्पुरुष एवं सद्योजात में से प्रत्येक जब उद्भूत (प्रकट) होना चाहते हैं तब उनके द्वारा तीन भेद प्रकट किया जाता है । उद्भूत होने से उनका एक-एक भेद होता है । इस प्रकार ये छः हो जाते हैं । ये तीनों मिलकर एक भेद बनाते हैं फिर ईश + तत्पुरुष, ईश + सद्योजात और सद्योजात + तत्पुरुष इस प्रकार दो-दो साथ मिलकर ये तीन-तीन भेद बनाते हैं इस प्रकार ये भेदप्रधान शिव की दश अवस्थायें होती हैं । वही कहा गया ‘ईशान तत्पुरुष सद्योजात के एक-एक के उद्भूत और उद्मभूषु भेद से छ: प्रकार होते हैं । फिर एक त्रिक और तीन द्वयात्मक से (चार भेद बनते हैं। इस प्रकार शिव के दश भेद होते हैं ।’ ___ इन्हीं के साथ वामदेव और अघोर को मिला देने पर अट्ठारह रुद्र हो जाते हैं। इस प्रकार-वामदेव और अघोर के एक-एक भेद से दो भेद होते हैं । (शिव के) ३२ श्रीतन्त्रालोकः तेन पञ्चानां त्र्यात्मकत्वेन भेदत्रयस्य शिवभेदेषु उक्तत्वात् । तत्पुरुषसद्योजातयोस्तु एवं स्वभावाभावात्, ताभ्यां सह असङ्गतेर्भेदचतुष्टयाभावादीशवामौ, ईशाघोरौ, अघोर-वामौ—इति द्व्यात्मकं भेदत्रयमेव अवशिष्यते-इति त्रयो द्विकभेदाः । तथा पञ्चनामापि ईशतत्पुरुषाजातवामाघोराणां त्र्यात्मकत्वेन संमीलनायामीशानस्य क्रमेण इतरवक्त्रसंभेदे षट्, तत्पुरुषस्य त्रयः, तथा सद्योजातस्य तदवशिष्टवक्त्रसंभेदेऽपि एक एव-इति दशविधत्वेऽपि ईश-तत्पुरुष-सद्योजातात्मनः प्रथमत्रिकस्य शिवभेदेषु उक्तत्वात् ईशवामाघोरात्मन:-शिष्टस्य त्रिकस्य व्यापारान्तरेण नियोक्ष्य माणत्वाच्च त्र्यात्मकभेदाष्टकमेवावशिष्यते-इत्यष्टावेव त्रिकभेदाः । अत एव एकककथनं चिन्त्यमिति न वाच्यम्, तत्पुरुषाजातवामाघोराणां हि द्वयात्मकतया चतुरात्मकतया वा ज्ञानजनने संयोगनिषेधो विवक्षितः, त्र्यात्मकतायामपि तथाभावे हि बहूनां भेदानां निषेधः प्रसृज्यते, इति भेदसप्तककथनमपि न्याय्यं न स्यात्।। इत्यलं बहना । तथा पञ्चानाममप्येषां चतरात्मकत्वेन संमीलनाया पञ्चविधत्वेऽपि नराजातवामाघोराणामुक्तयुक्त्या सङ्गत्यभावाच्चत्वारश्चतुर्भेदाः, सर्वेषामप्येषां संमीलनायां पञ्चकभेद एक एव-इत्येवम् ‘अष्टादश’ भेदाभेदप्रधाना रुद्रभेदाः । पाँच मुख होने पर भी ईशान आदि तीन (मुख) ही शिवभेद में कहे गये है। उक्त को फिर से कहना अनुचित होता है । तीन भेद भी द्व्यात्मक हैं । इसलिये पाँच भी तीनभेदात्मक ही हैं, तीन भेद शिवभेद में कहे गये हैं। तत्परुष और सद्योजात का ऐसा स्वभाव नहीं है । इस कारण उनके साथ सङ्गति न बैठने से चार भेद नहीं होने से ईश-वाम, ईश-अघोर, अघोर-वाम इस प्रकार दो-दो वाले तीन भेद ही बचते हैं । इस प्रकार दो समूह वाले तीन भेद हैं । उसी प्रकार ईशान तत्पुरुष सद्योजात वामदेव और अघोर इन पाँचों के त्र्यात्मक होने से सम्मेलन करने पर ईशान का क्रम से दूसरे मुखों के साथ भेद होने पर छः, तत्पुरुष सद्योजात रूप प्रथम त्रिक का शिव भेद के रूप में निर्वचन होने से ईशान वामदेव अधोर रूप शेष त्रिक का दूसरे व्यापार में लगाये जाने के कारण तीन-तीन वाला आठ भेद ही बचता है । इस प्रकार त्रिक के आठ ही भेद हैं । इसलिये ‘एकल’ कहना चिन्तनीय (व्यर्थ) है—ऐसा नहीं कहना चाहिये, क्योंकि यहाँ तत्पुरुष सद्योजात वामदेव और अघोर का ज्ञान के उत्पादन में दो-दो या चार-चार रूप में संयोग का निषेध विवक्षित है । त्र्यात्मकता होने पर भी वैसा होने (= ज्ञान के उत्पादन) में अनेक भेदों का निषेध प्राप्त होता है इसलिये सात भेदों का वर्णन भी उचित नहीं होगा-इतना पर्याप्त है । __इसी प्रकार इन पाँचों का चार के रूप में सम्मेलन करने पर पाँच प्रकार होने पर भी नर (= तत्पुरुष) सद्योजात वामदेव और अघोर की उक्त रीति से सङ्गति न होने से चार-चार के चार भेद होते हैं और इन सबको मिला देने पर पाँच का एक ही भेद होता है । इस प्रकार भेद-अभेदप्रधान अठारह रुद्रभेद होते हैं । वही कहा गया प्रथममाह्निकम् ३ तदुक्तम् ‘यदा त्रयाणां वक्त्राणां वामदक्षिणसङ्गतिः । तदा सप्त द्विकभेदा अष्टौ चैव त्रिकात्मकाः ।। चतुष्काश्चापि चत्वारः पञ्चकस्त्वेकरूपकः । इति विंशतिमध्यात्तु नराजातावसङ्गतिम् ।। वामाघोरद्वये यातः स्वातन्त्र्यात्पूर्वपश्चिमौ । ज्ञानं भजेते नैवेति भेदषोडशकं स्थितम् ।। तत्रापि वामदेवीयमेकं तदुपरि स्थितम् । स्वरूपं भैरवीयं च तेनाष्टादशधा स्थितिः ।। रुद्रभेदस्य शास्त्रेषु शिवेनैवं निरूपिता ।’ इति । एतच्च श्रीश्रीकण्ठ्यामभिधानपूर्वं विस्तरत उक्तम्, तद्यथा ‘स्रोतस्यूवें भवेज्ज्ञानं शिवरुद्राभिधं द्विधा । कामजं योगजं चिन्त्यं मौकुटं चांशुमत्पुनः ।। दीप्त. ……………………..न्तरं पुनः । शिवभेदा: समाख्याता रुद्रभेदांस्त्विमाछृणु ।। विजयं चैव नि:श्वासं मद्गीतं पारमेश्वरम्। मुख्यबिम्बं च सिद्धं च सन्तानं नारसिंहकम् ।। चन्द्रांशुं वीरभद्रं च आग्नेयं च स्वयम्भुवम्। विसरं रौरवाः पञ्च विमलं किरणं तथा ।। ललितं सौरभेयं च तन्त्राण्याहर्महेश्वरि । अष्टाविंशतिरित्येवमूर्ध्वस्रोतोविनिर्गताः ।’ ‘जब (परमेश्वर के) तीन मुखों की वाम और दक्षिण सङ्गति बनती है तब दो-दो के सात भेद और तीन-तीन के आठ भेद होते हैं । चार-चार का चार भेद और पाँच का एक भेद होता है । इस प्रकार बीस में से तत्पुरुष और सद्योजात की वामदेव और अघोर के साथ सङ्गति नहीं होती और अपने स्वातन्त्र्य के कारण पूर्व और पश्चिम दोनों ज्ञान को नहीं प्राप्त करता । इस प्रकार यह भेद १६ ही रहता है। उसमें भी वामदेव का एक भेद और उसके ऊपर भैरव का स्वरूप रहता है । इस प्रकार १८ रुद्रभेद हैं । इस (भेद) को शिव ने ही शास्त्रों में निरूपित किया है । यह (भेदवर्णन) श्रीकण्ठीसंहिता में विस्तारपूर्वक कथित है । जैसे—‘इस परम्परा में आगे चलकर शिव और रुद्र नामक दो प्रकार का ज्ञान होता है । कामज योगज चिन्त्य मौकुट अंशुमत् दीप्त… आदि शिवभेद कहे गये । अब रुद्रभेदों को सुनो । विजय, नि:श्वास, मद्गीत, पारमेश्वर, मुखबिम्ब, सिद्ध, सन्तान, नारसिंह, चन्द्रांशु, वीरभद्र, आग्नेय, स्वायम्भव, विसर, रौरव, विमल, किरण, ललित, सौरभेय-ये ३ त.प्र. श्रीतन्त्रालोकः अत्र चानेनैव ………………… शिवैरूक्तः शिवाभिधः । भेदो रुद्रैश्च रुद्राख्य इति भेदो निरूपितः ।।’ ‘वभिः’ अष्टभिर्गुणिता ‘अष्टो’ चतुःषष्टिभैरव भेदाः । तथा च अद्वयस्वभावे स्वरूपे शिवशक्तितत्सङ्घट्टाख्ययोगिनीवक्त्रात्मनि दक्षिणवक्त्रे प्रत्येकमुहुभूषूद्भूत तिरोधित्सु-तिरोहितात्मकतया चतूरूपत्वेन भेदषोडशात्मकमितरद्वक्रचतुष्टयं यदा युगपदन्तर्लीनतामेति तदैषां परस्परमेलनया चतुःषष्टिद्वयप्रधाना भैरवभेदाः । तदुक्तम् ‘यच्चान्ते दक्षिणं हार्द लिङ्गं हृत्परमं मतम् । तदप्यन्त:कुताशेषस्प(सृ)ष्टभावसुनिर्भरम् ॥ सर्वसंहारकत्वाच्च कृष्णं तिमिररूपधृत् । भेदभावकमायीयतेजोऽशासनात्मकम् ॥ तत्रान्तर्लीनतां याति यावद्वक्त्रचतुष्टयम् । उबुभूषुतथोद्भूतं तिरोधिरत्सु तिरोहितम् ।। इत्थं युगपदेवैतभेदषोडशकात्मकम् । दक्षे वैसर्गिके हा स्वतन्त्रेऽथ शिवे विशत्।। अष्टाष्टकात्म तच्छास्त्रं युगपद्धैरवाभिधम् ।’ इति । एतच्च श्रीश्रीकण्ठ्यामभिधानपूर्व विस्तरत उक्तम् । तद्यथा २८ तन्त्र हैं जो कि हे महेश्वरि! ऊर्ध्व स्रोत से निकले हैं।’ यहाँ पर इन्होंने ही ‘शिव के द्वारा कहे गये भेद शैव और रुद्र के द्वारा कहे गये भेद रुद्र कहे गये हैं । आठ को आठ से गुणा करने पर ६४ भैरवागम हैं अद्वय अवस्था में शिव और शक्ति के सङ्घट्ट नामक योगिनी-मुख में दक्षिण मुख में प्रत्येक उद्रुभूषु-उद्भूत, तिसोधित्सु और तिरोहित इन चार रूपों से १६ भेद हैं । शेष चार मुख जब अन्तर्लीन हो जाते हैं तब इनके परस्पर मेल से ६४ अद्वय प्रधान भैरव भेद होते हैं वही कहा गया ___ ‘जो अन्त में दक्षिण हृदय सम्बन्धी लिङ्ग है वही परम हृत् कहा गया है। वहीं (त्रिकोण या योनि के) अन्दर समस्त सृष्टि करने वाला होता है । सबका संहारक होने से वह काले रङ्ग का है और अंधकार रूप वाला (= आवरक) है । वह भेद को उत्पन्न करने वाले मायीय तेज के अंश को निगल जाता है । उसमें उद्धृभूषु, उद्भुत, तिरोधित्सु और तिरोहित ये चारों मुख अन्तर्लीन हो जाते हैं । इस प्रकार यह एक साथ सोलह भेदों वाला हो जाता है । दक्ष वैसर्गिक हार्द एवं स्वतन्त्र शिव में उनका प्रवेश हो जाता है । ६४ भेदों वाला यह भैरवागम (गुरुकृपागम्य है)३५ प्रथममाह्निकम् ‘अन्यत्संक्षेपतो वक्ष्ये गीतं यत्परमेष्ठिना । तच्चभेदैः प्रवक्ष्यामि चतुःषष्टिं विभागशः ।। भैरवं यामलं चैव मताख्यं मङ्गलं तथा । चक्राष्टकं शिखाष्टकं बहुरूपं च सप्तमम् ।। वागीशं चाष्टमं प्रोक्तमित्यष्टौ वीरवन्दिते । एतत्सादाशिवं चक्रं कथयामि समासतः ।। स्वच्छन्दो भैरवश्वचण्ड: क्रोध उन्मत्तभैरवः । असिताङ्गो महोच्छुष्म: कपालीशस्तथैव च ।। एते स्वच्छन्दरूपास्तु बहुरूपेण भाषिताः । ब्रह्मयामलमित्युक्तं विष्णुयामलकं तथा ।। स्वच्छन्दश्च रुरुश्चैव षष्ठं चाथर्वणं स्मृतम् । सप्तमं रुद्रमित्युक्तं वेतालं चाष्टमं स्मृतम् ।। अतः परं महादेवि मतभेदांछृणुष्व मे । रक्ताख्यं लम्पटाख्यं च मतं लक्ष्म्यास्तथैव च।। पञ्चमं चालिका चैव पिङ्गलाद्यं च षष्ठकम् । उत्फुल्लक मतं चान्यद्विश्वाद्यं चाष्टकं स्मृतम् ।। चण्डभेदाः स्मृता ह्येते भैरवे वीरवन्दिते । भैरवी प्रथमा प्रोक्ता पिचुतन्त्रसमुद्भवा ।। सा द्विधा भेदतः ख्याता तृतीया तत उच्यते। ब्राह्मी कला चतुर्थी तु विजयाख्या च पञ्चमी ।। चन्द्रांख्या चैव षष्ठी तु मङ्गला सर्वमङ्गला । एष मङ्गलभेदोऽयं क्रोधेशेन तु भाषितः ॥ प्रथमं मन्त्रचक्रं तु वर्णचक्रं द्वितीयकम् । तृतीयं शक्तिचक्रं तु कलाचक्रं चतुर्थकम् ।। यह श्रीकण्ठीसंहिता में विस्तार से कहा गया है ‘जो परमेष्टी ने कहा है मैं उसे संक्षेप में कह रहा हूँ । उसके चौंसठ भेद हैं। भैरव, यामल, मत, मङ्गल, चक्राष्टक, सदाशिव चक्र हैं । स्वच्छन्द, भैरव, चण्ड, क्रोध, उन्मत्तभैरव, असिताङ्ग, महोच्छुष्म, कपालीश ये स्वच्छन्द भैरव हैं । इनका अनेक रूपों में वर्णन है । ब्रह्मयामल, विष्णुयामल, स्वच्छन्द, रुरु और छठाँ, आथर्वण सातवाँ रुद्र है और वेताल आठवाँ कहा गया है । हे देवि! इसके बाद मतभेदों को मुझसे सुनो । रक्त लम्पट, मत, श्रीमत्, चालिका, पिङ्गल, उत्फुल्ल्क, विश्वाद्य-ये आठ चण्ड (भैरव) के भेद हैं । पिचुतन्त्र से उत्पन्न (= ज्ञात) भैरवी प्रथम है, ख्याता, ब्राह्मी, कला, विजया, चन्द्रा, मङ्गला और सर्वमङ्गला ये भेद क्रोधेश द्वारा कहे गये हैं । ३६ श्रीतन्त्रालोकः पञ्चमं बिन्दुचक्रं तु षष्ठं वै नादसंज्ञकम् । सप्तमं गुह्यचक्रं च खचक्रं चाष्टमं स्मृतम् ।। एष वै चक्रभेदोऽयमसिताङ्गेन भासितः । अन्धक रुरुभेदं च अजाख्य मूलसंज्ञकम् ।। वर्णभण्ठं विडङ्ग च ज्वालिनं मातृरोदनम् । कीर्तिताः परमेशेन रुरुणा परमेश्वरि ।। भैरवी चित्रिका चैव हंसाख्या च कदम्बिका। हल्लेखा चन्द्रलेखा च विद्युल्लेखा च विद्युमान् ।। एते वागीशभेदास्तु कपालीशेन भाषिताः। भैरवी तु शिखा प्रोक्ता वीणा चैव द्वितीयिका।। वीणामणिस्तृतीया तु संमोहं तु ,चतुर्थकम् । पञ्चमं डामरं नाम षष्ठं चैवाप्यथर्वकम् ।। कबन्धं सप्तमं ख्यातं शिरश्छेदोऽष्टमः स्मृतः। एते देवि शिखाभेदा उन्मत्तेन च भासिताः ।। एतत्सादाशिवं चक्रमष्टाष्टकविभेदतः ।।’ इति । तैर्भिन्नं भेदोपभेदवैचित्र्यात्मना नानाप्रकारम–इत्यर्थः । यत्तु श्रीश्रीकण्ठ्यां तत्पुरुषवक्त्रमुद्दिश्य ‘अष्टाविंशतिभेदैस्तु गारुडं हृदयं पुरा ।’ इत्यादि । तथा ‘पश्चिमे भूततन्त्राणि…………….. ।’ तथा ‘दक्षिणे दक्षिणे मार्गश्चतुर्विंशतिभेदतः ।’ इत्यादि । तथा मन्त्रचक्र, वर्णचक्र, शक्तिचक्र, कलाचक्र, बिन्दुचक्र, नादचक्र, गुह्यचक्र और खचक्र ये आठ चक्रभेद अंसिताङ्ग के द्वारा कहे गये हैं । हे परमेश्वरी! अन्धक, रुरु, अज, मूल, वर्णभण्ठ, विडङ्ग, ज्वालिन, मातृरोदन-ये रुरुभैरव के द्वारा कहे गये है । भैरवी, चित्रिका, हंसा, कदम्बिका, हल्लेखा, चन्द्रलेखा, विद्युल्लेखा और विद्युन्माला ये वाणीशक्ति के भेद कपालीश ने बतलाये हैं । शिखा, वीणा, वीणामणि, सम्मोह, डामर, अथर्वक कबन्ध तथा शिरश्छेद-ये शिखाभेद उन्मत्तभैरव द्वारा वर्णित है । यह ६४ भेद वाला सदाशिव चक्र है । भेदोपभेद की विचित्रता से इनके अनेक प्रकार है । श्रीकण्ठी में तत्पुरुषवक्त्र को उद्दिष्ट कर जो गरुडोक्तशास्त्र के अनुसार (उसके) अट्ठाईस भेद हैं । तथा— ‘पश्चिम वक्त्र में भृततन्त्र…’ । तथा—‘दक्षिण में दक्षिण मार्ग चौबीस भेदों वाला है ।’ तथा प्रथममाह्निकम् ‘वामदेवात्तु यज्जातमन्यत्तत्सामृ(म्प्रतं शृणु ।’ इत्यादि अन्यभेदोपभेदवैचित्र्यमुक्तम्, तदेकैकस्य वक्त्रस्य पञ्चवक्त्रात्मक त्वात् एतद्भेदजातोपभेदात्मेव इति तत एव संगृहीम्, इति न पृथगिह आयस्तम् । तदुक्तम् ‘एकैकं पञ्चवक्त्रं च वक्त्रं यस्मात्प्रगीयते । दशाष्टादशभेदस्य ततो भेदेष्वसंख्यता ।।’ इति । अतश्च भेदभेदाभेदाभेदप्रतिपादकं शिवरुद्रभैरवाख्यं त्रिधैवेदं शास्त्रमुद्भूतम् इति सिद्धान्तः तदुक्तम् ‘तन्त्रं जज्ञे रुद्रशिवभैरवाख्यमिदं त्रिधा । वस्ततो हि त्रिधैवेयं ज्ञानसत्ता विजम्भते ।। भेदेन भेदाभेदेन तथैवाभेदभागिना ।’ इति । एवं च भेदाद्यात्मकमपीदं शास्त्रं परमेश्वरेशवामाघोरात्मकं षष्ठं त्रिकं परादिदेवीत्रयविश्रान्तिधामतया क्रोडीकृत्य ‘पुष्पे गन्धस्तिले तैलं देहे जीवो जले रसः । यथा तथैव शास्त्राणां कुलमन्त:प्रतिष्ठिम् ।।’ इत्याद्युक्त्या परमाद्वयामृतपरिप्लावितं विदध्यात्, अन्यथा ह्यस्य परपद ‘वामदेव से जो उत्पन्न हुआ अब उसको सुनो’ । इत्यादि अन्य भेदोपभेदवैचित्र्य कहा गया वह एक-एक वक्त्र के पञ्चवक्त्रात्मक होने से इस भेदोपभेद वाला ही है इसलिये वहीं से संगृहीत होने के कारण यहाँ पृथक् रूप से नहीं कहा गया । वही कहा गया है ‘एक-एक वक्त्र चुंकि पाँच वक्त्र वाला कहा जाता है इसलिये दश अष्टादश भेदों में भी असंख्य भेद हो सकते हैं । इसलिये भेदभेदाभेद और अभेद प्रतिपादक शिव रुद्र भैरव नाम से यह शास्त्र तीन ही प्रकार का उत्पन्न हुआ—यह सिद्धान्त है। वही कहा गया ____ ‘रुद्र शिव और भैरव नामक तीन तन्त्र उत्पन्न हुए । वस्तुत: ज्ञान की सत्ता भेद भेदाभेद और अभेद इस तीन ही प्रकार से प्रवाहित होती है । इस प्रकार भेद आदि वाला भी यह शास्त्र परमेश्वर के ईश वाम अघोर और परा परापरा अपग नामक तीन देवियों को मिलाकर छः का विश्रान्तिधाम के रूप में आश्रय बनकर (उनको आत्मसात् करता है) ‘जैसे फूलों में गन्ध, तिल में तैल, देह में जीव, जल में रस है । उसी प्रकार शास्त्रों में कुलशास्त्र अन्तः प्रतिष्ठित हैं।’ इत्यादि उक्ति के अनुसार (सभी शास्त्रों को) परम अद्वय अमृत से भर देता ३८ श्रीतन्त्रालोकः प्राप्तिनिमित्तत्वं न स्यात् । तदुक्तम् ‘ततोऽपि संहताशेषभावोपाधिसुनिर्भरः । भैरवः परमार्थोद्यद्रवबृंहितशक्तिकः ।। ईशान-वाम-दक्षासु तासु शक्तित्रयं क्रमात् । अपरादिपराप्रान्तं क्रोडीकृत्य त्रिकं स्थितः ।। उर्ध्ववामतदन्यानि तन्त्राणि च कुलानि च। तद्धाराप्रान्तरूढानि प्रापय्याभेदभूमिकाम् ।।’ इति । ननु एवंविधा श्रुतिर्न काचिदुपलभ्यत इति किं प्रमाणम् ? ननु अत्र उक्तमेवानेन गुरुपारम्पर्यलक्षणं प्रमाणम् । यदाह ‘इत्थं मध्ये विभिन्नं तत्रिकमेव तथा तथा । शास्त्रमस्मद्गुरुगृहे सम्प्रदायक्रमात्स्थितम् ।।’ इति । ननु यदेवात्र पुबुद्धिप्रभवत्वं चोद्यं तदेवोत्तरीकृतम्-इत्यपूर्वमिदंपाण्डित्यम्, तेनागमः कश्चन संवादनीयो येनैतत्समाहितं स्यात्, नैतत्, अविगीतैव हि प्रसिद्धिरागमः इत्युच्यते, यदुक्तम् ‘प्रसिद्धिरागमो लोके युक्तिमानथवेतरः । विद्यायामप्यविद्यायांप्रमाणमविगानतः ।। है। अन्यथा यह (कुलशास्त्र) परमपद की प्राप्ति का कारण नहीं बनता । वही कहा गया ‘अशेष भावों को अपने में संहत करने वाला यह भैरवागम परमतत्त्व से उत्पन्न अमृत से परिवर्द्धित शक्ति वाला है । उस ईशान वाम और दक्षिण में अपरा आदि तीनो शक्तियाँ एकरूप में स्थित हैं । ऊर्ध्व वाम और अन्य मत भी इसमें अभेद भूमि को प्राप्त कर स्थित हैं ।’ प्रश्न है कि इस प्रकार की कोई श्रुति तो मिलती नहीं फिर इस विषय में क्या प्रमाण है? यदि कहे कि यहाँ कही गई गुरुपरम्परा ही प्रमाण है । जैसा कि कहते हैं ___ ‘इस प्रकार बीच-बीच में (मतभेद से) भिन्न होते हुए भी यह त्रिकशास्त्र सम्प्रदाय के क्रम से हमारे गुरुघराने में ही स्थित है । प्रश्न है-जो यहाँ पुरुषद्धि का सामर्थ्य कहा गया वही (पूर्वप्रश्न का) उत्तर हो गया—यह तो अपूर्ण पाण्डित्य है फिर भी किसी आगम को भी पक्ष में उपस्थापित करना चाहिये जिससे यह समाधान हो जाय? ऐसा मत कहिये । जो सर्वसम्मत प्रसिद्धि होती है वही आगम कहा जाता है जैसा कि कहा गया ‘लोक में प्रसिद्धि ही आगम (के नाम से प्रसिद्ध होती) है, चाहे वह तर्कसङ्गत प्रथममाह्निकम् ३९ प्रसिद्धिरवगीता हि सत्या वागेश्वरी मता । तथा यत्र यथा सिद्धं तद्ग्राह्यमविशङ्कितैः ।। इति । सा चात्र विद्यत एवाविगानेन महात्मनां महागुरूणाम् इति किमत्र प्रमाणान्त रान्वेषणेन । यदि चार्वाग्दृशां भवादृशामेवंविधा श्रुति: कर्णगोचरं न गता तावतैव एतन्नोपपद्यते, इति न वक्तं शक्यम, नहि प्रमाणाभावात्प्रमेयस्याप्यभावः स्यात् । न चैते विप्रलम्भका येनैवमन्यथोपदिशेयुः एतदुपदेशमूलतैव निखिलस्य शैवशास्त्रागमार्थस्य प्रयोगदर्शनात् । तेन यथा मन्वादिस्मृतौ उत्सन्नशाखा मूलत्वादष्टकादियागानां मूलभूता श्रुतिः कल्प्यते तथा इहापि ज्ञेयम् । न विधां श्रुतिमदृष्ट्वा साक्षात्कृतनिखिलशैवागमसतत्त्वास्त एवमुपदिशेयुः इत्यलं महागुरूणा मुपदेशपरीक्षणदुःशिक्षया । ननु शास्त्राणाम् ‘यत: शिवोद्भवाः सर्वे शिवधामफलप्रदाः ।’ इत्याधुक्तरेकत्वनियामककारणफलयोरैक्यमस्ति, इह किंनिबन्धनमेषामेवं नानात्वमुक्तम् ? सत्यम्-किन्तु अनुग्राह्याशय भेदादेषां नानात्वं कल्पितम् । यदुक्तम् हो या न हो । विद्या और अविद्या के विषय में भी प्रमाण सर्वसम्मति के कारण होता है । यदि प्रसिद्धि सर्वसम्मत है तो वह ईश्वर की वाणी मानी जाती है । इसलिये जो जहाँ जिस प्रकार सिद्ध है उसे नि:शङ्क होकर मान लेना चाहिये ।’ और वह महात्मा महागुरुओं के अविगान से यहाँ है ही इसलिये दूसरा प्रमाण खोजने से क्या लाभ? यदि आधुनिक विचार वाले आप जैसे महानुभावों तक इस प्रकार की श्रति नहीं पहँचती तो इतने से ही यह सिद्ध नहीं होता (कि यह) वर्णन अप्रामाणिक है)-ऐसा नहीं कहा जा सकता । प्रमाणों के अभाव से प्रमेय का अभाव होता है-ऐसा नही है । ये (महागुरु लोग) वञ्चक नहीं हैं जिससे कि वे उल्टा-पुल्टा उपदेश देंगे । क्योंकि समस्त शैवशास्त्र और शैवागम के अर्थ का प्रयोग इन्हीं के उपदेश के आधार पर चलता है । इस कारण जैसा मनु आदि की स्मृतियों में (वर्णित) अष्टका आदि यागों के शाखाग्रन्थ उच्छिन्न होने पर भी उनकी श्रतिमूलकता की कल्पना की जाती है वैसे यहाँ भी समझना चाहिये । समस्त शैवागम का साक्षात्कार करने वाले बिना इस प्रकार की श्रृति को देखे ऐसा उपदेश नहीं करेंगे । इसलिये महागरुओं के उपदेश परीक्षण की द:शिक्षा मत दीजिये । प्रश्न है कि शास्त्रों के विषय में _ ‘ये सभी शिव से उत्पन्न हैं इसलिये सब शिवधाम रूप फल को देने वाले ऐसी उक्तियाँ होने से कारण और फल दोनों एक ही है फिर इन शास्त्रों की अनेकता किस कारण से है? (आपका कथन) सत्य है । किन्तु अनुग्राह्य जना की पात्रता के भेद से अनेक शास्त्रों की कल्पना की गयी है । जैसा कि कहा गया श्रीतन्त्रालोकः ‘सर्वमेतत्प्रवृत्त्यर्थं श्रोतृणां तु विभेदतः । अर्थभेदात्तु भेदोऽयमुपचारत्प्रकल्प्यते ।। फलभेदो न कल्प्योऽत्र कल्प्यश्चेदयथायथम् ।’ इति । ननु यद्येवं तत् ‘वेदादिभ्यः परं शैवं शैवाद् वामं च दक्षिणम् । दक्षिणाच्च परं कौलं कौलात्परतरं नहि ।।’ इत्यादिना उक्तमेषां यथायथमुत्कृष्टत्वं युक्तं न स्यात्,? नैतत्-द्वारद्वारिभावेन एषामुपायोपेयभावस्य उक्तत्वात्, तेन परमाद्वयोपदेशप्रतिपादकमेव शास्त्रं शिवसद्भावलाभैकफलम्-इत्यवसेयम् । तदेव परमपदप्राप्तो साक्षादुपायभूतत्त्वा दुत्कृष्टम् । एतच्चानेनैव श्रीमालिनीश्लोकवार्तिकादौ वितत्य उक्तम्, तत्तत एव स्वयमवधार्यम्, ग्रन्थगौरवभयात्तु प्रतिपदं न संवादितम् । अत एवाह—‘तत्सारं त्रिकशास्त्रम्’ इति । तदुक्तम् ‘वेदाच्छैवं ततो वामं ततो दक्षं ततः कुलम् । ततो मतं ततश्चापि त्रिकं सर्वोत्तमं परम् ।।’ इति । अनेनैवाशयेन च ‘यह सब शास्त्र श्रोताओं के भेद से प्रवृत्ति के लिये हैं । अर्थभेद के कारण यह (शास्त्र) भेद लक्षणा के द्वारा कल्पित है । इस (भिन्न शास्त्रसमूह) में फलभेद की कल्पना नहीं करनी चाहिये । यदि कल्पना की जाती है तो वह तथ्य के अनुरूप नहीं है ।’ प्रश्न है कि-यदि ऐसा है तो फिर ‘वेद आदि से बढ़ कर शैवशास्त्र, शैव से वाम तथा (वाम से) दक्षिण और दक्षिण शास्त्र से बढ़कर कौलमार्ग है । कौल से बढ़ कर कोई दूसरा नहीं है।’ __इत्यादि (वचन) के द्वारा उक्त इनका क्रमिक उत्कृष्टत्व ठीक नही है? ऐसा नहीं है । इन शास्त्रों का द्वारद्वारी भाव से उपायउपेय भाव कहा गया है । इसलिये परम अद्वय के उपदेश का प्रतिपादक शास्त्र ही शिवसमावेश का लाभ कराता है यह समझना चाहिये । और वही परमपद की प्राप्ति का साक्षात् उपाय होने के कारण उत्कृष्ट है । इस बात को इन्होंने (= अभिनवगुप्त ने) ही मालिनीविजय वार्त्तिक आदि में विस्तार से कही है इसलिये वहीं से समझ लेना चाहिये ग्रन्थविस्तार के भय से प्रतिपद नहीं कहा गया । इसलिये कहा—उसका सार त्रिकशास्त्र है ।’ वही कहा गया है ‘वेद की अपेक्षा शैव, उसकी अपेक्षा वाम, उससे बढ़कर दक्षिण उससे कुल, उससे मत और उससे भी बढ़कर त्रिकशास्त्र सर्वोत्तम माना गया है ।’ और इसी आशय से प्रथममाह्निकम् ‘वाममार्गाभिषिक्तोऽपि दैशिकः परतत्त्ववित् । संस्कार्यो भैरवे सोऽपि कुले कौले त्रिकेऽपि सः ।।’ इत्यादि श्रीनिशाचारादावुक्तम् ।। तच्च सिद्धा-नामक-मालिन्याख्य-खण्ड त्रयात्मकत्वात् त्रिविधिम् । तत्र क्रियाप्रधानं सिद्धातन्त्रम्, ज्ञानप्रधानं नामकं तन्त्रम्, तदुभयमयं मालिनीमतम् इति तदेव मुख्यम्, यदाह—‘तत्सारं मालिनी मतम्’ इति । एवं च, ‘न तदस्तीह यन्न’ इत्यादि युक्तमेवोक्तम् ।। १८ ।। अतश्च सर्वसहत्वात्तदधिकारेणैव च प्रतिज्ञाया अपि निर्वाहो युक्तः–इत्याह अतोऽत्रान्तर्गतं सर्वं संप्रदायोज्झितैर्बुधैः । अदृष्टं प्रकटीकुर्मो गुरुनाथाज्ञया वयम् ॥ १९ ॥ ‘अत:’ इति उक्त युक्तयास्यैव शास्त्रस्य प्रधान्यात् । ‘प्रकटीकुर्मः’ इति प्रक्रियाकरणेन । अतश्च ‘प्रधाने हि कृतो यत्न फलवान्भवति’-इति भावः । ‘गुरुनाथाज्ञया’ इति–नहि तदाज्ञां विनात्र अधिकार एव भवेत् इति भाव: ।। १९ ।। अन्यादृष्टप्रकटीकरणे च स्वात्मनि भगवत्प्रसाद एव निमित्तम्-इति ‘वाम मार्ग में दीक्षित होकर भी परतत्त्ववेत्ता आचार्य के लिये भैरवशास्त्र में प्रवेश के लिये दीक्षा आवश्यक है । वह (= भैरवशास्त्र में दीक्षित) भी कुलशास्त्र में और कौल आचार्य त्रिकशास्त्र में (प्रवेश के लिये अवश्य संस्कार्य है) । इत्यादि श्रीनिशाचर आदि में कहा गया है । यह (निशाचर शास्त्र) सिद्धा नामक और मालिनी नामक तीन खण्डों वाला होने से तीन प्रकार का है । उनसे सिद्धातन्त्र क्रियाप्रधान है, नामक तन्त्र ज्ञानप्रधान है और जो दोनों की प्रधानता वाला है वह मालिनीतन्त्र है । इसलिये यही मुख्य है । जैसा कि कहा- ‘उसका सार मालिनीतन्त्र है।’ इसलिये ‘ऐसा जो’ (मालिनीमत में न कहा गया हो) इत्यादि ठीक ही कहा गया ।। १८ ।। ___इसलिये सर्वसम्मत होने के कारण उस (= गुरु) के ही अधिकार से (अपने ग्रन्थ की) प्रतिज्ञा का निर्वाह ठीक है-यह कहते हैं इसलिए सम्प्रदायों के द्वारा परित्यक्त तथा विद्वानों के द्वारा अदृष्टी समस्त विषयों को हम गरुनाथ की आज्ञा से इस (ग्रन्थ) के अर्न्तगत प्रकट करेंगे ।। १९ ।। अत: = उपर्युक्त युक्ति से इसी शास्त्र की प्रधानता होने के कारण, प्रकट करते हैं-प्रक्रिया के द्वारा । इसलिये प्रधान के विषय में किया गया प्रयत्न फलवान होता है-यह तात्पर्य है । गुरुनाथ की आज्ञा से—उनकी आज्ञा के बिना इस (ग्रन्थप्रणयन) में अधिकार ही नहीं होता—यह तात्पर्य है ।। १९ ।। श्रीतन्त्रालोकः दर्शयितुमाह अभिनवगुप्तस्य कृतिः सेयं यस्योदिता गुरुभिराख्या । त्रिनयनचरणसरोरुहचिन्तनलब्धप्रसिद्धिरिति ॥२०॥ त्रिनयनप्रसादासादितप्रकृष्टसिद्धेः किं नामासाध्यम्-इति भावः ।। २० ।। एवं चेयं कृति: सर्वेषामेव ग्राह्या भवेत्, इति प्रतिपादयितुमाह श्रीशम्भुनाथभास्करचरणनिपातप्रभापगतसङ्कोचम् । अभिनवगुप्तहृदम्बुजमेतद्विचिनुत महेशपूजनहेतोः ॥ २१ ॥ आदिवाक्यम् हृदयं शास्त्रात्मसतत्त्वम्, महेश्वरस्य पूजनम् ‘पूजा नाम न पुष्पाद्यैर्या मतिः क्रियते दृढा । निर्विकल्पे महाव्योम्नि सा पूजा ह्यादराल्लयः ।। इत्यायुक्तया तत्तद् वक्ष्यमाणज्ञप्तिक्रमेण स्वात्मतया प्रत्यभिज्ञानम् । अतश्च दूसरों के द्वारा अदृष्ट को प्रकट करने में अपने ऊपर भगवान् की प्रसन्नता ही कारण बनती है-यह दिखलाने के लिये कहते है ___ यह अभिनवगुप्त की वह कृति है जिसकी आख्या (= नाम, प्रसिद्धि) गुरुओं ने की है (अथवा आज्ञा दी है) और जो त्रिनेत्र भगवान शङ्कर के चरण कमल के चिन्तन से मुझे सिद्ध अर्थात् ज्ञात हुई है ।। २० ।। त्रिलोचन की प्रसन्नता से प्राप्त प्रकृष्ट सिद्धि के कारण क्या (-कुछ भी) असाध्य (नहीं) हो सकता है-यह तात्पर्य है ।। २० ।। इस प्रकार यह कृति सबके लिये स्वीकार्य हो, यह बतलाने के लिये कहते हे श्रीशम्भुनाथरूपी सूर्य के चरणों में प्रणामरूपी किरणों के द्वारा जिसका सङ्कोच (अर्थात् अज्ञान) हट गया है ऐसे अभिनवगुप्त के इस हृदय-कमल का महेशपूजन के लिए चयन करो (अर्थात इस ग्रन्थ के अध्ययन द्वारा शङ्कर को प्रसन्न करो) ।। २१ ।। यह प्रथम वाक्य है । हृदय = शास्त्र का आत्मतत्त्व, महेश का पूजन ‘पष्प आदि (बाद्य पदार्थो) के द्वारा (द्वैतभाव से विधीयमान पजा) पजा नही है, जो निर्विकल्पक महाव्योम (= परमाकाश) में बुद्धि स्थिर की जाती है तथा उसमें श्रद्धापूर्वक जो (जीवसत्ता का परसत्ता में) लय किया जाता है वही पूजा है ।’ ४३ प्रथममाह्निकम् महावाक्यार्थेन एकमेवादिवाक्यात्मकं वाक्यम् इति दर्शयितुमाह-‘आदिवाक्यम्’ इति । इह यद्यपि परमेश्वरशक्तिपातमन्तरेण तच्छास्त्रश्रवणादावन्यत् प्रवृत्तिनिमित्तं नाभ्युपेयते, तथापि शास्त्रकाराणामियं शैली-इत्यभिधेयप्रयोजनादि प्रतिपादयितुं प्रवृत्तिहेतुतया अयमादिवाक्योपनिबन्धः । तत्र प्रथमश्लोकपञ्चकासूत्रितोऽनुत्तर षडर्धार्थक्रम इत्यनेन साक्षादभिहितश्च परपरापरापरात्मतादिना बहुप्रकारस्त्रिकार्थ स्तावदभिधेयः । तस्यैव च कर्तृप्रतिपादनकौशलेन कौलागमस्य च समस्तशास्त्र प्राधान्याभिधानेन सातिशयत्वं प्रतिपादतितुं ‘श्रीभट्टनाथ’ इत्यादि श्लोकपञ्चक मुपात्तम् । स च गुरुपरम्परागत ‘तस्माद् गुरुक्रमायातं दिशन्नेति परं शिवम् ।’ इत्याद्युक्तनीत्या निजप्रयोजनकारी भवति, इत्येतदङ्गतयैव पारम्पर्यसंदर्शनार्थं गुरुसङ्कीर्तनपरं श्लोकसप्तकमुट्टङ्कितम् । अतश्चास्यैव वक्ष्यमाणोपायक्रमेण स्वात्म तया प्राभिज्ञानाज्जीवन्मुक्तिप्रदत्वं प्रयोजनं श्लोकान्तरासूत्रितमपि ‘श्रीशम्भुनाथ’ ___ इत्यादि उक्ति के अनुसार तत्तद् वक्ष्यमाण ज्ञान के क्रम से (समस्त विश्व का) अपनी आत्मा के रूप में प्रत्यभिज्ञान ही पूजा है । इसलिये (इस ग्रन्थरूपी) महावाक्य के द्वारा ‘एकमेवाद्वितीयम्’ (छा० उ० ३.६. २.१) इत्यादि वाक्य के अर्थ को बतलाने वाला यह वाक्य है-यह दिखाने के लिये कहते हैं-‘आदिवाक्यम्’ । यद्यपि इस सम्प्रदाय में परमेश्वर के शक्तिपात के बिना शास्त्रों के श्रवण आदि का दूसरा कारण नहीं माना जाता तथापि शास्त्रकारों की यह शैली है इसलिये अभिधेय, प्रयोजन आदि का प्रतिपादन करने के लिये प्रवृत्तिनिमित्त के रूप में यह आदिवाक्य का प्रयोग किया गया । इस प्रकार प्रथम पाँच श्लोकों में अनुत्तर त्रिक अर्थ का क्रम साक्षात् वर्णित है । पर-परापर-अपर रूप अनेक प्रकार से यह त्रिकार्यक्रम कहा जा सकता है । अपने कर्तृत्त्व प्रतिपादन की कुशलता से उसी कौलागम का समस्त शास्त्रों की अपेक्षा प्राधान्य कथन के द्वारा (उसका) सातिशयत्व प्रतिपादित करने के लिये श्रीभट्टनाथ… इत्यादि पाँच श्लोकों का वर्णन किया गया । वह (कौलागम) गुरुपरम्परा से प्राप्त होता है । _ ‘इस कारण गुरुपरम्परा से आये हुए (ज्ञान का) उपदेश करने वाला (गुरु) परमशिवत्व को प्राप्त होता है ।’
  • इत्यादि उक्त रीति के अनुसार (वह आगम) अपना प्रयोजन सिद्ध करता है इसलिये इसके अङ्ग के रूप में परम्परा को दिखलाने के लिये गुरु के वर्णन से सम्बद्ध सात श्लोकों का वर्णन किया गया और इसीलिये वक्ष्यमाण उपाय के क्रम से अपनी आत्मा के रूप में प्रत्यभिज्ञा होने से यह जीवन्मुक्ति देने वाला है-यह ४४ श्रीतन्त्रालोकः इत्यादिश्लोकेन साक्षादुक्तम् । एतदुद्दिश्य च को नाम न सचेता: परमेश्वरशक्ति पातपवित्रित: प्रवर्त्तते इत्यस्य प्रवृत्तिनिमित्तत्वम्, प्रवृत्तस्याप्येदुपलब्धौ ‘तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः ।’ इत्याद्युक्तेर्विघ्नाः सम्भवन्ति इत्येतन्निरासाय गणेशवटुकयोः स्तुतिः । ‘अर्थितो रचये’ इति प्रतिज्ञाताया: प्रक्रिययायाश्च ‘तन्मया तन्त्र्यते तन्त्रालोकनाम्न्यत्र शासने ।’ इत्यादिवक्ष्यमाणोपजीवनेन ‘तन्त्रालोक:’–इत्यभिधानम् । एवमभिधानाभि धेययोरभिधेयप्रयोजनयोश्च वाच्यवाचकसाध्यसाधनभावलक्षणः सम्बन्ध श्वार्थाक्षिप्तः इत्यनेकवाक्यसंमेलनात्मकमेकमेवादिवाक्यं प्रवृत्तिहेतुतया उक्तम्-इति पिण्डार्थः ।। २१ ।। इह यद्यपि सर्ववादिनां मोक्ष एव उपादेयः, तत्प्रतिपक्षभूतः संसारश्च हेयः, तस्य च मिथ्याज्ञानं निमित्तम्, तत्प्रतिकूलं च तत्त्वज्ञानम्-इति तत्साक्षत्कारेणैव अज्ञानापगमान्मोक्षावाप्तिः इत्यत्राविवादः, तथापि तैस्तदेकनियतं ज्ञानाज्ञानयो: स्वरूपं न ज्ञातम् इति प्रयोजन यद्यपि अन्य श्लोकों में सङ्केतित है, तथापि श्री शम्भुनाथ…….’ इत्यादि श्लोक में साक्षात् कहा गया है । इसको लक्ष्य कर कौन बुद्धिमान परमेश्वर के शक्तिपात से पवित्र हुआ (जीवन्मुक्ति के लिये) नहीं प्रवृत्त होगा-यह इसका प्रवृत्तिनिमित्त है । प्रवृत्त होने पर भी इसकी प्राप्ति के विषय में ‘विनायकगण उस (साधक) को अनित्य भोगों में लगा देते है ।’ इत्यादि कथन से विघ्न उत्पन्न होते हैं—इसलिये उन (विघ्नों) के निराकरण के लिये गणेश और वटुक भैरव की स्तुति (की गयी) है । ‘प्रार्थना करने पर रचना कर रहा हूँ’ इस वाक्य के द्वारा प्रतिज्ञात प्रक्रिया का ‘वह मेरे द्वारा इस तन्त्रालोक नामक शास्त्र में विस्तार से कहा जा रहा है ।’ इत्यादि वक्ष्यमाण के आधार पर ‘तन्त्रालोक’ नाम रखा गया । इस प्रकार अभिधान-अभिधेय, अभिधेय-प्रयोजन का वाच्यवाचक साध्यसाधन रूप सम्बन्ध अर्थात् आक्षिप्त हो जाता है । इस प्रकार अनेक वाक्य के सम्मेलन वाला एक ही आदि वाक्य प्रवृत्तिनिमित्त के रूप में कहा गया—यह सम्पिण्डित अर्थ है ।। २१ ।। __ यद्यपि सभी मत वाले मोक्ष को उपादेय और उसके विरोधी संसार को हेय मानते हैं । उस (संसार) का कारण मिथ्याज्ञान है । तत्त्वज्ञान उस (मिथ्याज्ञान) का विरोधी ज्ञान है । इसलिये उस तत्त्व के साक्षात्कार से ही अज्ञान दूर होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है इसमें कोई विवाद नहीं है । तथापि वे भिन्नमतावलम्बी ज्ञान और अज्ञान का एक निश्चित स्वरूप नहीं जानतेप्रथममाह्निकम् ‘भ्रमयत्येव तान्माया ह्यमोक्षे मोक्षलिप्सया ।’ इत्यायुक्त्या तदभ्युपगतो मोक्षो मोक्ष एव न भवति–इति दर्शयितुं शास्त्रान्तरवैलक्षण्येन तत्परीक्षणस्य वक्ष्यमाणत्वात् प्राधान्यमपि कटाक्षयितुमुपक्रम एव बन्धमोक्षपरीक्षामुट्टङ्कयति ग्रन्थकार: इह तावत्समस्तेषु शास्त्रेषु परिगीयते । अज्ञानं संसृर्हेतुर्ज्ञानं मोक्षककारणम् ॥ २२॥ न चैतदस्माभिः स्वोपज्ञमेवोक्तम्-इत्याह मलमज्ञानमिच्छन्ति संसाराङ्करकारणम् । इति प्रोक्तं तथा च श्रीमालिनीविजयोत्तरे ॥ २३ ॥ ‘अज्ञानं’ तिमिरं परमेश्वरस्वातन्त्र्यमात्रसमुल्लासितस्वरूपगोपनासतत्त्व मात्मानात्मनोरन्यथाभिमानस्वभावम् अपूर्ण ज्ञानम्, तदेव चाणवम् ‘मलम्’, न तु नवमाह्निकादौ निषेत्स्यमानं द्रव्यरूपम् । उक्तं च ‘स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता । द्विधाण मलमिदं स्वस्वरूपापहानित: ।।’ इति । ‘माया उन्हें अमोक्ष में मोक्षप्राप्ति की इच्छा से भरमा रही है ।’ इत्यादि उक्ति के अनुसार उसके द्वारा प्राप्त मोक्ष मोक्ष ही नहीं होता—यह बतलाने के लिये अन्य शास्त्रों से विलक्षण होने से उसकी परीक्षा करने के कारण (शैव शास्त्र की) प्रधानता को सङ्केतित करने के लिये ग्रन्थकार बन्धमोक्ष की परीक्षा करते हैं इस जगत् में समस्त शास्त्रों में यह कहा जाता है कि अज्ञान सृष्टि का कारण है ओर ज्ञान मोक्ष का एकमात्र कारण है ।। २२ ।। इसे हमने अपने मन से नहीं कहा—यह बतलाते हैं (शास्त्रज्ञ विद्वान्) अज्ञान को मल मानते हैं । वह संसार के अंकुरण का कारण है (अथवा संसार का अंकुर अर्थात प्रथम कारण है) ऐसा श्रीमालिनीविजयोत्तर में कहा गया है ।। २३ ।। अज्ञान का अर्थ है-अन्धकार, अपूर्ण ज्ञान । यह परमेश्वर के स्वातन्त्र्यमात्र से समुल्लासित स्वरूपगोपन वाला तथा आत्मा और अनात्मा को भिन्न समझना है । वही आणव मल है न कि नवम आह्निक में जिसका निषेध किया जायेगा वह द्रव्य । कहा भी गया है ‘बोध के स्वातन्त्र्य का नष्ट हो जाना तथा स्वातन्त्र्य का बोध न होना, इस प्रकार अपने स्वरूप के सङ्कोच से यह आणव मल दो प्रकार का होता है।’ श्रीतन्त्रालोकः तच्च कीदृक् ? इत्याह-संसार इति । ‘संसारस्य’ ‘भिन्नवेद्यप्रथात्रैव मायाख्यम्………… ।’ इत्याद्युक्तस्वरूपस्य मायीयस्य मलस्य ‘संसारकारणं कर्म संसाराङकुर उच्यते ।’ इति वक्ष्यमाणनीत्य ‘अङ्कुर:’ कारणं कार्ममलं तस्य ‘कारणं । तदुक्तम् ‘मलं कर्मनिमित्तं तु नैमित्तकमतः परम् ।’ इति श्रीमालिनीविजयोत्तरे प्रोक्तम् इत्येतदधिकारेणैवायं ग्रन्थः प्रवृत्त इत्युपोद्वलितम् ।। २३ ।। अज्ञानस्य पौरुषबौद्धात्मकत्वेन द्वैविध्येऽपि इह पौरुषमेव विवक्षितं स्यान्नान्यत् इत्याह विशेषणेन बुद्धिस्थे संसारोत्तरकालिके । सम्भावनां निरस्यैतदभावे मोक्षमब्रवीत् ॥ २४ ॥ ‘विशेषणेन’ ‘संसाराङ्कुरकारणम् इत्यनेन’ नहि दुरध्यवसायरूपं बौद्धमज्ञानं वह कैसा है? इस प्रश्न के उत्तर में कह रहे हैं संसार… । संसार का ‘भिन्न-भिन्न वेद्य का विस्तार ही इस शास्त्र में मायीय मल है ।’ इत्यादि के द्वारा कहे गये स्वरूप वाले का = मायीयमल का, ‘संसार का कारणभूत जो कर्म वही संसारांकुर कहा जाता है।’ इस वक्ष्यमाण नीति के अनुसार अंकुर = कारण = कार्ममल । उसका कारण । वही कहा गया ‘मल ही कर्म का निमित्त है नैमित्तिक इससे भिन्न है । ऐसा श्रीमालिनीविजयोत्तर तन्त्र में कहा गया है । इस प्रकार उसी ग्रन्थ को आधार बनाकर यह ग्रन्थ प्रवृत्त हो रहा है-यह सङ्केत किया गया । और बौद्ध दो प्रकार होने पर भी यहाँ पौरुष अज्ञान अज्ञान का पौरुष ही विवक्षित है दूसरा नहीं- यह कहते है ___चूँकि ‘संसाराङ्कुरकारणम्’ यह विशेषण दिया गया है इसलिए (मायीयमल का नाश होने पर) सांसारिक शरीर के बाद रहने वाले बौद्ध ज्ञान के विषय में भी (मोक्ष उपलब्ध कराने की) सम्भावना को निरस्त करके इस (= बौद्ध ज्ञान) के अभाव की स्थिति में (अर्थात पौरुष ज्ञान के होने पर) मोक्ष (होता है ऐसा आगम एवं आगमवेत्ता ने) कहा है ।। २४ ।। प्रथममाह्निकम् कर्मणः कारणम् अपि तु तत्तस्य-इति कथमेतद्विशेषणं सङ्गच्छताम् तद्धि सति कर्मकारणके शरीरे सम्भवति तस्य कार्यकारणात्मकत्वात् बुद्धेश्च कारणवर्गान्त: पातित्त्वात्, अत एवोक्तम् ‘संसारोत्तरकालिके’ इति । ___ ‘शरीरभुवनाकारो मायीय: परिकीर्तितः ।’ इत्याद्युक्तेः संसाराच्छरीरादनन्तरभाविनि-इत्यर्थः ॥ किं तत्सम्भावना निरासेन?इत्यक्तम‘एतदभावे मोक्षमब्रवीत’ इति । नहिबौद्धाज्ञानमात्रनिवत्तौ मोक्षो भवेत् यत्तस्मिन्निवृत्ते बौद्धमेव ज्ञानमुदेति’ तस्य च शुद्धविकल्पात्मत्वेऽपि ‘सर्वो विकल्प: संसार……………. ।’ इति नीत्या संसाराविर्भावकत्वमे इति कथमेतदभावेऽपि एवं स्यात् यदभि प्रायादितो बाबैरपि ‘परमार्थविकल्पेऽपि नावलीयेत पण्डितः । को हि भेदो विकल्पस्य शुभे वाऽप्यथ वाऽशुभे ।।’ इत्याधुक्तम्, पौरुषे पुनरज्ञाने दीक्षादिना निवृत्ते सति यदि बौद्धं ज्ञानमुदियात् तदा तस्य वक्ष्यमाणनीत्या जीवन्मुक्ति प्रत्यपि कारणत्वं भवेत्, केवलेन पुनस्तेन विशेषण = संसारांकुरकारणम् यह । दुरध्यवसायरूप बौद्ध अज्ञान कर्म का कारण नहीं है अपितु वह (= कर्म) उसका (अज्ञान का कारण) है फिर इस विशेषण का कैसे समन्वय होगा? क्योंकि कर्म के फलस्वरूप शरीर के रहने पर ही वह (= बौद्ध अज्ञान) सम्भव है क्योंकि वह (अज्ञान) कार्यकरण वाला है । बुद्धि करणवर्ग में मानी जाती है । इसीलिये कहा गया-संसार के बाद वाला । ‘मायीय (मल) शरीर और भुवन के आकार वाला है ।’ इत्यादि उक्ति से (संसारोत्तरकालिके का अर्थ है) संसार = शरीर, के बाद होने वाला । उसकी सम्भावना का त्याग करने से क्या होता है? इसके बारे में कहा गया - ‘इसके अभाव में (गुरुदेव ने) मोक्ष की बात कही है । केवल बौद्ध अज्ञान की निवृत्ति होने पर मोक्ष नहीं होता । बौद्ध अज्ञान की निवृत्ति होने पर बौद्ध ज्ञान ही उत्पन्न होता है । यद्यपि यह (बौद्ध ज्ञान) शुद्ध विकल्प रूप होता है तथापि’ ‘समस्त संसार विकल्प ही है । इस नीति के अनुसार (वह बौद्ध ज्ञान) संसार को ही बनाने वाला है फिर इसके अभाव में ऐसा (= मोक्ष) कैसे होगा । इसी अभिप्राय से इस (शैवशास्त्र के अतिरिक्त) बाहरी (मत वाले) भी विद्वान् को चाहिये कि वह पारमार्थिक विकल्प में भी तल्लीन न हो । विकल्प तो विकल्प है, वह चाहे शुभ हो अथवा अशुभ । उसमें कोई अन्तर नहीं है । इत्यादि कहा गया है । दीक्षा आदि के द्वारा पौरुष अज्ञान के हट जाने पर ४८ श्रीतन्त्रालोकः न किञ्चित्सेत्स्यति—इत्युक्तप्रायम् । पौरुषं पुनर्ज्ञानमुदितं सत् अन्य- निरपेक्षमेव मोक्षकारणम् । यदुक्तम् ‘पाशाश्च पौरुषाः शोध्या दीक्षायां न तु धीगताः । तेन तस्यां दोषवत्यामपि दीक्षा न निष्फला ।।’ इति । तच्च ज्ञानमात्रस्वभावम्, अख्यात्यभाव एव हि पूर्णा ख्याति:, सैव च प्रकाशानन्दघनस्यात्मनस्तात्त्विकं स्वरूपम्, तत्प्रथनमेव मोक्षः इति युक्तमुक्तम् ‘एतदभावे मोक्षमब्रवीत्’ इति ।। २४ ।। ननु अज्ञानशब्दस्य अपूर्ण ज्ञानमर्थः इत्यत्र किं निबन्धनम्, ज्ञानाभावमात्र मेवास्तु ? इत्याशङ्कयाह अज्ञानमिति न ज्ञानाभावश्चातिप्रसङ्गतः । स हि लोष्ठादिकेऽप्यस्ति न च तस्यास्ति संसृतिः ॥ २५ ॥ कोऽसावतिप्रसङ्गः–इत्याह—‘स हि’ इत्यादि । तद्युक्तमुक्तम्-अज्ञानशब्दस्य अपूर्ण ज्ञानमर्थ:- इति ।। २५ ।। यदि बौद्ध ज्ञान उदित हो तब वह वक्ष्यमाण नीति से जीवनमुक्ति के प्रति कारण बन जाता है । केवल उस (= बौद्धज्ञान) से कुछ सिद्ध नहीं होने वाला । पौरुष ज्ञान उत्पन्न होकर बिना किसी की अपेक्षा के मोक्ष का कारण बनता है । जैसा कि कहा गया ___ ‘दीक्षा में पौरुष पाश (= अज्ञान) का शोधन करना चाहिये न कि बुद्धि में रहने वाला (अज्ञान) । इसलिये उस (= दीक्षा) के दोषवती होने पर भी दीक्षा निष्फल नहीं होती ।’ वह (= पौरुष ज्ञान अथवा मोक्ष) ज्ञानस्वरूप है । अख्याति (= अज्ञान) का अभाव ही पूर्णख्याति है और वही प्रकाश और आनन्द से परिपूर्ण आत्मा क तात्त्विकरूप है । उस (आत्मा) का प्रसार ही मोक्ष है-इसलिये ठीक ही कहा गया—(गुरु ने) इस (अज्ञान) के अभाव में मोक्ष कहा है ।’ प्रश्न है कि अज्ञान शब्द का अर्थ अपूर्णज्ञान है इसमें क्या प्रमाण है ? क्या ज्ञानाभाव मात्र ही (प्रमाण) है?—यह शङ्का कर कहते है अज्ञान का अर्थ ज्ञानाभाव नहीं है (क्योंकि ऐसा मानने पर) अतिप्रसङ्ग हो जाएगा । वह (ज्ञानाभाव) मिट्टी के ढेले आदि में भी है किन्तु उसकी संसृति (= संसरण, विनाश) तो नहीं होती ।। २५ ।। __यह अतिव्याप्ति क्या है? इस विषय में कहते है-वह… । तो ठीक ही कहा कि अज्ञान शब्द का अर्थ है-अपूर्ण ज्ञान । प्रथममाह्निकम् तदाह अतो ज्ञेयस्य तत्त्वस्य सामस्त्येनाप्रथात्मकम् । ज्ञानमेव तदज्ञानं शिवसूत्रेषु भासितम् ॥ २६ ॥ ‘अतो’ यथोक्ताद्धेतोः ‘ज्ञेयस्य’ नीलसुखादेः, ‘ज्ञेयस्य च परं तत्त्वं यः प्रकाशात्मकः शिवः ।’ इत्यादिवक्ष्यमाणस्वरूपस्य ‘तत्त्वस्य’ ‘सामस्त्येन’ तस्य सर्वत्राविशेषात् तदेक घनाकारत्वेन ‘अप्रथात्मकम्’ यत् इदं नीलम् इदं सुखम् इति द्वैतप्रथात्मकत्वाद पूर्ण ‘ज्ञानम्’ तदेव ‘अज्ञानम्’ न पुनर्ज्ञानाभावमात्रम्-इत्येतच्छिवसूत्रेषु ‘भासितम्’
  • उक्तम्-इत्यर्थः ।। २६ ।। तत्र चैतत्कुत्र दर्शितम् ? इत्याशङ्क्याह चैतन्यमात्मा ज्ञानं च बन्ध इत्यत्र सूत्रयोः । संश्लेषेतरयोगाभ्यामयमर्थः प्रदर्शितः ॥ २७ ॥ ‘संश्लेषेतरयोगाभ्याम्’ इति संहितया, अन्यथा च अकारप्रश्लेषविश्लेषाभ्या तेन ‘ज्ञानं बन्धः, अज्ञानं बन्ध:’-इति चायमर्थः, इत्यज्ञानशब्दस्य अपूर्ण वही कह रहे हैं ___ इसलिए ज्ञेय (= नील सुख आदि) तत्त्व का पूर्णरूप से प्रकाशित न होने वाला ज्ञान (= अपूर्णज्ञान) ही शिवसूत्रों में अज्ञान शब्द से । कहा गया है ।। २६ ॥ ___अतः = यथोक्त कारणवश । ज्ञेय का = नील सुख आदि का । ‘जो प्रकाशात्मक शिव है वही ज्ञेय का परमतत्त्व है ।’ इत्यादि वक्ष्यमाण स्वरूप वाले तत्त्व का, सम्पूर्णरूप से उसके सर्वत्र समान रूप से विद्यमान होने के कारण तदेकघनाकार रूप में, अप्रथात्मक—यह नील (= घट बाह्यपदार्थ) और यह सुख (आन्तरपदार्थ) है-इस प्रकार द्वित्वभाव वाला होने से, अपूर्ण ज्ञान-वही अज्ञान है न कि ज्ञान का अभाव । यह तथ्य शिवसूत्रों में भाषित = कथित है ।। २६ ।। यह कहाँ दिखलाया गया? यह शङ्का कर कहते हैं ‘चैतन्यमात्मा’ ‘ज्ञानंबन्धः’ इन दोनों सूत्रों में सन्धि एवं अन्य (= । प्रकार का अर्थात् सन्धि रहित ज्ञान शब्द के साथ) योग के द्वारा यह अर्थ प्रदर्शित किया गया है ।। २७ ।। संश्लेष और अन्य के योग से = सन्धि एवं अन्यरूप से = अकार के प्रश्लेष एवं विश्लेष से, इस प्रकार ‘ज्ञानं बन्धः अज्ञानं बन्धः’‘यह अर्थ श्रीतन्त्रालोकः ज्ञानाभिधानलक्षण: ।। २७ ।। एतदेव व्याचष्टे चैतन्यमिति भावान्तःशब्दःस्वातन्त्र्यमात्रकम् । अनाक्षिप्तविशेषं सदाह सूत्रे पुरातने ॥ २८ ॥ द्वितीयेन तु सूत्रेण क्रियां वा करणं च वा। ब्रुवता तस्य चिन्मात्ररूपस्य द्वैतमुच्यते ॥ २९ ॥ द्वैतप्रथा तदज्ञानं तुच्छत्वाद् बन्ध उच्यते । तत एव समुच्छेद्यमित्यावृत्त्यनिरूपतिम् ॥ ३० ॥ इह न किञ्चिदप्यचेतितं भवति, चितिक्रिया सर्वसामान्यरूपा इति । चेतयति इति चेतन: पूर्णज्ञानक्रियावान् तस्य भावः ‘चैतन्यम्’ पूर्णज्ञानक्रियावत्त्वम्, तदेव च परमैश्वर्यस्वभावं स्वातन्त्र्यमुच्यते । तदाह—स्वतन्त्र्यमात्रकम्’ इति । स्वातन्त्र्यमेव केवलं स्वातन्त्र्यमात्रकम्, अत एवाह-‘अनाक्षिप्तविशेषम्, इति, ‘अनाक्षिप्ता:’ स्वसहचारिणोऽपि नित्यत्वव्यापकत्वादयो ‘विशेषा:’ भेदा येन तत् । बनता है । इसलिये अज्ञान शब्द का अर्थ होता है-अपूर्ण ज्ञान ।। २७ ।’ इसी की व्याख्या करते है प्रथम शिवसूत्र में ‘चैतन्यम्’ इस शब्द को यदि (चिती संज्ञा ने धातु से भाव अर्थ में ल्युट् प्रत्यय लगाकर चेतन फिर ‘तस्य भाव: चैतन्यम्’ ऐसा) भावान्त माने तो यह विशेष आक्षेप से रहित केवल स्वातन्त्र्य सत् को बतलाता है ।। २८ ।। द्वितीय सूत्रवर्ती (ज्ञान शब्द) से क्रिया अथवा करण को बतलाते हुए उस (सत् तथा) चिन्मात्र रूप (पदार्थ) को द्वैत भाव कहा जाता है ।। २९ ।। जो दो रूपों में भासित होना है वही अज्ञान है और तुच्छ होने के कारण वही बन्धन कहलाता है । इसी कारण वह समुच्छेद्य है यह बात बार-बार कही गई है ।। ३० ।। - इस (विश्व) में कुछ भी चेतनरहित नहीं है । इसलिये चेतन क्रिया सर्वत्र है । जो चेते वही चेतन अर्थात् पूर्ण ज्ञानक्रिया वाला और उसका भाव चैतन्य है, अर्थात पूर्ण ज्ञानक्रिया, वही ईश्वर का परम स्वभाव है । स्वातन्त्र्य मात्र का अर्थ है केवल स्वातन्त्र्य । इसीलिये कहा-अनाक्षिप्त विशेषता वाला | जिसने अपने सहचारी भी नित्यत्व व्यापकत्व आदि विशेषों का आक्षेप नहीं किया है-वह १. येन विना यन्नभवति तत् तस्य नान्तरीयकम् । प्रथममाह्निकम् भावप्रत्ययान्तो हि शब्द: सहचारिधर्मान्तरनिवृत्तिमेव ब्रूते, अत एव द्रव्याभिधायिन: शब्दस्य विशेषः । यदाहुः ‘धर्मान्तरप्रतिक्षेपाप्रतिक्षेपौ तयोर्द्वयोः । साङ्केतभेदस्य पदं ज्ञातृवाञ्छानुरोध: ।। भेदोऽयमेव सर्वत्र द्रव्यभावाभिधायिनोः ।’ इति । ‘द्वितीयेन’ इति अर्थाद् द्वितीयसूत्रवर्तिना ज्ञानशब्देन, ज्ञप्ति:-ज्ञानम्, जायते येन इति ज्ञानं च इति व्युत्पत्त्या ‘क्रियाम् करणम्’ च प्राधान्येनाभिदधता तस्य-चैतन्यमात्मा- ‘इत्युक्तस्वरूपस्य’ अत एव चेतयते इति ‘चित्’ चिति क्रियायां कर्ता, तन्मात्रमेव केवलं ‘रूपम्’ यस्य तस्य ‘द्वैतमुच्यते’ कर्तृकर्मणोः कर्तृकर्मक्रियाणां च भिन्नानामवच्छेदकानामागूरणाद् द्वैतप्रथासूत्रणं क्रियते, पूर्णमस्य रूपं नाख्याति:- इत्यर्थः । ‘तत्’ तस्मात्संविदद्वैतात्मनः पूर्णस्य रूपस्य अख्यानात् ‘द्वैतप्रथा’ एव ‘अज्ञानम्’ अपूर्ण ज्ञानमपूर्णत्वाच्च तदेव अपूर्णमन्यता शुभाशुभवासनाशरीरभुवनाकारस्वभावविविधसङ्कुचितज्ञानरूपतया मलत्रयात्मा ‘बन्धः’ इति उच्यते, बन्धरूपत्वादेव च तदज्ञानम् ‘समुच्छेद्यम्’ (चैतन्य) शब्द भावप्रत्ययान्त है । यहाँ चेतन शब्द से ‘गुणवचनब्राह्मणादिभ्य कर्माणि च,’ पा. सू. ५.१.१२४ से ष्यज् प्रत्यय जोड़ कर चैतन्य शब्द बना है । इस | प्रकार) भावप्रत्ययान्त (चैतन्य आदि) शब्द अन्य सहचारी धर्मों का अभाव बतलाते है । इसलिये वह (प्रत्यय) द्रव्यवाची शब्द की विशेषता बतलाता है (जिसके कारण | वह द्रव्य उस नाम से व्यवहत होता है)। जैसा कि कहते है । ‘द्रव्य और भाववाचक शब्दों का सर्वत्र यही अन्तर होता है । ज्ञाता की इच्छा के अनुसार धर्मान्तर का प्रतिक्षेप और अप्रतिक्षेप होता है। उन (प्रतिक्षेप और अप्रतिक्षेप) दोनों में सङ्केत का भेद (भिन्न-भिन्न) पद (चेतन, चैतन्य आदि की निष्पत्ति करता है)। द्वितीय अर्थात् सूत्रवर्ती ‘ज्ञान’ शब्द से-ज्ञप्ति:-ज्ञानं तथा ज्ञायते अनेन इति ‘ज्ञानम्’-इन व्युत्पत्तियों के द्वारा क्रमश: क्रिया और करण बतलाया जाता है । तस्य = ‘चैतन्यमात्मा’ इस सूत्र का, इसलिये चेतयते इति चित् = चेतन क्रिया का कर्ता, केवल यही रूप है जिसका उसका । द्वैत कहा जाता है = कर्ता-कर्म, कर्ता-कर्म-क्रिया इत्यादि भिन्न-भिन्न अवच्छेदकों के आगूरण (= स्वीकृति) से द्वैतप्रथा का प्रचलन किया जाता है इसके पूर्णरूप का आख्यान नहीं । इस संवित्स्वरूप अद्वैतस्वभाव वाले पूर्ण रूप का कथन न करने से द्वैत प्रथा ही अज्ञान = अपूर्ण ज्ञान है । अपूर्ण होने से वही अपूर्णमन्यता शुभ-अशुभ वासना-शरीर-भुवन आदि आकार के रूप में अनेक प्रकार के संकुचित ज्ञान के रूप में तीन मलों वाला ‘बन्ध’ कहा जाता है । और बन्धरूप होने के कारण ही वह अज्ञान समुच्छेद्य है। श्रीतन्त्रालोकः ‘मलं कर्म च मायीमाणवमखिलं च यत् । सर्वहेयमिति प्रोक्तं… इत्युक्त्या हेयम-इत्यर्थः । नन्वत्र द्वैतप्रथात्मकत्वादपूर्ण ज्ञानमेव अज्ञानम् इत्येतत्कुतोऽवगतम् ?-इत्याशङ्क्योक्तम्-‘इत्यावृत्त्या निरूपितम्’- इति । ‘आवृत्त्या’ - इति अज्ञानम् इति संहितापाततः पुनरावर्तनेन–इत्यर्थः ।।२८-३०॥ नन्वेवं मोक्षस्य लक्षणमभिधीयताम् ? इत्याशङ्कयाह स्वतन्त्रात्मातिरिक्तस्तु तुच्छोऽ तुच्छोऽपि कश्चन । न मोक्षो नाम तन्नास्य पृथङ्नामापि गृह्यते ॥ ३१ ॥ न कश्चिदन्योऽस्ति इति वाक्यशेषः । यदि तच्छस्तत्पर्वोक्तनीत्या बन्ध एव स्यात्, अतुच्छश्चेत् पारमार्थिकत्वान्नास्य स्वतन्त्रात्मातिरेक: । यद्वक्ष्यति ‘मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूपप्रथनं हि सः । स्वरूपं चात्मन: संवित्………………. ।’ इत्यादि । किमुक्तं भवति-इह तावदात्मज्ञानं मोक्ष इत्यविवादः, अतो यदेवात्मनो लक्षणं तदेव मोक्षस्य इति तन्नान्तरीयकत्वादेव अस्य लक्षणसिद्धेः ‘आणव मायीय और कार्ममल सब हेय हैं-ऐसा कहा गया है ।’ इस उक्ति के अनुसार हेय है । द्वैतप्रथात्मक होने के कारण अपूर्ण ज्ञान ही अज्ञान है-यह कहाँ से ज्ञात हुआ? ऐसी शङ्का कर कहते हैं-ऐसा आवृत्ति के द्वारा कहा गया है । आवृत्ति के द्वारा—‘अज्ञानम्’ यहाँ सन्धि मानने के कारण पुनः (सूत्र की) आवृत्ति के द्वारा यह अर्थ है ।। २८-३० ।। मोक्ष का लक्षण बतलाइये? यह शङ्का कर कहते हैं स्वतन्त्र आत्मा के अतिरिक्त मोक्ष नामक कोई भी तुच्छ या अतुच्छ पदार्थ नहीं है । इसलिए इस (= मोक्ष) का अलग से नाम भी नहीं लिया जाता (लक्षण आदि की चर्चा तो दूर की बात है) ।। ३१ ।। ____ कोई और दूसरा नहीं है—इतना और जोड़ना चाहिये । यदि तुच्छ (= असत्) है तो पूर्वोक्त नियम के अनुसार वह ‘बन्ध’ ही है । और यदि अतुच्छ है तो पारमार्थिक होने के कारण यह स्वातन्त्र्य से भिन्न नहीं है । जैसा कि कहेंगे ‘मोक्ष कोई दूसरी वस्तु नहीं है । वह स्वरूप का विस्तार मात्र है । और संविद् ही आत्मा का स्वरूप है ।’ इत्यादि । इससे क्या कहा जाता है? (उत्तर है-) आत्मज्ञान ही मोक्ष है इस विषय में विवाद नहीं है । इसलिये जो आत्मा का लक्षण है वही मोक्ष का (भी लक्षण) है । इसलिये नान्तरीयक (= अभिन्न) होने से इसका लक्षण हो जाने के प्रथममाह्निकम् पृथक्लक्षणं न कृतम्, अत एव ‘नामापि’ इति अपिशब्देन लक्षणादेः पुन: का वार्ता-इत्यावेदितम् ।। ३१ ।। एवमप्यस्य तद्वैलक्षण्यं कटाक्षीकर्तुं दर्शनान्तरोक्तस्य मोक्षस्य स्वरूपमभि धातुमुत्क्रमते यत्तु ज्ञेयसतत्त्वस्य पूर्णपूर्णप्रथात्मकम् । तदुत्तरोत्तरं ज्ञानं तत्तत्संसारशान्तिदम् ॥ ३२ ॥ ‘यत्’ पुनः ज्ञेयस्य’ कला-तत्त्व-भवनाद्यात्मनोऽध्वनः यत् ‘सतत्त्वम्’ उर्बोर्ध्वमन्योन्यं च भेदेनावस्थानम्, तस्य ‘उत्तरोत्तरम्’ उपर्युपरिभावेन तत्तद्भुवना द्युल्लङ्घनक्रमेण तत्तदवेच्छेदापगमात् यथायथमतिशयाद् द्वैतप्रथात्मकत्वात् संकुचितत्त्वेऽपि ‘पूर्णपूर्णप्रथात्मकं ज्ञानम्’ उदेति तदधरीकृततत्त्वजालोल्लङ्घनात् _ ‘चतुर्दशविधं यच्च प्रोक्तं संसारमण्डलम् ।’ इत्याद्युक्ते: ‘तस्य तस्य’ चतुर्दशविधयोन्यात्मनः ‘संसारस्य’ ‘शान्तिदं तत उन्मोचकम-इत्यर्थः । ज्ञानस्य हि मोचनमेव धर्मः, किंतु संकुचितस्या संकुचितत्त्वम् ।। ३२ ।। कारण पृथक् लक्षण नहीं किया गया । इसलिये ‘नामापि’ यहाँ ‘अपि’ शब्द से यह सूचित होता है कि फिर लक्षण आदि की क्या चर्चा || ३१ ।। ऐसा होने पर भी इस (त्रिकदर्शन के मोक्ष) की विलक्षणता को सङ्केतित करने के लिये अन्य दर्शनों में कथित मोक्ष के स्वरूप का कथन करते हैं _जो कि ज्ञेय (= कला तत्त्व भुवन-आदि के मूल में वर्तमान) सत् तत्त्व है जो कि पर्णप्रसारस्वभाव वाला है, (संकुचितप्रसारस्वभाव वाले तत्त्वों को तिरस्कृत करते हुए) जो उस तत्त्व का उत्तरोत्तर (उत्कृष्ट पूर्णप्रसारात्मक) ज्ञान उत्पन्न होता है, वही संसार से शान्ति अर्थात् मुक्ति दिलाने वाला है ।। ३२ ।। ____ जो कि ज्ञेय = कलातत्त्व भुवन स्वरूप अध्वा का जो, सतत्त्व = ऊपर-ऊपर परस्पर भिन्न रूप में अवस्थान, उसका उत्तरोत्तर = ऊपर-ऊपर क्रम से तत्तद् भुवन आदि का उल्लंघन करते हुए तत्तद् अवच्छेदकों के हट जाने से अनुरूप आतिशय्य के कारण द्वैतभाव के संकुचित होने पर भी पूर्ण-पूर्ण भाव का ज्ञान उत्पन्न होता है वह निम्नस्तरीय तत्त्वसमूह के उल्लङ्घन के कारण होता है । ‘जो संसारमण्डल चौदह प्रकार का कहा गया । इत्यादि उक्ति से उस-उस का = चौदह प्रकार की योनियों वाले संसार का, शान्तिप्रद = उससे मुक्ति दिलाने वाला है । ज्ञान का कर्म (अज्ञान से) मोचन है अर्थात् संकुचित को सङ्कोचरहित करना ।। ३२ ।। श्रीतन्त्रालोकः एतदेव दर्शयति रागाद्यकलुषोऽस्म्यन्तःशून्योऽहं कर्तृतोज्झितः। इत्थं समासव्यासाभ्यां ज्ञानं मुञ्चति तावतः ॥ ३३ ॥ ‘इत्थम्’ प्रथमार्धनिरूपितस्वरूपम् ‘ज्ञानम्’ ‘तावत:’ परिमिताद् बन्धात्, अर्थात् बौद्धादीन्मुञ्चति- इति संबन्धः । तत्र ‘रागाद्यकलुषोऽहं भवामि’ इति ज्ञानं योगाचाराणाम् । यदाहुः ‘रागादिकलुषं चित्तं संसारस्तद्विमुक्तता ।।’ ‘संक्षेपात्कथितो मोक्ष: प्रहीनावरणैर्जिनैः ।।’ इति । तथा ‘प्रभास्वरमिदं चित्तं प्रकृत्याऽऽगन्तवो मला: । तेषामपाये सर्वार्थ तज्ज्योतिरविनश्वरम् ॥’ इति । अयमत्रार्थ:-प्रकृतिप्रभावस्वरस्य चित्तस्य अनाद्यविद्यावशाद् रागादिभिरागन्तु कैर्मलैरावृतत्वेन संसाराविर्भावेऽपि भावनाद्यात्मकमार्गानुष्ठानबलात्तत्तदागन्तुकमल उसी को दिखलाते हैं मैं राग आदि के द्वारा मलिन नहीं हूँ (यह विज्ञानवादी बौद्धों का मत है), मै अन्त:शून्य हूँ (यह माध्यमिकों का सिद्धान्त है), मै कतत्व से रहित हूँ (यह सांख्यों का मत है) इस प्रकार का सम्पूर्ण रूप से अथवा पृथक्-पृथक् होने वाला ज्ञान उतने से ही (अर्थात् केवल कार्म या मायीय या आणव अथवा तीनों मलों से) मुक्ति प्रदान करता है ।। ३३ ।। इस प्रकार = उक्त श्लोक के पूर्वार्द्ध में वर्णित स्वरूप वाला, ज्ञान । उतने = परिमित बन्ध से अर्थात् बौद्ध आदि को मुक्त करता है—ऐसा अन्वय है । उसमें ‘मै राग आदि दोषों से रहित हूँ’-यह ज्ञान योगाचार मतानुयायियों का है । जैसा कि कहते हैं _ ‘राग आदि से मलिन चित्त ही संसार है और उससे मुक्त होना संक्षेप में। दिगम्बर जैनों के द्वारा मोक्ष कहा गया है । तथा ‘यह चित्त स्वभावतः प्रकाशरूप है । मल स्वभावत: आगन्तुक है । उन (मलों) का नाश होने पर वह अविनश्वर ज्योति ही सब कुछ है । ___ यहाँ यह तात्पर्य है-चित्त स्वभावत: प्रभास्वर है । अनादि अविद्या के कारण राग आदि आगन्तुक मलों से ढंक जाने के कारण संसार का आविर्भाव होता है । ‘मै राग आदि से शून्य हूँ’-इत्यादि भावना वाले मार्ग पर चलने से उस आगन्तुकप्रथममाह्निकम् प्रहाणेन आश्रयपरावृत्त्या अविनश्वरज्योतीरूपस्वरूपाभिव्यक्तिर्मोक्ष इति, तदयुक्तम्, -भावना ह्यत्र भवद्भिः कारणमिष्यते, सा क्षणक्षयिणां चित्तक्षणानां विशेषमाधातुं नोत्सहते, तस्याः स्थिरैकाश्रयगतत्त्वेन विशेषाधानक्षमत्वात् । तथाहि स्थायिन स्तिलादयो भावा: स्थायिभिरेव सुमनोभिर्वास्यन्ते, तथेयमपि स्यात्, अतश्च प्रतिक्षणमपूर्वत्वेन उपजायमानस्य निरन्वयविनाशिलङ्घनाभ्यासवत् अनासादिता तिशयस्य चित्तक्षणस्य प्रभास्वरचित्तक्षणोपजननाय भावना न प्रभवेत् इत्यनया कोऽर्थः । समलाश्च चित्तक्षणा: स्वारसिक्याः सदृशारम्भणशक्तेः स्वसदृशानेव चित्तक्षणानुत्पादयितुं क्षमन्ते, न विसदृशान् प्रभास्वरान् । एवं च चित्तक्षण भगुरत्वान्मलप्रहारणायैव भावना न प्रगल्भेत इत्याश्रयपरावृत्तेः का वार्ता इति कृतं क्षणिकवादिनां मोक्षेण । बन्धमोक्षौ च स्थिरैकादिपक्षे युज्यते, बद्धो हि मोक्षाय प्रवर्तते, प्राप्य च निवृत्तो भवति इति, सन्तानश्चैको न विद्यते, तस्य भेदाभेदविकल्पोपहतत्त्वात् । ‘अन्त:’ संविद्रूपतायामपि ‘शून्योऽहं’ भवामि इति ज्ञानं माध्यमिकानाम् । ते खलु सर्वभावन:स्वाभाव्यवादिन:संविदोऽपि नै:स्वाभाव्या न्मिथ्यात्वमभिदधतस्यच्छून्यतायामेव मोक्षमाचक्षीरन् । यदाहुः मल का नाश होता है फिर मल के आश्रय (चित्त) के अपने स्वरूप में आने से अविनश्वर ज्योति रूप ‘स्व’ की अभिव्यक्ति हो जाती है । यही मोक्ष है । (उनका) यह कथन असमीचीन है-आप (बौद्ध) लोग इस विषय में भावना को कारण मानते हैं । वह (भावना) क्षणभंगुर चित्तक्षणों में विशेष को स्थापित नहीं कर सकती। क्योंकि वह (भावना) स्थिर किसी आश्रय में ही विशेष का आधान कर सकती है । वह इस प्रकार-स्थायी तिल आदि में स्थायी ही फूलों से सुगन्धि स्थापित की जाती है । उसी प्रकार यह (भावना) भी है । इसलिये प्रतिक्षण नया-नया उत्पन्न होने वाले असम्बद्ध विनाशी लङ्घन के अभ्यास के समान निर्विशेष चित्तक्षण में भावना प्रभास्वर चित्तक्षण को उत्पन्न नहीं कर सकती । इसलिए यह व्यर्थ है । (दूसरी बात यह है कि) मलयुक्त चित्तक्षण स्वाभाविक सदृश आरम्भण की शक्ति से अपने सदृश (= समल) चित्तक्षणों को ही उत्पन्न कर सकते है न कि (अपने से) भिन्न प्रभास्वर (चित्तक्षणों) को । इस प्रकार चित्तक्षणों के भंगुर होने के कारण भावना मलों को हटाने में ही समर्थ नहीं हो सकती फिर आश्रय (चित्त) की परावृत्ति की क्या बात । इसलिए क्षणिकवादियों का मोक्षसिद्धान्त असङ्गत है। ___बन्ध और मोक्ष दोनों स्थिर पक्ष में ही हो सकते हैं । जो बद्ध होता है वही मोक्ष के लिये प्रवृत्त होता है और (मोक्ष को) प्राप्त कर (बन्ध से) छूट जाता है । सन्तान भी एक नहीं है क्योंकि वह भेदाभेद = विकल्प से उपहत हैं । अन्तः = (मोक्ष के) संविद्प होने पर भी ‘मै शून्य हूँ ऐसा ज्ञान माध्यमिकों को होता है । उनके अनुसार संसार के समस्त पदार्थ नि:स्वभाव वाले हैं । फलत: संविद् भी नि:स्वभावा होने से मिथ्या है । इस प्रकार संविद् की शून्यता ही मोक्ष है-ऐसा कहते हैं । जैसा कि कहा है श्रीतन्त्रालोकः ‘चित्तमात्रमिदं विश्वमिति या देशना मुनेः । तत्त्रासपरिहारार्थं बालानां सा न तत्त्वतः ।। सापि ध्वस्ता महाभागैश्चित्तमात्रव्यवस्थितिः ।’ इति, तदप्युक्तम्,-संविदो हि मिथ्यात्वेन स्वतन्त्ररूपापाकरणेऽपि मिथ्यात्वे सत्तैव न भवेत् तस्याः नीलादिवत् परतन्त्ररूपत्वाभावात्, नीलादीनां हि मिथ्या त्वेन स्वतन्त्ररूपापाकरणेऽपि संविदात्मतयाऽस्त्यवस्थानम्, संविदि तु स्फुरत्तामात्र सारायां मिथ्यात्वादसत्त्वमेव स्यात् इति न किञ्चित्स्फुरेत् इति मूकुँव स्यात् इति । न च संविदः स्फुरत्तामात्रसाररूपाया अपह्नवः शक्यक्रिय: इति यत्किाञ्चिदेतत् । अथ ‘सर्वालम्बनधर्मैश्च सर्वसत्त्वैरशेषतः । सर्वक्लेशाशयैः शून्यं नं शून्यं परमार्थतः ।। इत्याधुक्तयुक्त्या ग्राह्यग्राहकभावादिना कल्पितेन रूपेण शून्यम्, न तु संविदापि इति चेत्, एवं ह्युच्यमाने विज्ञानवादे एवाभ्युपगम: स्यात्, सोऽपि हि कल्पितपरतन्त्रा ‘इत्यन्त:करणस्यैव विचित्रात्मावभासिनः । अविभाविततत्त्वस्य विस्फूर्जितमिदं जगत् ।।’ ‘यह विश्व विज्ञान मात्र है’-यह जो शाक्यमुनि का सिद्धान्त या उपदेश है वह सामान्य जनों को (संसार से) छुटकारा दिलाने के लिये है न कि तत्त्वोपदेश । वह चित्तमात्र की व्यवस्था भी उनके द्वारा ध्वस्त कर दी गयी (क्योंकि वह भी नि:स्वभाव है)। यह (कथन) भी ठीक नहीं है-मिथ्या होने के कारण संविद् का स्वतन्त्ररूप न रहने पर मिथ्या होने से (उसकी) सत्ता ही नहीं रहेगी क्योंकि नील आदि की भाँति उसका रूप परतन्त्र नहीं है । नील (घट) आदि मिथ्या होने के कारण स्वतन्त्ररूपात्मक न होने से संविद् रूप से तो रहते ही हैं । और संविद् स्फुरत्तामात्र होने के कारण, मिथ्या होने से असत् हो जायेगी । फलत: कहीं कोई भी ज्ञान नहीं होगा और सर्वत्र मूर्छा ही रहेगी । स्फुरत्तामात्र तत्त्व वाली संविद् का तिरस्कार नहीं किया जा सकता । । ‘समस्त आलम्बन धर्मों से समस्त सत्त्वों से तथा समस्त क्लेशों और उनकी वासनाओं से जो सम्पूर्णतया शून्य है वह भी परमार्थतः शून्य नहीं है। इत्यादि उक्त युक्ति के द्वारा ग्राह्यग्राहक भाव आदि से कल्पित रूप से शून्य न कि संविद् से भी शून्य? यदि ऐसा कहें तो ऐसा कहने पर आप विज्ञानवाद को ही मान रहे है । वह भी ‘इस प्रकार यह संसार विचित्ररूप में अवभासन करने वाले तथा तत्त्व की प्रथममाह्निकम् इत्याधुर्विज्ञप्तिमेव परमार्थसतीमभ्युपागमत् इति न नवं किञ्चिदा युष्मतोत्प्रेक्षितम् । तत्र चोक्तो दोष: ‘अकर्ताहं भवामि’ इति ज्ञानं सांख्यानाम् । ते हि निष्क्रियमेवात्मानमभ्युपागमन्, अन्यथा हि तस्य चैतन्यं न स्यात् अतेचनानामेव क्षीरादीनां क्रियावत्त्वोपलब्धेः । अयुक्तं चैतत्-अकर्तृत्वे हि पुरुषस्य अनिर्मोक्ष: स्यात् अकिञ्चित्करत्वे हि पुरुषस्योत्पन्नेऽपि विवेकदर्शने स्वरूपेणावस्थानं न स्यात्, प्रवृत्तिस्वभावायाः प्रकृतेरौदासीन्यायोगात् तं प्रत्यपि पुन: सम्भावनाया: सम्भवात् । न च प्रकृतेः ‘दृष्टाहमनेन’ इति ‘न पुनरेतदर्थमहं प्रवर्ते’ इत्यनुसन्धानमस्त्याचैतन्यादस्याः प्रेक्षाकारित्वाभावात् । एवं चेयं कृतेऽपि शब्दाधुपलम्भे यथा पुनस्तदर्थ प्रवर्तते, तथा कृतायामपि विवेकख्यातौ पुनरपि तदर्थं प्रवर्तिष्यते, स्वभावस्यानपेतत्त्वात् । एवमपि कृतमकृतं न भवति-इति संकुचितमपि ज्ञानं बौद्धादीनां निजोचितामर्थक्रियां विदध्यात् । तथाहि बौद्धाः ‘एकमेवेदं संविद्रूपं हर्षविषादाद्यनेकाकारविवर्तं पश्यामः ।।’ इत्याद्युक्तयुक्त्या बुद्धिवृत्त्यात्मकं ज्ञानमेव तत्त्वं प्रतिपन्ना: इति विशुद्ध भावना से रहित अन्त:करण का ही उल्लास है ।’ इत्यादि उक्ति के अनुसार कल्पित परतन्त्र आदि शून्यरूपता के कारण विज्ञान को ही परमार्थ सत मानने वाले आप (शून्यवादी बौद्ध) कोई नयी बात तो नहीं कह रहे हैं । और उस (विज्ञानवाद) में दोष कहा जा चुका है। । सांख्य दार्शनिकों के अनुसार ‘मै अकर्ता हूँ’ यह ज्ञान होता है । वे लोग आत्मा को निष्क्रिय मानते हैं अन्यथा (आत्मा में) चैतन्य नहीं होगा । क्योंकि क्रिया दध आदि अचेतन पदार्थों में ही मिलती है। यह (कथन) अयक्त है—परुष के कर्ता न होने पर (उसका) मोक्ष नहीं होगा । पुरुष के निष्क्रिय होने पर उसमें विवेकज्ञान उत्पन्न होने पर भी (उसकी) स्वरूप में स्थिति नहीं होगी क्योंकि प्रकृति स्वभावतः प्रवृत्ति वाली है वह उदासीन हो नहीं सकती इसलिये उस (= पुरुष) के प्रति पुनः (बन्धन की) सम्भावना रहती ही है। मैं इस (पुरुष) के द्वारा देख ली गयी’ इसलिये पुन: उसके लिये प्रवृत्त होती है उसी प्रकार विवेक ख्याति होने पर भी (पुरुष के लिये) वह प्रवृत्त नहीं होऊँगी इस प्रकार का प्रकृति द्वारा अनुसन्धान | भी नहीं हो सकता क्योंकि जड़ता के कारण यह अनुसन्धान कर नहीं सकती । इस प्रकार जैसे यह शब्द आदि को सुनने पर उसके अर्थ के प्रति प्रवृत्त होगी ही क्योंकि स्वभाव को दूर नहीं किया जा सकता । ऐसा होने पर भी जो कृत है वह अकृत नहीं हो सकता-इस नियम के अनुसार बौद्धमतावलम्बियों का संकुचित भी ज्ञान अपने लिये उचित अर्थक्रिया को करेगा ही । बौद्ध (कहते) हैं _ ‘एक ही यह संविद् रूप (ज्ञान) हर्ष, विषाद आदि अनेक आकारों में विवर्तित होता है । इत्यादि युक्ति के अनुसार बुद्धि की वृत्तिरूपी ज्ञान को ही परमतत्त्व मानते हैं । ५८ श्रीतन्त्रालोकः बुद्धितत्त्वप्राप्तिरेवैषां मोक्षः । तदुक्तम् ‘ब्रह्मा तत्राधिपत्वेन बुद्धितत्त्वे व्यवस्थितः । सर्वज्ञं च तमेवाहुबौद्धानां परमं पदम् ।। इति । अत एवैषां बद्धितत्त्वाधोवर्तिनः संसारस्य शान्तिः । एवं च ‘जानं मञ्जति तावतः’ इति युक्तमुक्तम् । सांख्याश्च सुखदु:खाद्यात्मकप्रकृति- पृथग्भावेन पुंस एव स्वरूपेणावस्थानं तत्त्वं प्रतिपन्नाः इति पुंस्तत्त्वप्राप्तिरेवैषां मोक्षः । तदुक्तम् _ ‘पौरुषे चैव सांख्यानां सुखद:खादिवर्जितम् ।’ इति । नैरात्म्यदृष्टेश्चात्मदृष्टिविशिष्यते, इति सांख्यानां बौद्धेभ्यः पूर्णप्रथात्मकं ज्ञानम् इत्येषां बुद्धितत्त्वोर्ध्ववर्तिपुंस्तत्त्वप्राप्तिः । एवं च पूर्णप्रथात्मकमुत्तोत्तरं ज्ञानम्, इत्यादिः पूर्वसूत्रप्रतिज्ञातोऽर्थो निर्वाहितः । एवं सांख्यपातञ्जलयोः प्रकृतिपृथग्भावेन पुंज्ञानस्य साम्येऽपि सांख्येभ्य: पातञ्जलानामीश्वरप्रणिधानात् तद्विशिष्यते, इति तेषां स्तत्त्वोर्ध्ववर्तिनियतितत्त्वप्राप्तिरुक्ता । __ ‘षडविंशकं तु देवेशि योगशास्त्रे परं पदम् ।’ इति । इस प्रकार बुद्धि तत्त्व का साक्षात्कार ही इनके मत में मोक्ष है । वही कहा गया ‘बद्धितत्त्व में ब्रह्मा अधिपति के रूप में स्थित है ।’ उस सर्वज्ञ (ब्रह्मा) को बौद्धों का परमपद माना गया है।’ ___ इसलिये इनके मत में बुद्धितत्त्व के नीचे वाले संसार की शान्ति (ही मोक्ष) है। इस प्रकार ‘ज्ञानं मुञ्चति तावत: (= ज्ञान ही इन्हें उतने-सीमित बन्ध-से मुक्त करता है) यह कथन ठीक है । सांख्य मत वाले सुख दुःख आदि स्वरूप वाली प्रकृति से पृथक् होकर पुरुष की स्वरूप में स्थिति को ही तत्त्व (= मोक्ष) मानते हैं । इस प्रकार पुरुष तत्त्व की प्राप्ति ही इनके (मत में) मोक्ष है । वही कहा है ___‘सांख्यों के मत में सुख दु:ख आदि से रहित पौरुष ज्ञान ही मोक्ष है । नैरात्म्यदृष्टि (= आत्मा का अस्तित्व न स्वीकार करना) से आत्मदृष्टि (= आत्मा को सत् मानना) बढ़कर है । इसलिये सांख्य दार्शनिकों का ज्ञान बौद्धों की अपेक्षा पूर्णप्रथा वाला है इसलिये इनके यहाँ बुद्धितत्त्व से ऊपर वाले पुरुषतत्त्व की प्राप्ति मानी गयी है । इस प्रकार उत्तरोत्तर ज्ञान पूर्णप्रथात्मक है-इत्यादि पूर्वसूत्र में प्रतिज्ञात अर्थ का निर्वाह किया गया । इस प्रकार सांख्य और योग दोनों मत में प्रकृति से पृथक् रूप में पुरुष ज्ञान समान होने पर भी पातञ्जल योग वालों का वह (मोक्षस्वरूप) बढ़कर है क्योंकि उसमें, ईश्वर प्रणिधानाद्वा’ कह कर ईश्वर (= उत्कृष्ट पुरुष तत्त्व) के प्रणिधान को मोक्ष का साधन माना गया है । अर्थात् पुरुष तत्त्व से ऊपर नियति तत्त्व की प्राप्ति कही गयी है। ‘हे देवेशी ! योगशास्त्र में छब्बीसवाँ तत्त्व परम पद है ।’ प्रथममाह्निकम् एवं च मौसुलपाशुपतादीनामपि यथायथं ज्ञानातिशयादूोर्ध्व तत्त्वावाप्ति: परं पदम् इति । तदुक्तम् ‘मौसुले कारूके चैव मायातत्त्वं प्रकीर्तितम् ।’ इति । तथा ‘व्रते पाशुपते प्रोक्तमैश्वरं परमं पदम् । इति । तत्रैवं बौद्धादीनां मायीयादेव मलादंशांशिकया, मौसुलानां कार्मादपि, पाशुपतानाम् अनात्मनि आत्माभिमानात् आणवादपि मलान्मोचकं ज्ञानम् इत्युक्तम् ‘समासव्यासाभ्याम्’ इति ।। ३३ ।। ननु स्वदर्शनौचित्येन एवं बन्धविगलनेऽपि किमिति नासौ मुक्तः इत्याशङ्कयाह तस्मान्मुक्तोऽप्यवच्छेदादवच्छेदान्तरस्थितेः । अमुक्त एव मुक्तस्तु सर्वावच्छेदवर्जितः ॥ ३४ ॥ …………..अध्वा बन्धस्य कारणम् ।’ इत्युक्तेः अध्वा तावद् बन्धकः । तत्र बौद्धादयो बुद्धितत्त्वान्तबन्धविगलनात् इस प्रकार मौसुल पाशुपत आदि के मत में भी क्रमशः ज्ञान का अतिशय होने से ऊर्ध्व-ऊर्ध्व तत्त्व की प्राप्ति परम पद मानी गयी है । वही कहा गया ‘मौसुल और कारुक मत में माया तत्त्व (की प्राप्ति ही मोक्ष) कही गयी है’ जैसे कि ‘पाशुपत व्रत (= सिद्धान्त) में ईश्वर को परमपद कहा गया है ।’ इस प्रकार बौद्ध आदि के मत में मायीय मल से अंश-अंश ज्ञान ही (उनको) मुक्त करता है । मौसुलों के मत में वही ज्ञान कार्म मल से तथा पाशुपत मत में अनात्मा में आत्माभिमान रूप आणव मल से मुक्ति दिलाता है। इस प्रकार (पूर्वकारिका में) ‘समासव्यासाभ्याम्’ पद से यह कहा गया ।। ३५ ।। प्रश्न है कि अपने-अपने दर्शन के अनुसार बन्धन के नष्ट होने पर भी यह (जीव) क्यों मुक्त नहीं होता? उत्तर देते हैं इस कारण अंशत: (अध्व बन्धन से) मुक्त होते हुए भी अन्य आशिक बन्धन के वर्तमान होने से जीव अमक्त ही हैं । वस्तुत: मक्त तो वही होता है जो समस्त (अध्वरूपी) बन्धन से रहित होता है ।। ३४ ।। ‘अध्वा ही बन्ध का कारण है’ इस कथन के अनुसार अध्वा ही बन्धक है । ऐसी स्थिति में बौद्ध आदि श्रीतन्त्रालोकः तन्मुक्ता अपि तदूर्ध्ववर्त्यध्वान्तरावच्छेदस्थितेरमुक्ता एव, अत एवैषां पुनरपि सर्गारम्भे सृज्यमानत्वात् संसाराविर्भावः, बन्धकारणस्य नि:शेषेणाप्रक्षयात् । यद्वक्ष्यति ‘सांख्यवेदादिसंसिद्धान् श्रीकण्ठस्तदहर्मुखे । सृजत्येव पुनस्तेन न सम्यङ्मुक्तिरीदृशी ।।’ इति । श्रीस्वच्छन्दशास्त्रेऽपि ‘लौकिकानां पुनः सृष्टिः पुनः संहार एव च । संसारचक्रमारूढा भवन्ति घटयन्त्रवत् ।।’ इत्यादि सामान्येनाभिधाय ‘मुक्तं च प्रतिबन्धात्तं पुनर्बध्नाति चेश्वरः । बन्ध: संसारतो भूयो यावद्देवं न विन्दति ।’ इति बौद्धाद्यवान्तरदर्शनमुक्तोपलक्षणपरतया विशेषेणोक्तम् । यः पुनर्नि:शेष प्रक्षीणसर्वाध्वबन्धः स एव साक्षान्मुक्तः इत्याह—‘मुक्तस्तु सर्वावच्छेदवर्जित:’ इति । यदुक्तम् बुद्धितत्त्वपर्यन्त बन्धन के नष्ट होने से उनसे मुक्त होकर भी उस (बुद्धितत्त्व) से ऊर्ध्ववर्ती अन्य अध्वाओं की सीमा के रहने के कारण अमुक्त ही हैं । इसलिये सृष्टि के आरम्भ में ये पुनः जन्म लेते हैं । और संसार की उत्पत्ति होती है । क्योंकि बन्धन के कारणों का पूर्णरूपेण क्षय नही हुआ रहता । जैसा कि कहेंगे ___ ‘सांख्यवेद आदि के अनुसार संसिद्ध (= मुक्त) पुरुषों की, श्रीकण्ठनाथ सृष्टि के आरम्भ में पुनः सृष्टि करते हैं इसलिये (उनकी) ऐसी मुक्ति सम्यक्तया नहीं होती ।’ स्वच्छन्दतन्त्र में भी ‘लौकिक साधकों की बार-बार सृष्टि और संहार होते रहते हैं । (वे लोग) घटयन्त्र (= रहट) की भाँति संसार चक्र पर सदैव आरूढ रहते है ।’ इत्यादि सामान्य रूप से कथन कर ‘ईश्वर प्रतिबन्ध के कारण मुक्त को पुन: बन्धन में डालते है । बद्धपुरुष संसार के कारण तब तक बन्धन में होता है जब तक वह देव (= परमशिव) को नहीं जान लेता । ___ यह बात विशेषतया बौद्ध आदि अवान्तरदर्शन के अनुसार मुक्तों के लिये कही गयी है । जो समस्त अध्वबन्धन को पूर्णरूप से नष्ट कर चुका है वही साक्षात् मुक्त है । वही कहते हैं—समस्त अवच्छेदों (= प्रतिबन्धों) से रहित (ही वास्तविक मुक्त है)’ जैसा कि कहा गया । प्रथममाह्निकम् ‘सर्वाधवनो विनिष्क्रान्तं शैवानां तु परं पदम् ।’ इति । तथा ‘शैवः सिद्धो भाति मूéतरेषां मुक्तः सृष्टौ पुनरभ्येति नाधः ।’ इति ।। ३४ ।। अत्र चैवंविधमेव पूर्ण ज्ञानं निमित्तम्-इत्याह यत्तु ज्ञेयसतत्त्वस्य ज्ञानं स्वात्मनोज्झितम् । अवच्छेदैर्न तत्कुत्राप्यज्ञानं सत्यमुक्तिदम् ॥ ३५ ॥ ‘अवच्छेदैः’ सङ्कोचाधायिभिरिदन्तापरामर्शः ‘सर्वात्मना’ सर्वप्रकारं वासना मात्रेणापि यत् ‘उज्झितम्’ पराहन्तापरामर्शसारम—इत्यर्थः । अत एव च पूर्ण प्रथात्मकत्वात् ‘न तत् कुत्राप्यज्ञानम्’ अतश्च ‘सत्याम्’ मुक्त्याभासविलक्षणां ‘मुक्ति’ ददाति, अहंपरामर्शसारप्रमात्रैकात्म्येन स्फुरति—इत्यर्थः ।। ३५ ।। इदानीमुद्दिष्टयोर्ज्ञानाज्ञानयोरेव स्वरूपं विभजति ज्ञानाज्ञानस्वरूपं यदुक्तं प्रत्येकमप्यदः । द्विधापौरुषबौद्धत्वभिदोक्तं शिवशासने ॥३६ ॥ ‘शैवों का परमपद समस्त अध्वाओं से परे है ।’ तथा ‘शैवसाधक सिद्ध होने पर अन्य (मुक्तों) के शिर पर बैठता है (= सर्वोत्कृष्ट स्थिति में होता है) । (एक बार) मुक्त होने पर वह पुनः नीचे की सृष्टि में पतित नहीं होता ।। ३४ ।।’ इस विषय (= मुक्ति) में इस प्रकार का ही पूर्ण ज्ञान कारण बनता है—यह कहते हैं जो (इन्दतापरामर्शी) अवच्छेदों से सभी प्रकार से रहित है फलत: कहीं भी अर्थात् किसी भी अंश में अज्ञान नहीं हैं प्रत्युत ज्ञेय तत्त्व का (पूर्णप्रथात्मक) ज्ञान है वही वास्तविक मुक्ति को प्रदान करने वाला ___अवच्छेद = सङ्कोच उत्पन्न करने वाले इदन्तापरामर्शो से । सब प्रकार से अर्थात् वासना तक, जो उज्झित = त्यक्त अर्थात् केवल पर अहन्ता परामर्शवाला, इसीलिये पूर्णविस्तारात्मक होने से वह किसी अंश में भी अज्ञान नहीं है । इसलिये सत्या = मुक्ति जैसी प्रतीत होने वाली अमुक्ति से विलक्षण, मुक्ति को देता है = अहं परामर्शरूप प्रमाता से अभिन्न रूप में स्फुरित होता है ।। ३५ ।। अब नाम लेकर बताये गये ज्ञान और अज्ञान के स्वरूप का विभाग करते ज्ञान और अज्ञान का जो स्वरूप पहले कहा गया पारमेश्वर दर्शन श्रीतन्त्रालोकः ‘शिवशासने’ इति पञ्चस्रोतोरूपे पारमेश्वरदर्शने—इत्यर्थः । एतद्धि सर्वत्रैवा विशेषेणोक्तम ।। ३६ ।। तदेव लक्षयति तत्र पुंसो यदज्ञानं मलाख्यं तज्जमप्यथ । स्वपूर्णचित्क्रियारूपशितावरणात्मकम् ॥ ३७ ॥ सङ्कोचिदृक्क्रियारूपं तत्पशोरविकल्पितम् । अथ—शब्द आनन्तर्ये, उद्देशानन्तरं हि लक्षणपरीक्षयोरवसरः-इत्याशयः । ‘तत्र’ द्विविधयोर्ज्ञानाज्ञानयोर्मध्यात् …………………. पुंसः प्रादुर्भवत्परम् ।’ इत्यस्यात्मनोऽपि यत्समनन्तरोक्तस्वरूपं मलाख्यमनन्यसाधाणानवच्छिन्नज्ञान क्रियायोगि परप्रमातृरूपाच्छिवादेव जातमुद्भूतम्-इत्यर्थः । परमेश्वर एव हि स्वस्वातन्त्र्यात्पूर्णज्ञत्वकर्तृत्त्वाद्यपहस्तनेन अख्यात्यात्मकारणमलाविर्भावेन स्वात्मान मावृणुयात् । तदुक्तम् ‘परमं यत्स्वातन्त्र्यं दुर्घटसम्पादनं महेशस्य । (= शैवदर्शन) में पौरुष एवं बौद्ध भेद से वह प्रत्येक दो-दो प्रकार का कहा गया है ।। ३६ ।। ___शिवशासन में = पाँच धाराओं वाले पारमेश्वर दर्शन में यह सर्वत्र समानरूप से कहा गया है ।। ३६ ।। उसका लक्षण बतलाते हैं उनमें जो पुरुष का अज्ञान है जिसका नाम मल है, जो उस (परप्रमाता) पुरुष से उत्पन्न है, अपनी पूर्ण ज्ञानक्रियारूप शिवता का आवरण करने वाला है तथा परमशिव की ज्ञानक्रिया का सङ्कोचक है, वह (अज्ञान) पशु में भी निर्विकल्प अर्थात् आभास रूप में रहता है ।। ३७-३८- ।। ‘अथ’ शब्द का प्रयोग आनन्तर्य अर्थ में हुआ है । नामसङ्कीर्तन के बाद लक्षण और परीक्षा का अवसर प्राप्त है—यह आशय है । वहाँ = दो प्रकार के ज्ञान-अज्ञान में से ……….यह (परप्रमाता रूप) पुरुष से उत्पन्न हुआ ।’ आत्मा का जो पूर्वोक्त रूप वाला मल नामक (अज्ञान है वह) अनन्यसाधारण अनवच्छिन्न ज्ञान क्रिया वाले परप्रमाता रूप शिव से जात = उत्पन्न है । परमेश्वर ही अपने स्वातन्त्र्यवश पूर्णज्ञत्त्व कर्तृत्व आदि को छिपाकर अज्ञान रूप आणवमल को उत्पन्न कर उससे अपने को ढंक लेता है । वही कहा गया ‘महेश्वर का दुर्घटसम्पादक जो परम स्वातन्त्र्य है, वह देवी मायाशक्ति शिव का प्रथममाह्निकम् ६३ देवी मायाशक्ति: स्वात्मावरणं शिवस्यैतत् ।। (प० सा० १५का० ) मायापरिग्रहवशाद् बोधो मलिन: पुमान्पशुर्भवति ।’ इति । (प० सा० १६ का०) वक्ष्यति च ‘तेन स्वरूपस्वातन्त्र्यमानं मलविजृम्भितम् ।’ इति । तदेव पशोराणवादिमलत्रययोगिनोऽपि तस्य मातुर्देशकालाद्यवच्छिन्नत्वान्नियत दृक्क्रियास्वाभासालोचनात्मकं ज्ञानम् । परमेश्वर एव हि सर्वज्ञताद्यपहस्तनेन अणुतां प्रापितस्य स्वात्मन: पुनरपि कलादियोगं कृतवान्, येनास्य नियतं ज्ञत्वकर्तृत्वाद्यभियुक्तम् । तदुक्तम् ‘असूत सा कलातत्त्वं यद्योगादभवत्पुमान् । जातकर्तृत्वसामो विद्यारागौ ततोऽसृजत् ।। विद्या विवेचयत्यस्य कर्म तत्कार्यकारणे। रागोऽपि रञ्जयत्येनं स्वभोगेष्वशुचिष्वपि ।। नियतिर्योजयत्येनं स्वके कर्मणि पुद्गलम् । कालोऽपि कलयत्येनं तुट्यादिभिरवस्थितः ।।’ इति । ज्ञानस्वरूपस्य प्रथममुद्देशेऽपि अवश्योच्छेद्यत्वप्रतिपादनार्थमादाव-ज्ञानस्वरूपं निरूपितम् ।। अपना आवरण है । माया के पाश में बद्ध होने के कारण शुद्धबोधरूपी पुरुष मलिन पशु हो जाता है ।’ आगे कहेंगे—‘इस कारण मल का जो विजृम्भण है वह भी (परमेश्वर के) स्वरूप का स्वातन्त्र्य ही है ।’ वही (स्वातन्त्र्य) आणव आदि तीन मलों वाले उस प्रमाता का देश काल आदि से अवच्छिन्न होने के कारण दर्शन क्रिया एवं अपने आभास का आलोचक ज्ञान हो जाता है । परमेश्वर स्वयं सर्वज्ञता आदि को छिपाकर अणुभाव को प्राप्त आत्मा को कला, विद्या आदि से युक्त करता है जिससे ज्ञत्व कर्तृत्व आदि सीमित हो जाता है । वही कहा गया ‘उस (माया) ने कला तत्त्व को उत्पन्न किया जिसके योग से पुरुष ज्ञाता एवं कर्ता बन जाता है । इसके बाद (उसने) विद्या और राग की सृष्टि की । विद्या इसके कर्म को कार्यकारण भाव के रूप में विचारती है । राग इस पुरुष को अशुचि भोगों में अनुरक्त करता है । नियति इस पुद्गल (= शरीर) को अपने कर्म में नियुक्त करती है । तुटि आदि के रूप में उपहित काल इसको बद्ध करता है । यद्यपि ज्ञान का नाम पहले लिया गया था तथापि अवश्य उच्छेद्यत्व प्रतिपादित ६४ श्रीतन्त्रालोकः ननु पुंसा बुद्धिवृत्त्यात्मकं ज्ञानं निर्विकल्पकम् इत्युच्यते, तत् कथमेतत् बुद्ध्यंशोपनिपाति न स्यात्-इत्याशङ्क्याह तदज्ञानं न बुद्ध्यंशोऽध्यवसायाद्यभावतः ॥ ३८ ॥ एवमपि हि बुद्धेः
  • ‘अध्यवसायो बुद्धिः’ इत्याद्युक्तेरध्यवसाय एव मुख्यं रूपम्, कथमस्य एतदभावे तद्धर्मत्वं स्यात् ।। ३८ ।। अत एवाह अहमित्थमिदं वेयीत्येवमध्यवसायिनी । षटकञ्चुकाबिलाणूत्थप्रतिबिम्बनतो यदा ॥ ३९ ॥ धीर्जायते तदा तादृग्ज्ञानमज्ञानशब्दितम् । बौद्धं तस्य च तत्पौस्नं पोषणीयं च पोष्ट च ॥ ४० ॥ करने के लिये पहले अज्ञान का स्वरूप बतलाया गया ।। ३७ ।।।। पुरुष की बुद्धि की वृत्ति रूप ज्ञान ही निर्विकल्पक कहा जाता है तो फिर यह ज्ञान बुद्धि पर आश्रित क्यों नहीं होगा? ऐसा आशंका कर कहते हैं चूँकि उसमें अध्यवसाय (= निश्चयात्मकता) नहीं रहती इसलिए वह अज्ञान बुद्धि का अंश नहीं है ।। -३८ ।। ____‘अध्यवसायो (= निश्चयः) बुद्धि’ (सां.का.) इत्यादि कथन के अनुसार अध्यवसाय बुद्धि का मुख्य रूप है । इस (अध्यवसाय) के अभाव में (अज्ञान) उस (= बुद्धि) का कर्म कैसे होगा? ।। ३८ ।। इसलिये कहते हैं छः कञ्चकों से मलिन (परिमित प्रमाता) अणु में उत्पन्न होने वाले प्रतिबिम्ब से जब ‘मैं इसे इस प्रकार जानता हूँ’-ऐसी निश्चयात्मिका बुद्धि उत्पन्न होती है तब उस प्रकार का ज्ञान बौद्ध अज्ञान शब्द से अभिहित होता है । वह पौरुष अज्ञान बौद्ध अज्ञान का पोषणीय अर्थात् कार्य है और (उसका) कारण’ भी है ।। ३९-४० ।। १. चूँकि बौद्ध अज्ञान पौरुष अज्ञान के कारण उत्पन्न होता है इसलिए वह पौरुष अज्ञान का कार्य है । यदि बौद्ध अज्ञान न हो तो बौद्ध ज्ञान नहीं होगा और बौद्ध ज्ञान न होगा तो पौरुष अज्ञान नहीं हटेगा । अत: अपसारण की दृष्टि से बौद्ध अज्ञान कारण है ।प्रथममाह्निकम् Fu अस्याश्चैवमध्यवसाययोगित्वे हेतुः ‘षटकञ्चुक’ इति । षट्कञ्चुकैः ‘कालकलानियतिबलाद् रागाविद्यावशेन संबद्धः । अधुनैव किञ्चिदेवेदमेव सर्वात्मनैव जानामि । मायासहितं कञ्चुकषट्कर्मणोरन्तरङ्गमिदमुक्तम् ।। (प०सा० १६ उ०१७) इत्यादिना निरूपितस्वरूपैः—‘आबिल:’ प्रतिनियतज्ञत्वकर्तृत्वाद्युत्पत्त्या म्लान प्रायो योऽसौ ‘अणः’ परिमितात्मा, ततो जातात ‘प्रतिबिम्बनात’ चिच्छाया संक्रमणात्-इत्यर्थः । एवं ह्यस्याः पुंबोधव्यक्तिभूमित्वादेवंस्वभावो भवेत्-इति भावः । तादृक्’ इति एवमध्यवसायरूपम् । अनयोश्च परस्परं कार्यकारण दर्शयितुमाह—‘तस्य’ इत्यादि, ‘तस्य’ इति बौद्धस्य, ‘पौस्नम्’ पुंसि भवं पौरुषम्-इत्यर्थः । ‘पोषणीयम्’ कार्यम् इत्यर्थः । कामशोकाद्यावेशभाजो हि तन्मयतानुसंधानादिना तत्तदर्थसाक्षात्कारात्मकमविकल्पकं ज्ञानमुदियात् । यदाहुः ‘कामशोकभयोन्मादचौरस्वप्नायुपप्लुताः । अभूतानपि पश्यन्ति पुरतोऽवस्थितानिव ।।’ इति । ‘पोष्ट’ इति कारणम् । स्वप्नादावपि अनुभव एव हि प्राच्यो निमित्तम्, नहि | इस (बुद्धि) के इस प्रकार के अध्यवसाय वाली बनने में छ: कञ्चुक ही कारण हैं । छ कञ्चक ‘काल कला नियति के बल से राग और अविद्यावश सम्यक् रूप से आबद्ध पुरुष अभी, थोड़ा ही, यही, पूर्णरूप से जानता हूँ—ऐसा समझने लगता है । माया के सहित ये छः कञ्चुक अणु के अन्तरङ्ग कहे गये हैं ।’ | इत्यादि के द्वारा बतलाये गये स्वरूप वालों से आविल = निश्चित-सीमित ज्ञत्वकर्तृत्व आदि की उत्पत्ति से मलिन, जो यह अणु = परिमित आत्मा, उससे उत्पन्न = उसमें प्रतिबिम्बित, चित् की छाया के संक्रमण से । इस प्रकार पुरुष बोध की अभिव्यक्ति ही इसका आधार है अत: इस बुद्धि का ऐसा स्वभाव हो जाता है । वैसा = इस प्रकार का अध्यवसायरूप । इन दोनों (= बौद्ध और पौस्न ज्ञान) का कार्यकारण भाव दिखलाने के लिये कहा-तस्य… । तस्य = बौद्ध ज्ञान का, पौस्न = पुरुष में उत्पन्न अर्थात् पौरुष ज्ञान । पोषणीय = कार्य । काम शोक आदि के आवेश से युक्त साधक को तन्मयता के अनुसन्धान आदि के कारण भिन्न-भिन्न अर्थों के साक्षात्कार रूप निर्विकल्पक ज्ञान उत्पन्न होता है । जैसा कि कहा है ‘काम, शोक, भय, उन्माद, चौरकार्य, स्वप्न आदि से आक्रान्त मनुष्य असत् पदार्थों को भी सामने स्थित देखते हैं।’ पोष्ट्र = कारण । स्वप्न आदि में भी पूर्व का अनुभव कारण बनता ६६ श्रीतन्त्रालोकः नारिकेलद्वीपवासिनो वह्निविकल्पादाविच्छापि भवेत् ।। ३९-४० ।। एवमज्ञानं निरूप्य, ज्ञानमपि द्विविधं निरूपयितुमाह क्षीणे तु पशुसंस्कारे पुंसः प्राप्तपरस्थितेः। विकस्वरं तद्विज्ञानं पौरुषं निर्विकल्पकम् ॥ ४१ ॥ विकस्वराविकल्पात्मज्ञानौचित्येन यावता । तबौद्ध यस्य तत्पोस्न प्राग्वत्पोष्यं च पोष्टु च ॥ ४२ ॥ पशोराणवस्यापि वासनामात्रक्षयाभिधानात् ‘निमित्ताभावे नैमित्तिकस्याप्य-भाव:’ इति न्यायेन कार्ममायीययोरपि प्रक्षयानिवृत्तनिखिलबन्धस्य ‘पुंसः’ अत एव प्राप्त परमचिदैकात्म्यस्य ‘विकस्वरम्’ पराहन्ताविमर्शात्मकम् “निर्विकल्पकम्’ कृत्रिमा हङ्कारादिविकल्पविलक्षणं ज्ञानं पौरुषं भवति–इति वाक्यार्थः ।। _ ‘औचित्येन’ इति तद्वत्पूर्णेनात्मना-इत्यर्थः । अतश्च ‘सर्वो ममायं विभव:’ इत्येवंरूपत्वमस्याः । ‘यस्य’ इति बौद्धज्ञानस्य । ‘प्राग्वत्’ इति यथैवाज्ञानयो: है। नारियल से भरे द्वीप के निवासी वह्निविकल्प की इच्छा भी नहीं कर सकत ।। ३९-४० ।।। अज्ञान का निरूपण करने के बाद दो प्रकार के ज्ञान का निरूपण करने के लिये कहते है पशुसंस्कार क्षीण होने पर (परमचिदैकात्म्य) स्थिति को प्राप्त पुरुष के अन्दर (जो) विकस्वर निर्विकल्पक विज्ञान उत्पन्न होता है वह पौरुष (ज्ञान कहलाता है) ।। ४१ ।। विकस्वर निर्विकल्पक आत्मज्ञान के औचित्य (= पूर्ण होने) के कारण चूंकि वह बौद्ध (ज्ञान भी है) जिसका कि वह पौरुष ज्ञान पूर्ववत् (= जैसे बौद्ध अज्ञान पौरुष अज्ञान का कारण और कार्य है उसी प्रकार) पोष्य और पोषक है ।। ४२ ।। पश् के आणव मल की वासना तक के क्षय होने से ‘कारण का अभाव होने पर कार्य का भी अभाव हो जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार कार्म और मायीय मलों का भी क्षय होने से पुरुष का समस्त बन्धन समाप्त हो जाता है परिणामस्वरूप परम संविद् के साथ ऐकात्म्य हो जाने से उसके अन्दर विकस्वर = पराहन्ताविमर्शरूप, निर्विकल्पक = कृत्रिम अहङ्कार आदि से विलक्षण जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह पौरुष (ज्ञान) होता है । ___ औचित्य के साथ = पूर्णरूप से । इसीलिये इस (संविद्) का रूप- यह सब गोग हा वैभव है-ऐसा होता है । जिसका = बौद्ध ज्ञान का । पूर्व की भाँति = प्रथममाह्निकम् परस्परं पोष्यपोषकभावस्तथैव-इत्यर्थः । तथैव पूर्णापूर्णत्वेन पुन: विशेषो ग्राह्यः, अन्यथा हि ज्ञानाज्ञानयोः स्वरूपमेवाभिहितं न स्यात् ।। ४१-४२ ।। नन्वेवंविधमज्ञानं तावदनाद्येवावस्थितम् इति नास्ति विवादः, एतदभावात्मकं ज्ञानं पुनः कदा समुदियात् ? एतदभावे च किं निमित्तम् ? इत्याशङ्कयाह तत्र दीक्षादिना पौंस्नमज्ञानं ध्वंसि यद्यपि । तथापि तच्छरीरान्ते तज्ज्ञानं व्यज्यते स्फुटम् ॥ ४३ ॥ यद्यप्युक्तस्वरूपम् ‘पौंस्नमज्ञानम्’ ‘दीयते ज्ञानसद्भावः क्षीयन्ते पशुवासनाः । दानक्षपणसंयुक्ता दीक्षा तेनेह कीर्तिता ।।’ इत्याधुक्तस्वरूपया दीक्षया नश्यत्येव ‘तथापि’ ‘तत्’ अज्ञानाभावमात्र रूपमात्मज्ञानं व्यक्त्युन्मुखमपि …………………..प्रारब्धेकं न शोधयेत् ।’ इत्याद्युक्तेरिदंशरीरारम्भकस्य कार्ममलस्य सद्भावात् ‘तस्य’ वर्तमान-शरीरस्य अन्ते स्फुटं व्यज्यते’ जिस प्रकार उक्त दोनों अज्ञानों में पोष्यपोषक सम्बन्ध है उसी प्रकार (दोनों में) अन्तर केवल पूर्ण और अपूर्ण का है । अन्यथा ज्ञान और अज्ञान का स्वरूप ही नहीं कहा गया होता ।। ४१-४२ ।। ___ इस प्रकार का अज्ञान अनादि ही कहा गया है-इसमें कोई विवाद नहीं है । इस (अज्ञान) का अभाव रूप ज्ञान कब उत्पन्न होगा और उस अभाव का निमित्त क्या होगा? ऐसी शङ्का कर कहते है उनमें दीक्षा आदि के द्वारा पौरुष अज्ञान यद्यपि नाशवान् है तथापि (जिस शरीर में दीक्षा आदि होती है) उस शरीर का अन्त होने पर वह (= आत्मीय) ज्ञान स्पष्टतया व्यक्त हो जाता है ।। ४३ ।। ___ यद्यपि (गुरु के द्वारा) ज्ञानसद्भाव दिया जाता है (जिसके फलस्वरूप) पशुवासना नष्ट हो जाती है । इस प्रकार दान एवं क्षपण से संयुक्त होने के कारण (वह संस्कार) दीक्षा कहलाता है। इत्यादि उक्त स्वरूपवाली दीक्षा के द्वारा उक्त रूप वाला पौरुष अज्ञान नष्ट हो जाता है तथापि, वह = अज्ञानाभावमात्ररूप आत्मज्ञान प्रकाशित होने की स्थिति में होते हुए भी ‘………. प्रारब्ध कर्मों का शोधन नहीं करना चाहिये’ इत्यादि उक्ति के अनुसार शरीरारम्भक कार्ममल के रहने से, उसके = वर्तमान श्रीतन्त्रालोकः ..देहपाते शिवं व्रजेत् ।’ इत्याद्यक्त्या साक्षात्कारात्म स्फरति—इत्यर्थः । आदिशब्दाच्च शेषवत्त्या ग्रहणम्, न तु तीव्रतरशक्तिपातादेः, तद्धि दीक्षायां निमित्तम् इति तद्वचनेनैवास्य ग्रह: सिद्धः, न चास्मिन्दीक्षातोऽन्यत्किचिन्मुक्तौ निमित्तम् । तदुक्तम् ‘तस्मात्प्रवितताद् बन्धात्परस्थानविरोधात् ।। दीक्षैव मोचयत्यूचं शैवं धाम नयत्यपि ।।’ इति । तीव्रतमशक्तिपातादौ पुनरनुपायादिक्रमेण दीक्षा भवेत्, येनास्य तत्कालमेवाप वर्ग: । तदुक्तम् ‘तत्संबन्धात्ततः कश्चित्तत्क्षणादपवृज्यते ।’ इति । _____दीक्षानिरपेक्षमेव पुनरेतत् मुक्तौ निमित्तम् इति न सम्भाव्यम्, एवं श्रुतिविरोध: स्यात् । ‘तस्य दीक्षां विनैवात्मसंस्कारपरिणामतः । सम्यग्ज्ञानं भवेत्सर्वशास्त्रेषु परिनिष्ठितम् ।।’ शरीर के अन्त में स्पष्टरूप से व्यक्त होता है देहपात होने पर (साधक) शिवभाव को प्राप्त हो जाता है। इत्यादि उक्ति के अनुसार प्रत्यक्ष रूप से स्फुरित होता है । (श्लोकस्थ दीक्षादि पद में) आदि शब्द से शेषवृत्ति (संस्कार) का ग्रहण करना चाहिये न कि तीव्रता, शक्तिपात आदि का । वह तो दीक्षा के विषय में निमित्त है इसलिये उसके ही कथन से इसका ग्रहण सिद्ध हो जाता है । इस मुक्ति में दीक्षा से भिन्न कोई कारण नहीं है । वही कहा गया __इस कारण परमस्थान (प्राप्ति) का विरोधी जो विस्तृत बन्धन है, दीक्षा ही उससे मुक्ति दिलाती है और ऊर्ध्ववर्ती शैवपद को प्राप्त भी कराती है तीव्रतम् शक्तिपात आदि की प्रक्रिया में अनुपाय आदि के क्रम से दीक्षा होती है जिससे इस (दीक्षित व्यक्ति) का तत्काल मोक्ष हो जाता है । जैसा कि कहा गया’ ____‘उसके बाद उससे सम्बन्ध होने के कारण कोई उसी समय अपवर्ग को प्राप्त हो जाता है ।’ ___इससे यह नहीं समझना चाहिये कि दीक्षा आदि से रहित यह (तीव्रतम शक्तिपात आदि) मुक्तिलाभ में कारण होता है……… क्योंकि ऐसा मानने पर श्रुति में विरोध हो जायेगा । “उस (साधक) का दीक्षा के बिना ही आत्मसंस्कार के परिणामस्वरूप समस्त शास्त्रों में परिनिष्ठित सम्यक् ज्ञान उत्पन्न होता है ।’ य प्रथममाह्निकम् इत्यादौ पुनर्बाह्यक्रियादीक्षाभिप्रायेण तन्निषेधो विवक्षितः, अन्यथा ह्यत्रात्म संस्कारशब्दार्थ एव कथं सङ्गच्छताम् इत्यलं बहुना ।। ४३ ।। ननु यद्येवं दीक्षया देहान्त एवमुक्तिर्भवेत्, तत्कथं ‘जीवन्नेव विमुक्तोऽसौ’ इत्याद्युक्तम् ? इत्याशङ्कयाह बौद्धज्ञानेन तु यदा बौद्धमज्ञानजृम्भितम् । विलीयते तदा जीवन्मुक्तिः करतले स्थिता ॥ ४४ ॥ ‘बौद्धज्ञानेन’ इति परमेश्वराद्वयशास्त्रश्रवणायुद्भूतेन । तदुक्तम् ‘गुरूणैव यदा काले सम्प्रदायो निरूपितः । तदाप्रभृति मुक्तोऽसौ यन्त्रं तिष्ठति केवलम् ।।’ इति । एतच्च दीक्षिताधिकारेणैव ज्ञेयम्, नहि अकृतदीक्षस्य शास्त्रश्रवणेऽप्यधिकार: इति कुतस्तदवबोधनिमित्तकोऽपि तज्ज्ञानाविर्भावः स्यात् । तदुक्तम् ‘अदीक्षितानां पुरतो नोच्चरेच्छिवपद्धतिम् ।’ इति । न च अप्रध्वस्तपौरुषाज्ञानस्य अनेन किञ्चिद्भवति इत्युक्तप्रायम्, अन्यथा हि इत्यादि में जो निषेध कहा गया है वह बाह्य क्रिया दीक्षा के अभिप्राय से, अन्यथा यहाँ आत्मसंस्कार शब्द के अर्थ की सङ्गति कैसे बैठेगी बस इतना पर्याप्त यदि दीक्षा के कारण देहान्त होने पर ही मुक्ति हो जायेगी तो ‘जीवित रहते हुए ही यह मुक्त हो जाता हैं ।’ इत्यादि कैसे कहा गया? यह शङ्का कर कहते = EEEE है तब जीवन्मुक्ति करतल में स्थित हो जाती है ।। ४४ ।। बौद्धज्ञान के द्वारा–परमेश्वर से सम्बद्ध अद्वय शास्त्र के श्रवण आदि से उत्पन्न के द्वारा । वही कहा गया ‘जिस समय गुरु ने (शिष्य के लिये) सम्प्रदाय का निरूपण किया तभी से यह मुक्त हो गया । (अब जीवित रहने वाला वह) केवल यन्त्र के समान रहता यह (कथन) दीक्षित के ही विषय में जानना चाहिये । जिसकी दीक्षा नहीं हुई है उसका शास्त्रश्रवण में भी अधिकार नहीं है फिर उसको (= शास्त्र को) समझने के कारण उत्पन्न ज्ञान का आविर्भाव कैसे होगा? वही कहा गया ‘दीक्षारहित लोगों के सामने शैवशास्त्र का उच्चारण नहीं करना चाहिये ।’ श्रीतन्त्रालोकः प्रेक्षावतां दीक्षायां प्रवृत्तिरेव न स्यात्-साध्यस्यार्थस्य अत एव स्रुष्टुरभावात्, अत एव दीक्षायां शिथिलास्थत्वं न वाच्यम्, तस्या एव मुक्ति प्रति मूलकारण त्वात् । एवं दीक्षादिना पौंस्नं ज्ञानमभिव्यक्तयुन्मुखमपि न तदैव मुक्ति प्रदम्, देहान्ते तदभिव्यक्तरुक्तत्वात्, इदं पुनस्तदैव इति ततोऽस्य प्राधान्यमपि कटाक्षितम् ।। ४४ ।। न केवलमेतदेवास्य ततः प्राधान्यनिमित्तं यावदन्यदपि–इत्याह दीक्षापि बौद्धविज्ञानपूर्वा सत्यं विमोचिका । तेन तत्रापि बौद्धस्य ज्ञानस्यास्ति प्रधानता ॥ ४५ ॥ इह ‘सर्वलक्षणहीनोऽपि ज्ञानवान्गुरुरुत्तमः ।’ इत्याद्युक्तेरधिगतशास्त्रार्थस्यैव हि गुरोर्दीक्षायाम् अधिकारः, अत एव तस्य ‘शिवशास्त्रविधानज्ञं ज्ञानज्ञेयविशारदम् ।’ इति लक्षणं प्राधान्येनोक्तम्, अन्यथा पुन: जिसका पौरुष अज्ञान नष्ट नहीं हुआ है उसका इस (श्रवण) से कुछ नहीं होता-यह तात्पर्य है । अन्यथा बुद्धिमान् लोग दीक्षा में प्रवृत्त ही नही होंगे । क्योंकि साध्य अर्थ का स्रष्टा ही नहीं है। इसीलिये दीक्षा में शिथिल आस्था नहीं होनी चाहिये । क्योंकि वही (= दीक्षा ही) मुक्ति के प्रति मूल कारण है । इस प्रकार दीक्षा आदि के द्वारा पौरुष ज्ञान यद्यपि अभिव्यक्त होने वाला होता है तथापि वह उसी समय मुक्ति नहीं देता क्योंकि उस (पौरुष ज्ञान) की अभिव्यक्ति शरीरपात होने पर ही कही गयी है । यह (= पौरुष ज्ञान) भी उसी (= बौद्ध ज्ञान) के बाद होता है इस कारण इस बौद्ध ज्ञान की प्रधानता भी सङ्केतित है ।। ४४ ।। उस (= दीक्षा) की अपेक्षा केवल यही इस (= बौद्ध ज्ञान) प्राधान्य का कारण नहीं है बल्कि अन्य भी कारण है-यह कहते हैं बौद्ध विज्ञान है पूर्व में जिसके ऐसी दीक्षा भी मुक्ति देने वाली होती है (यह बात) सत्य है । इस कारण वहाँ (= दीक्षा के विषय में) भी बौद्ध ज्ञान की ही प्रधानता है ।। ४५ ।। “समस्त लक्षणों से रहित भी ज्ञानवान् गुरु सर्वश्रेष्ठ होता है ।’ इत्यादि उक्ति के अनुसार समस्त शास्त्रों का ज्ञाता ही गुरु दीक्षा के विषय में अधिकारी होता है । इसीलिये ‘शिवशास्त्र के विधान को जाननेवाला और ज्ञान तथा ज्ञेय में निपुण’ ऐसा उसका मुख्य लक्षण बतलाया गया है । अन्यथा प्रथममाह्निकम् ‘शास्त्रहीने न सिद्धः स्याद्दीक्षायां वीरवन्दिते ।’ इत्याधुक्त्या दीक्षा विमोचिकैव न स्यात्, तेन इति दीक्षायां बौद्धस्य ज्ञानस्य कारणत्वात्, नहि तेन विना तस्या निष्पत्तिरेव स्यात् ।। ४५ ।। न चैतदस्मदुपज्ञमेव—इत्याह ज्ञानाज्ञानागतं चैतद् द्वित्वं स्वायम्भुवे रुरौ । मतङ्गादौ कृतं श्रीमत्खेटपालादिदैशिकैः ॥ ४६ ॥ तदुक्तम्-श्रीस्वायम्भुवे ‘अथात्ममलमायाख्यकर्मबन्धविमुक्तये । व्यक्तये च शिवत्वस्य शिवज्ञानं प्रवर्तते ।।’ इति । ‘अथानादिर्मल: पुंसां पशुत्वं परिकीर्तितम् । तत्सद्भाववशोऽज्ञादि: पाशौघ: पौरुषः स्मृतः ।। तस्मात्तत्तत्त्वतो ज्ञेयं मोक्षमक्षयमिच्छता ।’ इति च । श्रीरुरावपि ‘यजन्ति विविधैर्यज्ञैर्मन्त्रतत्त्वविशारदाः । ___ ‘हे वीर शैवों द्वारा वन्दिते! शास्त्रहीन (गुरु से प्राप्त) दीक्षा सिद्धिदायक नहीं होती ।’ ___ इत्यादि उक्ति के अनुसार दीक्षा मुक्तिप्रद नहीं होती । इस कारण = दीक्षा के विषय में बौद्धज्ञान के कारण होने से । उस (= बौद्धज्ञान) के बिना उस (= दीक्षा) की निष्पत्ति नहीं होती ।। ४५ ।। यह बात मैने अपने मन से नहीं कहीं-यह कहते हैं ज्ञान और अज्ञान की दृष्टि से ये दो प्रकार स्वायम्भव, रुरु एवं मतङ्ग आदि शास्त्रों में श्रीमान् खेटपाल आदि आचार्यों के द्वारा किए गए हैं ।। ४६ ।। वही बात स्वायम्भुव शास्त्र में कही गयी है ‘आत्ममल अर्थात् आणवमल मायीयमल एवं कार्ममल, जो कि बन्धन रूप है, से मुक्ति तथा शिवत्व की अभिव्यक्ति के लिये शिवज्ञान प्रवृत्त होता है।’ ‘अनादि अज्ञान ही पुरुषों का पशुत्व है (अथव पुरुषों के अन्दर वर्नमान अनादि अज्ञान ही उनका पशुत्व है) । उसके प्रभाव के कारण अज्ञान आदि पापा के पाश कहे गये हैं । इस कारण अक्षय मोक्ष को चाहने वाले को उसको यथार्थ रूप से जाना चाहिये ।’ रुरुशास्त्र में भी कहा गया है श्रीतन्त्रालोकः गुरुतन्त्राद्यनुज्ञातदीक्षासिच्छिन्नसंशया: ।।’ इति । ‘न मीमांस्या विचार्या वा मन्त्रा: स्वल्पधिया नरैः । प्रमाणमागमं कृत्वा श्रद्धातव्या विचक्षणैः ।। सर्वे मन्त्रात्मका देवाः सर्वे मन्त्रा: शिवात्मका: । शिवात्मकमिदं ज्ञात्वा शिवमेवानुचिन्तयेत् ।।’ इति च । श्रीमतङ्गेऽपि ‘ततः स भगवानीश: स्फुरन्माणिक्यशेखरः । वाक्यानलसमुत्थेन ज्वालावीर्येण मन्त्रराट् ।। प्रददाह मुनेः सर्वमज्ञानं तृणराशिवत् ।’ इति । ‘शिववक्त्राम्बुजोद्भूतममलं सर्वतोमुखम् ।। शिवत्वोन्मीलनं तथ्यं ज्ञानमज्ञाननाशनम् । अनेन सिद्धाः पश्यन्ति यत्तत्पदमनामयम् ।।’ इति च । आदिशब्देन चिल्लाचक्रेश्वरीमतादेर्ग्रहणम् । तदुक्तं तत्र ‘बौद्धं च पौरुषेयं च द्विविधं तन्मलं स्मृतम् । तत्र दीक्षादिना याति पौरुषेयं मलं क्षयम् । ‘मन्त्रों के तत्त्वज्ञान के पण्डित लोग अनेक प्रकार के यज्ञों से (परमेश्वर की) पूजा करते है । वे लोग गुरुतन्त्र आदि से अनुज्ञात दीक्षा रूपी तलवार से संशय को काट देते हैं । ____‘अल्पबुद्धि वाले लोगों के द्वारा मन्त्रों की मीमांसा या उन पर विचार नहीं करना चाहिये । उन बुद्धिमानों को चाहिये कि वे आगम शास्त्र को प्रमाण मानकर उनमें श्रद्धा करें । सभी देवतायें मन्त्रात्मक हैं और सभी मन्त्र शिवात्मक है । यह सब कुछ शिवात्मक ही हैं—ऐसा समझकर शिव का ही अनुचिन्तन करना चाहिये।’ मतङ्गशास्त्र में भी ‘इसके बाद शिर पर चमकती हुई मणि वाले तथा मन्त्रों से सुशोभित भगवान् शिव ने वाक् रूपी अग्नि से उत्पन्न ज्वालारूपी शक्ति से मुनि के समस्त अज्ञान को तृणराशि के समान जला दिया ।’ शिव के मुखकमल से उत्पन्न निर्मल सर्वतोमुखी, शिवत्व को जागृत करने वाला, अज्ञान का नाशक यथार्थ ज्ञान (उत्पन्न होता है) । सिद्ध लोग इसके द्वारा उस अनामय पद को देखते हैं । ‘मतङ्गादौ’ मे स्थित आदि पद से चिल्ला, चक्रेश्वरी आदि मतों का ग्रहण होता है । वही वहाँ कहा गया है ‘वह अज्ञान बौद्ध और पौरुष (भेद से) दो प्रकार का कहा गया है । उनमें से प्रथममाह्निकम् बौद्धमक्षयमेवास्ते तावत्तावत्समुद्रितम् । यावन्न बौद्धमेवास्य सजातीयविलापकम् ।। ज्ञानमभ्युदितं सम्यक्सारेतरविभागकृत् ।’ इति पौंस्नज्ञानाभिव्यञ्जने दीक्षा तावन्न प्रभवेद्यावदस्य बौद्धं ज्ञानं पूर्वभावि न स्यात्, येनास्य ततोऽपि प्राधान्यमुक्तम् ।। ४६ ।। एवं बौद्धमपि ज्ञानं पारमेश्वरं शास्त्रमन्तरेण कुतः समुदियात् इति तदेव मूलकारणत्वादिह प्रधानम्-इत्याह तथाविधावसायात्मबौद्धविज्ञानसम्पदे । शास्त्रमेव प्रधानं यज्ज्ञेयतत्त्वप्रदर्शकम् ॥ ४७ ॥ ‘संपदे’ इति–तां जनयितुम् इत्यर्थः । यतो ‘ज्ञेयस्य’ नीलसुखादेः ‘तत्त्वम्’ प्रकाशमानत्वान्यथानुपपत्त्या प्रकाशात्मकशिवस्वभावत्वम्, तस्य प्रदर्शकम् पराद्वयोपदेशकारित्वात्तदभिधायकम्-इत्यर्थः । अत एव चास्य तदप्रदर्शकतया शास्त्रान्तरेभ्यो वैलक्षण्यमपि कटाक्षितम् ।। ४७ ।। । पौरुष अज्ञान दीक्षा आदि के द्वारा क्षीण होता है । बौद्ध अज्ञान तब तक पूर्ण उदित और अक्षय रहता है जब तक कि उसका सजातीय एवं (अज्ञान का) विलायक सम्यक् तथा तत्त्व से भिन्न को अलग करने वाला बौद्ध ज्ञान उत्पन्न नहीं हो जाता । पौरुष ज्ञान को व्यक्त करने में दीक्षा तब तक समर्थ नहीं होती जब तक कि उसके पूर्व बौद्धज्ञान उदित न हो । इस कारण इस (बौद्ध ज्ञान) को उस (पौरुष ज्ञान) की अपेक्षा प्रमुख कहा गया है ।। ४६ ।। बौद्ध ज्ञान भी पारमेश्वर (= शैव) शास्त्र के अध्ययन के बिना कैसे उदित हो सकता है (अर्थात् नहीं उदित हो सकता) इसलिये मूल कारण होने से वहीं यहाँ प्रधान है—यह कहते हैं उस प्रकार के निश्चयात्मक बौद्धविज्ञान को उत्पन्न करने के लिए शास्त्र ही प्रधान है क्योंकि (वह) ज्ञेय तत्त्व का प्रदर्शक है’ ।। ४७ ।। सम्पत्ति के लिये = पर विज्ञान को उत्पन्न करने के लिये । क्योंकि ज्ञेय = नील सुख आदि का, तत्त्व = प्रकाशमानत्व की अन्यथा अनुपपत्ति से प्रकाश रूप शिवस्वभावत्व उसका प्रदर्शक = पर अद्वय का उपदेष्टा होने के कारण उसका कथन करने वाला । इसलिये उस (= द्वैतप्रथा वाले नील सुख आदि) का प्रदर्शक न होने के कारण इस शैव शास्त्र की अन्य शास्त्रों से विलक्षणता का भी सङ्केत किया गया ।। ४७ ।। १. यत् = यतः ७४ श्रीतन्त्रालोकः ननु भवत्वेवम्, अत्र पुन: किं निमित्तं यत्पौंस्नाज्ञाननिवृतौ देहान्ते मुक्तिः, बौद्धाज्ञाननिवृत्तौ तु तदैव-इत्याशङ्क्याह दीक्षया गलितेऽप्यन्तरज्ञाने पौरुषात्मनि । धीगतस्यानिवृत्तत्वाद्विकल्पोऽपि हि सम्भवेत् ॥ ४८ ॥ ‘धीगतस्य’ इति अज्ञानस्य । ‘विकल्पो हि’ भेदप्रथात्मकः स चैव अख्याति रूपत्वादज्ञानम् इति बहूक्तम् ।। ४८ ।। ननु धीगतमज्ञानं यदि न निवृत्तं तदात्मनः किमायातम्-इत्याशङ्कयाह देहसद्भावपर्यन्तमात्मभावो यतो धियि । देहान्तेऽपि च मोक्षः स्यात्पौरुषाज्ञानहानितः ॥ ४९ ॥ दीक्षितस्यापि हि नियतकालं बुद्धावात्मग्रहो भवेत् इति तयोरभेदाद् बौद्धमप्यज्ञानमात्मन्युपचितं सम्भवेत्-इति भावः । अत एव देहान्ते बुद्धावात्म ग्रहव्युपरमात् पौरुषस्याज्ञानस्य दीक्षादिना पूर्वमेव प्रध्वस्तत्त्वान्मोक्ष: इति युक्तमुक्तम् ‘तच्छरीरान्ते तज्ज्ञानं व्यज्यते स्फुटम्’ इति ।। ४९ ।। प्रश्न है कि ऐसा हो जाय किन्तु इसका क्या कारण है कि पौरुष अज्ञान की निवृत्ति होने पर देहपात होने पर मुक्ति हो जाती है और बौद्ध अज्ञान की निवृत्ति होने पर उसी समय?-यह शङ्का कर कहते है दीक्षा के द्वारा पौरुषात्मक अज्ञान के नष्ट होने पर भी बुद्धिगत अज्ञान के निवृत्त न होने से विकल्प की सम्भावना रहती है ।। ४८ ।। धीगत का = अज्ञान का । विकल्पभेदप्रथा वाला होता है और वही अख्यातिरूप होने से अज्ञान है—यह कई बार कहा जा चुका है ।। ४८ ।। ___ यदि बौद्ध अज्ञान नहीं निवृत्त होता तो आत्मा का क्या होता ?-यह शङ्का कर कहते हैं चूंकि देह की सत्तापर्यन्त बुद्धि के विषय में आत्मभाव बना रहता है इसलिए (यदि बौद्ध अज्ञान नष्ट नहीं हुआ है तो) पौरुष अज्ञान के नष्ट हो जाने पर भी देहान्त के बाद मोक्ष नहीं होगा ।। ४९ ।। दीक्षाप्राप्त व्यक्ति को भी नियत काल (= शरीरधारण) पर्यन्त बुद्धि मे आत्माभिमान रहता । इसलिये उन दोनों (आत्मा और बुद्धि) का अभेद होने से बौद्ध अज्ञान आत्मा में भी आ सकता । इसलिये देहपात होने पर बुद्धि में आत्मभावना के नष्ट हो जाने पर और पौरुष अज्ञान के दीक्षा आदि के द्वारा पहले ही नष्ट हो जाने से मोक्ष हो जाता है । इसलिये ठीक कहा गया- ‘उस (साधक) के शरीर का अन्त होने पर वह ज्ञान स्पष्टतया स्फुरित होता है’ ।। ४९ ।।प्रथममाह्निकम् एवं विकल्पोऽत्र सम्भवन्मुक्तौ व्यवधायकः इति न तदैव मुक्तिः, तस्य पुनरसम्भवे सत्यपि देहे मुक्ति:-इत्याह बौद्धाज्ञाननिवृत्तौ तु विकल्पोन्मूलनाद् ध्रुवम् । तदैव मोक्ष इत्युक्तं धात्रा श्रीमन्निशाटने ॥ ५० ॥ न चैतदप्रमाणकम्-इत्याह—‘इत्युक्तम्’ इत्यादि ।। ५० ।। विकल्पयुक्तचित्तस्तु पिण्डपाताच्छिवं व्रजेत् । इतरस्तु तदैवेति शास्त्रस्यात्र प्रधानतः ॥ ५१ ॥ ‘इतरः’ इति निर्विकल्प: ।’ तदैव’ इति देहसद्भावे-इत्यर्थः । यदुक्तम् तत्रैव ‘विकल्पयुक्तचित्तस्तु पिण्डपाताच्छिवं व्रजेत् ।’ विकल्पहीनचित्तस्तु ह्यात्मानं शिवमव्ययम् ।। पश्यते भावशुद्ध्य यो जीवन्मुक्तो न संशयः ।’ इति । इदानीं प्राक् प्रतिज्ञातं शास्त्रस्यैव प्राधान्यं निगमयति-इति इत्यादिना ‘इति’ मुक्ति में सम्भावित विकल्प बाधक बनता है इसलिये उसी समय मुक्ति नहीं होती और यदि वह (= विकल्प) उत्पन्न न हो तो शरीर रहते हुए मुक्ति हो जाती है-यह कहते हैं बौद्ध अज्ञान के निवृत्त होने पर विकल्पों का नाश होने से निश्चित ही उसी समय मोक्ष हो जाता है—ऐसा निशाटनशास्त्र में धाता के द्वारा कहा गया है ।। ५० ।। यह कथन अप्रामाणिक नहीं है इसलिये कहा गया-इत्युक्तम्… इत्यादि ।। ५० ।। विकल्प से युक्त चित्त वाला व्यक्ति शरीर के अवसान के बाद शिवत्व को प्राप्त करता है । दूसरा (= निर्विकल्पक चित्त वाला) तो उसी समय देह रहते हुए, (शिवत्व को) प्राप्त करता है क्योंकि यह विषय इस शास्त्र मे प्रधान है ।। ५१ ।। इतर = निर्विकल्प । उसी समय = देह के रहते हुए । जैसा कि वहीं पर (= निशाटन में) कहा गया विकल्पों से युक्त चित्त वाला साधक देहपात होने पर शिव को प्राप्त होता है किन्तु विकल्पों से रहित चित्तवाला जो (साधक) भावों की शुद्धिपूर्वक अपने को अव्यय शिव के रूप में देखता है वह जीवन्मुक्त होता है इसमें कोई सन्देह नहीं अब पूर्वप्रतिज्ञात शास्त्र के ही प्राधान्य को ‘इति’ इत्यादि के द्वारा निष्कर्ष रूप श्रीतन्त्रालोकः शब्द: काकाक्षिन्यायेन योज्यः, तेन श्रीनिशाटनग्रन्थसमाप्तौ हेतौ च व्याख्येयः । स च ‘ज्ञेयतत्त्वप्रदर्शकम्’ इत्यादिना प्रागप्युक्तः ।। ५१ ।। ननु किं नाम ज्ञेयस्य तत्त्वं यत्प्रदर्श्यमानं शास्त्रप्राधान्यावगमकमपि स्यात् इत्याशङ्कयाह ज्ञेयस्य हि परं तत्त्वं यः प्रकाशात्मकः शिवः । नह्यप्रकाशरूपस्य प्राकाश्यं वस्तुतापि वा ॥ ५२ ।। ‘ज्ञेयस्य’ नीलादेर्नीलतैव-प्रकाशमानता न तावदात्मभूता, तथात्वे हि सर्वदैव सर्वान्प्रति च स्यान्न तु कदाचित्कंचित्प्रति इति सर्वेऽपि सर्वज्ञाः स्युः । अतश्च अस्य प्रकाशते, मम प्रकाशते इति प्रकाशात्मप्रमातृसंलग्नैव सा युज्यते इति नासौ स्वातन्त्र्येण पर्यवसितस्वरूपो नीलादिः, शिव एव प्रकाशात्मक: प्रमाता, तदतिरिक्तस्य अन्यस्य भेदाभेदविकल्पोपहतत्त्वात्, अतश्च नीलादेर्शेयस्य प्रकाश मानत्वात् स एव परमार्थः इत्युक्तम् ‘प्रकाशात्मकः शिवः परं तत्त्वम्’ इति । नन्वसौ स्वयमतथारूपोऽपि प्रकाशसंबन्धात्तथा भविष्यति इत्याशङ्कयाह—‘नहि’ में बतलाते हैं-‘इति’ शब्द को काकाक्षिन्याय से जोड़ना चाहिये । इस प्रकार ‘इति’ शब्द के दो अर्थ है १. निशाटन की समाप्ति । २. शास्त्र ही हेतु है । वह ‘ज्ञेय तत्त्व का प्रदर्शक है’-इत्यादि के द्वारा पहले भी कहा जा चुका है ।। ५१ ।। प्रश्न है कि-ज्ञेय का वह तत्त्व क्या है जो प्रदर्श्यमान होकर शास्त्र का बोधक भी होता है? यह शङ्का कर कहते हैं जो प्रकाशस्वरूप शिव है (वही) ज्ञेय का परमतत्त्व है । जो प्रकाशस्वरूप नहीं है उसकी प्रकाशमानता अथवा वास्तविकता भी नहीं है (अर्थात् उसकी सत्ता ही नहीं है) ।। ५२ ।। ज्ञेय = नील आदि की नीलता ही प्रकाशमानता है । यह (= प्रकाशमानता) आत्म तत्त्व नहीं है । वैसा होने पर (यदि यह आत्मा होता) तो (आत्मा चूँकि नित्य और सर्वव्यापी है अत:) सबको सदा प्रकाशित होता न कि किसी को किसी समय । फलत: सब लोग सर्वज्ञ हो जाते । इसलिये ‘इसको दिखलायी पड़ता है।’ ‘मुझे प्रकाशित होता है। ऐसा (अनुभव होने से) प्रकाशस्वरूप प्रमाता से सम्बद्ध होने पर ही यह (= प्रकाशमानता) सङ्गत होती है । इस प्रकार नील आदि स्वतन्त्ररूप से अस्तित्व वाले नहीं हैं । शिव ही प्रकाशस्वरूप प्रमाता है । उससे अतिरिक्त अन्य (पदार्थ) भेद और अभेद रूपी विकल्पों से ग्रस्त है । नील आदि ज्ञेय पदार्थों का प्रकाशक होने से वह (= शिव) ही अन्तिम तत्त्व है इसलिये कहा गया—‘शिव परम तत्त्व है ।’ प्रश्न है कि यह (नील आदि) स्वयं वैसा न होते हए भी प्रकाश के सम्बन्ध से वैसा (= प्रकाशमान) हो जाता—ऐसी शङ्का कर कहते हैं प्रथममाह्निकम् इत्यादि । प्रकाशसंबन्धेनापि हि प्रकाशमानो नीलादिः स्वयं प्रकाशरूप एव सन् प्रकाशते, न अप्रकाशरूपश्च प्रकाशते च इति स्यात् नहि अश्वत: प्रासाद: श्वेतते, न चैवं वस्तुत्वमप्यस्य स्यात् नहि प्रकाशरूपतामपहाय अन्यद्वस्तु सम्भवेत् इति भावः ।। ५२ ।। एवं च न केवलं नीलादेर्शेयस्य भावस्य प्रकाशमानत्वात्प्रकाशात्मक: शिवस्तत्त्वं यावत्तदभावस्यापि–इत्याह अवस्तुतापि भावानां चमत्कारैकगोचरा। यत्कुड्यसदृशी नेयं धीरवस्त्वेतदित्यपि ॥ ५३ ॥ यतो ‘नास्त्यत्र घट:’ इत्येवंरूपापि बुद्धिर्बोधस्वभावत्वात्कुड्यादिजडपदार्थ विलक्षणा अत एव घटाद्यभावोऽपि बुद्धयमानत्वात्परमानन्दैकघनबोधात्मक शिवस्वभाव एव–इत्यर्थः । तदाहुः ‘अबोधोऽपि बुद्ध्यमानो बोधात्मभूत ईश्वर एव ।’ इति ।। ५३ ।। ननु सिद्धे प्रकाशे भावाभावरूपस्य ज्ञेयस्य तदेकपरमार्थत्वं सिद्धयेत्, स एव पुन: केन प्रमाणेन सिद्धः? इत्याशङ्कयाह ‘न ही…) नील आदि (यद्यपि अप्रकाश रूप हैं तथापि) प्रकाश के सम्बन्ध से प्रकाश मान होते हए वे स्वयं प्रकाशरूप होकर प्रकाशित होते हैं । जो अप्रकाशरूप है वह प्रकाशित नहीं हो सकता । अश्वेत महल श्वेत नहीं बन सकता। इसी प्रकार यह वस्तु भी नहीं है क्योंकि प्रकाशरूपता को छोड़कर कोई दूसरी वस्तु सम्भव नहीं है ।। ५२ ।। नील आदि ज्ञेय पदार्थों के प्रकाशित होने से शिव तत्त्व केवल (उनका) प्रकाशक है ऐसा नहीं है वह उनके अभाव का भी प्रकाशक है-यह कहते हैं पदार्थो की अवस्तुता भी केवल चमत्कार का विषय है क्योंकि अवस्तु (= यह वस्तु नहीं है) ऐसी बुद्धि भी दीवाल के समान (जड) नहीं है (अपितु बोधस्वरूप है) ।। ५३ ।। ‘यहाँ घट नहीं हैं ऐसी बुद्धि बोधस्वभावा होने के कारण दीवाल आदि जड़ पदार्थों से विलक्षण है । इसलिये फट आदि को अभाव भी ज्ञात होने के कारण परमानन्दैकघनबोधरूप शिवस्वभाव वाला ही है । वही कहा है’ ‘अबोध का भी ज्ञान होता है इसलिये वह भी बोधरूप ईश्वर ही है’ ।। ५३ ।। प्रकाश के सिद्ध होने पर भावाभावरूप ज्ञेय प्रकाश रूपपरमार्थ सिद्ध होते हैं किन्तु वह (= प्रकाश) ही किस प्रमाण से सिद्ध होता है ? यह शङ्का कर कहते हैं श्रीतन्त्रालोकः प्रकाशो नाम यश्चायं सर्वत्रैव प्रकाशते । अनपह्नवनीयत्वात् किं तस्मिन्मानकल्पनैः ॥ ५४ ॥ अपूर्वार्थविषयं खलु प्रमाणम् । यदाहुः ‘अनधिगतविषयं प्रमाणमज्ञातार्थप्रकाशो वा ।’ इति । प्रकाशस्य अपूर्वत्वेन प्रकाशो नास्ति सर्वदैव तस्य प्रकाशमानत्वेन ‘अनपह्नवनीयत्वात्’ इति व्यर्थं तत्र प्रमाणपरिकल्पनम् । तथाहि तदा तस्य अपूर्वत्वेन प्रकाश: स्यात् यद्यसौ पूर्वमनधिगतत्त्वेन अप्रकाशमानः स्यात् तथाभावश्च तद्रहितपूर्वकालस्मृतौ सत्यां भवेक्त, स्मृतिरपि एवंरूपमनुभवं विना नोत्पद्यते, अनुभूतविषयासम्प्रमोषात्मकत्वात्तस्याः, न च प्रकाशरहितत्त्वेन पूर्वकालमनुभवोऽस्ति, तस्यैवानुभवस्य प्रकाशात्मकत्वात्, स एव हि प्रकाश: इति कथं पूर्वमपि तदभावः, अतश्च सर्वदास्य अवभासमानत्वेन आदिसिद्धत्वात् न प्रमाणसव्यपेक्षा सिद्धिः । स एव च ‘प्रकाश एव प्रकाशक: प्रमाता’ इति नीत्या परप्रमातृरूपः परमेश्वरः शिवः इति युक्तमुक्तम्-‘ज्ञेयस्य च परं तत्त्वं यः प्रकाशात्मकः शिवः ।’ इति ।। ५४ ।। प्रकाश वही है जो सर्वत्र ही प्रकाशित होता है । चूंकि वह छिपाने (अस्वीकार करने) योग्य नहीं है अत: उसके बारे में प्रमाणों की कल्पना करने से क्या लाभ? ।। ५४ ।। प्रमाण वह है जो अपूर्ण (= अज्ञात) अर्थ को विषय बनाता है । जैसा कि कहते है ‘अप्राप्त अथवा अज्ञात वस्तु प्रमाण का विषय बनती है । या प्रमाण के द्वारा ज्ञात होती है ।’ प्रकाश अपूर्व के रूप में प्रकाशित नहीं होता । सर्वदा प्रकाशमान होने से उसका कभी निषेष नहीं किया जा सकता । इसलिये उसके विषय में प्रमाण खोजना व्यर्थ है । वैसा मानने पर वह अपूर्व रूप से प्रकाशक बनता। यदि यह पहले अनधिगत रूप होने से अप्रकाशक होता तो उसका वैसा होना उससे रहित पूर्वकाल की स्मृति होने पर होता । और स्मृति भी बिना उस प्रकार के अनुभव के उत्पन्न नहीं होती क्योंकि वह अनुभूत विषय का असम्प्रमोष रूप वाली है । प्रकाशरहित होने से पूर्वकाल में अनुभव रहता नहीं क्योंकि वही (= प्रकाश वाला ही) अनुभव प्रकाश रूप होता है । वही प्रकाश है फिर उसका पहले अभाव कैसे होगा । इसलिये इस (= प्रकाश) के सर्वदा अवभासमान होने से आदि सिद्ध (= अनादि) होने के कारण उसकी सिद्धि के लिये प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। और वही ‘प्रकाश प्रकाशक = प्रमाता है’ इस नीति से परमेश्वर शिव ही परप्रमाता है । यह ठीक कहा गया कि ‘जो प्रकाशात्मक शिव है वही ज्ञेय का परम तत्त्व है’ ।। ५४ ।। प्रथममाह्निकम् ७९ न केवलमेतत्सिद्धौ प्रमाणानामनुपयोगो यावत्प्रत्युत एषां तदधीना सिद्धिः इत्याह प्रमाणान्यपि वस्तूनां जीवितं यानि तन्वते । तेषामपि परो जीवः स एव परमेश्वरः ॥ ५५ ॥ इह वस्तूनां नीलपीतादीनां प्रकाशनिरपेक्षेण स्वस्वरूपेण तावत्स्वयमन्योऽन्यं वा न कश्चिद्विशेषः । नहि स्वात्मनि नीलं नीलं पीतं वा पीतम् । यदि नाम हि स्वात्मनि नीलं पीतं स्यात्पीतं वा नीलम, तत्किमिव न विरुद्धमापतेत् । अथ यथैव यत्प्रकाशते तथैव तत्स्वात्मनि परिनिष्ठतं स्यात् इति न नीलं पीतम्, पीतं वा नीलम्, इति चेत्-एवं तद्देषां स्वात्मनि विशेषो न कश्चिदुक्तः स्यात् अपि तु प्रकाशते इति-इति प्रकाश एवैषां रूपं तत्तन्नियतस्वरूपप्रतिष्ठानिबन्धनत्वात् जीवितं वितनुयात् येन नीलमिदं पीतमिदम् इति सिद्ध्येत् । स च नीलाद्यु परागेण नियतरूपतामवलम्बमान: प्रमाणशब्दव्यपदेश्यो भवेत् । न चास्य स्वात्म सिद्धिं प्रति अन्यदपेक्षणीयम्-प्रकाशरूपत्वात्, प्रकाशस्य च स्वपरप्रकाशक त्वात्, तथाभूतोऽप्यसौ प्रकाशो विमर्शरूपतां विना नार्थस्य आत्मनो वा प्रकाशरूपतायां प्रतिष्ठास्पदं स्यात्, नहि प्रकाशः इत्येवासौ स्वपरात्मनो: इस (प्रकाश रूप शिव) की सिद्धि में प्रमाण अनुपयोगी है—केवल इतना ही नहीं है बल्कि इन प्रमाणों की सिद्धि उस (= प्रकाश) के अधीन है-यह कहते (लोग) जिन प्रमाणों को वस्तुओं का जीवित (= आधार) मानते है उन (प्रमाणों) का भी (एक) पर (= विमर्शात्मक प्रकाश) जीव (= आधार) है और वही परमेश्वर है ।। ५५ ।। नील पीत आदि वस्तुओं का प्रकाशनिरपेक्ष स्वस्वरूप की दृष्टि से स्वयं अथवा परस्पर कोई भेद नहीं है । नील अपने आप में नील नहीं है और पीत पीत नहीं । यदि अपने आप में नील पीत होता और पीत नील होता तो (अपने में ही) वह विरुद्ध हो जाता । इसलिये जो जिस रूप में प्रकाशित होता है वह उसी रूप में अपने में परिनिष्ठित रहता है । इसलिये नील पीत नहीं होता और पीत नील नहीं। यदि ऐसा हो तो फिर इन (नील आदि) का अपने में कोई वैशिष्ट्य उक्त नहीं होगा । चूँकि यह प्रकाशित होता है इसलिये प्रकाश ही इनका रूप है और यही उनकी अपने-अपने नियत रूप में प्रतिष्ठा का कारण होने से उनको जीवन प्रदान करता है जिससे ‘यह नील है’ ‘यह पीत है’ यह सिद्ध होता है । वही (प्रकाश) नील आदि के उपराग से निश्चित रूप प्राप्त कर प्रमाण शब्द से व्यवहत होता है । अपने को सिद्ध करने के लिए इसे दूसरे की अपेक्षा नहीं होती क्योंकि यह स्वयंप्रकाश रूप है और प्रकाश स्वपरप्रकाशक होता है । ऐसा होकर भी यह प्रकाश विमर्शरूपता के बिना किसी पदार्थ का या स्वयं अपना भी प्रकाश नहीं ८० श्रीतन्त्रालोकः र EP प्रतिष्ठापको भवेत्, एवं हि नीलमपि नीलम् इत्येव कृत्वा तथा स्यात् । तस्मात्स्वपरप्रकाशतासिद्धौ तस्यापि अहंपरामर्शात्मा जीवितभूत: प्रकाशोऽभ्युप गमनीयोयेन सर्वं सिद्ध्येत् । यदुक्तम् ‘प्रकाशस्यात्मविश्रान्तिरहंभावो हि कीर्तितः ।’ इति । स एव च परप्रकाशात्मा परमेश्वरः शिवः इत्युक्तम्-‘तेषामपि परो जीव: स एव परमेश्वरः’ इति ।। ५५ ।। एवमादिसिद्धत्वादस्य न केवलं साधकं प्रमाणमकिञ्चित्करं यावद्बाधकमपि -इत्याह सर्वापह्नवहेवाकधर्माप्येवं हि वर्तते। ज्ञानमात्मार्थमित्येतन्नेति मा प्रति भासते ॥ ५६ ॥ ‘सर्वेषाम्’ ज्ञातृज्ञानज्ञेयानाम् ‘अपह्नवो’ निराकरणं तत्र ‘हेवाक’ एव ‘धर्म:’ स्वभावो यस्यासौ बौद्धः । तत्र त्रयाभाववादिनो माध्यमिकाः । ज्ञातृज्ञेया भाववादिनो योगाचाराः । ज्ञात्रभाववादिनो वैभाषिकाः । करा सकता । प्रकाशमात्र होने से यह अपना और दूसरे का प्रतिष्ठापक नहीं हो सकता । ऐसा होने पर नील भी नील ही रहता (वह किसी को ज्ञात नहीं होता) । इसलिये (प्रकाश की) स्वपरप्रकाशता सिद्ध होने पर उस (प्रकाश) को भी अहंपरामर्श रूप जीवनात्मक प्रकाश मानना चाहिये जिससे सब सिद्ध हो जायेगा । जैसा कि कहा गया ‘प्रकाश की अपने में विश्रान्ति ही अहंभाव कहा गया है ।’ और वही पर प्रकाशरूप परमेश्वर शिव है ऐसा कहा गया—उन से भी परे जीव है वही परमेश्वर है ।। ५५ ।। इस (= प्रकाश) के आदि सिद्ध होने से केवल साधक प्रमाण व्यर्थ नहीं है बल्कि बाधक प्रमाण भी (व्यर्थ) है-यह कहते हैं सभी (ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय आदि पदार्थों) के निषेध के लिए उत्कट इच्छा वाले (बौद्ध) भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं । (वे बौद्ध भी) ‘ज्ञान आत्मा के लिए है’—ऐसा मुझे नहीं भासित होता (इस प्रकार कहते हुए अपनी सत्ता को स्वीकार करते हैं और वहीं आत्मसत्ता परमेश्वर है) ।। ५६ ।। समस्त = ज्ञाता ज्ञान और ज्ञेय का, अपह्रव = निषेध इसलिये ‘हेवाक’ ही है धर्म = स्वभाव जिसका वह अर्थात् बौद्ध । उनमें से माध्यमिक (= शून्यवादी) बौद्ध (ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय) तीनों का अभाव मानते हैं । योगाचार (=विज्ञानवादी) बौद्ध ज्ञाता और ज्ञेय का अभाव मानते है । वैभाषिक ज्ञाता का अभाव स्वीकार करते हैं। प्रथममाह्निकम् ८१ सोऽपि ‘ह्येवं ज्ञानमात्मार्थम्’ इत्येतत् मां संवेदनस्वभावत्वाद् विचारयितारं प्रति नेति भासते-नास्ति इति प्रतीतिरूपो वर्तते-अवतिष्ठते-इत्यर्थः, तेन आत्मादेर्निराकरणे साधने वापि अवश्यमेव साधयिता पूर्वकोटावाक्षिप्तः सिद्ध: नहि साधयितारमन्तरेण अर्थानां साध्यतैव स्यात्, स च स्वत: सिद्धः प्रकाशात्मा परमार्थरूप: परमेश्वर: शिव एव ।। ५६ ।। अतश्च तत्र व्यर्थमेव बौद्धस्यापि प्रमाणस्य परिकल्पनम् इत्याह अपहृतौ साधने वा वस्तूनामाद्यमीदृशम् । यत्तत्र के प्रमाणानामुपपत्त्युपयोगिते ॥ ५७ ॥ ‘वस्तूनाम्’ ज्ञातृज्ञानज्ञेयात्मनाम्, ‘आद्यम्’ आद्यसिद्धत्वात् ‘ईदृशम्’ पर प्रमातृरूपम्, ‘तत्र’ इति आदिसिद्धे प्रमातरि । प्रमेयं खलु प्रमिण्वत्प्रमाण मुच्यते, प्रमेयं च विभिन्नप्रकाशाधीनसिद्धिकमिदन्ताविमृश्यं च भवति । न चैवं रूपत्वं प्रमातुर्येन प्रमाणपरिच्छेद्यः स्यात्, स हि अर्थपरिच्छेदादौ प्रवृत्त: स्वप्रकाशरूपत्वान्न प्रकाशाद्रिन्नो नापीदन्ताविमृश्यः, अहंप्रत्यवमर्शमयत्वात्, सच यदि प्रमाणप्रमेय: स्यात् तत्रापि प्रमितिक्रियायां प्रमात्रा अपरेण भाव्यम्, वह भी ‘इस प्रकार ज्ञान आत्मा के लिये है इसलिये यह मुझे = संवेदन स्वभाव वाला होने के कारण विचारकर्ता को, भासित नहीं होता = नहीं है इस प्रतीति के रूप में रहता है । इसलिये आत्मा के निराकरण में अथवा सिद्ध करने में साधक अवश्य पूर्व कोटि में आक्षिप सिद्ध होता है । अर्थ साधयिता के बिना साध्य नहीं बन सकते और वह (= साधयिता स्वत: सिद्ध प्रकाशस्वरूप परमार्थ परमेश्वर शिव ही है ।। ५६ ।। इसलिये इस विषय में बौद्ध की भी प्रमाण कल्पना व्यर्थ ही है-यह कहते (ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय रूप) वस्तुओं के आद्य (= आदि सिद्ध) होने से इस प्रकार (परप्रमाता के भी आदि सिद्ध होने से उसके विषय में) प्रमाणों की उपपत्ति और उपयोगिता ही क्या है ।। ५७ ।। ___ वस्तुओं का = ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय रूप (वस्तुओं) का । आद्य = प्रथमसिद्ध । ऐसा = परप्रमाता रूप । उसमें = आदिसिद्ध प्रमाता के विषय में । प्रमेय को प्रमा का विषय बनाने वाला प्रमाण कहलाता है और प्रमेय की सिद्धि विभिन्न प्रकाश के अधीन होती है और (वह प्रमेय) ‘इदम्’ के रूप में विमर्श का विषय होता है । परपमाता का ऐसा रूप नहीं है जिससे वह प्रमाण का परिच्छेद्य (= विषय) बन सके । विषय में सरि अदि कि विपस में प्रवृत्त वह (= प्रमाता) स्वप्रकाशरूप होने से प्रकाश से भिन्न नहीं है साथ ही वह इदन्ता के द्वारा विमृश्य भी नहीं है क्योंकि (वह) अहंप्रत्यवमर्श वाला है । यदि वह प्रमाणों के द्वारा प्रमेय होता तो ८२ श्रीतन्त्रालोकः तत्राप्यन्येन इत्यनवस्थानं स्यात्, तस्मान्नात्र प्रमाणस्य प्रवृत्तौ काचिदुपपत्तिः । यस्तु भावनोपदेशादौ ‘सकृद् विभातोऽयमात्मा प्रमाता’ इत्यादिरिदन्तया व्यवहार: स न वास्तवः, तत्र तस्य साक्षादप्रतीतेः; अहन्ताव्यवधानेन हि तत्रासौ प्रतीयते इत्यास्ताम्, एतद्धि पदे पदे वितनिष्यते । प्रमाणानुपयोगस्त्वादिसिद्धत्वात् समनन्तरमेव दर्शितः, इति न पुनर्वितानितः ।। ५७ ।। न केवलमत्र युक्तिरेवास्ति यावदागमोऽपि–इत्याह कामिके तत एवोक्तं हेतुवादविवर्जितम् । तस्य देवातिदेवस्य परापेक्षा न विद्यते ।। ५८ ॥ परस्य तदपेक्षत्वात्स्वतन्त्रोऽयमतः स्थितः । ततः इति-तत्र प्रमाणानामुपपत्त्युपयोगयोरभावात्, हेतो:-अनुमानस्य वादेन विवर्जितम् अत एवाह-तस्य इत्यादि, परस्य-प्रमाणादेः, अत: इति परानपेक्षत्वलक्षणाद्धेतोः ।। ५८ ।। एवमस्य परानपेक्षत्वाद्यथा न प्रमाणान्यवच्छेदकानि, तथा प्रमेयाण्यपि उसका भी प्रमाता कोई दूसरा होता फिर इस (दुसरे) का तीसरा-इस प्रकार अनवस्था हो जाती है । इसलिये यहाँ प्रमाण की प्रवृत्ति में कोई युक्ति नहीं है । भावनोपदेश आदि (ग्रन्थों) में (अथवा किसी भावना के कारण या किसी के उपदेश के आधार पर) जो ‘प्रमाता रूप यह आत्मा एक बार प्रकाशित हो जाता है तो बस हो गया । दुबारा प्रकाशित नहीं होगा ।’ (आत्मा के लिये) ‘इदम्’ रूप में व्यवहार किया गया वह वास्तविक नहीं है क्योंकि वहाँ (= भावना में) उस (= आत्मा) की साक्षात् प्रतीति नहीं होती । वहाँ वह अहन्ता के व्यवधान से प्रतीत होता है । इतना कथन पर्याप्त है । इसका तो (इस ग्रन्थ में) पग-पग पर व्याख्यान किया जायेगा । (आत्मा के) आदिसिद्ध होने से प्रमाणों का कोई उपयोग नहीं है—यह अभी पहले दिखा दिया गया इसलिये फिर चर्चा नहीं की गयी ।। ५७ ।। इस विषय में केवल तर्क ही नहीं आगम प्रमाण भी है—यह कहते हैं इसलिए कामिक शास्त्र में हेतु और वाद से रहित होकर कहा गया है कि उस देवातिदेव को किसी दूसरे की अपेक्षा नहीं है । चूँकि दूसरा स्वयं उस (= देवातिदेव) की अपेक्षा रखता है अत: यह (देवातिदेव परमेश्वर) स्वतन्त्र सिद्ध है ।। ५८-५९- ।। इस कारण = उस विषय में प्रमाणों की सिद्धि और उपयोग न होने के कारण, हेतु के = अनुमान के, सिद्धान्त से रहित । इसलिये कहते हैं-उसका इत्यादि । पर का = प्रमाण आदि का । अत: = पर की अपेक्षा न रखने के लक्षण के कारण ।। ५८ ।। प्रथममाह्निकम् इत्याह अनपेक्षस्य वशिनो देशकालाकृतिक्रमाः॥ ५९॥ नियता नेति स विभुर्नित्यो विश्वकृतिः शिवः। वशिन:- स्वतन्त्रस्य इति विशेषणद्वारेण हेतुः । अत्रापीति—परानपेक्षस्य, प्रकाशात्मनः शिवस्य हि देशकालाकारैर्भेदाभेदविकल्पोपहतत्त्वादवच्छेदा धानमशक्यम् इत्युक्तम्-नियता न इति अत एव च स एवंविधः इत्याह विभुर्नित्यो विश्वाकृति:- इति । विभुः इति—देशावच्छेदशून्यत्वात् । नित्य इति—अतीतादिकालावच्छेदविगलनात् । विश्वाकृतिः इति—चिदचिदाद्याकार वैचित्र्योल्लासकत्वात् ।। ५९ ।। एतदेव प्रपञ्चयति विभुत्वात्सर्वगो नित्यभावादाद्यन्तवर्जितः ॥६० ॥ विश्वाकृतित्त्वाच्चिदचित्तद्वैचित्र्यावभासकः । अत एवास्यागमेषु नानारूपत्वमुच्यते-इत्याह ततोऽस्य बहुरूपत्वमुक्तं दीक्षोत्तरादिके ॥ ६१ ॥ DY जिस प्रकार (प्रकाश के) परानपेक्ष होने से प्रमाण इस (प्रकाश) के अवच्छेदक नहीं होते उसी प्रकार प्रमेय भी-यह कहते हैं वशी (= स्वतन्त्र, अत एव) निरपेक्ष (उस शिव) के देश काल आकृति और क्रम नियत (= परिच्छन्न) नहीं है इसलिए वह विश्वरूप शिव व्यापक एवं नित्य हैं ।। -५९, ६०- ।। वशी का = स्वतन्त्र का, यह विशेषण के रूप में हेतु है इसमें भी परानपेक्ष का । प्रकाशात्मक शिव चूँकि देश काल आकार के द्वारा भेदाभेद वाले विकल्पों से | युक्त नहीं है, इस कारण उसमें अवच्छेद का आधान सम्भव नहीं है इसलिये कहा गया—नियत नहीं और इसीलिये वह इस प्रकार का है-यह कहते हैं- (वह) | व्यापक नित्य और विश्वरूप आकार वाला है । देशावच्छेदशून्य होने से वह विभु है। अतीत आदि कालावच्छेद के नहीं होने से वह नित्य है । चित् एवं अचिद् आदि विचित्र आकार को उल्लसित करने के कारण विश्वाकृति है ।। ५९ ।। उसी का व्याख्यान करते हैं व्यापक होने के कारण सर्वत्र गतिशील (= विद्यमान) है। नित्य होने से आदि और अन्त से रहित है और विश्वाकृति होने के कारण चित् अचित् रूप विचित्रता का आभास कराने वाला है ।।-६०, ६१-।। इसीलिये आगमों में उसके अनेक रूपों का वर्णन है श्रीतन्त्रालोकः तदेवाह भुवनं विग्रहो ज्योतिः खं शब्दो मन्त्र एव च। बिन्दुनादादिसंभिन्नः षड्विधः शिव उच्यते ॥ ६२ ॥ भवनम् तत्तद्भवनाधिष्ठेयं भोगाधाररूपम् । विग्रहशब्देन उपचाराद्विग्रहिणो लक्ष्यन्ते । तेषां च रुद्रक्षेत्रज्ञादिनानारूपत्वेऽपि तत्तत्सिद्धिदानसामर्थ्यादिह रुद्रादीनि कारणान्येव । ज्योति:-बिन्दु: ‘कदम्बगोलकाकारः स्फुरत्तारकसन्निभः ।’ इत्यादिनास्य ज्योतीरूपत्वेनाभिधानात् । खं शून्यम्-शक्ति-व्यापिनी-समना लक्षणम् । शब्दो नादात्मा मन्त्र: अकारोकारमकारात्मा । अस्य विशेषणम् बिन्दुनादादिसंभिन्नः इति । यदुक्तम् ‘बिन्दु दस्तथा व्योम मन्त्री भुवनविग्रहौ । षड्वस्त्वात्मा शिवोध्येयः फलभेदेन साधकैः ।।’ इति । - इसीलिए दीक्षोत्तर आदि में इसका अनेक रूप कहा गया है।।६१।। यह कहते हैं भुवन (= भोग का आधार), विग्रह (= शरीरधारी), ज्योति, आकाश शब्द और मन्त्र (ये) बिन्दु और नाद आदि से मिश्रित होन पर छः प्रकार के शिव नाम से अभिहित होते हैं (इसमें ज्योति का बिन्दु से शब्द का नाद से मिश्रण समझना चाहिए अथवा बिन्दु और नाद इसका सम्बन्ध केवल मन्त्र से समझना चाहिए । बिन्दु और नाद मन्त्र के विशेषण हैं) ।। ६२ ।। वही कहते हैं भुवन = भिन्न-भिन्न का भुवन जो कि अधिष्ठेय के भोग का आधार है । विग्रह शब्द से लक्षणया विग्रही को समझना चाहिये । उनके रुद्रक्षेत्रज्ञ आदि अनेक रूप होने पर भी भिन्न-भिन्न सिद्धि को प्रदान करने के सामर्थ्य के कारण यहाँ रुद्र आदि कारण ही हैं । ज्योति = बिन्दु । ___(बिन्दु) कदम्ब के गोल (पुष्प) के आकार वाला तथा चमकते हुए तारा की भाँति होता है । इत्यादि के द्वारा इसका ज्योतिरूप में कथन किया गया है । ख = शून्य जो कि शक्ति-व्यापिनी और समना रूप है । शब्द = नाद । मन्त्र अउम् वाला ओम् । बिन्दु नाद आदि से सभिन्न-यह ओम् का विशेषण है । बिन्दु नाद व्योम मन्त्र भुवन और विग्रह इन छ: वस्तुओं (= रूपों) वाले शिव का ध्यान साधकगण फलभेद के अनुसार करें ।‘प्रथममाह्निकम् तथा ‘उन्मना तु परो भावः स्थूलस्तस्यापरो मतः । पुनः शून्यं च व्योमात्मा संस्पर्श च ततः परम् ।। शब्दो ज्योतिस्तथा मन्त्रा: कारणा भुवनानि च ।’ इति ।। तथा ‘व्योम-विग्रह-बिन्द्वर्ण-भुवनाध्वविभेदतः । लक्ष्यभेदः स्मृतः षोढा……………. ।।’ इत्यादि ।। ६२ ।। अत्र च ‘यो यत्राभिलषेद्भोगान्स तत्रैव नियोजितः । सिद्धिभाक् …………………………… ।। इतिन्यायेन यस्य यत्र निष्ठा तस्य तत्प्राप्तिर्भवति–इत्याह यो यदात्मकतानिष्ठस्तद्भावं स प्रपद्यते । व्योमादिशब्दविज्ञानात् परो मोक्षो न संशयः ।। ६३॥ यः साधकः, यस्य भुवनादेः, आत्मकतायां तद्रूपताया:, निष्ठः, स तथा उन्मना पर भाव है । उसका अपर भाव स्थूल है । पुनः शून्य व्योमस्वरूप है। उसके बाद संस्पर्श (थोड़ा स्थूल) है । शब्द ज्योति मन्त्र और भुवन ये सब कारणा (= बन्धन में डालने वाले) हैं ।’ तथा ‘आकाश विग्रह (= शरीर) बिन्दु, वर्ण, भुवन और अध्वा के भेद से लक्ष्यभेद छः प्रकार का माना गया है’-इत्यादि ।। ६२ ।। यहाँ पर ‘जो (साधक) जहाँ जिन भोगों की कामना करता है वह वहीं नियोजित होकर सिद्धि प्राप्त करता है । ___ इस न्याय से जिसकी जिसमें निष्ठा होती है उसको उसकी प्राप्ति होती है यह कहते हैं ___जो (साधक) जिस (भुवन आदि) की स्वरूपता के प्रति निष्ठा रखता है वह उसी रूप में सिद्धि प्राप्त करता है । मोक्ष, व्योम आदि शब्द के विज्ञान (= परामर्श) से अतिरिक्त (शिवैकात्म्यलाभरूप) है इसमें कोई संशय नहीं ।। ६३ । जो = साधक, जिसका = भुवन आदि की, आत्मकता = तद्रूपता में निष्ठा ८६ श्रीतन्त्रालोकः तद्भावम्-तत्तद्भुवनादिरूपत्वेन नियतां सिद्धिमेति- इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘भुवनं चिन्तयेद्यस्तु वक्ष्यमाणैकरूपकम् । भुवनेशत्वमाप्नोति.. इत्युपक्रम्य ‘ब्रह्मादिकारणानां तु विग्रहं यः सदा स्मरेत् । पूर्वोक्तलक्षणं यच्च तन्मयत्वमवाप्नुयात् ।। मन्त्रैश्च मन्त्रसिद्धिस्तु जपहोमार्चनाद् भवेत् । पूर्वोक्तरूपकध्यानात्सिध्यत्यत्र न संशयः ।। ज्योतिर्ध्यानात्तु योगीन्द्रो योगसिद्धिमवाप्नुयात् । तन्मयत्वं तदाप्नोति योगिनामधिपो भवेत् ।। शन्यध्यानाच्च शन्यात्मा व्यापी सर्वगतिर्भवेत । समनाध्यानयोगेन योगी सर्वज्ञतां व्रजेत् ।।’ इति । एषां च षण्णामपि शिवात्मकत्वात् …………… शिवं ध्यात्वा तु तन्मयः ।’ इत्याद्युक्तेः शिवैकमयतयैकैकानुप्रवेशेऽपि शिवात्मकस्वरूपलाभो भवेत् रखता है वह उस भाव को = तत्तद् भुवन आदि के रूप में नियत सिद्धि को प्राप्त करता है—यह अर्थ है । वही कहा गया ‘जो (साधक) वक्ष्यमाण रूप वाले भुवन का चिन्तन करता है वह भुवनेश बन जाता है । इत्यादि से प्रारम्भ कर ‘जो ब्रह्मा आदि (सृष्टि के) कारणों के पूर्वोक्त लक्षण वाले विग्रह का (अथवा जो ब्रह्मा आदि का पूर्वोक्त लक्षण है) उसका स्मरण करता है वह उसकी तन्मयता को प्राप्त करता है । मन्त्रों के (जप) द्वारा मन्त्र की सिद्धि होम और पूजन के कारण होती है । पूर्वोक्तरूप का ध्यान करने से (ध्येय की तद्रुपता) की सिद्धि होती है—इसमें कोई संशय नहीं है। योगीन्द्र ज्योति का ध्यान करने से योगसिद्धि को प्राप्त करता है । उसके बाद तन्मयत्व (= ज्योतिर्मयत्व) को प्राप्त करता है और योगियों का राजा हो जाता है । शुन्य का ध्यान करने से वह शून्यात्मा होकर सर्वव्यापी और सर्वत्र गतिशील हो जाता है । समना के ध्यान के कारण योगी सर्वज्ञ हो जाता है।’ इन छहों के शिवात्मक होने से ……….शिव का ध्यान कर (योगी) शिवमय हो जाता है । इत्यादि उक्ति के द्वारा शिवमय एकरूप में अनुप्रवेश होने पर भी (योगी को) प्रथममाह्निकम् इत्याह-व्योमादिशब्दविज्ञानात् इत्यादि । व्योमादीनाम् एषां षण्णां शब्दानां शब्द: - परो विमर्शः. तदात्मकतया यत विज्ञानम-अनभवः तस्मात परो-विमर्शक सारशिवैकात्म्यापत्तिलक्षणो, मोक्षो नि:संशयं भवेत्-इति वाक्यार्थः । व्योमादि षट्क इति पाठे तु व्योमादेः षट्कस्य विशिष्टादनवच्छिन्नाज्ज्ञानात्-इति व्याख्येयम् । न च अत्र भुवनादीनां क्रमो विवक्षितः इतीह व्योमादि इति प्रयुक्तम् ।। ६३ ।। ननु यद्ययं विश्वाकृतिस्तत्कथमस्य षड्विधत्वमेवोक्तम्-इत्याशङ्कयाह विश्वाकृतित्त्वे देवस्य तदेतच्चोपलक्षणम् । अनवच्छिन्नतारूढाववच्छेदलयेऽस्य च ॥ ६४ ॥ उपलक्षणम् एव भवति, अनेनैव निखिलविश्वसंग्रहसिद्धेः । न केवलमेत । द्विश्वाकारतायामेवास्योपलक्षणं यावदन्यत्रापि-इत्याह–अनवच्छिन्नतारूढो इत्यादि । अवच्छेदलये इति-अवच्छेदानां सङ्कोचाधायिनां भुवनादीनां लये विश्वोत्तोर्ण तायाम्-इत्यर्थः । विश्वमयत्वेऽप्यस्य स्वस्वरूपान्न प्रच्यावः इत्याशयः । नन्वेमुभयथापि अस्य नियतात्मकत्वावगमादवच्छेद एवोक्तो भवेत् ? इत्याशङ्क्योक्तम्-अनवच्छिन्नतारूढाविति । अस्य हि विश्वमयत्वेऽपि विश्वोत्तीर्ण शिवात्मक स्वरूप का लाभ हो जाता है-यह कहते हैं—‘व्योम आदि शब्द को जान लेने से’—इत्यादि । व्योम आदि इन छ: शब्दों का शब्द = पर विमर्श, तदात्मक जो विज्ञान = अनुभव, उससे परे विमर्शात्मक शिवैकात्म्यप्राप्तिरूप मोक्ष (वह) नि:संशय प्राप्त हो जाता है—यह वाक्यार्थ है । (व्योमादि शब्द के स्थान पर) व्योमादिषट्क-ऐसा पाठ होने पर व्योम आदि छः के विशिष्ट = अनवच्छिन्न (= असीम) ज्ञान से-ऐसी व्याख्या करनी चाहिये । यहाँ पर भवन आदि का क्रम विवक्षित नहीं है इसलिये यहाँ व्योम आदि-प्रयोग किया गया है ।। ६३ ।। यदि यह (परमेश्वर शिव) विश्व आकृति वाला है तो फिर इसको छ प्रकार का कैसे कहा गया?—यह शङ्का कर कहते हैं देव (= परमशिव) के विश्वाकृतिरूप (= विश्वमय) होने, अन वच्छिन्नता पर आरूढ होने तथा अवच्छेद का लय (= विश्वोत्तीर्णता) होने पर उसका यह (= षड्विधत्व) उपलक्षण है ।। ६४ ।। (यह षड्विधकथन) उपलक्षण है । इसी से समस्त विश्व का संग्रह सिद्ध हो जाता है । यह केवल विश्वाकारता का ही उपलक्षण नहीं है बल्कि अन्यत्र भी उपलक्षण है-यह कहते हैं- अनवच्छिन्नता रूढि मे……’ । अवच्छेद का लय हाने पर = अवच्छेदों अर्थात् सङ्कोचाधायक भुवन आदि का लय होने पर अर्थात विश्वोत्तीर्णता दशा में यह अर्थ है । विश्वरूप होने पर भी इसकी अपने स्वरूप में च्युति नही होती । प्रश्न है—दोनों प्रकार से इसके नियत होने से अवच्छेद ही उक्त ८८ श्रीतन्त्रालोकः त्वादनवच्छिन्नतायामेव प्ररोही भवेत्, एक एव हि स्वतन्त्रो बोधस्तथा तथा प्रस्फुरेत् इति ।। ६४ ।। ननु कथमेकदैव एकस्य विश्वमयत्वेऽपि विश्वोत्तीर्णत्वं सङ्गच्छते ? इत्याशङ्काशान्तत्यर्थमागमं संवादयति उक्तं च कामिके देवः सर्वाकृतिनिराकृतिः। जलदर्पणवत्तेन सर्वं व्याप्तं चराचरम् ॥ ६५ ॥ दर्पणाद्यन्तः प्रतिबिम्बितं घटादि यथा दर्पणादिव्यतिरेकेण प्रकाशमानमपि दर्पणाद्यनतिरिक्तमेव, अन्यथा दर्पणघटयोरन्योन्यं वैविक्त्येन भानं स्यात्, तथैव प्रकाशात्मना शिवेनापि स्थावरजङ्गमात्मकमिदं विश्वं स्वेच्छया स्वस्वरूपातिरिक्ताय मानत्वेन अवभासितं सत्, व्याप्तं प्रकाशमानतान्यथानुपपत्त्या स्वस्वरूपानतिरेकेणैव क्रोडीकृतम्, अत एवायं विश्वमयत्वेऽपि विश्वोत्तीर्णस्तदुत्तीर्णत्वेऽपि तन्मयः इत्युभयथापि न कश्चिद् दोषः । अत एवोक्तम्-सर्वाकृतिर्निराकृति:- इति । सर्वाकृति:- विश्वमयः निराकृति:-विश्वोत्तीर्णः आवृत्त्या तत्त्वेऽपि तदुत्तीर्ण:–इति च । तदेवमयमेक एव प्रकाशात्मा परमेश्वरः सर्वतो जृम्भते इतीश्वराद्वयमेव परमार्थतः ।। ६५ ।। ननु भावानां तदपेक्षया पृथप्रकाशानुपपत्तेर्मा नाम तदतिरेकेण सत्ता भूत् हो रहा है?—ऐसी शङ्का कर कहा गया-अनवच्छिन्नता रूढि मे) इसके विश्वमय होने पर भी विश्वोत्तीर्ण होने से यह अनवच्छिन्न ही रहेगा । एक ही स्वतन्त्र संविद उन-उन (= विश्वोत्तीर्ण विश्वमय आदि) रूपों में प्रस्फुरित होता है ।। ६४ ।। एक ही समय में एक के विश्वमय होने पर (उसकी) विश्वोत्तीर्णता कैसे सम्भव है—ऐसी शङ्का की शान्ति के लिये आगम की चर्चा करते हैं कामिक आगम में कहा गया है कि देव (= शिव) समस्त आकृतियों वाला (= विश्वमय) तथा आकृतिविहीन (= विश्वोत्तीर्ण) है । जलदर्पण के समान (समस्त) चराचर उससे व्याप्त है ।। ६५ ।। दर्पण आदि के भीतर प्रतिबिम्बित घट आदि जैसे दर्पण से भिन्न प्रकाशित होते हुए भी दर्पण से अभिन्न ही रहता है अन्यथा दर्पण और घट का परस्पर भिन्न रूप से भान होता, उसी प्रकार प्रकाशस्वरूप शिव भी स्थावर जङ्गम रूप इस विश्व को अपनी इच्छा से स्वरूप से भिन्न रूप में प्रकाशित करते हुए भी व्याप्त होकर प्रकाशमानता की अन्यथासिद्धि न होने से स्वस्वरूप से अभिन्न ही स्वीकार करते हैं। इसीलिये यह विश्वमय होने पर भी विश्वोत्तीर्ण और विश्वोत्तीर्ण होने पर भी विश्वमय हैं—इस प्रकार दोनों रूपों में कोई दोष नहीं है । इसलिये कहा गया (वह) सर्वाकृति भी है और निराकार भी है । इस प्रकार यह एक ही प्रकाशात्मा परमेश्वर सर्वत्र उल्लसित है । अत: परमार्थत: ईश्वराद्वय ही है ।। ६५ ।। प्रथममाह्निकम् इति भावापेक्षया प्रकाशात्मक एव एतेश्वरः इत्यास्तां तावदेतत् । यत्पपर्विभूत्वादि धर्मजातं तस्योक्तं. तदपेक्षया धर्मधर्मिणोर्धर्माणां च परस्पर भेदस्य अनपह्नवनीयत्वाद् योऽयं भेद उल्लसितः कथं वार्यते येन एक एवेश्वरः इत्यद्वयवादनिर्वाह: स्यात् इत्याशङ्कयाह __न चास्य विभुताद्योऽयं धर्मोऽन्योन्यं विभिद्यते । न च विभुताद्योऽयं अस्य स्वरूपातिरिक्तस्तदतिशायकः कश्चित् धर्मः अपि तु स्वरूपमेवैतत् । विभुत्वं हि व्यापकत्वमुच्यते, तच्च स्वव्यतिरिक्त व्याप्ये सति स्यात्, न च परं प्रकाशमपेक्ष्य दिगादि किञ्चित्सम्भवेत् इति किं नाम व्याप्नुयात् । नित्यत्वमपि नास्य धर्म:- तस्य कालत्रयानुगामिरूपत्वात्, अस्य चाकाल कलितत्वात् । यदभिप्रायेणैव ‘सकृद्विभातोऽयमात्मा’ इत्याद्युक्तम् । एवं विश्वा कतित्त्वमपि । नहि एतदपेक्षया विश्वं नाम किञ्चिदस्ति, यदाकारत्वमप्यस्य स्यात । एवं चैषां परप्रकाशापेक्षया कथंचिद्रे दायोगात्पारस्परिकोऽपि भेदो नास्ति प्रश्न है कि भावों का उस (= शिव) से पृथक प्रकाश सिद्ध न होने से उनकी सत्ता उससे भिन्न सिद्ध नहीं होती इसलिये भावों की अपेक्षा प्रकाशस्वरूप ईश्वर एक ही है यह तो ठीक है किन्तु जो उसका विभुत्व आदि धर्मसमुदाय कहा गया उसको दृष्टि में रखकर धर्म और धर्मी का तथा धर्मों का परस्पर भेद अस्वीकृत नहीं किया जा सकता । इसलिये यह जो भेद उल्लसित है उसका निराकरण कैसे होगा जिससे कि ईश्वर एक है— इस अद्वयवाद का निर्वाह हो- यह शङ्का कर कहते है
  • इसका विभूत्व आदि धर्म एक का दूसरे से भेद नहीं करता । (यहाँ तक कि विभुत्व आदि भी उसका कर्म नहीं अपितु स्वरूप (characteristics) है ।। ६६- ।। यह विभता आदि इस (प्रकाशरूप शिव) से अतिरिक्त उसमें अतिशय लाने वाला कोई धर्म नहीं है बल्कि यह उसका स्वरूप ही है । विभु का अर्थ है व्यापक । और वह अपने से भिन्न व्याप्य के रहने पर ही सम्भव है । किन्तु पर प्रकाश को छोड़कर दिशा आदि कुछ भी सम्भव नहीं है फिर वह (प्रकाश) किसे व्याप्त करेगा । नित्यत्व भी इसका धर्म नहीं है क्योंकि यह (= नित्यत्व) तीनों कालों का अनुगामी होता है और यह (शिव) अकालकलित है । जिस अभिप्राय से ही ‘यह आत्मा सकृत् विभात है’ इत्यादि कहा गया । इसी प्रकार (यह) विश्वाकृति भी है । इसकी अपेक्षा विश्व नाम की कोई (वस्तु) नहीं है जो कि इसका आकार बने । इस प्रकार इन (= धर्मों) का परप्रकाश की अपेक्षा किसी भी प्रकार का भेद न ९० श्रीतन्त्रालोकः इत्युक्तम्-न चान्योन्यं विभद्यते इति । ननु यद्येवं तत्कथमस्य विभुर्नित्यो विश्वाकृतिः इत्यादिधर्मभेद उक्तः? इत्याशङ्कयाह एक एवास्य धर्मोऽसौ सर्वाक्षेपेण वर्तते ॥६६॥ तेन स्वतन्त्र्यशक्त्यैव युक्त इत्याञ्जसो विधिः।। अस्य खलु एक एवासौ अहंप्रत्यवमर्शाख्यो हि स्वभावभूतो धर्मोऽस्ति, यः सर्वं विभुत्वादिधर्मजातमाक्षिपेत् । अत्रायमर्थः-अयं हि नाम प्रकाशस्य अहंप्रत्यवमर्श उच्यते यदयं स्वस्य परस्य वा प्रकाशने परं नापेक्षते इति । अत एवास्य स्वातन्त्र्यरूपं तत्तद्देशकालाद्यवभाससहस्रोल्लासनसामर्थ्यं स्यात्, येनास्य स्वसमुल्लासितोऽपि संकुचितः प्रमातृवर्गः स्वापेक्षया व्यापकत्वनित्यत्वादि व्यवहरेत्, वस्तुत: पुनरप्यहंप्रत्यवमर्शाख्या स्वातन्त्र्यशक्तिरेवास्यास्ति येन ‘स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ।’ (प्र०१ अ०५ आ०१३ श्लो०) इत्याधुक्तम् । अत एवाह-तेन इत्यादि ।। ६६ ।। ननु सर्वत्रैवास्य इच्छाद्यनन्तशक्तियोगित्वमुक्तमिति तत्कथमिहैकयैव होने से परस्पर भी कोई भेद नहीं है-यह कहा गया—(इनका) परस्पर भी भेद नहीं हैं’ ।। ६५ ।। ___ यदि ऐसा है तो फिर इसका विभु नित्य विश्वाकृति इत्यादि धर्मभेद कैसे कहा गया-यह शङ्का कर कहते हैं __इसका एक ही धर्म है कि वह सभी (विभुत्व आदि) धर्मों को (अपने में) आक्षिप्त (= समाहित) करके वर्तमान है । इसलिए (वह) स्वातन्त्र्य शक्ति से युक्त है यही सरल विधि है ।। -६६,६७- ।। इसका एक ही स्वभावभूत धर्म है और उसका नाम है—अहंप्रत्यवमर्श । यह सभी विभुत्व आदि धर्मसमूह का आक्षेप कर लेता है । यहाँ यह अर्थ है-प्रकाश का यही प्रत्यवमर्श है कि वह अपने या पर के प्रकाशन के लिये किसी दूसरे की अपेक्षा नहीं रखता । इसी कारण स्वातन्त्र्य ही इसका सामर्थ्य है जिसके कारण तत्तद् देश काल आदि रूप में हजारों-हजारों रूप का उल्लास हो रहा है । उसी (सामर्थ्य) के कारण इसका स्वसमुल्लसित भी सङ्कचित प्रमातृवर्ग अपनी अपेक्षा व्यापकत्व नित्यत्व आदि का व्यवहार करता है । वस्तुतः अहंप्रत्यवमर्श नामक इसकी स्वातन्त्र्य शक्ति ही है जिससे “यह इसका स्वातन्त्र्य ही है और वही परमात्मा का मुख्य ऐश्वर्य है ।” इत्यादि कहा गया । इसीलिये कहा-इस कारण ।। ६६ ।। प्रथममाह्निकम् स्वातन्त्र्याख्यया शक्त्या योग उच्यते ? इत्याशङ्कयाह बहुशक्तित्वमप्यस्य तच्छक्त्यैवावियुक्तता ॥ ६७ ॥ स्वातन्त्र्यशक्तिरेव हि तत्तदेषणीयाधुपाधिवशान्नानात्वेन व्यवह्रियते इति तच्छक्तियोगितैवास्यानन्तशक्तित्वम् । यदुक्तम् ‘या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी। इच्छात्वं तस्य सा देवि सिसृक्षोः प्रतिपद्यते।। एकापि सत्यनेकत्वं यथा गच्छति तच्छण ।’ इत्याधुपक्रम्य ‘एवमेषा द्विरूपापि पुनर्भेदैरनन्तताम् । अर्थोपाधिवशाधाति चिन्तामणिरिवेश्वरी’ ।। ६७ ।। ननु एवमपीश्वराद्वयवादो न नियूंढस्तदतिरिक्तायाः स्वातन्त्र्यशक्तेरप्य भिधानात् ? इत्याशङ्कयाह शक्तिश्च नाम भावस्य स्वं रूपं मातृकल्पितम् । प्रश्न है कि सर्वत्र इसको इच्छा आदि अनन्तशक्ति से युक्त कहा गया है तो फिर यहाँ एक ही स्वातन्त्र्य नामक शक्ति से योग कैसे कहा जाता है—यह शङ्का कर कहते हैं ___ इसका अनेक शक्तियुक्त होना भी उस (स्वातन्त्र्य) शक्ति से वियुक्त न होना है ।। -६७ ।। स्वातन्त्र्य शक्ति ही तत्तत् एषणीय (ज्ञेय) आदि उपाधि के कारण नानारूप में व्यवहृत होती है इस प्रकार उस (स्वातन्त्र्य) शक्ति के योग से ही यह अनन्तशक्ति वाला है। जैसा कि कहा गया ___“जगत्पालक की जो वह शक्ति उसमें समवाय रूप से वर्तमान है, हे देवि ! वही सृष्टि की इच्छा वाले उस (परमेश्वर) की इच्छा हो जाती है । एक होकर भी वह जिस प्रकार अनेक होती है उसे सुनो ।’ (मा.वि.तं. १/५) इत्यादि प्रारम्भ कर “इस प्रकार यह ईश्वरी दो रूप वाली होती हुई भी अर्थ रूप उपाधि के कारण, चिन्तामणि के समान अनन्त भेदों को प्राप्त करती है’’ ।। ६७ ।। प्रश्न है कि इस पर भी ईश्वराद्वयवाद सिद्ध नहीं हुआ क्योंकि उस (= शिव) से अतिरिक्त स्वातन्त्र्य शक्ति का कथन किया जाता है?—यह शङ्का कर कहते है प्रमाताओं के द्वारा कल्पित, पदार्थ का अपना रूप ही शक्ति है । श्रीतन्त्रालोकः तेनाद्वयः स एवापि शक्तिमत्परिकल्पने ॥ ६८ ॥ यतो भावस्य–यस्य कस्यचन सत: पदार्थस्य—स्वमेव रूपं फलभेदात् भेदारोपेण शक्तिः इति प्रमातृभिः परिकल्प्यते, न त्वसौ वस्तुतः पदार्थान्तरं किञ्चित्, अतः शक्तिशक्तिमत्परिकल्पनेऽपि क्रियमाणे, स एव अद्वयमयो विभुः, न काचिदद्वयखण्डना इति यावत् । तदुक्तम् ‘फलभेदादारोपितभेद: पदार्थात्मा शक्तिः । इति ।। ६८ ।। नन्वेवमस्तु, यन्न शक्तिशक्तिमतोमेंद इति, शक्तीनां पुन: परस्परं भेद एव भवति इति पुन: स दोषस्तदवस्थ एव ? इत्याशङ्कयाह मातृक्लुप्ते हि देवस्य तत्र तत्र वपुष्यलम् । को भेदो वस्तुतो वह्वेर्दग्धृपक्तत्वयोरिव ।। ६९ ॥ यथा वह्नः दाहपाकादिफलभेदाद् दाहिका पाचिका च शक्तिभेदेन कल्पितापि वस्तुतः शक्तिमदेकस्वभावत्वान्न परस्परस्य स्वरूपं भेत्तुमलम्; पृथक्सिद्धं हि वस्तु वस्त्वन्तरं भिनत्ति, नहि शक्तेः शक्तिमदतिरेकेण पृथक्सिद्धिरेवास्ति इति कि इसलिए शक्तिमान् की कल्पना होने पर भी वह अद्वय ही है ।। ६८ ।। किसी भी पदार्थ का अपना ही रूप फलभेद के आधार पर भेद का आरोप करने से शक्ति होती है प्रमातृगण ऐसी कल्पना करते हैं । यह शक्ति वस्तुत: कोई भिन्न पदार्थ नहीं है । इसलिये शक्ति और शक्तिमानरूपी दो की कल्पना करने पर भी वह विभू अद्वयमय ही है इस प्रकार अद्वयवाद का कोई खण्डन (सम्भव, नहीं है । वही कहा गया ‘फलभेद के कारण जिसमें भेद का आरोप होता है वह शक्ति पदार्थ की आत्मा ही है’ ।। ६८ ।। प्रश्न है कि ठीक है कि शक्ति और शक्तिमान में भेद नहीं है । किन्तु शक्तियों में परस्पर भेद तो है ही फिर वह दोष (= द्वैतापत्ति) वैसा ही है-यह शङ्का कर कहते हैं प्रमाताओं के द्वारा कल्पित, परमेश्वर के भिन्न-भिन्न शरीरों में अग्नि के दाहकत्व पाचकत्व आदि के समान वास्तविक क्या भेद है । (जैसे अग्नि की अनेक शक्तियाँ अग्नि से अभिन्न हैं उसी प्रकार परमेश्वर की अनेक शक्तियों के होने पर भी परमेश्वर एक है) ।। ६९ ।। जिस प्रकार दाह, पाक आदि फलभेद से अग्नि की दाहिका पाचिका शक्ति भिन्न-भिन्न कल्पित होती है तो भी वस्तुत: शक्तिमान् (वह्नि) के एक स्वभाव वाली होने से परस्पर स्वरूप का भेद नहीं होता । पृथक् सिद्ध वस्तु का दूसरी वस्तु से भेद होता है । शक्ति शक्तिमान् से भिन्न रूप में सिद्ध नहीं है फिर किसका किससे प्रथममाह्निकम् केन भेद्यम्, वह्वेरेव हि दाहादिसमर्थं स्वरूपं तथा परिकल्पितम् । एवं परमेश्वरस्य परिकल्पितेऽपि शक्तीनामानन्त्ये न कश्चिद्भेद: इति न कदाचिदीश्वरा द्वयवादक्षतिः ।। ६९ ।। नन् एवं परिकल्पितोऽपि शक्तीनां भेदो भासत एव इति कथं तदपह्नवः ? -इत्याशङ्कयाह न चासौ परमार्थेन न किञ्चिद्भासनादते। नास्ति किञ्चित्तच्छक्तितद्वद्भेदोऽपि वास्तवः ॥ ७० ॥ भानमन्तरेण अन्यत्किंचिन्नास्ति इत्यसौ भेदोऽपि भासमानत्वाद्वस्तुतो न न किञ्चित्, अपि तु परमार्थसन्नेव इति शक्तीनां तद्वतश्च भेदोऽपि पारमार्थिक एवं - इति वाक्यार्थः । एवं भेदस्य भानैकस्वभावत्वान्न ततोऽतिरेकः इति नाद्वयवादक्षतिः, नापि शक्तीनां तद्वतश्च भेदेन स्थितस्य व्यवहारस्यापह्नवः इति सर्व सुस्थम् ।। ७० ।। ननु परमेश्वरस्य स्वातन्त्र्याख्या शक्तिरेकैवास्ति इत्युक्तम्, इच्छादयस्तु कि तद्विस्फूर्जितमात्रम्, उत स्वतन्त्राणि शक्त्यन्तराणि? इत्याशङ्कयाह भेद किया जाय । वह्नि का ही दाह आदि में सक्षम रूप वैसा (भिन्न) माना गया है। इसी प्रकार परमेश्वर की शक्तियों को अनन्त मानने पर भी (उनमें परस्पर) कोई भेद नहीं है । अत: ईश्वराद्वयवाद अक्षत है ।। ६९ ।। ___ प्रश्न है-इस प्रकार शक्तियों का, कल्पित ही सही, भेद भासित तो होता है फिर उसको अस्वीकार कैसे किया जा सकता है? – यह शङ्का कर कहते हैं आभास के अतिरिक्त परमार्थत: कुछ नहीं है (इसलिए यह (= भेद) भी आभासित होने के कारण) कुछ नहीं है ऐसा नहीं है (अर्थात् भेद भी पारमार्थिक है) शक्ति और शक्तिमान् का भेद भी वास्तविक है ।। ७० ।। ___ भान के अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है इसलिये यह भेद भी भासमान होने से वस्तुतः कुछ नहीं है—ऐसा नहीं है वरन् यह परमार्थ सत् ही है । इसलिये शक्तियों और शक्तिमान् का भेद भी पारमार्थिक ही है-यह वाक्यार्थ है | भेद का स्वभाव ही भान है इसलिये वह उस ( प्रकाशरूप शिव) से अतिरिक्त नहीं है । इस प्रकार अद्वयवाद अक्षत है । शक्तियों और शक्तिमान् के भेद रूप में स्थित व्यवहार को भी छिपाया नहीं जा सकता । इस प्रकार सब ठीक है ।। ७० ।। प्रश्न है कि परमेश्वर की स्वातन्त्र्य नामक शक्ति एक ही है— यह कहा गया । तो इच्छा आदि क्या उस (= स्वातन्त्र्य) का विस्फूजितमात्र हे या दूसरी स्वतन्त्र शक्तियाँ ?-यह शङ्का कर कहते हैं श्रीतन्त्रालोकः स्वशक्त्युद्रेकजनकं तादात्म्यावस्तुनो हि यत्। शक्तिस्तदपि देव्येवं भान्त्यप्यन्यस्वरूपिणी ॥ ७१ ॥ यत् नाम हि अवान्तरशक्तिवैचित्र्यं वह्नयादे: वस्तुनः-स्वस्याः शक्तेः इति व्यपदेशप्रवृत्तिनिमित्तभूताया निर्विशेषक्रियामात्रनिष्ठायाः सामर्थ्य लक्षणायाः शक्ते: उद्रेको–दाहपाकादिविशेषरूपशक्त्यन्तरात्मतयोच्छलनं तस्य जनकम् अवभासकम्, तदपि-तादात्म्यात्-एवंविधस्वशक्त्येकरूपत्वाद्यथोक्तरूपा स्वेव शक्ति:- इति सम्बन्धः । समर्थो हि वह्निः सर्वं दाहादिकार्यजातं कुर्यात् इत्यभिप्रायः । एवं परमेश्वरस्यापि इच्छाद्यवान्तरशक्तिरूपतयावभासमानापि शक्तिर्देवी तत्तद्भेदोल्लासेऽपि परप्रकाशाभिन्नस्वभावत्वात् द्योतमानावभासा स्वातन्त्र्याख्यैव इति यक्तमक्तम—‘एक एवास्य धर्मोऽसौ सर्वाक्षेपेण वर्तते ।’ इति। एवमेकैवास्य स्वातन्त्र्याख्या शक्तिस्तथा तथा सृष्टेन भेदेन भायात् इति सिद्धम् ।। ७१ ।। न केवलं शक्तिरेवास्यैवङ्कल्पितेन भेदेनावभासते यावत्स्वयमपि–इत्याह शिवश्चालुप्तविभवस्तथा सृष्टोऽवभासते । जो (वह्नि आदि) वस्तु की आत्मशक्ति की आभासित उच्छलत्ता का जनक है वह भी अन्य स्वरूप में होता हुआ तादात्म्य के कारण (देव की स्वातन्त्र्य) चमत्कारिणी शक्ति ही है ।। ७१ ।। वह्नि आदि वस्तु का जो अवान्तर शक्ति वैचित्र्य है अर्थात् स्वशक्ति का = सामान्य क्रियामात्र वाली सामर्थ्य रूप शक्ति का, उद्रेक = दाह पाक आदि विशिष्ट शक्त्य न्तर के रूप में उच्छलन, उसका जनक = अवभासक, है । वह भी तादात्म्य के कारण इस प्रकार की अपनी शक्ति के एक रूप होने के कारण यथोक्तरूप वाली स्व ही शक्ति है । समर्थ ही वह्नि दाह आदि समस्त कार्यसमूह को सम्पन्न करता है-यह अभिप्राय है । इसी प्रकार परमेश्वर की भी इच्छा आदि अवान्तर शक्ति के रूप में अवभासमान होने वाली शक्ति देवी तत्तद् भेद का उल्लास होने पर भी परप्रकाश से अभिन्न स्वभाव वाली होने के कारण द्योतमान अवभास वाली स्वातन्त्र्य नामक ही है । इस प्रकार ठीक ही कहा गया- इसका एक ही धर्म सबको आक्षिप्त कर के हैं । इस प्रकार इस (= प्रभु) की एक ही स्वातन्त्र्य नामक शक्ति सृष्टि के भेद से भिन्न - भिन्न रूप में प्रकाशित हो रही है यह सिद्ध है ।। ७१ ।। उसकी केवल शक्ति ही इस कल्पित भेद के रूप में नहीं भासित होती वरन् वह स्वयं भी (भासित होता है) यह कहते हैं शिव अपनी संविद्रूपी प्रमातृदर्पण में भावना (उपदेश) आदि के विषय में अपने स्वातन्त्र्यवश उस प्रकार (= भिन्न-भिन्न रूप में) सृष्टप्रथममाह्निकम् स्वसंविन्मातृमकुरे स्वातन्त्र्याद्भावनादिषु ॥ ७२ ॥ शिवश्च स्वा संकुचिता संवित् लक्षणं यस्यासौ बुद्ध्यादौ गृहीतात्मग्रह: परिनिष्ठित: प्रमाता, स एव स्वच्छत्वात्प्रतिबिम्बसहिष्णुत्वेन मकुरः, तस्मिन् भावनोपदेशादौ स्वस्वातन्त्र्यात् तथा भाव्यमानत्वादिना कल्पितेन भेदेन सृष्टः प्रमेयतामापादित इव अवभासते, न चैवमप्यसौ प्रमात्रेकरूपत्वात् तथा भवति इत्युक्तम्-अलुप्तविभव इति, अपरिहतप्रमातृभाव:-इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘स्वातन्त्र्यादद्वयात्मानं स्वातन्त्र्याद्भावनादिषु । प्रभुरीशादिसङ्कल्पैर्निर्माय व्यवहारयेत् ।।’ इति ।। ७२ ।। (ई०प्र० १-५-१६) एतदेवोपसंहरति तस्माद्येन मुखेनैष भात्यनंशोऽपि तत्तथा । शक्तिरित्येष वस्त्वेव शक्तितद्वत्क्रमः स्फुटः ॥ ७३ ।। तस्मात् उभयोरपि शिवशक्त्योस्तथा सृष्टेन भेदेन अवभासननोपपत्तेहेंतोरपि होकर आभासित होते है (= तत्तद् व्यवहार करते है और ऐसा होने | पर भी) उनका वैभव लुप्त नहीं होता ।। ७२ ।। शिव = अपनी संकुचित संवित् ही है लक्षण जिसका वह, बुद्धि आदि को आत्मा मानने वाला परिमित प्रमाता, वही स्वच्छ होने के कारण प्रतिबिम्ब धारण करने की क्षमता वाला होने से मकुर (= दर्पण), उसमें भावनोपदेश आदि में अपने स्वातन्त्र्यवश उस प्रकार भाव्यमानत्व आदि कल्पित भेद से, सृष्ट = प्रमेयता को प्राप्त जैसा अवभासित होता है । प्रमातृरूप होने से वह वैसा नहीं होता इसलिये कहा गया-अलुप्त विभव वाला = अपरित्यक्त प्रमातृभाव वाला । वही कहा गया “स्वातन्त्र्य शक्ति के कारण अद्वय रूप आत्मतत्त्व को स्वतन्त्र भावना आदि कार्यों में वह सर्व समर्थ विभु ईश आदि सङ्कल्पों के द्वारा अपने को उसी रूप में परिवर्तित कर समस्त व्यवहार करता है” || ७२ ।। उसी का उपसंहार कहते है इसलिए निरंश होते हुए भी (जिस भुवन आदि वाले पदार्थों के) रूप में (शिव) आभासित होते हैं वह वस्तु (उस शिवैकात्म्यलाभ का उपाय होने के कारण) शक्ति ही है । इस प्रकार शक्ति और तद्वान् (= शक्तिमान्) का (उपायोपेय रूप में) क्रम स्पष्ट (= सशंय रहित) है ।। ७३ ।। इस कारण शिवशक्ति दोनों के उस प्रकार बनाये गये भेद से अवभासमान होने श्रीतन्त्रालोकः शिवः प्रकाशमात्रैकरूपत्वात् अनंशोऽपि येन भुवनाद्यन्यतमांशलक्षणेन मुखेन भावनादो भासतें तत् मुखम् ……………… शैवी मुखमिहोच्यते ।’ इत्यायुक्त्या तथा शिवप्राप्त्युपायतया शक्तिरेव, नहि एतदवगमादौ उपायान्तरमस्ति उपपद्यते वा । अतश्च शक्तिशक्तिमतोरूपायोपेयभावात्मा क्रमः सम्यगव स्फूट: न कश्चिदत्र संशयः-इत्यथ: ।। ७३ ।। अतश्च अनयोरसावुपायोपेयभावस्तत्र तत्र आगमेषु उद्धोष्यते—इत्याह श्रीमत्किरणशास्त्रे च तत्प्रश्नोत्तरपूर्वकम् । अनुभावो विकल्पोऽपि मानसो न मनः शिवे ॥ ७४ ।। अविज्ञाय शिवं दीक्षा कथमित्यत्र चोत्तरम् । तत् इति शिवागमे शक्तरुपायत्वमुक्तम्-इति वाक्यशेषः । एतदेव च शब्दार्थरूपत्वेन शास्त्रस्य द्वैविध्येन प्रवृत्तेरर्थद्वारेण दर्शयति अनुभाव इत्यादिना । तत्र गरुडेन से भी प्रकाशमात्र होने के कारण अनंश भी शिव जिस = भवन आदि किसी भी अंशरूप मुख से भावना आदि में भासित होता है वह मुख ………. शिव का मुख कही जाती है’ इत्यादि उक्ति के द्वारा उस प्रकार शिवप्राप्ति के उपाय के रूप में शक्ति ही है। इस (शिव) की प्राप्ति आदि के विषय में कोई अन्य उपाय न है और न हो सकता है । इसलिये शक्ति और शक्तिमान् का उपाय-उपेय रूप क्रम पूर्णरूपेण स्पष्ट है इसमें कोई संशय नहीं है—यह अर्थ है ।। ७३ ।। इसलिये इन दोनों का उपायउपेय सम्बन्ध भिन्न-भिन्न आगमों में घोषित किया जाता है-यह कहते हैं श्रीमत्किरण संहिता में प्रश्नोत्तरपूर्वक वह (= शक्ति उपाय है ऐसा कहा गया) है (प्रश्न यह है कि) अनुभाव तो विकल्प है वह मन में उत्पन्न होता है । शिव के विषय में मन (की गति है नहीं तो फिर मन के द्वारा) शिव को बिना जाने दीक्षा कैसे (सम्भव है) इस विषय में उत्तर है- ।। ७४-७५ - ।। ___ वह = शिवागम में । शक्ति को उपाय कहा गया—यह जोड़ देना चाहिये । यही शास्त्र की शब्द एवं अर्थ रूप दो प्रकार से प्रवृत्ति होने के कारण अर्थ के द्वारा दिखाते हैं—अनुभाव……… । इस विषय में गरुड़ ने जब प्रश्न किया कि प्रथममाह्निकम् ‘शिवतत्त्वं कथं शून्यं तच्छून्यं नाक्षगोचरः । प्रत्यक्षं चाक्षविज्ञानं तदतीतं न किञ्चन ।।’ इति प्रत्यक्षागोचरत्वाच्छिवत्त्वं न किञ्चित् इति पृष्टे, भगवता ‘माया हेया शिवो ग्राह्यो ग्राहकः पुरुषः स्मृतः । मायाधर्मैः शिवः शून्यः … इत्यादिना ‘अतीन्द्रियं च यद्वस्तु तत्राप्यनुभवो न किम् । अनुभावो मनोऽध्यक्ष: प्रसिद्धः क्षुद्यथा च तृट् ।।’ इत्यन्तेन शिवतत्त्वस्य बाह्येन्द्रियाप्रत्यक्षत्वेऽपि मानसप्रत्यक्षविषयत्वात् किञ्चित्त्वेन प्रतिसमाहितम् । एतच्च पुनरप्यागूर्य गरुडेन ‘अनुभावो विकल्पोत्थो विकल्पो मानस: स च । समनस्कं च तज्ज्ञेयमनस्कमरूपकम् ।। अज्ञात्वा दैशिकस्तत्त्वं कथं दीक्षां करोत्यसौ । ज्ञेयः सर्वात्मनैवार्थः स ज्ञेयो नैव सर्वथा ।।’ इत्यादिना पृष्टम् । एतत्प्रश्नार्थ एव ग्रन्थकृता संक्षेपचिकीर्षया स्ववचसो hd शिवतत्त्व शून्य कैसे है? जो शून्य है वह इन्द्रियों का विषय नहीं होता । इन्द्रियों का ज्ञान प्रत्यक्ष होता है और उससे परे कुछ नहीं है? फलत: प्रत्यक्ष का विषय न होने से शिवतत्व कुछ नहीं है ?–तो भगवान् ने माया हेय है शिव ग्राह्य है पुरुष ग्राहक माना गया है । शिव माया के कर्मों से शून्य है… | इत्यादि के द्वारा “जो वस्तु अतीन्द्रिय होती है क्या उसका अनुभव नहीं होता अनुभव तो मानसिक प्रत्यक्ष है जैसे कि भूख और प्यास (का प्रत्यक्ष)” यहाँ तक शिव तत्त्व के बाह्य इन्द्रियों के प्रत्यक्ष का विषय न होने पर भी मानस प्रत्यक्ष का विषय होने से ‘कुछ है’ इस रूप में (गरुड़ के प्रश्न का) समाधान किया है । इस पर पुन: विचार कर गरुड़ ने ‘अनुभव विकल्प से उत्पन्न होता है । विकल्प मन से उत्पन्न होते है । वह (= मानस प्रत्यक्ष) समनस्क है । वह ज्ञेय (= शिव) अमनस्क और अरूप है आचार्य इस तत्त्व को न जानकर कैसे दीक्षा कर सकते है । यह (= शिव) जिसे ‘हम’ ज्ञेय समझते हैं वही सर्वात्मना परमार्थ है और वह सर्वथा (= किसी भी दशा में) ज्ञेय नहीं है।’ इत्यादि के द्वारा प्रश्न किया । इस प्रश्न का निहितार्थ ही ग्रन्थकार के द्वारा ७त. प्र. ९८ श्रीतन्त्रालोकः पनिबद्धः । अत्रायमर्थ:- यन्नाम बभक्षादिन्यायेन शिवस्य मानसप्रत्यक्षविषयत्व मुक्तं तत्र मानसोऽनुभवः ‘सङ्कल्पकमत्र मनः…… इति नीत्या सङ्कल्पात्मकत्वात् विकल्प: तस्य चार्थासंस्पर्शित्वं रूपम् इति मनः तावत् शिवे न प्रमाणम्, यत्र च न प्रमाणं प्रवर्तते, तन्न ज्ञातं भवेत् इत्यज्ञाते शिवतत्त्वे कथं दीक्षा स्यात्, दैशिको हि परं तत्त्वं ज्ञात्वा तत्र दीक्षया दीक्ष्यं योजयेत् । अत एव ‘गुरौ ज्ञानम्’ इत्याद्युक्तम् । इति शब्दः प्रश्नसमाप्तौ। अत्र इति गरुडोक्ते प्रश्ने । उत्तरम् इति भगवदुक्तं प्रति समाधानम् ।। ७४ ।। तदेवाह ___ क्षुधाद्यनुभवो नैव विकल्पो नहि मानसः ॥ ७५ ॥ न-शब्दो भिन्नक्रमः, तेन प्रश्ननिषेधविषयत्वेन योज्यः, नायं प्रश्न इति । हि-शब्दो हेतौ, यतो बुभुक्षादीनां विकल्पात्मक एव मानसोऽनुभवो न भवति इत्यर्थः । आसां हि प्रथममविकल्पकमानसप्रत्यक्षविषयत्वमप्यस्ति, अन्यथा संक्षेप करने की इच्छा से अपने शब्दों में लिखा गया । यहाँ यह अर्थ है बुभुक्षादि न्याय से शिव को जो मानस प्रत्यक्ष का विषय बतलाया गया वहाँ मानस अनुभव “मन सङ्कल्प करने वाला है…” इस नीति से, सङ्कल्पात्मक होने से विकल्प है । उस (= मानस अनुभव) का रूप अर्थ का स्पर्श नहीं करता । इस कारण मन शिव के विषय में प्रमाण नहीं हो सकता । और जिस विषय में प्रमाण की प्रवृत्ति नहीं होती वह ज्ञात नहीं हो सकता । इस रीति से जब शिवतत्त्व अज्ञात है तो उसके विषय में दीक्षा कैसे हो सकती है? आचार्य परतत्त्व को जानकर ही उस (तत्त्व) से दीक्ष्य को दीक्षा के द्वारा जोड़ता है । इसलिये ‘गुरु में ज्ञान रहता है’ इत्यादि कहा गया । ‘इति’ शब्द प्रश्न की समाप्ति (के अर्थ) में (प्रयुक्त है) । अत्र = गरुड़ के द्वारा उक्त प्रश्न के विषय में । उत्तरम् = भगवान का वचन ही प्रतिसमाधान है ।। ७४ ।। वही कहते हैं ऐसा नहीं है । क्षुधा आदि का अनुभव विकल्पात्मक है किन्तु मानस नहीं । (निर्विकल्पक ज्ञान की अवस्था में मन का सहयोग नहीं होता) ।। -७५ ।। ‘न’ शब्द का क्रम भिन्न है । उसको (श्लोककार्ध के पहले) प्रश्न के निषेध के रूप में जोड़िये । (अर्थ हुआ) यह प्रश्न (उचित) नहीं है । ‘हि’ शब्द का प्रथममाह्निकम् तत्पृष्ठभाविनो बुभुक्षेयम् इति विकल्पस्योदयो न स्यात् । सविकल्पकमानस प्रत्यक्षविषयत्वेऽप्यासां न कश्चिद्दोषः, तस्य वस्त्वाश्रयत्वेन प्रमाणत्वाभ्युपगमात् । एवं शिवोऽपि मानसप्रत्यक्षगोचरो भवत्येव, किंतु शक्तिद्वारेण इति विशेषः । यदुक्तं तत्रैवोत्तरग्रन्थे ‘क्षुधाद्यनुभवो यत्र विकल्पस्तत्र नो भवेत् । वस्त्वाश्रयो विकल्पोऽपि तद्वस्तु घटवन्न च ।। विकल्पो मानस: सूक्ष्मः शून्यशक्तिलयं गतः । तद्गतस्त्वन्यविच्छिन्नस्तेनासौ चित्तवर्जितः ।। ज्ञानं चात्मेन्द्रियाश्लेषात्कर्ता ह्यात्मा मन: क्रिया । शिवः साध्योऽत्र मन्तव्यो विभुरप्येकधर्मतः ।।’ इति । यत्तु अस्य शून्यत्वमुक्तं तन्मायाक्षयोपचारेण तद्धमैः परिणामित्वादिभिः शून्यत्वाच्छून्यम्-इत्युक्तम् । अन्यापेक्षया तु तदशून्यमेवेत्यर्थावाप्तम् । अतश्च शिवं शक्तिद्वारेण ज्ञात्वा दैशिकस्तत्र दीक्षया दीक्ष्यं योजयति इति न काचित्क्षतिः ।। ७५ ।। प्रयोग हेतु अर्थ में है । बुभुक्षा आदि का विकल्पात्मक ही मानस अनुभव नहीं होता अपितु इनका पहले निर्विकल्पक मानस प्रत्यक्ष होता है । अन्यथा उसके बाद होने वाली ‘यह बभक्षा है’ ऐसे विकल्प का उदय ही नहीं होगा । इनको सविकल्पक मानस प्रत्यक्ष का विषय मानने पर भी कोई दोष नहीं है । क्योंकि वह (= सविकल्पक मानस प्रत्यक्ष) वस्तु के आधार पर ही प्रमाण माना जाता है । इस प्रकार शिव भी मानस प्रत्यक्ष का विषय है ही । किन्तु यह प्रत्यक्ष विषयता शक्ति के द्वारा होती है । जैसा कि वहीं पर आगे वाले ग्रन्थ में कहा गया ___“जहाँ क्षुधा आदि का अनुभव होता है वहाँ विकल्प नहीं होता । विकल्प भी वस्तु के अधीन होता है । वह वस्तु घट के समान नहीं है । विकल्प मन में होता है वह सूक्ष्म है तथा शून्य (में व्याप्त) शक्ति के माध्यम से वह (शक्ति में) लीन हो जाता है । उस (शक्ति) में लीन होने से वह दुसरे (पदार्थो) से अलग हो जाता है इसके कारण वह चित्त से असम्बद्ध हो जाता है । आत्मा और इन्द्रिय के आश्लेष से ज्ञान होता है । उसमें आत्मा कर्त्ता होता है और मन (उसकी) क्रिया है । यहाँ शिव को, विभु होने पर भी एक धर्म (= शक्ति या स्वातन्त्र्य) के कारण साध्य मानना चाहिये ।” जो इस (= शिव) को शून्य कहा गया वह माया के क्षय के कारण लक्षणा के द्वारा, उसके परिणामित्व आदि धर्मो से शून्य होने के कारण (उस शिव की) शून्यता है । अन्य की अपेक्षा तो वह अशून्य ही है-यह बात अर्थात् आक्षिप्त है। इसलिये शक्ति के द्वारा शिव का ज्ञान कर आचार्य शिष्य को दोक्षा के द्वारा उस (शिव) से जोड़ देता है-इस प्रकार कोई क्षति नही हैं ।। ७५ ।। श्रीतन्त्रालोकः ननु सर्वात्मनार्थो ज्ञातो भवति न तु अंशेन । विकल्पश्च सर्वात्मना अर्थ ज्ञातुं न शक्नोति-नियतांशाभिनिवेशित्वात् तस्य, अत: शिवस्तेन शक्तिद्वारेण विषयीकृतोऽपि सर्वात्मना तद्गोचरीभावाभावान्न ज्ञात: इति प्रश्नशेषमाशङ्क्याह रसाधनध्यक्षत्वेऽपि रूपादेव यथा तरुम् । विकल्पो वेत्ति तद्वत्तु नादबिन्द्वादिना शिवम् ॥ ७७ ॥ विकल्प: अत्र निर्विकल्पकपृष्ठभावी ग्राह्यः । तेन स तरुं रूपरसाद्यात्मकमपि रूपाद्यात्मनैव गृह्णाति न रसाद्यात्मनापि नियतत्वात्तद्ग्रहणस्य, नहि सर्वात्मत्वेन अगृहीतत्वाद् अगृहीत एवासौ इति वक्तुं युज्यते अनुभवविरोधात् । तद्वत् नादबिन्द्वाद्यात्मकशक्तिद्वारेण शिवोऽपि ज्ञात एव भवति इति सिद्धान्तः । तदुक्तं तत्रैव ‘प्रत्यक्षेण यथा वृक्षो रूपमात्राद्विगृह्यते । रसादयो गृहीता नो तथेशो ज्ञानशक्तितः ।। गृह्यते तत्त्वभावेन वस्तुभावविवर्जनात् ।’ इति । प्रश्न है कि कोई भी पदार्थ ज्ञात है-ऐसा तभी कह सकते हैं जब कि वह सर्वात्मना ज्ञात हो न कि अंशत: । विकल्प अर्थ का सर्वात्मना ज्ञान नहीं कर सकता क्योंकि उसका प्रवेश एक निश्चित अंश में ही होता है । अत: शक्ति के द्वारा (ज्ञान का) विषय बनाये जाने पर भी शिव सर्वात्मना उस (= विकल्प) का विषय नहीं होने से ज्ञात नहीं है—इस प्रश्न की आशङ्का कर कहते हैं रस आदि का प्रत्यक्ष न होने पर भी जिस प्रकार रूप (के प्रत्यक्ष मात्र) से वृक्ष को विकल्प जान लेता है उसी प्रकार नाद बिन्दु आदि (रूपों वाली शक्ति) के द्वारा शिव को भी ‘विकल्प’ जान लेता है ।। ७७ ।। ___ यहाँ विकल्प का अर्थ निर्विकल्पक ज्ञान के बाद होने वाला (ज्ञान) समझना चाहिये । इसलिए वह (= विकल्प) रूप रस आदि वाले भी वृक्ष को रूप वाला ही समझते हैं न कि रस आदि वाला भी क्योंकि उस (= रस) का ग्रहण नियत (= रसनेन्द्रिय से ही हो सकता) है । सर्वात्मना गृहीत न होने पर भी यह ‘ज्ञार, नही है’- ऐसा नहीं कहा जा सकता क्योकि अनुभव से विरोध हो जाता है । उसी प्रकार नाद बिन्दु आदि रूपों वाली शक्ति के द्वारा शिव भी ज्ञात ही हो जाता है यह सिद्धान्त है । वही वहाँ कहा गया है “जिस प्रकार वृक्ष केवल रूप के द्वारा प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय बनता है जब कि उसके रस आदि का ज्ञान नहीं होता उसी प्रकार शिव भी ज्ञान शक्ति के द्वारा तत्त्व के रूप में अनुभूत होता है क्योंकि उस अनुभूति में वस्तुभावना का अभाव रहता है ।” तथा प्रथममाह्निकम् तथा ‘बिन्दु दस्तथा शक्तिः शून्यत्वे परिकल्पिता: । चेतसः स्थितिहेत्वर्थं पुनर्नित्यं स्थिरं भवेत् ।। अतीन्द्रियः सुसूक्ष्मत्वात्सूक्ष्मा शक्तिः स तद्गतः । ज्ञानशक्तिर्मता सापि तज्ज्ञानाज्ज्ञात एव सः ।।’ इति । एवं शक्तिरेव परतत्त्वाधिगमे परमुपायः इति सिद्धम् । सा च भुवनादिरूपतया अनन्तप्रकारा इत्युक्तप्रायम् ।। ७७ ।। एवं यत्किञ्चन जडाजडात्मकविश्वैचित्र्यं यच्च तद्विषयं सृष्ट्यादि जाग्रदाद्यवस्थादि वा तत्सर्वं परमेश्वरस्य शक्तिस्फार एव-इत्याह बहुशक्तित्वमस्योक्तं शिवस्य यदतो महान् । कलातत्त्वपुराणुपदादिर्भेदविस्तरः ॥७८ ॥ सृष्टिस्थितितिरोधानसंहारानुग्रहादि च। तुर्यमित्यपि देवस्य बहुशक्तित्वजृम्भितम् ।। ७९ ॥ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तान्यतदतीतानि यान्यपि । तान्यप्यमुष्य नाथस्य स्वातन्त्र्यलहरीभरः ।। ८० ॥ ___“बिन्दु, नाद और शक्ति शून्य रूप में परिकल्पित है । चित्त को स्थिर बनाने के लिये वह (शिव) नित्य और स्थिर होता है । वह (शिव) अत्यन्त सूक्ष्म हाने के कारण इन्द्रियों के प्रत्यक्ष का विषय नहीं है । शक्ति सूक्ष्म है और वह (शिव) उसमें रहता (रमण) करता है । वही (शक्ति) ज्ञान शक्ति मानी गयी है और उस (= ज्ञानशक्ति) के ज्ञान से वह ज्ञात हो जाता है ।” इस प्रकार सिद्ध हो गया कि शक्ति ही परमतत्त्व के ज्ञान के लिये परम उपाय है । और वह भवन आदि के रूप में अनन्त प्रकार की है ।। ७७ ।। इस प्रकार जड़ चेतन रूप जो कुछ विश्ववैचित्र्य है और तद्विषयक सृष्टि आदि या जाग्रंत आदि अवस्था आदि है वह सब परमेश्वर का शक्ति विस्तार (या शक्ति उल्लास) है—यह कहते हैं इस शिव की अनेक शक्तिता कही गई है । क्योंकि इसी से महान् कला, तत्त्व, पर (= भुवन), अर्ण (= वर्णमाला का अक्षर), अण (मन्त्र) पद आदि भेदों का विस्तार हुआ है ।। ७८ ।। सृष्टि स्थिति संहार निग्रह अनुग्रह आदि तथा तुरीय अवस्था ये भी (उस) देवता की अनेक शक्ति का उल्लास है ।। ७९ ।। _जाग्रत् स्वप्न, सुषुप्ति और उससे अन्य (= तुरीय) और तुरीयातीत ये जो कुछ हैं वे सब इस परमेश्वर के स्वातन्त्र्य की लहरों की श्रीतन्त्रालोकः महामन्त्रेशमन्त्रेशमन्त्राः शिवपुरोगमाः । अकलौ सकलश्चेति शिवस्यैव विभूतयः ॥ ८१ ॥ पदादि इति आदिशब्देन भूतभावग्रहणम् । सृष्टिस्थिति इत्यनेन कृत्यभेद उक्तः । तुर्यमित्यन्यच्छब्दवाच्यं सृष्ट्यादीनामन्तर्वर्ति पूर्ण रूपम् । अनेन चतुष्टयार्थस्यापि आसूत्रणं कृतम्, तेन स्थितौ संहारे तिरोधानानुग्रहयोरन्तर्भाव: कायों येनैतत्स्यात्, अन्यत्तुर्यम्, जाग्रत्स्वप्न इत्यनेन अवस्थाभेद उक्तः । थकलो इति विज्ञानाकलप्रलयाकलौ । अनेन प्रमातृभेद: ।। ७८-८१ ।। तदेवं वैचित्र्यभाज: षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकस्य जगतश्चिदानन्दैकघनः परमार्थ: शिव एवानुप्राणकतया वर्तते-इत्याह तत्त्वग्रामस्य सर्वस्य धर्मः स्यादनपायवान् । आत्मैव हि स्वभावात्मेत्युक्तं श्रीत्रिशिरोमते।। ८२ ॥ द्विविधो हि धर्मः पदार्थस्य-प्राणप्रदो विशेषाधानहेतुश्च । आद्यो यथा सामान्यम्, नहि गोत्वमन्तरेण गौः गौरेव भवति । द्वितीयो यथा गुणः, उच्छलता है ।। ८० ।। शिव जिसके पहले वर्तमान है ऐसे (सदाशिव तत्त्व में रहने वाले) महामन्त्रेश (ईश्वर तत्त्व में रहने वाले) मन्त्रेश्वर (शुद्धविद्या तत्त्व मे निवास करने वाले) मन्त्र दो अकल, विज्ञानकल और प्रलयाकल तथा सकल (ये सब) शिव की ही विभूतियाँ हैं ।। ८१ ।। पर आदि’ में आदि पद से भूत भाव का ग्रहण होता है । ‘सृष्टि स्थिति इस पद से कृत्यभेद कहा गया । तुर्य शब्द का पृथक् कथन सृष्टि आदि के अन्तवर्त्ति पूर्णत्व को बतलाने के लिये है । इसके द्वारा पुरुषार्थचतुष्टय का भी सन्दर्भ दिया गया । इससे स्थिति और संहार में तिरोधान और अनुग्रह का अन्तर्भाव कर लेना चाहिये जिससे यह (= तुर्य = पूर्णत्व) सङ्गत हो जाय । अन्य तुर्य अर्थात् जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति रूप तीन अवस्थाओं से परे की अवस्था (= तुरीय और तुरीयातीत अवस्था) । अकलौ यहाँ द्विवचन से विज्ञानाकल और प्रलयाकल (समझना चाहिये) इसस प्रमातृभेद (कहा गया) ।। ७८-८१ ।। इस प्रकार इस विचित्र ३६ तत्त्वों वाले जगत् का चित्आनन्दरूप परमतत्त्व शिव ही अनुप्राणक है—यह कहते है आत्मा ही समस्त (छत्तीस) तत्त्व समूह का स्वाभाविक धर्म है (और इसीलिए) वह कभी भी (इन छत्तीस तत्त्वों से) अपायवान् अर्थात् वियुक्त नहीं होता—ऐसा त्रिशिरो भैरव में कहा गया है ।। ८२ ।। पदार्थ के दो धर्म होते हैं—प्राणदायक और वैशिष्ट्याधायक । प्रथम जैसे प्रथममाह्निकम् शुक्लादिर्हि लब्धसत्ताकं वस्तु विशिनष्टि । एवमिह आत्मैव तत्त्वसमूहस्य प्राणप्रदत्वात् स्वभावभूतो धर्मः अत एव अनपायवान् नित्यावियुक्त:-इत्युक्तम् । | हि शब्दो हेतौ । नन्वत्र किं प्रमाणम्-इत्याशक्योक्तम्- ‘इत्युक्तं त्रिशिरोमते’ इति ।। ८२ ।। तत्रत्यमेव ग्रन्थं शास्त्रस्य शब्दार्थरूपतया द्वैविध्येन प्रवृत्तेरुभयथाप्याह हृदिस्थं सर्वदेहस्थं स्वभावस्थं सुसूक्ष्मकम्। सामूह्यं चैव तत्त्वानां ग्रामशब्देन कीर्तितम् ।। ८३ ।। समूह एव सामूह्यम् । ग्रामशब्दो हि समूहार्थवृत्ति: ‘कवलीकृतनि:शेषतत्त्वग्रामस्वरूपकम् । इत्यादिप्रयोगदर्शनात् । तच्च सर्वत्र बाह्ये देहे चान्तः साधारणा साधारणतया द्वैविध्येन वर्तमानम्-इत्यर्थः । अत एव स्वभावे स्थावर जङ्गमाद्यात्मनि नियते रूपे स्थितम् । एवमपि हृदि-बोधे स्थितम्, तदैकात्म्येन परिस्फुरत् इति यावत्, अत एव सुसूक्ष्मम्-अपरिच्छद्यम् ।। ८३ ।। गणसामान्य’ । गोत्व के बिना गाय गाय ही नहीं रहेगी । दूसरा जैसे गुण । शुक्ल आदि (गुण) सत्तात्मक वस्तु को (अन्य काली नीली आदि वस्तुओं से) अलग करता है । इस प्रकार यहाँ आत्मा ही समस्त तत्त्वों का प्राणप्रद होने से (उनका) स्वभावभूत धर्म है । इसीलिये उसको अविनश्वर तथा नित्य संश्लिष्ट है-ऐसा कहा गया । ‘हि’ शब्द का प्रयोग यहाँ ‘हेतु’ अर्थ में किया गया है । इसमें क्या प्रमाण है ? यह शङ्का कर कहते हैं-त्रिशिरोमत में ।। ८२ ।। शास्त्र की शब्द एवं अर्थ दो प्रकार से प्रवृत्ति होने के कारण उस ग्रन्थ को दोनों प्रकार से उद्धृत करते हैं तत्त्वों का (वह) समूह जो कि हृदय (= बोध), सभी देह तथा स्वभाव में स्थित है और अत्यन्त ही सूक्ष्म है, ‘ग्राम’ शब्द से कहा गया है ।। ८३ ।। समूह ही सामूह्य है । ग्राम शब्द का अर्थ समूह है । “समस्त तत्त्वसमूह रूप अपने स्वरूप को निगलने वाला ।’ इत्यादि प्रयोग देखा जाता है । वह (तत्त्व) सर्वत्र बाहर और शरीर के भीतर साधारण और असाधारण दोनों रूपों विद्यमान है । इसीलिये वह स्वभाव = स्थावर जङ्गम आदि नियतरूप, में स्थित है । ऐसा होते हुए भी (वह) हृदय = बोध में स्थित है अर्थात् बोध से अभिन्न रूप में स्फुरित हो रहा है । इसीलिये (वह) १. नित्यत्वेसत्यनेकसमवेतत्वम् सामान्यम् । १०४ श्रीतन्त्रालोकः तत्त्वग्रामस्य चास्य न संकुचित आत्मा धर्मः, अपि तु पर:- इत्याह ____ आत्मैव धर्म इत्युक्तः शिवामृतपरिप्लुतः। शिवामृतपरिप्लुतः इति परानन्दचमत्कारमय:-इत्यर्थः । एवं स एव परमुपेयः इति तत्रैवावधातव्यम्-इत्यपि सूचितम् । कश्च अत्र उपायो येनैतत्साक्षात्कारो भवेत्—इत्याह प्रकाशावस्थितं ज्ञानं भावाभावादिमध्यतः ॥८४॥ स्वस्थाने वर्तनं ज्ञेयं द्रष्टुत्वं विगतावृति ।। विविक्तवस्तुकथितशुद्धविज्ञाननिर्मलः ॥८५ ॥ ग्रामधर्मवृत्तिरुक्तस्तस्य सर्वं प्रसिद्ध्यति । आदिशब्दाद्भावोऽपि, तेन भावाभावयोः भावयोर्वा यत् मध्यम् अन्तरालं तदवलम्ब्य प्रकाशे स्वात्मन्येव, न पुनर्भावाभावादिस्वरूपे अवस्थितं यत् ज्ञानं सुसूक्ष्म = अपरिच्छेद्य है ।। ८३ ।। इस तत्त्वसमूह का धर्म संकुचित आत्मा नहीं अपितु परम आत्मा है—यह कहते हैं शिवामृत (= परमानन्द) से व्याप्त आत्मा ही धर्म है ऐसा कहा गया हे ।। ८४- ।। शिवामृतपरिप्लुत = पर आनन्द के चमत्कार से परिपूर्ण । इस प्रकार वही परम उपेय है-यह वहीं से समझ लेना चाहिये—यह भी सूचित किया गया । इस विषय में कौन सा उपाय है जिससे इसका साक्षात्कार हो जाय ? –यह कहते है ____ भाव और अभाव (अथवा दो भावों) के बीच में वर्तमान जो प्रकाशावस्थ ज्ञान, उस (ज्ञानस्वरूप आत्मा) का अपने स्थान में रहना और आवर्त्तनरहित उसका द्रष्टुत्व जानना चाहिए । विविक्त (= अवच्छेद- रहित) वस्तु (= महासत्तात्मक परमतत्त्व) में कथित शुद्ध विज्ञान के द्वारा निर्मल एवं उसके साथ एकात्मता होने के कारण जिसके समस्त बन्धन निरूद्ध हो गए हैं उसे (हमारे गुरु के द्वारा) ग्राम धर्मवृत्ति कहा गया है । ऐसे व्यक्ति को सब कुछ सिद्ध हो जाता है ।। -८४-८६- ।। ___‘आदि’ शब्द से भाव भी (समझना चाहिये) इससे भाव और अभाव अथवा दो भाव पदार्थो का जो मध्य = अन्तराल उसको आधार बनाकर प्रकाश = स्वात्मा में ही, न कि भाव अभावादिरूप में अवस्थित जो ज्ञान, उस अपने = आत्मा केप्रथममाह्निकम् तस्य स्वस्य आत्मन: स्थाने स्थितौ वर्तनं ज्ञेयम्-ग्रामधर्मविषये वृत्तिर्ज्ञातव्या इत्यर्थः । इदमत्र तात्पर्यम्-भावद्वयस्य भावाभावयोर्वा प्रतीतिकाले मध्यं तद्वयावच्छेदहेतुं शून्यमुपलभ्य तद्भावाभावादि युगपत्त्यक्त्वा तत्रैव सावधानस्य परमोपेये शिवामृतपरिप्लुते परमात्मनि वृत्तिर्जायते इति । तदुक्तम् उभयो वयोर्ज्ञाने ज्ञात्वा मध्यं समाश्रयेत् । युगपच्च द्वयं त्यक्त्वा मध्ये तत्त्वं प्रकाशते ।। भावे त्यक्ते निरुद्धा चिन्नैव भावान्तरं व्रजेत् । तदा तन्मध्यभावेन विकसत्यति भावना ।।’ इति । ‘ज्ञेयम्’ इति काकाक्षिन्यायेन योज्यम् । तेन वर्तनमपि परमार्थसाक्षात्काररूपं द्रष्टत्वं ज्ञेयम्, तच्च विगतावृति विगता निवृत्ता भावाभावाद्यात्मकबाह्यरूपा आवृति: यस्य तत्, बाह्यदेशाद्यवच्छेदशून्यम् इति यावत् । अथ च विगता परापरात्मना कालेन रहिता कलनात्मिका आवृतिः यस्य तत्, अकालकलितम्-इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘अपरः षोडशो यावत्काल: सप्तदशः परः । परापरस्तु यः कालः स प्रियेऽष्टादश: प्रभुः ।। स्थान = स्थिति में वर्त्तन को जानना चाहिये । अर्थ यह है कि ग्राम धर्म के विषय में (उसकी) वृत्ति जाननी चाहिये । यहाँ यह तात्पर्य है-दो भाव पदार्थों की अथवा भाव और अभाव की प्रतीति के समय मध्य = उन दोनों के अवच्छेद का कारण जो शून्य है उसको प्राप्त कर उन भाव अभाव आदि को एक साथ छोड़कर उसी (= शून्य) में सावधान (साधक) की परम उपेय शिवामृत से परिप्लुत परमात्मा के विषय में वृत्ति उत्पन्न होती है । वही कहा गया ‘दोनों भावों का ज्ञान हो जाने पर मध्य को जानकर उसमें ध्यान लगाना चाहिये और फिर दोनों (भावों) का एक साथ त्याग कर मध्य (में ध्यान लगाने पर) तत्त्व का प्रकाश होता है । भावों का त्याग होने पर निरुद्ध संवित् दूसरे पदार्थ को अपना विषय नहीं बनाती । परिणामस्वरूप उन (= भावों) के मध्य में भावना को अतिक्रान्त करने वाली (चित् रूपा संविद) विकसित होती है । (श्लोक सं. ८४ में) ‘ज्ञेय’ पद को काकाक्षिन्याय से जोड़ना चाहिये । इससे वर्त्तन भी परमार्थ साक्षात्कार रूप दृष्टा के रूप में ज्ञेय है और वह विगतावृत्ति = विगत अर्थात् निवृत्त है भावाभावादि रूप बाह्य आवृत्ति जिसकी वह अर्थात् बाह्य देश आदि अवच्छेद से शून्य अथवा विगता = परापरात्मक काल से रहित, कलनात्मिका आवृत्ति है जिसकी वह अर्थात् अकालकलित । वही कहा गया ‘अपर काल सोलह (कलात्मक) होता है पर सत्रह (कलात्मक) । हे प्रिये ! जो परापरात्मक काल होता हैं वह अठारह (कलाओं वाला) होती है । यह प्रभु है । १०६ श्रीतन्त्रालोकः प्राण एक त्रिधा कालं कृत्वा चैव त्यजेत्युन:।’ इति । तथा विगता पदैकादशकात्मिका आवृतिः यस्य तत्, तत्प्रतिनियत तत्तद्ब्रह्माद्याकारोज्झितम् इति यावत् । यदुक्तम् ‘पदैकादशिका सा च प्राणे चरति नित्यशः । अकारश्च उकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।। अर्धचन्द्रो निरोधी च नादो नादान्त एव च । शक्तिश्च व्यापिनी चैव समनैकादशी स्मृता ।।’ इति । अत एव च उन्मनाभिन्नप्रमातृरूपं परमार्थसाक्षात्कारलक्षणमेतद्भवति इति पिण्डार्थः । तदुक्तम् ‘उन्मना तु ततोऽतीता तदतीतं निरामयम् ।’ इति । अत एव तत्तद्देशकालाकारैः विविक्तम् अवच्छेदशून्यं यत् वस्तु महासत्तात्म परं तत्त्वम तत्र कथितं सर्वागमेष अविगानेन उक्तं यत शर्ट पराहपरामर्शमयं विज्ञानं तेन निर्मल: तदैकात्म्यापत्त्या खिलीकृतनिखिलबन्धो ग्रामधर्मवृत्ति: भैरवाढैरवी प्राप्तः ……………..।’ इत्याद्युक्तेरस्मद्गुरुभिरप्युक्तः इति श्रीकण्ठस्येयमुक्ति: । तदुक्तं तत्र एक ही काल को प्राण तीन प्रकार का बना देता है और फिर उसे छोड़ देता है।’ तथा विगत है ग्यारह पदों वाली आवृत्ति जिसकी वह अर्थात् निश्चित तत्तद ब्रह्मा आदि आकार को छोड़ने वाला । जैसा कि कहा गया “एकादश पदों वाली वह (= आवृत्ति) प्राण में नित्य चलती रहती है । (वे एकादश पद निम्नलिखित है -) अकार, उकार, मकार, बिन्द, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी और समना । इसलिये यह (वर्तन) उन्मना से भिन्न प्रमातारूप परमार्थ साक्षात्कार रूप होता है । वही कहा गया’ “उन्मना उन (एकादश पदों) से परे है और उससे भी परे है वह निरामय (= संविद् तत्त्व या शिव तत्त्व) ।” इसलिये तत्तत् देश काल आकार से रहित अवच्छेद से शून्य जो वस्तु है वही महासत्तात्मक पर तत्त्व है। वहाँ = समस्त आगमों में, एक मत से उक्त जो शुद्ध पर अहंपरामर्शमय विज्ञान, उससे निर्मल = उसके साथ अभिन्न होने से साधक नष्ट समस्त बन्धनों वाला हो जाता है । साथ ही वह ग्रामधर्मवृत्ति वाला हो जाता है । “(साधक) भैरवभाव से भैरवी भाव को प्राप्त हो जाता है ।’’ इत्यादि वचनों से हमारे गुरु के द्वारा उक्त यह भगवान् श्रीकण्ठनाथ की उक्ति है । वही वहाँ कहा गया प्रथममाह्निकम् ‘चतुर्थ सम्प्रवक्ष्यामि ग्रामधर्मविभेदतः ।’ इत्याधुपक्रम्य ‘हृदिस्थं सर्वदेहस्थं स्वभावस्थं सुसूक्ष्मकम् । सामूह्यं चैव तत्त्वानां ग्रामशब्देन कीर्तितम् ।। आत्मा वै धर्म इत्यक्तो ग्रामधर्मः प्रकीर्तितः । प्रकाशावस्थितं ज्ञानं भावाभावादिमध्यतः ।। स्वस्थाने वर्तनं ज्ञेयं वर्तनं वृत्तिरुच्यते । वृत्तिस्तु स्वपदं ज्ञात्वा द्रष्टुत्वं परिपठ्यते ।। प्रबुद्धं तद्विजानीयाद्वाह्यावरणवर्जितम् । परापरविनिर्मुक्तमेकादशपदोज्झितम् ।। स्वात्मन्यात्मनि यज्ज्ञानं शिवामृतपरिप्लुतम् । विविक्तवस्तुकथितशुद्धविज्ञाननिर्मल: ग्रामधर्मवृत्तिरुक्तस्तन्त्रेऽस्मिन्सर्वथोदितः ।’ इति । एतदेव च _ ‘अथ वा शिवमन्विच्छेत्साधकः परतत्त्ववित् ।’ इत्यादि ‘स्थिति: कार्या तु तत्त्वस्था मध्यशक्तिप्रभान्विता ।’ “ग्रामधर्म के भेद से चतुर्थ (सिद्धान्त) को कहूँगा ।” इत्यादि प्रारम्भ कर “हृदय मे वर्तमान समस्त शरीरों में अवस्थित, स्वभाव में रहने वाला अत्यन्त सूक्ष्म जो तत्त्वों का समूह वह ग्राम शब्द से कहा गया है । आत्मा ही (उनका) धर्म है इसलिए आत्मा को ग्रामधर्म कहा गया है । ज्ञान प्रकाश (रूप शिव तत्त्व) में स्थित है । भावाभाव (भाव-भाव एवं भाव-अभाव के मध्य) में स्थित आत्मरूप में रहना ही ज्ञान का विषय है । वर्त्तन को वृत्ति कहते हैं । वृत्ति का अर्थ है-अपने स्थान को जानकर (वहाँ) द्रष्टा के रूप (= भाव) में रहना ।। उस (= ज्ञान) को प्रबुद्ध मानना चाहिये जो बाह्य आवरण से रहित हो, पर अपर (भाव) से मुक्त और एकादश पर से परे हो, इस प्रकार का स्वात्मा में आत्मविषयक जो ज्ञान होता है वह शिवभावनारूपी अमृत से आप्लावित होता है । सर्वावच्छेदशून्य वस्तु के रूप में कथित शुद्धविज्ञान से निर्मल यह ग्रामधर्मवृत्ति इस तन्त्र में सब प्रकार से कही गयी है ।’’ और यही “अथवा परतत्त्ववेत्ता साधक शिव (भाव) की कामना करे ।’’ इत्यादि । ‘शिव तत्त्व में अपनी स्थिति करनी चाहिये और उसे मध्य शक्ति के चमत्कार १०८ श्रीतन्त्रालोकः इत्यन्ततत्रत्यग्रन्थार्थगर्भीकारेण ग्रन्थान्तरमुपक्षेप्तुकामो ग्रन्थकारः स्वोक्त्या योजयति-‘तस्य सर्वं प्रसिद्ध्यति’ इति तस्य-ग्रामधर्मवृत्तेः प्राणापानगति बोटनेन मध्यधामानुप्रवेशात् प्राप्तपरशक्तिसामरस्यस्य, सर्व-बाह्य माभ्यन्तरं च, प्रकण-शिवाभेदमयत्वेन, सिद्ध्यति प्रथते—इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘शिवभावनयौषध्या बद्धे मनसि संसृते । काष्ठकुड्यादिषु क्षिप्ते रसवच्छिवहेमता ।।’ इति ।। ८४-८५ ।। अत आह ऊर्ध्वं त्यक्त्वाधो विशेत्स रामस्थो मध्यदेशगः ॥ ८६ ॥ ऊर्ध्वम् इति ऊर्ध्ववाहित्वात्प्राणम्, अध इति अधोवाहित्वादपानम्, त्यक्त्वा इति तद्गतिं त्रोटयित्वा, स ग्रामधर्मवृत्तिरर्थात् मध्यनाडी प्रविशेत् । स च कीदृशः मध्यदेशगः मध्यनाडिकाया अपि यत् मध्यं तत्रस्था या बिससूत्राकारा शक्तिः तस्या देश: अन्तव्योमरूप एकदेशस्तं गच्छति जानाति यः सः–तदेकतानतया 14 से युक्त करना चाहिये ।’ यहाँ तक वहाँ के ग्रन्थार्थ को अन्तर्भूत कर दूसरे ग्रन्थ की अवतारणा करने की इच्छा वाले ग्रन्थकार अपना वचन जोड़ते हैं-तस्य सर्व प्रसिद्धयति । उसको = ग्रामधर्मवृत्ति वाले को, प्राण अपान की गति को विराम देने से मध्यधाम (= सुषुम्ना) में अनुप्रवेश के कारण (जो साधक) पर शक्ति का सामरस्य प्राप्त कर लेता है उसको सब = बाह्य और आभ्यन्तर, प्र = प्रकृष्ट रूप से अर्थात् शिवाभेद रूप में सिद्ध हो जाता है = प्रस्फुरित होने लगता है। वही कहा गया है काष्ठ कुड्य आदि में (तत्तद्भेदबुद्धि से) विक्षिप्त संचरणशील चञ्चल पारदरूपी मन को जब शिवभावना रूपी औषधि के द्वारा बाँध लिया जाता है तब वह मन जगत् को स्वर्णरूप (= शिवरूप) समझने लगता है अर्थात् स्वयं स्वर्णमय (= शिवमय) हो जाता है ।। ८४-८५ ।। इसलिये कहा जो ऊर्ध्व (= प्राण) और अधः (= अपान) को छोड़कर (मध्यधाम अर्थात् सुषुम्णा में) प्रवेश करता है (वह) मध्यदेश को प्राप्त होने वाला रामस्थ (परमात्मा के साथ ऐक्य प्राप्त) हो जाता है ।। -८६ ।। ____ऊर्ध्व = प्राण, क्योंकि यह ऊर्ध्वगमन करता है । अधः = अपान, क्योंकि यह नीचे की ओर गमन करता है । त्यक्त्वा = छोड़कर अर्थात् उसकी गति को तोड़कर, वह ग्रामधर्मवृत्ति (हो जाय) अर्थात् सुषुम्ना में प्रवेश कर जाय । वह कैसा है ? (उत्तर में कहते हैं) मध्यदेश = मध्य नाड़ी का भी जो मध्य, उसमें रहने प्रथममाह्निकम् १०२ तन्निष्ठः इति यावत् । तदुक्तम् ‘मध्यनाडी मध्यसंस्थबिससूत्राभरूपया । ध्यातान्तोमया देव्या तया देवः प्रकाशते ।।’ इति ।। अत एवोक्तं रामस्थ: इति ………………….एकाकी न रमाम्यहम् ।’ इत्याद्युक्त्या रमते तत्तज्जडाजडात्मना विश्ववैचित्र्यात्मना क्रीडति इति राम: परमात्मा, तत्र तिष्ठति तद्रूपतया परिस्फुरति इत्यर्थः । तदुक्तं त्रिशिरोभैरवे ‘सेव्यमानमधोज़ तु प्राणापानोत्थरूढधीः । ऊर्ध्वं त्यक्त्वा तु प्रविशेद्रामस्थोऽत्रात एव च ।।’ तत्रैवागूरणेन भगवत्या ‘राम: किमुच्यते देव योऽत्रस्थः स च कः प्रभो। तस्याभ्यासः कथं नाम ब्रूहि सर्वं महेश्वर ।।’ बाली जो कमलनाल के तन्तु सदृश आकार वाली शक्ति, उसका देश = अन्तव्योम रूप जो एक देश, उसको जाने वाला = अर्थात् तदेकतान होकर तन्निष्ठ हुआ । वही कहा गया ‘मध्यनाड़ी के मध्य में स्थित कमलनाल के तन्तु के समान रूप वाली का ध्यान करने पर अन्तोमरूपा उस देवी (= शक्ति) के द्वारा देव (= शिव) प्रकाशित होते हैं।’ इसीलिये कहा गया-रामस्थ । ‘मैं अकेले रमण करता ।’ इत्यादि उक्ति से, जो रमण करता है = ततज्जड चेतन वाले विश्ववैचित्र्य के साथ क्रीड़ा करता है, वह राम है अर्थात् परमात्मा । उसमें रहता है अर्थात् उस रूप में परिस्फुरण करता है-यह अर्थ है । वही (बात) त्रिशिरोभैरव में कही गयी ‘प्राण और अपान (की गतियों) से (ऊपर) उठा हुआ दृढ़बुद्धि (साधक) प्राण को छोड़कर इसमें (सुषुम्ना में) प्रवेश कर जाता है इसीलिये वह रामस्थ (कहलाता) Anil इस विषय में सहमति के कारण भगवती (पार्वती) के द्वारा ‘हे देव ! राम किसे कहते हैं? जो इसमें रहता है वह कौन है? उसका अभ्यास कैसे किया जाता है? हे महेश्वर ! यह सब बतलाइये ।’ ११० श्रीतन्त्रालोकः इति पृष्टे, भगवता ‘रामस्थं परमेशानि योगं यत्कीर्तितं मया । कथयामि यथातथ्यमभ्यासस्तस्य योगतः ।।’ इत्यन्तेन प्रतिज्ञाय, तत्समाधानं बहुना ग्रन्थेन कृतम् ।। ८६ ।। इह च तदेव ग्रन्थकार: शब्दार्थद्वारेण पठति गतिः स्थानं स्वप्नजाग्रदुन्मेषणनिमेषणे । धावनं प्लवनं चैव आयासः शक्तिवेदनम् ॥ ८७ ॥ बुद्धिभेदास्तथा भावाः संज्ञाः कर्माण्यनेकशः । एष रामो व्यापकोऽत्र शिवः परमकारणम् ॥ ८८ ॥ स्वप्नः विकल्पः, जाग्रत् ज्ञानम्, उन्मेषणम् ईश्वरदशा, निमेषणम् सदाशिव दशा, आयास: ‘अय गतौ’ गत्यर्थो ज्ञानार्थः तेन अय: अयनं ज्ञानं तस्यासः क्षेपो निवृत्तिः–अज्ञानम्-इत्यर्थः । धर्माद्या अष्टौ बुद्धिधर्माः, संज्ञा: यादृच्छिका डित्थादयः, कर्माणि-व्यापारा: । अनेन च गत्यादिना चतुर्दशकेन सकलविश्वस्वीकारः कृतः । यच्चैतद्गत्यादि एष राम:-सकलविश्वावभासन ऐसा पूछे जाने पर भगवान् (शिव) ने ‘ह परमेशानी ! जिस रामस्थ योग की चर्चा मैने की है उसके यथार्थ रूप को मैं कह रहा हूँ । उसका अभ्यास योग से होता है ।’ यहाँ तक के ग्रन्थ से प्रतिज्ञा कर उसका अनेक बार ग्रन्थ के आधार पर समाधान किया है ।। ८६ ॥ यहाँ पर ग्रन्थकार उसी को शब्दार्थ के द्वारा कह रहे है चलना, ठहरना स्वप्न (= विकल्प) जाग्रत (= ज्ञान) उन्मेष (ईश्वरदशा निमेष = सदाशिव धावन और प्लवन, आयास (= अज्ञान) बुद्धिभेद (= धर्माधर्म ज्ञानाज्ञान वैराग्या वैराग्य ऐश्वर्यानैश्वर्य) रूपभाव, संज्ञा (यादृच्छिक शब्द ‘पप्पू’ आदि) तथा अनेक कर्म-ये सब राम (अर्थात् परमेश्वर) ही है । इसीलिए व्यापक शिव ही इस विषय में परम कारण हैं ।। ८७-८८ ।। स्वप्न = विकल्प, जाग्रत् = जागरण, उन्मेषण = ईश्वरदशा, निमेषण = सदाशिव दशा, आयास = अज्ञान । ‘अय् गतौ’ धातु गति अर्थात् ज्ञान अर्थ वाली है । इस प्रकार अय = अयन = ज्ञान, उसका आस = क्षेप (असु क्षेपणे) = निवृत्ति = अज्ञान । (बुद्धिभेद) = धर्म आदि आठ बुद्धिधर्म । संज्ञा = डिस्थ डवित्थ आदि यदृच्छा शब्द । कर्म = व्यापार । इस गति आदि चौदह के द्वारा समस्त विश्व को स्वीकृत किया गया । जो यह गति आदि है वही राम अर्थात् प्रथममाह्निकम् क्रीडापरः परमात्मा परमेश्वरः, अत एवोक्तम्- ‘व्यापकोऽत्र शिवः परमकारणम्’ __ इति, ‘अत्र’ इति–गत्याधुपलक्षिते विश्वस्मिन्, शिवस्यैव हि अयमशेषविश्वात्मा स्फार:- इति भावः । तदुक्तम् ‘विषयेषु च सर्वेषु इन्द्रियार्थेषु च स्थितः । यत्र यत्र निरूप्येत नाशिवं विद्यते क्वचित् ।।’ इति ।। ८७-८८।। कथं चात्र तदैकात्म्यापत्तिलक्षणा स्थितिर्भवति–इत्याह कल्मषक्षीणमनसा स्मृतिमात्रनिरोधनात् । ध्यायते परम ध्येय गमागमपदे स्थितम् ।। ८९ ।। परं शिवं तु व्रजति भैरवाख्यं जपादपि । येन क्षीणं कल्मषं तत्तद्भेदावभासकालुष्यं यस्य तादृशं मनो, मनुते इति __ मनो विमर्शात्मावबोधो यस्य तेन ‘सर्वो विकल्प: स्मृतिः…. इति नीत्या स्मृतिरेव केवला स्मृतिमात्र शरीरमुखहस्ताद्यात्मकं विकल्पनम्, तस्य निरोधनम्-आकाराद्युल्लेखशून्यत्वेन प्रतिहननम्, तदवलम्ब्य, तत्तन्नियता समस्त विश्व के अवभासन रूपी क्रीड़ा में निरत परमात्मा परमेश्वर है । इसीलिये कहा गया—‘व्यापक शिव यहाँ परम कारण है ।’ यहाँ = गति आदि से उपलक्षित विश्व में, यह समस्त विश्व शिव का ही प्रसार या उल्लास है । वही कहा गया ‘समस्त विषयों में और समस्त इन्द्रियों में (वह शिव) स्थित है । जहाँ-जहाँ देखा जाय कोई भी स्थान शिव से रहित नहीं है’ ।। ८७-८८ ।। उस (शिव) से तादात्म्य रूपा स्थिति कैसे होती है- यह कहते हैं (भेदावभास रूप) कल्मष से रहित मन के द्वारा (विकल्प रूप) स्मृति का निरोध करने से परमध्येय का ध्यान किया जाता है । (फलतः ध्याता) गति और स्थिरता के पद में स्थित भैरव नामक परमशिव को प्राप्त होता है जप से भी (उक्त प्राप्ति होती है) ।। ८९-९०- ।। जिसके द्वारा कल्मष = तत्तद्रेदावभासरूप कालुष्य, क्षीण हो गया है जिसका वैसा मन । जो मनन करे वही मन है अर्थात् विमर्शरूप अवबोध है जिसका । इससे ‘समस्त विकल्प ही स्मृति है ।’ इस नीति से स्मृतिमात्र अर्थात् केवल स्मृति-शरीर, मुख, हाथ आदि वाला विकल्प । उसका निरोध = आकार आदि के उल्लेख से शून्य के रूप में ११२ श्रीतन्त्रालोकः कारसङ्कोचाभावात् परमं . ध्येयं शिवलक्षणं परमकारणं ध्यायते स्वात्माभेदेन परामृश्यते । यदुक्तम् ‘ध्यानं या निश्चला बुद्धिर्निराकारा निराश्रया । न तु ध्यानं शरीरस्य मुखहस्तादिकल्पना ।।’ इति । एवंविधो ध्याता, गमो गमनं गतिः, अगमश्च अगति: स्थानम्, ताभ्यामुपलक्षिते पदे समनन्तरोक्ते चतुर्दशविधे आश्रये स्थितम्, अत एव परम् पूर्णम्, अत एव च भैरवाख्यं शिवं व्रजति–तत्समावेशमाप्नोति—इत्यर्थः । न केवलमयं ध्यानादेव शिवं व्रजति यावज्जपादपि इत्युक्तं-जपादपि इति ।। ८९ ।। कोऽसौ जपो नाम ? इत्याशङ्कयाह तत्स्वरूपं जपः प्रोक्तो भावाभावपदच्युतः ॥ ९० ॥ तस्य-शिवस्य, स्वरूपम् परावाक्स्वभावाम् आत्मरूपम् अर्थात् भूयो । परामृश्यमानं जपः, अत एव भावाभावपदच्युतः-पूर्वोक्तनीत्या तन्मध्यस्फुर त्संवित्परामर्शमात्रसार:- इत्यर्थः । तदुक्तम् प्रतिघात, उसको आधार बनाकर, तत्तत् नियत आकार का सङ्कोच न होने से परम ध्येय शिव लक्षण परम कारण का, ध्यान किया जाता है = (उसका) अपने से अभिन्न रूप में परामर्श किया जाता है । जैसा कि कहा गया ‘जो निश्चल निराकार निराश्रय बुद्धि है (वही) ध्यान है न कि शरीर के मुख, हाथ आदि की कल्पना ध्यान है ।’ इस प्रकार का ध्याता । गम = गमन = गति । अगम = अगति = स्थिति । उन दोनों के द्वारा उपलक्षित पद = समनन्तरोक्त चौदह प्रकार के आधार में, स्थित अत एव पर = पूर्ण और इसीलिये भैरव नामक शिव को, जाता है = उनके समावेश को प्राप्त करता है । केवल ध्यान से ही शिव को नहीं प्राप्त करता बल्कि जप से भी (प्राप्त करता है) ।। ८९ ।। यह जप क्या है ?-यह शङ्का कर कहते हैं भाव और अभाव (= प्राण अपान) दोनो पदों (= गतियों) से रहित होकर तत्स्वरूप (= शिवस्वरूप, का परामर्श ही) जप कहा गया उसका = शिव का, स्वरूप = परावाक् स्वभाव वाला आत्मरूप (अर्थात् परावाक् का) बार-बार परामर्श ही जप है । इसीलिये भाव और अभाव के पद से रहित अर्थात् पूर्वोक्त नीति से उस (= भाव अभाव) के बीच स्फुरित होने वाली संवित् का परामर्शमात्र । वही कहा गया ११३ प्रथममाह्निकम् ‘भूयो भूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या । जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृश: ।।’ इति । एवं ग्रामधर्मवृत्तिरेव रामस्थ: इत्युक्तं स्यात् । तदुक्तम्-श्रीत्रिशिरोभैरवे ‘गच्छंस्तिष्ठन्स्वपञ्जाग्रदुन्मिषन्निमिषंस्तथा । धावनं प्लवनं चैव आयास: शक्तिवेदनम् ।। बुद्धिभेदास्तथा भावा: संज्ञाः कर्माण्यनेकशः। एतच्चतुर्दशविधं रामं तु परिकीर्तितम् ।। व्यापितं देवदेवेन शिवेन परमात्मना । सर्वभावान्तरस्थेन अनेकाकारलक्ष्मणा ।। कल्मषक्षीणमनसा स्मृतिमात्रनिरोधनात् । ध्यायते परमं ध्येयं गमागमपदे स्थितम् ।। परं शिवं तु व्रजति भैरवाख्यं जपादपि । तत्स्वरूपं जपः प्रोक्तो भावाभावपदच्युतः ।।’ इति ।। ९० ।। ननु प्रायः सर्वत्रैव ध्यानस्य व्यतिरिक्तसाकारध्येयविषयत्वं जपस्य विकल्पात्मकवाचकवाच्यजप्यनिष्ठत्वं चोक्तम्, इह पुनः स्वात्माभेदेन परामर्श मात्रमेवोभयो रूपम् इति किमेतद् ? इत्याशङ्क्याह तदत्रापि तदीयेन स्वातन्त्र्येणोपकल्पितः । ‘परभाव में जो बार-बार भावना की जाती है वही यहाँ जप है । यह स्वयं नाद है । ऐसा मन्त्रस्वरूप ही जाप्य होता है।’ ___ इस प्रकार ग्रामधर्मवृत्ति वाला (साधक) ही रामस्थ है-ऐसा कहना चाहिए । वही (बात) त्रिशिरो भैरव में कही गयी है ___ ‘गति, स्थिति, शयन, जागरण, उन्मेष, निमेष, धावन, संतरण, आयास, शक्तिवेदन, बुद्धिभेद, भाव, संज्ञा और अनेक कर्म में चौदह प्रकार का राम कहा गया है । यह समस्त भावों के अन्दर विद्यमान, अनेक आकार वाले देवाधिदेव परमात्मा शिव से व्याप्त है । स्मृति का निरोध करने से कालुष्य से रहित मन के द्वारा गमागम पद में स्थित परम ध्येय का ध्यान किया जाता है । जप के द्वारा भी साधक भैरव नामक परम शिव को प्राप्त करता है । भावाभाव पद से ऊपर उठकर उसके स्वरूप का परामर्श ही जप कहा गया है’ ।। ९० ।। प्रश्न है कि प्रायः सर्वत्र ध्यान का विषय ( ध्यान से) भिन्न साकार (वस्तु) होती है, जप विकल्पात्मक वाचक वाच्य रूप जप्य तक सीमित रहता है और यहाँ अपने से अभिन्न रूप में परामर्शमात्र ही दोनों (ध्यान और जप) का रूप है यह कैसे?—यह शङ्का कर कहते हैं इसलिए इस विषय में भी उस (चित्) के स्वातन्त्र्य की अपेक्षा ८त. प्र. ११४ श्रीतन्त्रालोकः दूरासन्नादिको भेदश्चित्स्वातन्त्र्यव्यपेक्षया ॥९१ ॥ इह पराहंपरामर्शमात्रसारत्वात् स्वतन्त्रप्रकाशात्मा परमेश्वर एव परमार्थः इति तत्प्राप्तो उपदेश्यभेदेन तदुपकल्पितमेव उपायानां नानात्वम्, तेन चित्स्वातन्त्र्य प्रधानतया उल्लसित उपाय आसन्नः इत्युच्यते, अन्यथा तु इतर:-इत्याह दूर इति । एवमपि उपेयासन्नतया कस्यचिदेव उपायत्वम् इति नाशक्यम् उपायोपेयभावस्य द्वारद्वारिभावेन वक्ष्यमाणत्वात् ।। ९१ ।। एतदेवोपसंहरति एवं स्वातन्त्र्यपूर्णत्वादतिदुर्घटकार्ययम् । केन नाम न रूपेण भासते परमेश्वरः॥ ९२ ॥ रूपेण इति तत्तत्स्वशक्त्यात्मना-इत्यर्थः ।। ९२ ।। अत एवाह निरावरणमाभाति भात्यावृतनिजात्मकः । आवृतानावृतो भाति बहुधा भेदसङ्गमात् ॥ ९३ ॥ उसी (परमतत्त्व) के स्वातन्त्र्य के द्वारा कल्पित दूर और आसन्न आदि (उपायों के अनेक) भेद हैं ।। -९१ ।। यहाँ पर अहंपरामर्शमात्र रूप होने से स्वतन्त्र प्रकाश रूप परमेश्वर ही परमार्थ है इसलिये उसकी प्राप्ति के विषय में उपदेश्य के भेद से उपाय के अनेक प्रकार कल्पित होते हैं । इस कारण जो उपाय चित् के स्वातन्त्र्य को प्रधानता देता है उसे आसन्न उपाय कहते हैं । इसके विपरीत उपाय दूरगामी माने जाते हैं । इसमें भी उपेय के आसन्न होने से किसी-किसी को ही उपाय मानना पड़ता है ऐसी शङ्का नही करनी चाहिये । क्योंकि उपाय उपेय भाव में द्वारा-द्वारी भाव रहता है ।। ९१ ।। इसी का उपसंहार करते है ____ इस प्रकार स्वातन्त्र्यपूर्ण होने से अत्यन्त दुर्घटकारी यह परमेश्वर किस रूप में भासित नहीं होता? (अर्थात् सभी रूपों में भासित होता है) ।। ९२ ।। रूपेण का अर्थ है-भिन्न-भिन्न अपनी शक्ति वाले (रूप) के द्वारा ।। ९२ ।। इसीलिये कहते है वह आवरण रहित (= शुद्धप्रकाशमय) होकर भासित होता है । अपने को आवृत्ति करके भी भासित होता है आवृत और अनावृत होकर भी ज्ञात होता है । इस प्रकार अनेक रूप से (वह आभासितप्रथममाह्निकम् इति शक्तित्रयं नाथे स्वातन्त्र्यापरनामकम् । इच्छादिभिरभिख्याभिर्गुरुभिः प्रकटीकृतम् ॥ ९४ ॥ निरावरणम् इति-शुद्धप्रकाशमयत्वात्, आवृत इति-भेदकालुष्योदयात्, आवृतानावृतः इति-शुद्धज्ञानमयत्वेऽपि भेदकालुष्यासूत्रणात्, अत एव परापरपरापरत्वम, बहधा इति—एषणीयादिनानात्वात अनेकप्रकारम—इत्यर्थः । निरावरणत्वेऽपि हि निषेध्यमानत्वाद् भेदस्य वासनामात्रेणावस्थानम् । इति शब्द: स्वरूपपरामर्शकः, तेन एतदेव अवभासमानं निरावरणत्वादि परादिरूपं शक्तित्रयं गुरुभिः एतच्छास्त्रावतारकैः, इच्छादिसंज्ञाभिः परमेश्वरविषयतया उन्मीलितमपि स्वातन्त्र्यशक्त्यभिधानमेव इति ‘बहुशक्तित्वमप्यस्य तच्छक्त्यैवावियुक्तता’ इति निर्वाहितम् ।। ९३-९४ ।। बहुशक्तित्वमेव च एतदभिधायकानां प्रवृत्तिनिमित्तम्-इत्याह देवो ह्यन्वर्थशास्त्रोक्तैः शब्दैः समुपदिश्यते। महाभैरवदेवोऽयं पतिर्यः परमः शिवः ॥ ९५ ॥ अन्वथै:-व्युत्पन्नः निरुक्तैः, शास्त्रोक्तैः सामयिकैः ।। ९५ ।। होता है) । इस प्रकार उस परमात्मा में स्वातन्त्र्य नाम वाली जो तीन शक्तियाँ, (पर, परापर और अपर) हैं उसे हमारे गुरुओं के द्वारा इच्छा आदि (= इच्छा-ज्ञान-क्रिया) नाम से प्रकट किया गया है ।। ९३-९४ ।। ___ निरावरण इसलिये है कि वह शुद्ध प्रकाशमय है । आवृत इसलिये कि भेद रूप कालुष्य का उदय होता है । आवृतानावृत इसलिये कि शुद्ध ज्ञानमय होने पर भी भेदरूपी मलिनता रहती ही है । इसलिये पर, अपर और परापर (तीन रूपों में भासित होता है) बहुधा = एषणीय आदि के अनेक होने से अनेक प्रकार का । निरावरण होने पर (किसी प्रकार के कालुष्य का) निषेध होने पर भी वासना मात्र से भेद रहता है । इति शब्द (शिव) स्वरूप को बतलाता है । इसलिये निरावरणत्व आदि ही (उसका) अवभास है । उसका जो पर आदि रूप है वही इस शास्त्र के अवतारक गुरुओं के द्वारा इच्छा आदि (= ज्ञान किया) नाम से (कहे गए हैं) परमेश्वर के विषय के रूप में उन्मीलित भी यह स्वातन्त्र्य शक्ति ही कही जाती है । ‘इस (परमेश्वर) की अनन्त शक्तियाँ है और उस शक्ति से अवियुक्त होना (उसका स्वभाव) है’ ।। ९३-९४ ।। ___ इस (शिव) के अभिधायक (शास्त्रों) का प्रवृत्तिनिमित्त भी बहुशक्तित्व ही है यह कहते हैं यहाँ भैरवदेव जो कि पति एवं परमशिव हैं वे (= देव) अन्वर्थ शास्त्रोक्त शब्दों के द्वारा कहे जाते हैं ।। ९५ ।। अन्वय = व्युत्पन्न निरुक्तशास्त्र प्रतिपादित । शास्त्रोक्त = सामयिक ।। ९५ ।। ११६ श्रीतन्त्रालोकः तदेवाह विश्वं बिभर्ति पूरणधारणयोगेन तेन च श्रियते । सविमर्शतया रवरूपतश्च संसारभीरुहितकृच्च ॥ ९६ ॥ संसारभीतिजनिताद्वात्परामर्शतोऽपि हृदि जातः । प्रकटीभूतं भवभयविमर्शनं शक्तिपाततो येन ॥ ९७ ॥ नक्षत्रप्रेरककालतत्त्वसंशोषकारिणो ये च । कालग्राससमाधानरसिकमनःसु तेषु च प्रकटः ।। ९८ ॥ सङ्कोचिपशुजनभिये यासां रवणं स्वकरणदेवीनाम् । अन्तर्बहिश्चतुर्विधखेचर्यादिकगणस्यापि ॥९९ ॥ तस्य स्वामी संसारवृत्तिविघटनमहाभीमः । बिभर्ति-धारयति पोषयति च स्वात्मभित्तिसंलग्नत्वेन तदुल्लासनात् । तेन इति विश्वेन, भियते इति धार्यते पोष्यते च तस्य विश्वमयत्वेनैव सर्वत्र वही कहते हैं (यहाँ भैरव शब्द की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है-) पूरण और धारण के द्वारा जो विश्व का भरण करता है और उस (= विश्व) के द्वारा जो सेवित (= भरित, धृत और पुष्ट) होता है (वह भैरव है) । स्वरूप (= शब्द व्यापार) के द्वारा (संसार का भरण एवं रवण करने से भैरव हैं) । संसार में वर्तमान् भीरु (पशुओं) का हित करने से (भैरव) हैं ।। ९६ ।। संसार की भीति से जनित जो रव (अर्थात् भगवविषयक आक्रन्द) अथवा परामर्श, उसके द्वारा जो हृदय में उत्पन्न हो (वह भैरव है) । शक्तिपात के माध्यम से जिसनें भवमय विमर्श को प्रकट कर दिया है (अर्थात् संसार से विमुख बना दिया है वह भैरव है) ।। ९७ ।। भ (= नक्षत्र) के प्रेरक भेर अर्थात् काल तत्त्व का शोषण करने वाले (= भैरव अर्थात् कालग्राससमाधि लगाने वाले योगी जन) उनका स्वामी = उनके मन में प्रकट होने से (भैरव कहलाते हैं) ।। ९८ ।। सङ्कोची पशु लोगों के भय के लिए जिन अपने करण देवियों का रवण (-वे देवियाँ भीरव हैं अर्थात्) भीतर बाहर वर्तमान चार प्रकार का खेचरी आदि गण (= खेचरी, गोचरी, दिक्चरी और भूचरी) उसका स्वामी (अर्थात्) संसारवृत्ति के विघटन में महाबलशाली ।। ९९-१००- ।। भरण करता है = आत्मभित्ति से संलग्न होने से उस (विश्व) को उल्लसित करने के कारण धारण या पोषण करता है । उससे = विश्व से (इस विश्व का प्रथममाह्निकम् ११७ स्फुरणात् । रवरूपतः इति शब्दनस्वाभाव्यात्, तेन भरणाद्रवणाच्च भैरवः इत्ययं निरुक्तः । भीरूणाम् अयं हितकृत् इति भैरवः, भीरुत्वे च निमित्तं संसारः तेन संसारिणामभयप्रद:-इत्यर्थः । भयं भी: संसारत्रासः, तया जनितो योऽसौ रवः भगवद्विषय आक्रन्दः परामों वा ततो जातः इति भैरवः, तेनाक्रन्दवतां परामर्शवतां च हृदि परमार्थभूमौ स्फुरितः इति यावत् । भवाद्यं भीस्तस्य रवो विवेचनं विमर्शनं तस्य शक्तिपातमखेन अयं कारणम इति भैरव: संसारवैमुख्येऽपि अयमेव निमित्तम्-इति भावः । भानि-नक्षत्राणि, ईरयति प्रेरयति इति भेर: काल: तस्य तत्त्वं क्षणाद्यात्मकं स्वरूपम्, तस्य सम्यङ् नि:शेषेण शोषम् अभिभवं कुर्वन्ति इति कालं वयन्ति इति भेरवा: कालग्राससमाधिरूढावधाना योगिनः, तेषु अयं स्वामी तत्त्वेन प्रकट: स्फुरित: इति भैरव: । सङ्कोचिनो भेदप्रथामयस्य पशुजनस्य भिये तत्तत्सुखदुःखाद्युपजनन त्रासाय रवणं शब्दराशिसमुत्थकादिकलाविमर्शमयो रवो यासां ताः स्वकरणदेव्यः इन्द्रियशक्तयः, तथा अन्तर्बहिः प्रमातृप्रमेयाद्यात्मा चतुर्विधः चतुष्प्रकार: खेचर्यादिको गण: खेचरी-गोचरी-दिकचरी-भूचर्यो भीरवास्तासामयं स्वामी भैग्वः । महाभीम इति भीषणः, तेनात्र भैरवशब्दः, सङ्केतित:- इति भावः ।। ९६-९९ ।। च उसके द्वारा) भरण अर्थात् धारण और पोषण किया जाता है क्योंकि वह विश्वमय होने से सर्वत्र स्फूरण करता है । स्वरूप होने से = शब्दन स्वभाव वाला होने के कारण । इस प्रकार भरण और रवण करने से (यह शिव) भैरव कहलाता है । यह भययुक्त (साधकों) का हितकारी है इसलिये भैरव है । भीरुत्व में कारण है संसार । इसलिये संसारियों को अभय देने वाला । भय = भी = संसार से त्रास । उससे उत्पन्न जो रख = भगवद्विषयक आर्तनाद अथवा परामर्श उससे उत्पन्न भैरव । तात्पर्य यह है कि आक्रन्द वालों या परामर्श वालों के हृदय में = परमार्थ भूमि में स्फुरित होने वाला । भव से भय को भी (कहते हैं) उसका रव = विवेचन-विमर्श उसका शक्तिपात के द्वारा कारण होने से यह भैरव है । संसार से विमुखता होने में भी यही कारण है । जो भ = नक्षत्र को ईरयति = प्रेरणा देता है वह भेर = काल । उसका तत्त्व = क्षण आदि वाला स्वरूप, उसका सम्यक् = पूर्णरूप से, शोषण = अभिभव करते हैं या जो काल को प्राप्त होते है वे भेरव अर्थात् कालग्रास की समाधि में रूढ़ ध्यान वाले योगीजन, उनमें यह स्वामी तत्त्व के रूप में प्रकट या स्फुरित होता है इसलिये भैरव । सङ्कोची = भेदप्रथा वाले पशुजों के भय = तत्तत् सुख दुःख आदि की उत्पत्ति रूप त्रास, के लिये रवण = शब्दराशि से उत्पन्न ‘क’ आदि कला के विमर्श से पूर्ण रव है जिन (करणदेवियों) का वे अपनी करणदेवियाँ इन्द्रियों की शक्तियाँ तथा भीतर एवं बाहर प्रमाता प्रमेय आदि चतुर्विध = चार प्रकार वाला खेचरी आदि समूह = खेचरी - गोचरी - दिकचरी - भूचरी ही, भीरव है, उनका यह स्वामी भैरव है । महाभीम = भयङ्कर । इससे यहाँ भैरव शब्द का सङ्केत है ।। ९६-९९ ।। ११८ श्रीतन्त्रालोकः एतदेवोपसंहरति ___ भैरव इति गुरुभिरिमैरन्वथैः संस्तुतः शास्त्रे ॥ १०० ॥ गुरुभिः तत्तच्छास्त्रावतारकैः, इमैः एभिः समनन्तरोक्तैः अन्वथैः अर्थानुगतै चिकैः, संस्तुत: परिचितः शास्त्रे विशेषानुपादानात् सर्वत्रैव अर्थादुक्तः । अथ च अन्वथैः सम्यक् सकलजगद्भरणादिसामर्थ्यप्रतिपादनद्वारेण स्तुतः इत्यर्थः, यदुक्तम् ‘भ्रियात्सर्वं रवयति सर्वदो व्यापकोऽखिले । इति भैरवशब्दस्य सतततोच्चारणाच्छिव: ।।’ इति ।। तथा भरणाद्भरितस्थितिः ।’ इति । इमैः इति चिन्त्यम् । गुरुगदितैरिति तु श्रेष्ठ: पाठः ।। १०० ।। हेयेत्यादिना देवशब्दस्य निर्वचनमाह हेयोपादेयकथाविरहे स्वानन्दघनतयोच्छलनम् । इसी का उपसंहार करते है इन अन्वर्थों से हमारे गुरुओं के द्वारा शास्त्र में (वह परमतत्त्व) भैरव कहा गया है ।। -१०० ।। गुरुओं = तत्तत् शास्त्रों के प्रणेताओं के द्वारा इन = पूर्वोक्त, अन्वर्थ = अर्थानुगत वाचक शब्दों के द्वारा, संस्तुत = परिचित, शास्त्र में विशेष का उपादान न होने से सब (शास्त्रों) में यह बात अर्थात् उक्त हो गयी । और भी-अन्वर्थ = पूर्णरूपेण समस्त संसार के भरण आदि समार्थ्य के प्रतिपादन द्वारा स्तुत । जैसा कि कहा गया ‘सबका भरण करता है, सदा शब्दन करता है , सम्पूर्ण (विश्व) में व्याप्त है इस प्रकार ‘भैरव’ शब्द का सतत् उच्चारण करने से (साधक साक्षात्) शिव हो जाता है । तथा ‘… (वह) भरण करता है इसलिये वह पूर्णता वाला है ।’ ‘इमैः’ यह पाठ (अशुद्ध होने से) चिन्तनीय है । (उसके स्थान पर) ‘गुरुगदितैः’ यह पाठ श्रेष्ठ है ।। १०० ।। ‘हेय’ इत्यादि के द्वारा देव शब्द का निर्वचन करते है हेय एवं उपादेय की कथा से रहित केवल अत्यधिक आनन्द के प्रथममाह्निकम् ११९ क्रीडा सर्वोत्कर्षेण वर्तनेच्छा तथा स्वतन्त्रत्वम् ॥१०१॥ व्यवहरणमभिन्नेऽपि स्वात्मनि भेदेन सञ्जल्पः । निखिलावभासनाच्च द्योतनमस्य स्तुतिर्यतः सकलम्॥१०२॥ तत्प्रवणमात्मलाभात्प्रभृति समस्तेऽपि कर्तव्ये । बोधात्मकः समस्तक्रियामयो दृक्क्रियागुणश्च गतिः॥ १०३ ॥ स्वस्वातन्त्र्यमाहात्म्यात् शिवादिक्षित्यन्ताशेषविश्वात्मनोल्लासनमेव अस्य क्रीडा सर्वोत्कर्षेण वर्तनेच्छा, तथा स्वतन्त्रत्वं व्यवहरणम् इति–अभिन्नेऽपि स्वात्मनि भेदेन सञ्जल्पः, क्रीडेति दीव्यति क्रीडति इति देवः । न चात्र क्रीडातिरिक्त निमित्तम् इत्याह-हेय इत्यादिना । नहि किञ्चिदुपादातुं हातुं वा जगत्सर्गादौ ईश्वरः प्रवर्तते, अत एव स्वानन्दघनत्वमेवात्र हेतुरुपात्तः, अत एव चास्य स्वतन्त्रत्वमेव, सर्वोत्कर्षेण वर्तनेच्छा विजिगीषुता, विजिगीषोर्हि कथं नु नाम सर्वानेवाभिभूय अहं वर्ते इतीयमेव इच्छा भवति । तथाशब्द: पूर्वापेक्षया समुञ्चये तेन दीव्यति विजिगीषते इति देवः । देवशब्दस्य सर्वस्मात् अभिन्नेऽपि स्वात्मनि कारण उच्छलत्ता ही क्रीडा है (इसलिए दीव्यति क्रीडति इति देव: ऐसी व्युत्पत्ति करने से वे देव हैं) सबसे बढ़कर रहने की इच्छा तथा स्वतन्त्र व्यवहार, स्वयं अभिन्न होते हुए भी भेदपूर्वक (अहं आत्मानं जानामि ऐसा) सञ्जल्प, समस्त चराचरात्मक जगत् का अवभासन करने से इस (देव) का द्योतन, स्वरूपलाभ से प्रारम्भ कर सभी कर्त्तव्यों में सम्पूर्ण विनम्रता उसकी स्तुति, बोधात्मक, समस्त क्रियाओं वाला, दृक् (= दर्शन = ज्ञान) एवं क्रियारूप गुणों वाला, (और चूँकि उक्त सभी गुणों से युक्त है अत:) गति (सर्वज्ञ) और सर्वव्यापक हैं ।। १०१-१०३ ।। अपने स्वातन्त्र्य की महिमा से शिव से लेकर पृथिवीपर्यन्त समस्त विश्व के रूप में उल्लासन ही इसकी क्रीड़ा अर्थात् सबसे बढ़कर रहने की इच्छा तथा स्वतन्त्र व्यवहार अर्थात् अभिन्न अपने में भेद का प्रसार, जो क्रीड़ा करे वह देव है (क्योंकि दिव् धातु का अर्थ क्रीड़ा होता है ।) क्रीड़ा के अतिरिक्त (इस संसार का) कोई दूसरा कारण नहीं हैं यह कहते हैं हेय इत्यादि । जगत् की सृष्टि के प्रारम्भ में ईश्वर कुछ का ग्रहण या त्याग करने के लिये प्रवृत्त नहीं होता । इसलिये इस (सृष्टि) के विषय में (उसका) स्वानन्दघन होना ही कारण बतलाया गया । और इसीलिये उसकी स्वतन्त्रता भी है । सबसे बढ़कर रहने की इच्छा ही विजिगीषुता होती है । विजिगीषु के हृदय में—‘मैं सबको अभिभूत कर वर्तमान रहूँ’ यह इच्छा क्यों उदित होती है (इस पर विचार करना चाहिये) । ‘तथा’ शब्द पूर्व की अपेक्षा समुच्चय (अर्थ) में प्रयुक्त हुआ है । इससे दीव्यति अर्थात् विजिगीषति इति देव (यह देवशब्द की व्युत्पत्ति है) देव शब्द का अर्थ है-सबसे अभिन्न भी स्वात्मा में १२० श्रीतन्त्रालोकः भेदेन ‘अहमिदं जानामि’ इति योऽयमस्य सञ्जल्पः तद्व्यवहरणम् अपारमार्थिकेन रूपेण स्फुरणम्— इत्यर्थः, तेन दीव्यति व्यवहरति इति देवः । निखिलस्य प्रमातृप्रमेयात्मनो निखिले चास्य यत् अवभासनं तत् द्योतनं, तेन दीव्यति द्योतते द्योतयति इति वा देवः । यतः ‘सकलमिदं जगत् स्वरूपलाभात्प्रभृति समस्तेतिकर्तव्यतायां तदायत्तप्रवृत्ति इत्यस्य स्तुतिः । सर्वे हि शिवमन्त्रमहेश्वरा दयः तत्परतन्त्रवृत्तित्वादुन्मुखतया प्रहा एवइति भावः । अस्य इति कर्मणि षष्ठी, तेन दीव्यते स्तूयते इति देव: । समस्ता पूर्णा विमर्शलक्षणा क्रिया प्रकृता यस्यासौ, दृक्क्रिये गुण:-शक्तिर्यस्यासौ, यतोऽयमेवंविधः ततोऽस्य गति: विशेषानुपादानात् सर्वत्र ज्ञानं प्रसरणं च इति सर्वज्ञः सर्वव्यापकश्च इति सिद्धम्, तेन दीव्यति, जानाति, प्रसरति च इति वा देव: ।। १०१-१०३ ।। एतदेवोपसंहरति इति निर्वचनैः शिवतनुशास्त्रे गुरुभिः स्मृतो देवः । गुरुभिः इति बृहस्पतिपादैः । स्मृत इति “एवं वामो देव: स दीव्यति क्रीडति प्रभुर्यस्मात् ।’ भेदपूर्वक ‘मैं इसे जानता हूँ’ ऐसा जो इसका सञ्जल्प उसका व्यवहार अर्थात् अपारमार्थिक रूप से स्फूरण । इसलिये (देव शब्द की एक व्युत्पत्ति और है) दीव्यति व्यवहरति इति देवः । समस्त प्रमाता और प्रमेय का निखिल में ही अवभासन अर्थात् उसका प्रकाशन (भी देव शब्द का अर्थ है) इससे दीव्यति = द्योतते अथवा द्योतयति इति देव:- यह विग्रह भी है । यह समस्त जगत् अपनी सत्ता में आने से लेकर समस्त कार्यों के लिये उसके अधीन होकर चलता है-यह इसकी स्तुति है । शिव मन्त्रमहेश्वर आदि सब उसके अधीन कार्यकारी होने से उसकी ओर उन्मुख होकर नत होते है-यह भाव है । ‘अस्य’ यहाँ कर्म में षष्ठी है । इस प्रकार दीव्यति स्तूयति इति देवः (ऐसी भी व्याख्या है । समस्त = पूर्ण, विमर्शलक्षण क्रिया है जिसकी वह (समस्त क्रियामय है) । दृक् और क्रिया हैं गुण अर्थात् शक्ति जिसकी वह (दृक्रियागुण है)। चूँकि वह इस प्रकार का है इसलिये इसकी गति—विशेष का उपादान न होने से सर्वत्र ज्ञान और प्रसरण है जिसका वह सर्वज्ञ और सर्वव्यापक है-यह सिद्ध हो गया । इसलिये दीव्यति जानाति प्रसरति च वा इति देवः (ऐसा विग्रह भी समझना) चाहिये ।। १०१-१०३ ।। इसी का उपसंहार करते हैं उपर्युक्त व्याख्याओं के द्वारा (बृहस्पति) गुरु ने शिवतनुशास्त्र में देव (= परमेश्वर) का वर्णन किया है ।। १०३- ।। ‘इस प्रकार वह वाम (= सुन्दर गुरु = वृहस्पति कहा गया-) देव प्रभु जिस कारण क्रीड़ा करते हैं’ प्रथममाह्निकम् इत्यादिना ‘अविहतगति: स यस्माद्देवस्तस्मात्सदाशिवो गीतः ।’ इत्यन्तेन ग्रन्थेन व्यावर्णित:-इत्यर्थः ।। शासनेत्यादिना पतिशिवशब्दयोर्निर्वचनमाह शासनरोधनपालनपाचनयोगात्स सर्वमुपकुरुते । तेन पतिः श्रेयोमय एव शिवो नाशिवं किमपि तत्र ॥१०४ ॥ शासनम् शास्त्रोपदेशादिना बोध्यानां बोधनम् । रोधनम् संसारिणां विलय शक्त्या आघ्रातत्वात् तत्रैवावस्थापनम् । पालनम् यथास्थितस्य विश्ववैचित्र्यस्य नियतनियन्त्रणया तथैव स्थापनात्मकं संरक्षणम् । पाचनम् कर्मणां कर्मिण: प्रति फलदानौन्मुख्यजननम् । उक्तं हि ‘स्वापेऽप्यास्ते बोधयन्बोधयोग्यान् रोध्यान रुन्धन्पाचयन्कर्मिकर्म । मायाशक्तीर्व्यक्तियोग्या: प्रकुर्वन् सर्वं पश्यन् यद्यथावस्तुजातम् ।।’ इति । इत्यादि से प्रारम्भ कर ‘चूँकि वह देव अप्रतिहत गति वाला है इसलिये सदाशिव कहा गया है ।’ यहाँ तक के ग्रन्थ से विशेषरूप से वर्णित है । शासन इत्यादि के द्वारा ‘पति’ एवं शिव शब्दों का निर्वचन करते हैं ___ शासन (= शास्त्रोपदेश आदि के द्वारा लोगों का) उद्बोधन, रोधन अपनी निग्रहशक्ति के द्वारा (= संसारियों का संसार में) रक्षण, (पुनः उस विश्व का) पालन, (कर्मशील जीवों के कर्मों का) फलदान आदि करने के कारण वह सबका उपकार करते हैं इसलिए वे पति हैं । श्रेयोमय होने के कारण वे शिव हैं। उनमें लेशमात्र भी अशिव नहीं है ।। १०४ ।। शासन = शास्त्रोपदेश आदि के द्वारा बोध्य (शिष्य या साधक) को बोध कराना । रोधन = विलय शक्ति से संस्पृष्ट होने के कारण उसी (= संसार) में अवस्थापन । पालन = यथास्थित विश्ववैचित्र्य का निश्चित नियन्त्रण के द्वारा उसी रूप में स्थापना रूप संरक्षण । पाचन = कर्म करने वालों को (उनके) कर्मों को फल देने की उन्मुखता को पैदा करना । कहा भी गया है ‘(वह) मोहनिन्द्रा में भी बोध के योग्य साधकों को उद्बुद्ध करता है । रोध के १२२ श्रीतन्त्रालोकः तेन इति–रक्षणार्थपर्यवसायिनोऽपि पतिशब्दस्य शासनादिकारकत्वेन हेतुना -इत्यर्थः । अत एव पाति रक्षति इति पति: । श्रेयोमयः पराद्वयस्वभावत्वात् । अशिवम् इति द्वैतम् ।। १०४ ।। ननु एवमपि किं विशेषणयोगेन ? इत्याशङ्कयाह ईदृग्रूपं कियदपि रुद्रोपेन्द्रादिषु स्फुरेद्येन । तेनावच्छेदनुदे परममहत्पदविशेषणमुपात्तम् ॥ १०५ ॥ ईदृक् इति— भैरवादिशब्देष्वन्वर्थगत्या दर्शितम् । कियत् इति–किञ्चिदेव, न तु सर्वम्, एतत् हि अंशांशिकया सर्वत्रैव सम्भवेत्-इति भावः । अत एव अन्यव्यवच्छेदेन सर्वातिशयप्रतिपदनार्थं परममहत्पदलक्षणं विशेषणमुक्तम् ।।१०५।। ननु अज्ञानं संसृतौ निमित्तं, ज्ञानं च मोक्षे, स्वस्वरूपाख्यातिश्चाज्ञानम्, तत्ख्यातिश्च ज्ञानम्, स्वात्मनश्च स्वरूपं परः प्रकाश:, स एव च स्वं रूपं स्वेच्छया प्रच्छाद्य विश्वरूपतामवभासयेत् । एवमपि तदधिगमे तच्छक्तिरेवोपायो योग्य का रोधन करते हुए कर्म करने वालों को कर्मो का फल देता है । माया की शक्तियों को अभिव्यक्ति के योग्य बनाकर जो वस्तुसमूह जैसा है उसको वैसा देखता रहता है।’ तेन’ का प्रयोग हेतु अर्थ में है । रक्षण अर्थ को बतलाने वाले पति शब्द का अर्थ शासन आदि करने वाला भी होता है-इस कारण । इसीलिये (पति शब्द की व्युत्पत्ति है)-पाति = रक्षति इति पतिः । पर अद्वय स्वभाव वाला होने के कारण वह श्रेयोमय है । अशिवम् का अर्थ है-द्वैत ।। १०४ ।। ___ प्रश्न है कि ऐसे (तत्त्व) के लिये विशेषण की क्या आवश्यकता—यह शङ्का कर कहते हैं चूँकि (उस शिव का) ऐसा रूप रुद्र उपेन्द्र आदि में स्फुरित होता है इसलिए अवच्छेद को हटाने के लिए परममहत् पद विशेषण के रूप में दिया गया है ।। १०५ ।। ऐसा = भैरव आदि शब्दों में अन्वर्थ के द्वारा दिखाया गया । कितना = थोड़ा सा ही न कि सब । अंशअंशी रूप में यह सर्वत्र सम्भव है । इसीलिये अन्य के व्यवच्छेद के द्वारा सर्वातिशयत्व का प्रतिपादन करने के लिय परम महत् पदवाला विशेषण कहा गया ।। १०५ ।। प्रश्न है कि अज्ञान संसार का कारण है और ज्ञान मोक्ष का । अपने स्वरूप का भान न होना अज्ञान है और उसका भान होना ज्ञान । अपना स्वरूप परम प्रकाश है और वही अपने रूप को अपनी इच्छा से आच्छादित कर विश्वरूपता का अवभासन करता है । ऐसा होने पर भी उस (पर प्रकाश रूप शिव) को जानने के प्रथममाह्निकम् १२३ येन स्वरूपख्यातिर्भवेत्, इयदेव च ज्ञातव्यम् यत्सर्वेषामेव शास्त्राणां प्रतिपाद्यं तच्च इह उक्तप्रायम् इत्यत एव विरन्तव्यम् ? इत्याशङ्कयाह इति यज्ज्ञेयसतत्त्वं दर्श्यते तच्छिवाज्ञया । मया स्वसंवित्सत्तर्कपतिशास्त्रत्रिकक्रमात् ॥ १०६ ॥ ‘इत्युपोद्धात:’ । इति–उक्तेन प्रकारेण यत् ज्ञेयस्य बन्धमोक्षादेः शास्त्रान्तर दृष्टत्वात् सतत्त्वम् पारमार्थिक रूपम् अर्थादिह संक्षेपेण उट्टङ्कितम्, तन्मया शिवाज्ञया स्वसंविदादि अवलम्ब्य च दर्शाते विस्तरेण उच्यते-इत्यर्थः । शिवोऽत्र गुरुः । ‘यो गुरुः स शिव: प्रोक्तो य: शिव: स गुरुः स्मृतः । उभयोरन्तरं नास्ति गुरोरपि शिवस्य च ।।’ इति । नहि अत्र तदादेशमन्तरेण अधिकार एव भवेत् इति भावः । स्वसंवित् स्वानुभव: । सत्तों युक्ति: । पतिशास्त्रम् भेदप्रधानं शैवम् । त्रिकम् परादिशक्ति त्रयाभिधायकं शास्त्रम् । क्रम: चतुष्टयार्थः । समाहारेऽयं द्वन्द्वः । इह पर्वमेव स्वानुभवेन युक्त्या सामान्यागमेन विशेषागमेन च सिद्धमुपदिश्यते इत्यागमः । लिये उसकी शक्ति ही उपाय है जिससे स्वरूप का भान होता है । इतना अवश्य जानना चाहिये कि जो सभी शास्त्रों का प्रतिपाद्य है वह यहाँ प्राय: कह दिया गया है इसलिये यहीं पर विराम कर लेना चाहिये?—यह शङ्का कर कहते है इस प्रकार का जो ज्ञेय तत्त्व है (जिसकी संक्षिप्त सूचना इस प्रस्ताव में की गई), अपनी संवित् सत्तर्क, पतिशास्त्र एवं त्रिक इन चारों का आलम्बन कर परमशिव (= गुरु) की आज्ञा से मेरे द्वारा वह (= ज्ञेय तत्त्व विस्तारपूर्वक) प्रतिपादित किया जा रहा है ।। १०६ ।। _____ इति अर्थात् उक्त प्रकार से जो ज्ञेय का = बन्ध मोक्ष आदि का, दूसरे शास्त्रों में दृष्ट होने से, सतत्त्व = पारमार्थिक रूप है अर्थात् यहाँ (= पूर्वोक्त ग्रन्थ में) संक्षेप में कहा गया वह शिव की आज्ञा से मेरे द्वारा अपनी संविद् आदि के आधार पर दिखलाया जा रहा है = विस्तारपूर्वक कहा जा रहा है । यहाँ शिव का अर्थ है-गुरु । ___ ‘जो गुरु हैं वह शिव कहे गये हैं और जो शिव हैं वह गुरु । गुरु और शिव दोनों में कोई अन्तर नहीं है ।’ उस (गुरु) के आदेश के बिना इस (शास्त्रवर्णन) में अधिकार ही नहीं होता । स्वसंविद् = अपना अनुभव । सत्तर्क = युक्ति । पतिशास्त्र = भेदप्रधान शैवशास्त्र । त्रिक = परा (अपरा और) परापरा इन तीन शक्तियों का वर्णन करने वाला शास्त्र । क्रम = चारो (= अनुभव, युक्ति, पतिशास्त्र और त्रिक) अर्थों वाला, यहाँ (= स्वसंवित् सत्तर्क पतिशास्त्र त्रिक इस स्थल में) द्वन्द समाहार अर्थ में है । यहाँ सब १२४ श्रीतन्त्रालोकः उपोद्धात इति–उप आशु संक्षेपेण ऊर्ध्वमादौ हन्यते टंक्यते दीनार इव राजाभिधानं शास्त्रार्थो यस्मिन् स तथा ।। १०६ ।। तदेवं प्रतिज्ञाय शास्त्रार्थगर्भीकारेण सम्प्रति अवतारयितुमाह तस्य शक्तय एवैतास्तिस्रो भान्ति परादिकाः । सष्टौ स्थितौ लये तर्ये तेनैता द्वादशोदिताः ॥ १०७ ।। तस्य परमेश्वरस्य भैरवादिशब्दाभिधेयस्य, एता: निखिलशक्त्यन्तर गर्भीकारेण प्रधानतया प्रतिपादिता: परादिकास्तिस्रः शक्तयः, सृष्टी, स्थितौ, लये. संहारे, तुर्ये, अनाख्ये च भान्ति सर्वसर्वात्मकेन रूपेण स्फुरन्ति इत्येकैकस्याः चातूरूप्येण श्रीसृष्टिकाल्याद्यात्मकतया द्वादशधोदय इति वाक्यार्थः । तदुक्तम् ‘धाम्नां त्रयाणामप्येषां सृष्ट्यादिक्रमयोगतः । भवेच्चतुर्धावस्थानमेवं द्वादशधोदितः ।। स्वसंवित्परमादित्यः प्रकाशवपुरव्ययः ।’ इति ।। १०७ ।। ननु एक एव परप्रकाशात्मको भैरवादिशब्दव्यपदेश्य: परमेश्वरः समस्ति, कुछ अपने अनुभव, युक्ति, सामान्यागम और विशष आगम के द्वारा सिद्ध का ही उपदेश किया जा रहा है । उपोद्घात का अर्थ है-उप = शोघ्र संक्षेप में, उत् = ऊपर पहले, घात = मारना उभारना । जैसे दीनार आदि मुद्राओं में राजा का आदेश आदि उभारा जाता है वैसे इस पूर्वोक्त ग्रन्थ में शास्त्र का प्रतिपाद्य उट्टङ्कित है ।। १०६ ।। ___ इस प्रकार प्रतिज्ञा कर शास्त्र-विषयक रहस्य को अब बतलाने के लिये कहते उस (परमेश्वर) की ये पर आदि तीन शक्तियाँ (अन्य शक्तियों को अपने में लीन करती हुई) आभासित होती हैं । (चूँकि ये) सृष्टि स्थिति लय (अथवा जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) एवं तुरीय (= अनाख्या) दशाओं में भासित होती है इसलिए ये बारह कही गई है ।। १०७ ।। उसका = भैरव आदि शब्दों के अभिधेय परमेश्वर का, ये = अन्य समस्त शक्तियों को अपने अन्दर समाहित कर प्रधानरूप से प्रतिपादित परा आदि तीन शक्तियाँ, सृष्टि, स्थिति, लय अर्थात् संहार, चतुर्थ अर्थात् अनाख्या दशाओं में, भासित होती है = सभी रूपों में स्फुरित होती है । इस प्रकार एक-एक के चार-चार रूप होने से सृष्टिकाली आदि १२ प्रकार का (इनका) उदय होता है । ‘इन तीनों (= परा, परापरा, अपरा) प्रकाशों की सृष्टि आदि के क्रम से चार-चार प्रकार की स्थिति होती हैं । इस प्रकार ये १२ कही गयी हैं । (ये सब) स्वसंवित् परम आदित्य प्रकाशस्वरूप अव्यय (शिव ही) हैं’ ।। १०७ ।।प्रथममाह्निकम् १२५ तस्य चाभिन्ना एकव स्वातन्त्र्याख्या शक्तिः इत्युपपादितम्, तत्कथमसरा इह द्वादशधोदय इत्युक्तम् ? इत्याशङ्कयाह तावान्पूर्णस्वभावोऽसौ परम: शिव उच्यते । तेनात्रोपासकाः साक्षात्तत्रैव परिनिष्ठिताः ॥ १०८ ॥ तावान् इति-द्वादश शक्तयः परिमाणमस्य, स तथा, अत एव पूर्णस्वभाव: इत्युक्तम् । पूणे सर्वमस्ति, सर्वत्र पूर्णमस्ति, अन्यथास्य पूर्णतैव न स्यात् । अत एव अत्र द्वादशात्मके चक्रे ये उपासका: ‘ते तत्र परमशिवे एव परिनिष्ठिता:-तदैकात्म्यभाजो भवन्ति-इत्यर्थः । एतच्च बहुप्रघट्टकवक्तव्यम्, इति शाक्तोपायाह्निक एव वितत्य विचारयिष्यते, इति नेहायस्तम् ।। १०८ ।। ननु कथमेतद्युक्तम्, यतोऽत्र संख्यायाः तत्र तत्र न्यूनत्वमाधिक्यं च सम्भवति ? इत्याशङ्कयाह तासामपि च भेदांशन्यूनाधिक्यादियोजनम् । तत्स्वातन्त्र्यबलादेव शास्त्रेषु परिभाषितम् ।। १०९ ॥ प्रश्न है कि परप्रकाश रूप भैरव आदि शब्दों से व्यवहार्य परमेश्वर एक हा है। और उसकी स्वातन्त्र्य नामक अभिन्न शक्ति भी एक ही है—ऐसा कहा गया । तो फिर इसकी १२ प्रकार की शक्तियाँ कैसे कही गयी ?-यह शङ्का कर कहते हैं (उन बारह शक्तियों से युक्त होने के कारण) वह परमशिव उतना पर्ण स्वभाव वाला है । इसलिए द्वादश शक्तिचक्र के उपासक लोग सीधे-सीधे उसी (- शिव में) परिनिष्ठित (= उससे एकाकार) हो जाते हैं ।। १०८ ।। उतना = १२ शक्तियों के परिमाण वाला । इसीलिये पूर्णस्वभाव कहा गया । पूर्ण में सब कुछ है और पूर्ण सर्वत्र है । अन्यथा इसकी पूर्णता ही नहीं होगी । इसलिये जो इन बारह चक्रों में उपासना करते हैं वे उस परम शिव में परिनिष्ठित होते हैं अर्थात् उससे तादात्म्य प्राप्त कर लेते हैं । यह वक्तव्य बहत स्थानों में कहा जा सकता है इसलिये शाक्तोपाय आह्निक में ही विस्तार के साथ इसका विचार किया जायगा, इसलिये यहाँ विस्तार नहीं किया गया ।। १०८ ।। प्रश्न है कि ऐसा कैसे कहा गया क्योंकि स्थान-स्थान पर (= भिन्न-भिन्न शास्त्रों में) संख्या की न्यूनता या अधिकता सम्भव है ?—यह शङ्का कर कहते शास्त्रों में उन (= शक्तियों) की भी भेदांश में न्यूनाधिक्ययोजना उसी (= शिव) के स्वातन्त्र्य के कारण कही गई है (वह इस प्रकार १२६ श्रीतन्त्रालोकः तदेवाह एकवीरो यामलोऽथ त्रिशक्तिश्चतुरात्मकः । पञ्चमूर्तिः षडात्मायं सप्तकोऽष्टकभूषितः ॥ ११० ॥ नवात्मा दशदिक्छक्तिरेकादशकलात्मकः । द्वादशारमहाचक्रनायको भैरवस्त्विति ॥ १११ ॥ यथा एकवीरो मृत्युजिति प्रथमध्याने । यामल: तत्रैव । कुलप्रक्रियायां तिस्रः शक्तयः पराद्याः । चतुरात्मा जयादिभेदेन । पञ्चमूर्तिः सद्योजातादितया । तदुक्तम् ‘सिद्धान्ते पञ्चकं सारं चतुष्कं वामदक्षिणे । त्रिकं तु भैरवे तन्त्रे……………………. ।।’ इति । षडात्मा इति, यद्वक्ष्यति ‘विश्वा तदीशिका रौद्री वीरका त्र्यम्बिका तथा । गुर्वीति षडरे देव्यः.. ….. ।।’ इति । सप्तक: इति, यदुक्तम् ‘ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारी वैष्णवी तथा । वही कहते हैं एकवीर, यामल, त्रिशक्ति, चार शक्ति वाला, पाँचमूर्त्ति, षडात्मा, सप्तक, अष्टकविभूषित, नवात्मा, दश दिकशक्ति वाला, ग्यारह कला वाला, द्वादशार महाचक्र का नायक और भैरव (तेरह संख्या वाला) है ।। ११०-१११ ।। ____ जैसे एक है और वीर भाव वाला है । मृत्युञ्जय के रूप में प्रथम ध्यान का विषय है । उसी (ध्यान) में वह यामल (= शिवशक्तिसङ्घट्ट रूप) है । कुलप्रक्रिया में परा आदि तीन शक्तियाँ हैं । जया आदि चार शक्तियों तथा जाग्रत आदि चार अवस्थाओं से युक्त वह चतुरात्मा है । सद्योजात आदि (ईशान तत्पुरुष, वामदेव, अघोर) के कारण वह पञ्चमूर्ति है । वही कहा गया ‘शैव सिद्धान्त में पाँच ही मुख्य हैं । वामदक्षिण में चार । भैरव तन्त्र में तीन ।’ षडात्मा-जैसा कि कहेंगे विश्वा, विश्वेश्वरी, रौद्री, वीरका, त्र्यम्बका और गुर्वी ये छ: अरायें देवीचक्र की है……… ।’ सप्तक जैसा कि कहा गया hc प्रथममाह्निकम् वाराही च तथेन्द्राणी चामुण्डा चेति मातरः।। इति । अष्टकेन–अघोरादिना । स एव एतदष्टकमध्यवर्ती नवात्मा । दशदिक्छक्तिः | इति, यदुक्तम् ‘उमा दुर्गा भद्रकाली स्वस्ति स्वाहा शुभङ्करी । श्रीश्च गौरी लोकधात्री वागीशी दशमी स्मृता ।।’ इति । एकादश इति खण्डचक्रोक्ता । इयदन्तं न्यूनसंख्यास्वीकारः भैरव: । इति त्रयोदश: । अनेन अधिकसंख्यासूत्रणम् ।। ११०-१११ ।। तच्च अधिकसंख्याकत्वं निरवधि—इत्याह एवं यावत्सहस्रारे नि:संख्यारेऽपि वा प्रभुः । विश्वचक्रे महेशानो विश्वशक्तिर्विजृम्भते ॥ ११२ ।। सहस्रारे इति—त्रिशिरोभैरवप्रथमपटलोक्ते । ग्रन्थविस्तरभयात्तु न प्रातिपद्येन संवादितम् । नि:संख्यारे इति भुवनादीनामानन्त्यात् । एवमपि एतस्मान्न व्यतिरिक्तम, इत्याह विश्वशक्तिः इति । तदक्तम् ‘ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और चामुण्डा ये (सात) मातायें हैं।’ अष्टक के द्वारा-अघोर आदि के द्वारा । इन आठ के मध्य में रहने वाला वह नवात्मा है । दश अर्थात् दिशाओं की अधिष्ठात्री शक्तियाँ । जैसा कि कहा गया उमा, दुर्गा, भद्रकाली, स्वस्ति, स्वाहा, शुभङ्करी, श्री, गौरी, लोकधात्री और वागीशी ये दश (शत्तियों) हैं । ग्यारह-खण्ड चक्र में उक्त (= अ,उ,म्, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिका, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी और समना) (इनमें उन्मना को जोड़ने पर १२ हो जाते हैं ।) यहाँ तक (शक्तियों की) न्यून संख्या मानी गयी है । भैरव तेरहवें हैं । इसके द्वारा अधिक संख्या बतलायी गयी ।। ११०-१११ ।। और वह अधिक संख्या असीम है—यह कहते हैं इस प्रकार (त्रिशरोभैरव के अनुसार) हजार रूप में अथवा असंख्य होने के कारण संख्यारहित रूप में वही महेश विश्वशक्तियुक्त प्रभु इस विश्वचक्र में प्रस्फुरित हो रहे हैं ।। ११२ ।। सहस्रार (का वर्णन) त्रिशिरोभैरव के प्रथम पटल में है । ग्रन्थ के विस्तार के भय से यहाँ प्रत्येक पद की व्याख्या नहीं की गयी । भूवन आदि के अनन्त होने से वहाँ असंख्या अरायें है । फिर भी वे इस (सहस्रार) से भिन्न नहीं हैं इसलिये कहा गया—विश्वशक्ति । वही कहा गया श्रीतन्त्रालोकः ‘शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमच्यते । शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ।।’ इति ।। ११२।। नन् विश्वेषामपि चक्राणां यदि प्रभुरेव परमार्थः तदेकेनैव कार्तार्थ्यात् प्रतिशास्त्रं बहूनि किमुक्तानि ? इत्याशङ्क्याह तेषामपि च चक्राणां स्ववर्गानुगमात्मना। ऐक्येन चक्रगो भेदस्तत्र तत्र निरूपितः ॥ ११३ ॥ ऐक्येन तत्तत्सृष्ट्याद्यात्मनियतकृत्यकारित्वादिना साजात्येन । तच्च नियत कृत्यकारित्वादेव अस्य स्ववर्गानुगमात्मकत्वमुक्तम्, अत एव चक्रगो भेद इति शास्त्रेषु चक्राणामानन्त्यम् ।। ११३ ।। तदेव दर्शयति चतुष्पड्विर्द्विगणनायोगात्रैशिरसे मते । षट्चक्रेश्वरता नाथस्योक्ता चित्रनिजाकृतेः।। ११४ ॥ चतुर्णा द्विगणनायोगेन अष्टौ, पुनस्तथात्वेन षोडश, षण्णां द्विगणनायोगेन द्वादश, पुनस्तथात्वेन चतुर्विंशतिः इति षण्णां चक्राणामीश्वरता, तत्तत्समुल्लास्य ‘शक्ति और शक्तिमान् दो पदार्थ (शास्त्रों में) वर्णित हैं । इस (शक्तिमान्) की शक्तियाँ ही सम्पूर्ण संसार है और शक्तिमान् तो महेश्वर है’ ।। ११२ ।। : प्रश्न है कि यदि सभी चक्रों का अन्तिम तत्त्व परमेश्वर ही है तो एक ही (परमेश्वर) से कृतार्थ होने से काम चल जायगा शास्त्रों में बहुत से (चक्रों) का निर्वचन क्यों है ?-यह शङ्का कर कहते है उन चक्रों का भी (नियत कृत्यकारित्व के कारण) अपने वर्ग का अनुगमन होने से ऐक्य होने पर भी चक्रगत भेद वहाँ-वहाँ (= भिन्न-भिन्न शास्त्रों में) निरूपित है ।। ११३ ।। ऐक्य के कारण = तत्तत् सृष्टि आदि रूप नियतकृत्यकारित्व आदि सजातीयता के कारण । और वह (= ऐक्य) नियम कृत्यकारी होने के कारण ही है । इसी कारण इसको अपने वर्ग का अनुगमक कहा गया है । इसीलिए चक्रों में भेद है और इस प्रकार चक्र अनन्त है ।। ११३ ।। उसी को दिखलाते है चार और छ: की दो-दो गुनी गणना (४४२ = ८x२ = १६ और ६ x २ = १२ x २ = २४) करने से त्रिशिरोभैरव में विचित्र आत्म स्वरूप वाले उस परमात्मा की षट्चक्रेश्वरता कही गई है ।। ११४ ।। चार को दो बार गिनने से आठ फिर उसी प्रकार (दो बार गिनने से) सोलह. प्रथममाह्निकम् १२९ चक्राद्यपाधिवैचित्र्याच्चित्रा-नानाकारा. तदतिरिक्तस्य अन्यस्य अनपलम्भात निजाकृतिः यस्य, अत एव नाथस्य स्वातन्त्र्यशालिनः तत्तच्चक्राधिष्ठातुः प्रभोः, शिरसे मते त्रिशिरोभैरवे उक्ता अभिहिता इत्यर्थः । तदुक्तं तत्र ‘चतुष्कं षटकाष्टकं द्वादशारं षोडशारकम् ।। चतुर्विंशारकं देवि प्रविभक्त्या सुसंस्थितम् ।।’ इत्यादि ।।११४।। बहुप्रकारत्वं चक्राणां भेदनिमित्तमपि त्रिशिरोभैरव एवोक्तम्,—इत्याह नामानि चक्रदेवीनां तत्र कृत्यविभेदतः । सौम्यरौद्राकृतिध्यानयोगीन्यन्वर्थकल्पनात् ॥ ११५ ॥ उक्ता इति पूर्वश्लोकाल्लिङ्गादिविपरिणामाद् योज्यम् । एक एव हि परमेश्वरः तत्तत्साधककामानुसारं नियतां सौम्यरौद्रादिरूपाम् आकृतिमाभास्य तां तां सिद्धिं नियच्छेत् । तदुक्तम् ‘येन येन हि रूपेण साधक: संस्मरेत्सदा । तस्य तन्मयतां याति चिन्तामणिरिवेश्वरः ।।’ इति । छ को दो बार गिनने से बारह फिर उसी प्रकार चौबीस । इस प्रकार (४,८,१६ तथा ६,१२,२४) छः चक्रों के स्वामी (महेश्वर ही) हैं । तत्तत् समुल्लास्य चक्र आदि उपाधि के वैचित्र्य के कारण चित्र अर्थात् अनेक आकार वाली, (क्योंकि) उनसे अतिरिक्त किसी अन्य की सत्ता न होने से, अपनी ही आकृति है जिसकी इसलिये नाथ का = स्वातन्त्र्य शाली तथा तत्तत् चक्र के अधिष्ठाता प्रभु का, शिरसमत में = त्रिशिरोभैरव में । उक्त = कही गयी है। वही वहाँ कहा गया ‘हे देवि ! चार, छ:, आठ, बारह, सोलह और चौबीस अरों वाले (चक्र) अच्छी तरह विभक्त होकर अच्छी तरह स्थित हैं’ इत्यादि ।। ११४ ।।’ चक्रों की अनेक प्रकारता का कारण भी त्रिशिरोभैरव में ही कहा गया उनमें कार्यों की भिन्नता के आधार पर चक्रदेवियों के नाम अन्वर्थ कल्पना के कारण सौम्य, रौद्र आकृति वाले ध्यान से युक्त है ।। ११५ ।। उक्त है-श्लोक सं० ११४ में आये (‘उक्ता’ पद को प्रकृत श्लोक में ‘नामानि’ के अनुसार) लिङ्ग परिवर्तन कर (अर्थात् ‘उक्ता’ की जगह ‘उक्तानि’) जोड़ना चाहिये । एक ही परमेश्वर भिन्न-भिन्न साधकों की इच्छा के अनुसार निश्चित सौम्य रौद्र आदि रूपों वाली आकृति को आभासित कर भिन्न-भिन्न सिद्धियों को देता है । वही कहा गया ‘साधक जिस-जिस रूप में स्मरण करता है, परमेश्वर चिन्तामणि के समान श्रीतन्त्रालोकः श्रीत्रिशिरोभैरवप्रथमपटलाच्च अयमर्थः स्वयमेवाधिगन्तव्यः । अस्माभिस्तु ग्रन्थविस्तारभयात् न प्रातिपद्येन संवादितम् ।। ११५ ।। तदेवाह एकस्य संविन्नाथस्य ह्यान्तरी प्रतिभा तनुः । सौम्यं वान्यन्मितं संविदुर्मिचक्रमुपास्यते ॥११६ ॥ आन्तरी प्रतिभा स्वातन्त्र्यशक्तिः । अन्यत् इति रौद्रम् । अत एव तत्तत्सौम्य रौद्रादिनियताकारावच्छिन्नत्वात् मितम् ।। ११६ ।। एतदेव विभज्य दर्शयति अस्य स्यात्पुष्टिरित्येषा संविद्देवी तथोदितात् । ध्यानात्सझल्पसंमिश्राद् व्यापाराच्चापि बाह्यतः ॥ ११७ ॥ स्फुटीभूता सती भाति तस्य तादृक्फलप्रदा। पुष्टिः शुष्कस्य सरसीभावो जलमतः सितम् ।। ११८ ।। अनुगम्य ततो ध्यानं तत्प्रधानं प्रतन्यते । ये च स्वभावतो वर्णा रसनि:ष्यन्दिनो यथा ॥ ११९ ।। उसके लिये उसी रूप में उपस्थित होते हैं । यह अर्थ त्रिशिरोभैरव के प्रथम पटल से स्वयं समझ लेना चाहिये । ग्रन्थ विस्तार के भय से हमने प्रतिपद व्याख्या नहीं की ।। ११५ ।। वही कहते हैं एक ही संविद्प्रभु की आन्तरिक संवित् प्रतिभा शरीर की सौम्य अथवा अन्य = रौद्र, ऊर्मिचक्र के रूप में उपासना की जाती है ।। ११६ ।। आन्तरी प्रतिभा = स्वातन्त्र्यशक्ति । अन्यत् = रौद्र । इसीलिये तत्तत्, सौम्य, रौद्र आदि नियत आकार से अवच्चि इसी को अलग कर दिखलाते हैं इस (= शिव) की पुष्टि नामक संविद् देवी है । वह उसी प्रकार कहे गए सञ्जल्पमिश्रित ध्यान से अथवा बाह्य व्यापार के द्वारा स्पष्ट होकर उस (= उपासक) के लिए वैसा ही फल देने वाली होती है (तब साधक को) पृष्टि (= एक प्रकार का आनन्द) तथा (शुष्क तालाब में वर्षा के जल के आने पर उसके) सरस होने की तरह स्थिति होती है इसलिए वह सित अर्थात् उज्ज्वल स्वच्छ होती है । इसलिए तत्प्रधान (= पुष्टि का प्रेरक) ध्यान किया जाता है । जो वर्ण प्रथममाह्निकम् दन्त्यौष्ठ्यदन्त्यप्रायास्ते कैश्चिद्वर्णैः कृताः सह । तं बीजभावमागत्य संविदं स्फुटयन्ति ताम् ॥ १२० ॥ पुष्टिं कुरु रसेनैनमाप्याययतरामिति । सञ्जल्पोऽपि विकल्पात्मा किं तामेव न पूरयेत् ॥ १२१ ।। अमृतेयमिदं क्षीरमिदं सर्पिर्बलावहम् । तेनास्य बीजं पुष्णीयामित्येनां पूरयेत्क्रियाम् ॥ १२२ ॥ ध्यानाद्येव क्रमेण निरूपयति—पुष्टिरित्यादिना । ततः इति समनन्तरोक्ता खेतोः । अतः इति पुष्टेः शुष्कस्य सरसीभावापादानलक्षणत्वात् । जलं हि आप्यायकं तत्प्रधानं पुष्टिप्रयोजकम् पूर्णमित्यादिरूपम । सम्प्रति सजल्पमपि लौकिकालौकिकभेदेन द्विधा व्याचष्टे-ये च इत्यादिना । ते इति दन्त्योष्ठ्य दन्त्यप्राया वर्णाः । तां संविदं पुष्टिरूपां । बीजभावं मन्त्रभावम् । अत एवास्य सञ्जल्पस्यालौकिकत्वम् । दन्त्योष्ठ्या वकारादयः । दन्त्या अमृतबीजादयः । कैश्चिद्वर्णैरिति अदन्त्योष्ट्यप्रायादिभिः । यदुक्तम् स्वभावत: जिस प्रकार रसनिष्यन्दी हैं, दन्त्य या ओष्ठ्यदन्तप्राय हैं, वे कुछ वर्णों के साथ उस बीजभाव को प्राप्त कर उस (पुष्टिरूपा) संविद को स्पष्ट करते है । ‘पुष्टि करा ‘इसका रस से अधिकाधिक आप्लावित करो’ -ऐसा विकल्पात्मक सञ्जल्प क्या उसी (= संवित्) को आपूरित नहीं करेगा? यह अमृता (= गुडूची) है यह बलाधायक दधि है यह (बलाधायक) घृत है उसके द्वारा इस (= शरीर) के बीज (= शुक्र शोणित आदि धातुओं) को पुष्ट करता हूँ इस प्रकार इस (= पुष्टिरूप) क्रिया का पूरण करना चाहिए ।। ११७-१२२ ।। ध्यान आदि का ही क्रम से निरूपण करते हैं—पुष्टि इत्यादि के द्वारा । इस कारण = समनन्तर कथित हेतु से । इसलिये = पुष्टि के कारण । (पुष्टि) शुष्क को सरस बनाने का नाम है । जल आप्यायन करता है, वह प्रधान रूप में पुष्टि का प्रयोजक है । पूर्णरूप वाला है । अब “ये च’ इत्यादि के द्वारा सञ्जल्प को भी लौकिक, अलौकिक भेद से दो प्रकार की व्याख्या करते हैं वे = दन्त्य’, ओष्ठया, दन्त्यप्राय वर्ण । उस संविद् को जो कि पुष्टिरूपा है । बीज भाव = मन्त्रभाव । इसीलिये यह (मन्त्र का) सञ्जल्प अलौकिक होता है । दन्त्योष्ठ्य = वकार आदि । दन्त्य = अमृत बीज आदि । किन्हीं वर्णों से = अदन्त्य अनोष्ठ्य प्राय आदि से । जैसा कि कहा गया २. उ ऊ पवर्ग १. ल ल तवर्ग दन्त्य ‘स’ ३. व ५. ऋ ऋ टवर्ग ‘र’ ‘ष’ १३२ शीतन्त्रालोकः ‘वषडाप्यायने शस्तः ……………… इति । तथा ‘पुष्टावाप्यायने वगैः ……………… इति । एवं मूर्धन्यादीनामपि ग्रहणम् । विकल्पात्मा इत्यनेन अस्य लौकिकत्वं दर्शितम् । तामिति पुष्टिरूपां संविदम् । इदानी बाह्यमपि होमादिरूपं व्यापार विभजति अमृता इत्यादिना । क्षीरं दधि । तदुक्तम् ‘दधिहोमात्परा पुष्टिः ………… ।’ इति । बलावहशब्देन प्रत्येक संबन्धः । तेन इति गुडूच्यादिना द्रव्यजातेन । बीजम् इति—शरीरकारणभूतं शुक्रशोणितादि धातुवातम् । एनाम् इति—पुष्टिरूपां क्रियाम् ।। ११७-१२२ ।। एतदेव प्रमेयान्तरमुपक्षिपन् उपसंहरति तस्माद्विश्वेश्वरो बोधभैरवः समुपास्यते । अवच्छेदानवच्छिद्भ्यां भोगमोक्षार्थिभिजनैः ॥ १२३ ॥ अवच्छेदानवच्छिद्भ्याम् इति, अवच्छेदः समनन्तरोक्तनीत्या ध्यानादिनियत विधिनियन्त्रितत्वम्, तदन्यथात्वमनवच्छेदः । यद्वक्ष्यति ‘तृप्ति के लिय वषट् कहा गया है ।’ तथा ‘पुष्टि और तृप्ति अर्थ में वर्गों के द्वारा’ इसी तरह मूर्धन्य आदि का भी ग्रहण होता है । ‘विकल्पात्मा’ पद से इसका लौकिकत्व दिखलाया गया । उसको = पुष्टिरूपा संविद् को । अब बाह्य होम आदि रूप व्यापार का वर्गीकरण करते हैं—अमृता इत्यादि के द्वारा । क्षीर = दही। वही कहा गया ‘दधि के होम से अत्यन्त पुष्टि होती है।’ ‘बलावह’ शब्द को हर एक के साथ जोड़ना चाहिये । उससे = गुडूची आदि द्रव्यसमूह से । बीज = शरीर का कारण भूत शुक्र, रजस् आदि धातुसमूह । इसको = पुष्टिरूपा क्रिया को ।। ११७-१२२ ।। प्रमेयान्तर को प्रस्तुत करते हुए इसका उपसंहार करते हैं इसलिए भोग एवं मोक्ष चाहने वाले लोगों के द्वारा अवच्छेद अनवच्छेद के द्वारा विश्वेश्वर संविद् भैरव की उपासना की जाती है ।। १२३ ।। अवच्छेद अनवच्छेद के द्वारा–अवच्छेद = पूर्वोक्त नीति के अनुसार ध्यान प्रथममाह्निकम् ‘साधकानां बुभुक्षूणां विधिर्नियतियन्त्रित: । मुमुक्षूणां तत्त्वविदां स एव तु निरर्गल: ।।’ इति । भगवतश्च एतत्सावच्छेदमपि रूपम् अनवच्छिन्नपरस्वरूपानु प्राणितमेव, नहि तत्स्वरूपानुप्रवेशं विना किञ्चिदपि सिद्धयेत् ।। १२३ ।। एतदेव शब्दार्थद्वारकं गीताग्रन्थेन संवादयति येऽप्यन्यदेवताभक्ता इत्यतो गुरुरादिशत् । इत्यत:- इत्येवमादिकात् वाक्यकदम्बकात्-इत्यर्थः । गुरुरिति तात्त्विका | र्थोपदेष्टा भगवान्वासुदेवः । तत्र हि विद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्टवा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ।’ इत्यादिना । ‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।’ आदि नियत विधि रूपी नियन्त्रण । उससे भिन्न होना अनवच्छेद । जैसा कि कहेंगे भोगेच्छु साधकों के लिये विधि नियति के अधीन होती है और तत्त्व ज्ञानी मोक्षेच्छु लोगों के लिये वही विधि निरर्गल अर्थात् विधि-निषेध से रहित होती है । भगवान का यह सीमित रूप भी असीम परमस्वरूप से अनुप्राणित ही रहता है। उस (= पर) स्वरूप के अनुप्रवेश के बिना कुछ भी सिद्ध नहीं होता ।। १२३ ।। यही बात गीता ग्रन्थ के उदाहरण से शब्द अर्थ दोनों के द्वारा कहते हैं जो दूसरी देवताओं के भक्त हैं (वे भी, श्रद्धा से युक्त होकर यदि यजन करते हैं तो अविधिपूर्वक मेरा ही यजन करते हैं)- ऐसा गुरु ने उपदेश दिया है ।। १२४- ।। इससे = इत्यादि वाक्य समूह से | गुरु = तात्त्विक अर्थ के उपदेष्टा भगवान् वासुदेव । वहाँ (गीता) पर ____ ‘तीनों वेदों के अनुयायी, सोम पीने वाले, पापरहित जन यज्ञ के द्वारा (मेरा) पूजन कर मुझ से स्वर्गप्राप्ति के लिये प्रार्थना करते हैं । वे पुण्य को प्राप्त कर इन्द्रलोक में जाते हैं और स्वर्गलोक में दिव्य देव भागों को प्राप्त करते हैं ।’ इत्यादि के द्वारा तथा ‘पुण्य के क्षीण होने पर मर्त्यलोक में आ जाते हैं ।’ श्रीतन्त्रालोकः इत्यादिना च भोगार्थिनाम्, ‘अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।।’ इत्यादिना च मोक्षार्थिनाम्, अवच्छेदानवच्छेदाभ्यां क्रमेण स्वरूपमभिधाय पुन: सावच्छेदेऽपि रूपेऽनवच्छिन्नं रूपम् अस्त्येव इत्यभिधातुम् ‘येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ।।’ इत्यादिना तेनोपदिष्टम् ।। एतदेव व्याचष्टे ये बोधाव्यतिरिक्तं हि किञ्चिद्याज्यतया विदुः ॥ १२४ ॥ तेऽपि वेद्यं विविञ्चाना बोधाभेदेन मन्वते । ये याजका बोधाद् वेदित्रेकस्वभावात् स्वात्मरूपात्, व्यतिरिक्तमन्यत् तत्तन्नियताकारमिन्द्रादिदैवतं याज्यतया विदुः जानीयुः, ते विच्छिन्ननियता इत्यादि के द्वारा भोगार्थियों के, और ‘जिनके लिये मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं है ऐसे जो लोग मेरा चिन्तन करते हुए (मेरी) उपासना करते है, नित्य और सब प्रकार से (मुझ में) लगे हुए उन लोगों का मैं योगक्षेम’ वहन करता हूँ ।’ इत्यादि के द्वारा मोक्षार्थियों के अवच्छेद और अनवच्छेद के क्रम से स्वरूप का कथन कर पुन: सावच्छेद रूप में भी अनवच्छिन्न रूप है—यह कहने के लिये ‘जो अन्य देवताओं के भक्त श्रद्धा के साथ यजन करते हैं वे भी हे अर्जुन ! अविधिपूर्वक मेरा ही यजन करते है। इत्यादि के द्वारा उपदेश दिया गया है। उसी व्याख्या करते हैं जो लोग बोध (= आत्मस्वरूप) से भिन्न किसी (देवता आदि को) याज्य के रूप में जानते हैं वे भी वेद्य (= उस देवता) का विमर्श करते हए (उस देवता को) संविद् से अभिन्न रूप में जानते हैं ।। -१२४, १२५- ।। ___ जो = याजक, बोध से = वेदितामात्र स्वभाव वाले आत्मरूप से, व्यतिरिक्त = भिन्न = तत्तत् नियत आकार वाले इन्द्र आदि देवताओं को, यजनीय मानते हैं, वे १. अलब्धलाभो योगः, लब्धरक्षणं क्षेम ।प्रथममाह्निकम् १३५ कारवत्त्वात् वेद्यमपि इन्द्रादिरूपं दैवतं श्रद्धातिशययोगाद् गाढगाढं विमृशन्तः ‘वेद्यो वेदकतामाप्तो वेदक: संविदात्मताम् । संवित्त्वदात्मा चेत्सत्यं तदिदं त्वन्मयं जगत्।।’ इत्यादिन्यायेन बोधाभेदेन परप्रमात्रेकरूपस्वात्मयत्वेन अवबुध्यन्ते इत्यर्थः ।। ननु ‘देवतोद्देशेन द्रव्यत्यागो यागः’ इत्युक्तेः द्रव्यत्यागार्थमुद्दिष्टेव देवता भवति, न च बोधैकरूपस्य स्वात्मतत्त्वस्य तथात्वेन उद्देशोऽस्ति, कथमस्य याज्यत्वम् ? इत्याशङ्कयाह तेनाविच्छिन्नतामर्शरूपाहन्ताप्रथात्मनः ॥१२५ ।। स्वयंप्रथस्य न विधिः सृष्ट्यात्मास्य च पूर्वगः । वेद्या हि देवतासृष्टिः शक्तेर्हेतोः समुत्थिता ॥ १२६ ॥ अहंरूपा तु संवित्तिर्नित्या स्वप्रथनात्मिका । तेन बोधात्मत्वेन हेतुना, अस्य स्वात्मतत्त्वस्य, ‘सकृद्विभातोऽयमात्मा’ इति न्यायेन अनवच्छिन्नतया प्रवृत्ताविरतेन रूपेण पराहंप्रकाशपरामर्शमयस्य, अत एव स्वयंप्रथस्य प्रमाणादिनैरपेक्ष्येण स्वतः सिद्धस्य, विधि:-अप्रवृत्तप्रवर्तनात्मा, विच्छिन्न नियत आकार वाला होने के कारण वेद्य भी इन्द्र आदि रूप देवता का अतिशय श्रद्धा के कारण गाढरूप में विमर्श करते हुए ‘वेद्य वेदक बन जाता है और वेदक संविद । (हे भगवन) यदि संवित् तुम हो हो तो यह (वेद्य) संसार भी त्वन्मय (= तुम्हीं) हो ।’ इत्यादि न्याय से, बोध से अभिन्न केवल परप्रमातृरूप स्वात्ममय ही समझते है-यह अर्थ है । प्रश्न है कि देवता को उद्दिष्ट कर द्रव्य का त्याग याग होता है-ऐसा कहने से जो द्रव्यत्याग के लिये उद्दिष्ट है वही देवता होता है। किन्तु बोध-स्वरूप स्वात्मतत्त्व उस प्रकार उद्दिष्ट नहीं होता फिर यह यजनीय कैसे है ? यह शङ्का कर कहते है इसलिए अविच्छिन्नतामर्श रूप अहन्ताप्रथात्मक स्वयंसिद्ध इस (आत्मदेव) की कोई पूर्णगामी सृष्ट्यात्मक विधि नहीं है । देवता की । गयी सृष्टि ही वेद्य होती है जो कि शक्ति के लिए है । अहंरूपा संवित् तो नित्य और स्वप्रकाश है (वह किसी का विधेय नहीं हो सकती) ।। -१२५-१२७- ।। इस कारण = बोधात्मक होने से । इसका = आत्मतत्त्व का । ‘यह आत्मा एक ही बार प्रकाशमान हआ’ इस न्याय से, अनवच्छिन्न रूप से = प्रवृत्त अविरत रूप से, पर अहंप्रकाशपरामर्शमय का, इसीलिये स्वयंप्रथ का = प्रमाण आदि से श्रीतन्त्रालोकः पूर्वभावी, तथा सृष्ट्यात्मा तत्तत्सिद्धसाधनस्वभावो न भवति–इत्यर्थः । न खलु बोधस्वभावं स्वात्मतत्त्वं विधिविषयतामापद्यते-तस्य विधिप्राप्त्यभावात, यावदप्राप्तं हि विधेर्विषयः, न च स्वात्मनः कदाचित् अप्राप्तिरस्ति-आदिसिद्धतया सर्वदैव स्फुरणात् ।। १२७ ।। नन् विधेर्नियोगभावनाद्यात्मतया बहुविधत्वमुक्तम्, स्वात्मा पुनः कस्य विधेर्विषयतां न भजते ? इत्याशङ्कयाह विधिर्नियोगस्त्र्यंशा च भावना चोदनात्मिका ॥ १२७ ॥ विधि: अप्रवृत्तप्रवर्तको न पुनरज्ञातज्ञापकः । यदाहुः ‘विधेर्लक्षणमेतावदप्रवृत्तप्रवर्तनम् । अतिप्रसङ्गदोषेण नाज्ञातज्ञापनं विधिः ।।’ इति । स्वर्गयागयोश्च साध्यसाधनभावमवबोधयतोऽस्यैव विधेः तावत्प्रवर्तकत्वं यत् सप्रत्ययस्य पुंस: ‘प्रवृत्तोऽहम्’ इति ज्ञानजननम् । स च ‘नियोगः’ इति प्राभाकरैरुक्तः, ‘भावना’ इति भाट्टैः । तत्र तिङादिप्रत्ययवाच्यः ‘प्रवर्तितोऽहम्’ निरपेक्ष स्वतः सिद्ध का, विधि = अप्रवृत्त का प्रवर्तन रूप पूर्वभावी तथा सृष्ट्यात्मा = तत्तत् सिद्ध को पुनः सिद्ध करने वाला नहीं होता। बोधस्वभाव आत्मतत्त्व विधि का विषय नहीं बनता । क्योंकि वह विधि हो नहीं सकता । अप्राप्त ही विधि का विषय बनता है । और आत्मा कभी भी अप्राप्त नहीं है क्योंकि आदि सिद्ध होने के कारण वह सर्वदा स्फुरित होता रहता है ।। १२७।। प्रश्न है कि नियोग अथवा भावनारूप होने के कारण विधि के अनेक प्रकार कहे गये फिर यह आत्मा किस विधि का विषय नहीं होता? -यह शङ्का कर कहते है विधि (प्रभाकरों के द्वारा) नियोग नाम से (कही गई हैं) (भाट्टमीमांसक उसे) भावना कहते हैं (वह प्रेरणात्मक भावना साध्य साधन इतिकर्त्तव्यता रूप) तीन अंशों वाली है ।। - १२७ ।। विधि वह है जो अप्रवृत्त का प्रवर्तक हो न कि अज्ञात का ज्ञापक है जैसा कि कहते हैं ___ ‘विधि का यही लक्षण है कि वह अप्रवृत्त का प्रवर्तक है अतिव्याप्ति दोष के कारण अज्ञात का ज्ञापन विधि नहीं है।’ स्वर्ग और याग का साध्यसाधन सम्बन्ध बतलाना ही विधि का प्रवर्तन है कि ज्ञानवान् पुरुष के अन्दर ‘मै प्रवृत्त हुआ’ यह ज्ञान उत्पन्न करना । प्रभाकर एवं उनके मतानुयायी इसे ‘नियोग’ कहते हैं और कुमारिल भट्ट एवं उनके मतानुयायी ‘भावना’ । ‘तिङ्’ आदि प्रत्यय का अर्थ ‘मैं प्रवर्तित हुआ’ ऐसा प्रेरणास्वरूप AND है प्रथममाह्निकम् इति प्रेरणात्मकः कार्यात्मा अनुष्ठेयो धर्मों नियोगः । स च ‘दार्शपौर्णमासाभ्यां यजेत स्वर्गकामः ।’ इत्यादावनुबन्धद्वयावच्छिन्नः प्रतीयते । याज्यादिना हि अस्य विषयानुबन्ध उच्यते । ‘स्वर्गकामः’ इत्यनेन च अधिकारानुबन्धः, अत एव च व्यनुबन्ध बान्धवो ‘नियोगः’ इत्युद्धोष्यते । कंचित् क्वचिनियुक्ते इति नियोगस्वरूपम् इति । ‘भावना’ च भाव्यनिष्ठो भावकव्यापारः, भाव्यं स्वर्गादिफलम्, तन्निष्ठस्तदुत्पादक: पुरुषव्यापारो भावना । पुरुषो हि भवन्तं स्वर्गादिकमर्थं स्वव्यापारेण भावयति इति भावना इत्युच्यते । सा च द्विविधा-शब्दभावना अर्थभावना च इति । तस्याश्च किम्, केन, कथं भावयेत् इति अंशत्रयापेक्षत्वात् त्र्यंशत्वम् । तदुक्तम् ‘सा धातोः प्रत्ययाद्वापि भावनावगता सती । अपेक्षतेंऽशत्रितयं किं केन कथमित्यदः ।।’ इति । त्र्यंशा इति, तत्रार्थभावनायां ‘किम्’ इत्यपेक्षायां स्वर्गः, ‘केन’ इत्यपेक्षायां यागः, ‘कथम्’ इत्यपेक्षायां च ब्रीह्यादि सम्बन्धनीयम् । एवं शब्दभावनायामपि, ‘किम्’ इत्यपेक्षायां भाव्या पुरुषप्रवृत्ति:, ‘केन’ इत्यपेक्षायां शब्दः, ‘कथम्’ कार्यात्मक अनुष्ठेय धर्म नियोग कहलाता है । और वह ‘स्वर्गकामी दर्श पूर्णमास याग को करें’ इत्यादि में दो अनुबन्धों से अवच्छिन्न (= सीमित = बँधा हुआ) प्रतीत होता है । (‘यजेत’ के द्वारा बोधित) यज्ञ आदि के द्वारा इस (= नियोग) का विषयानुबन्ध कहा जाता है । ‘स्वर्गकाम:’ पद से अधिकारानुबन्ध (उक्त होता है) । इसीलिये ‘नियोग’ दो अनुबन्धों वाला होता है—यह उद्घोष किया जाता है । जो किसी (पुरुष) को कहीं नियुक्त करे वही नियोग का स्वरूप होता है । “भावना’ भाव्य में रहने वाला भावक का व्यापार होता है । ‘भाव्य’ होता है— स्वर्ग आदि फल । उसमें रहने वाला या उसको उत्पन्न करने वाला पुरुष-व्यापार भावना (कहलाता है) । पुरुष (भविष्य में) होने वाले स्वर्ग आदि विषय को अपने व्यापार से निष्पन्न करता है । इसलिये (वह व्यापार) भावना कहलाता है । वह (= भावना) दो प्रकार की है-शाब्दी भावना और आर्थी भावना । उसके तीन अंश होते हैं क्या बनाना चाहिये, किसके द्वारा बनाना चाहिये और कैसे बनाना चाहिये । वही कहा गया _ ‘वह भावना धातु अथवा प्रत्यय से ज्ञात होती हुई क्या, किसके द्वारा और कैसे—इन तीन अंशों की अपेक्षा रखती है ।’ तीन अंश-आर्थी भावना में क्या-इसकी अपेक्षा होने पर ‘स्वर्ग’, किसके द्वारा—यह अपेक्षा होने पर ‘याग’ और कैसे—यह अपेक्षा होने पर ब्रीहि आदि का सम्बन्ध जोड़ना चाहिये । इसी प्रकार शाब्दी भावना में भी ‘क्या’ अपेक्षा होने पर १३८ श्रीतन्त्रालोकः इत्यपेक्षायाम् अर्थवादवाक्यव्यापारः सम्बन्धनीयः। चोदना वैदिकं विधायक वाक्यम् । यदाहुः चोदनेति क्रियायाः प्रवर्तकं वचनम् ।’ इति । एतञ्चोभयत्रापि सम्बन्धनीयम् । तच्च प्रमाणान्तरप्रतिपन्नमेव अर्थमभिदधत् प्रमाणतां लभते, तं चार्थ साधयति । ‘ऐन्द्राग्नमेकादशकपालं निर्वपेत् ।’ इत्यादौ निर्वपणादिवदुद्दिष्टा इन्द्राद्या देवता अपि विधेया:-द्रव्यदेवता संबन्धस्यैव साक्षात्प्रतिपाद्यत्वात् ।। १२४-१२७ ।। तदेवाह तदेकसिद्धा इन्द्राद्या विधिपूर्वा हि देवताः । अहंबोधस्तु न तथा ते तु संवेद्यरूपताम् ॥ १२८ ॥ उन्मग्नामेव पश्यन्तस्तं विदन्तोऽपि नो विदुः । तदुक्तम् न विदुर्मी तु तत्त्वेनातश्चलन्ति ते ॥ १२९ ॥ भावनीया पुरुष की प्रवृत्ति, किसके द्वारा अपेक्षा होने पर शब्द और ‘कैसे’ अपेक्षा होने पर अर्थवादवाक्य का व्यापार जोड़ना चाहिये । चोदना = वेदोक्त विधिवाक्य । जैसा कि कहा गया ‘चोदना क्रिया को कराने वाला वचन है ।। इसे दोनों (= शाब्दी एवं आर्थी भावानाओं) के साथ जोड़ देना चाहिये । यह प्रमाणान्तर से अज्ञात अर्थ को बतलाती हुई प्रमाण बन जाती है और उस अर्थ को सिद्ध करती है । ‘इन्द्र और अग्नि देवता को उद्दिष्ट कर ग्यारह कपाल (मे पुरोडाश रखकर उसका) निर्वाप (= त्याग) करना चाहिये ।’ इत्यादि में निर्वपण की भाँति इन्द्र आदि देवता का भी विधान होता है । क्योंकि द्रव्य और देवता का साक्षात् सम्बन्ध प्रतिपाद्य होता है ।। १२४-१२७ ।। वही कहते हैं विधि प्रमाणों वाली इन्द्र आदि देवताएँ केवल शास्त्र से प्रमाणित होती हैं अहं बोध वैसा नहीं हैं । वे (आत्मदेव से भिन्न देवताओं की पूजा करने वाले) उन्मग्न अर्थात् शास्त्रों के द्वारा स्पष्टीकृत संवेद्य रूपता को ही देखते हैं इसलिए उस (आत्मा) को जानते हुए भी नहीं जानते ।। १२८-१२९- ।। प्रथममाह्निकम् विधिपूर्वा:-विधिरेव पूर्वम् पूर्वभावि अनधिगतार्थप्रकाशनात्मकं प्रमाणं यासां ताः तथोक्ताः, स्वात्मव्यतिरिक्ता हि देवता: वेद्यप्रायाः प्रमाणान्तरा- प्रतिपन्ना: शास्त्रेण साध्यन्ते इति युक्तः पक्षः । अहंबोधैकरूपः पुनः स्वात्मा पूर्वोक्तयुक्त्या सदैव प्रकाशमानत्वात् न स्वसिद्धौ प्रमाणं किञ्चिदपेक्षते इति युक्तमुक्तम् अविधिपूर्वकमिति । तदेवाह-अहंबोध: इति । तथा इति विधिपूर्व:- इत्यर्थः । नन् यदि प्रमाणादिनरपेक्ष्येणैव स्वात्मा स्वयं प्रकाशते किमिति न सर्वदैव सर्वेषाम्? इत्याशङ्क्याहते तु इत्यादि । त इति-स्वात्मव्यतिरिक्तेन्द्रादिदेवता याजकाः, तम् सर्वदैव प्रकाशमानं स्वात्मानम्, वेद्यवेदनान्यथानुपपत्त्या तदति रिक्तस्य च अन्यस्य देवतात्वानुपपत्तेः, वस्तुतो विदन्तोऽपि न विदुः-वेद्यताया एव प्राधान्येन दर्शनात् वेदित्रेकरूपतया न जानीयुः इत्यर्थः । अतश्च नियततत्तद्देवतादिरूपग्रहणेन च्यवन्ते इत्यर्थः । तदुक्तं तत्र न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ।’ इति ।। १२८-१२९ ।। तदेव व्याचष्टे इसलिए कहा गया है कि वे मुझे तत्त्वतः = नहीं जानते इसलिए (नियत उन-उन देवताओं का रूप प्राप्त करते हए तत्त्व से विचलित हो जाते हैं (= लक्ष्य से च्युत हो जाते हैं) ।। -१२९ ।। विधिपूर्वाः = विधि ही है पूर्व = पूर्वभावी = अज्ञात अर्थ का ज्ञापन करने वाला प्रमाण जिनका वे । अपने से भिन्न देवतायें वेद्यप्राय = प्रमाणान्तर से अज्ञात होने से शास्त्र के द्वारा बतलायी जाती है—यह पक्ष ठीक है । अपनी आत्मा अहंबोधरूप है और पूर्वोक्तयुक्ति के अनुसार सदैव प्रकाशमान है । इस कारण अपनी सिद्धि के लिए किसी प्रमाण की अपेक्षा नही रखती । इसलिए ठीक ही कहा गया-अविधिपूर्वकम् । उसी को कहते हैं-अहंबोध: । तथा = विधिपूर्वक । प्रश्न है कि यदि स्वात्मा प्रमाण आदि की अपेक्षा न करते हुए स्वयं प्रकाशन करता है तो फिर यह सबको सब समय क्यों नहीं (प्रकाशित होता)?—यह शङ्का कर कहते हैं-वे तो । वे = आत्मा को छोड़कर इन्द्र आदि देवताओं की पूजा करने वाले । उसको = सर्वदा प्रकाशमान् स्वात्मा को । क्योंकि वेद्य और वेदन की अन्यथा सिद्धि न होने से उनसे भिन्न अन्य का देवतात्व ही असिद्ध है । वस्तुत: जानते हुए भी नहीं जानते, क्योंकि वेद्यता को ही मुख्यतया देखने के कारण वेत्ता के रूप में नहीं जानते । इसलिये नियत तत्तद् देवता आदि का रूप ग्रहण करने च्युत हो जाते हैं । वही वहाँ कहा गया __(वे) मुझको नहीं जानते इसलिए तत्त्वज्ञान से च्युत हो जाते हैं’ ।। १२८-१२९ ।। १४० श्रीतन्त्रालोकः चलनं तु व्यवच्छिन्नरूपतापत्तिरेव या ।। एतदपि तत्रत्येन ग्रन्थेनैव संवादयति देवान्देवयजो यान्तीत्यादि तेन न्यरूप्यत ॥ १३० ॥ तेन इति–व्यवच्छिन्नरूपतापत्तिलक्षणेन हेतुना इत्यर्थः । यदुक्तम् ‘यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ।।’ इति ।। १३० ।। ननु यद्येवं कथमन्यदेवताभक्ता अपि यजन्ति इत्युक्तम् ? इत्याशङ्कयाह निमज्ज्य वेद्यतां ये तु तत्र संविन्मयीं स्थितिम् । विदुस्ते ह्यनवच्छिन्नं तद्भक्ता अपि यान्ति माम् ॥ १३१ ।। तत्र इति—स्वात्मव्यतिरिक्तायां देवतायाम् । तद्भक्ताः स्वात्मव्यतिरिक्तदेवता याजिन:-इत्यर्थः । माम् इति–परबोधैकस्वभावम् आत्मानम् । अस्मिन् परमा द्वयमये संविन्मयतयावस्थानमेव यागः, तत्समापत्तिरेव च फलम् ।। १३१ ।। उसी की व्याख्या करते हैं जो व्यवच्छिन्नरूपता को प्राप्त होना है वही चलन है ।। १३०- ।। इसको भी वहीं के ग्रन्थ से उद्धृत कर स्पष्ट करते हैं इसलिए देवता की उपासना करने वाले देवता को प्राप्त होते हैं ऐसा कहा गया है ।। -१३० ।। इससे—व्यवच्छिन्नरूपतापत्ति के कारण । जैसा कि कहा गया ‘देवताओं में निष्ठा रखने वाले देवलोक को प्राप्त करते हैं पितृव्रत लोग पितृलोक को जाते हैं । भूतप्रेत की पूजा करने वाले भूत बनते हैं और मेरी पूजा करने वाले मुझको प्राप्त होते हैं ।। १३० ।। _ यदि ऐसा है तो ‘अन्य देवताओं के भक्त भी (प्रकारान्तर से मेरी ही) पूजा करते हैं-ऐसा कैसे कहा गया ?-यह शङ्का कर कहते हैं जो लोग वेद्यता को विलीन करके उस (स्वात्मव्यतिरिक्त देवता में) संविन्मयी स्थिति को जानते हैं (ऐसे) उन (= देवताओं) के भर भी अनवच्छिन्न मुझको प्राप्त होते हैं ।। १३१ ।। उसमें = आत्मा से भिन्न देवता में । उसके भक्त = स्वात्मा से भिन्न देवता के याजक । मुझको = परबोधस्वभाव वाले आत्मा को । इस परम अद्वय स्वरूप (आत्मतत्त्व) में संविन्मय होकर स्थित होना ही याग है । उस की समापत्ति (= प्रथममाह्निकम् ननु भगवद्वासुदेवेन उक्तस्य ‘माम्’ इति अस्मच्छब्दस्य तदेकवाचकत्वात् कथं बोधमात्राभिधायकत्वमुच्यते ? इत्याशङ्कयाह सर्वत्रात्र ह्यहंशब्दो बोधमात्रैकवाचकः । स भोक्तप्रभुशब्दाभ्यां याज्ययष्टतयोदितः ॥ १३२ ॥ अत्र इति-गीताग्रन्थे, अनवच्छिन्नस्यैव बोधमात्रस्य प्रतिपिपादयिषितत्वात्, अत एव केवलस्यैव बोधस्य वाचकः पराम्रष्टा इत्युक्तम् । नहि प्रकाशाद् द्वितीयस्य अपोह्यस्य प्रतियोगिनः सम्भवोऽप्यस्ति, तस्य प्रकाशमानत्वाप्रकाश मानत्वविकल्पोपहतत्वात् । यस्तु शरीरादौ ‘कृशोऽहम्’ इत्यादिः अहंविमर्शः स विकल्प एव, सम्भवात् ।। ननु यदि बोध एव अप्रतिपक्ष एकोऽस्ति, तत्कथं ‘मां यजन्ति’ इत्यादौ याज्ययष्टतया भेद: पारमार्थिक: स्यात् ? इत्याशङ्कयाह–स भोक्तृ इत्यादि । बोध एव उभयात्मना स्फुरित:-इति भावः । तदुक्तं तत्र ‘अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।’ इति ।। १३२ ।। ननु एकश्च उभयात्मा च इति कथं सङ्गच्छताम् ? इत्याशङ्क्याह शिवसमावेश) ही फल है ।। १३१ ।। भगवान् वासुदेव के द्वारा उक्त ‘माम्’ पद वाला ‘अस्मत्’ शब्द उन्हीं का वाचक होने से बोधमात्र का वाचक कैसे हो सकता है?—यह शङ्का कर कहते इस (= गीता) में ‘अहम्’ शब्द सर्वत्र बोधमात्र का वाचक है । वह (बोध) भोक्ता और प्रभु शब्दों के द्वारा याज्य और यष्टा के रूप में कहा गया है ।। १३२ ।। ____ यहाँ = गीता ग्रन्थ में । क्योंकि वहाँ अनवच्छिन्न बोधमात्र ही वर्णन इष्ट है । इसलिये केवल बोध का ही वाचक = परामर्शक ऐसा कहा गया । प्रकाश को छोड़कर कोई दूसरा अपोह्य प्रतियोगी सम्भव नहीं है । क्योंकि वह (दूसरा पदार्थ) प्रकाशमानत्व और अप्रकाशमानत्व विकल्प से प्रभावित है । शरीर आदि के विषय में जो ‘मैं दुर्बल हूँ’ ऐसा अहंविमर्श होता है वह भी विकल्प ही है । क्योंकि शरीर आदि की अपेक्षा अन्य अपोह्य प्रतियोगी सम्भव है । प्रश्न है कि यदि बोध ही एक ऐसा तत्त्व है जो प्रतिपक्षरहित है तो फिर ‘मेरी पूजा करते हैं’ इत्यादि स्थलों में यजनीय और याजक की दृष्टि से भेद पारमार्थिक होगा ?—यह शङ्का कर कहते हैं-वह भोक्ता इत्यादि । बोध ही दोनों (यजनीय और याजक) रूपों में स्फुरित होता है । वहीं वहाँ गीता में कहा गया ‘मैं ही सब यज्ञों का भोक्ता और प्रभु हूँ’ ।। १३२ ।। श्रीतन्त्रालोकः याजमानी संविदेव याज्या नान्येति चोदितम् । न त्वाकृतिः कुतोऽप्यन्या देवता न हि सोचिता ॥ १३३ ॥ संविदेव याज्या, इति उदितम् प्रतिज्ञातम् । न पुनः कुतोऽपि हेतोः अन्याकृति: इन्द्रादिरूपा, सा च संवित् याजमान्येव, न पुन: अन्या भिन्ना, याज मानी संविदद्वयमयी-इत्यर्थः । सा हि एवंविधाकृतिः, आकृतिमती वा संविद्देवता नोचिता, संविदि भेदानुपपत्तेः, संविदतिरिक्तस्य च जाड्यात् । न च जडस्य द्योतमानत्वाद्येकस्वभावं देवतात्वं यज्यते इति स्वप्रकाशा संविदेव एका तत्तदात्मना स्फुरति इति युक्तमुक्तम्-‘स एव याज्ययष्ट्टतयोदितः’ इति ।। १३३ ।। अत एव च आदिसिद्धत्वात् संविदि न किञ्चिद् विध्यादि सिद्धिनिमित्त मुक्तम्-इत्याह विधिश्च नोक्तः कोऽप्यत्र मन्त्रादि वृत्तिधाम वा। - इह खलु वेदवाक्यानि मन्त्रब्राह्मणरूपत्वेन द्विधा । ब्राह्मणवाक्यान्यपि विध्यर्थवादनामधेयात्मकत्वेन त्रिधा । तत्र विधिवाक्यानां तावत् संविदि व्यापारो एक ही और दो वाला है यह कैसे सङ्गत होगा? – यह शङ्का कर कहते हैं यज्ञ करने वाली संविद् ही यजनीय है दूसरी कोई नहीं—ऐसा कहा गया है । कोई दूसरी आकृति कहीं भी नहीं है और न तो वह (संविद्) देवता (आकृति वाली है ऐसा मानना) उचित ही है ।। १३३ ।। संविद ही यजनीय है-ऐसा कथित = प्रतिज्ञात है। किसी भी कारण से इन्द्र आदि रूप अन्य आकृतियाँ नहीं हैं । (जो है) वह याजमानी संविद् ही है। दूसरी = भिन्न, नहीं है । अर्थात् संविद् अद्वयमयी है । वह (= संविद्) इस प्रकार की आकृति वाली है या संविद् देवता आकृतिवाली है- ऐसा कहना उचित नहीं है क्योंकि संविद् में भेद सिद्ध नहीं है । जो संविद् से अतिरिक्त है वह जड़ है । जो जड़ है वह द्योतमानत्व आदि एक स्वभाव वाला और स्फुरणशील हो, यह सम्भव नहीं । एक स्वप्रकाश संविद् ही भिन्न-भिन्न रूपों में स्फुरित होती है । इसलिये ठीक ही कहा गया–यजनीय और याजक के रूप में वही उदित है ।। १३३ ।। - इसीलिये आदिसिद्ध होने से संविद् के विषय में सिद्धि का कारण कोई विधि आदि नहीं कहा गया-यह कहते हैं इस विषय में न तो कोई विधि गई और न व्यापार का आश्रयभूत (कोई) मन्त्र आदि कहा गया है ।। १३४- ।। मन्त्र एवं ब्राह्मण भेद से वेदवाक्य दो प्रकार के होते हैं । ब्राह्मणवाक्य भी विधि अर्थवाद नामधेय रूप से तीन प्रकार के हैं। उनमें से विधिवाक्यों का संविद् १. निषेध नामक चौथा प्रकार भी समझना चाहिए । प्रथममाह्निकम् नास्ति इत्युक्तप्रायम् । एवं मन्त्रादेरपि तत्र नास्ति व्यापारः । यतो मन्त्रादि: वृत्ते: विधिव्यापारात्मनः क्रियायाः, धाम आश्रय:-तेन विना क्रियाया असम्पत्तेः । न च संविदि वाच्यवाचकयाज्ययाजकभावाद्यात्मकः कश्चिन्द्रेदः सम्भवति, एक एव आदिसिद्धो बोधः इति सिद्धम् ।। ननु यद्येवं तत्कथमयं जडाजडात्मा विश्वप्रसरः ? इत्याशङ्कयाह सोऽयमात्मानमावृत्य स्थितो जडपदं गतः॥ १३४ ॥ आवृतानावृतात्मा तु देवादिस्थावरान्तगः। जडाजडस्याप्येतस्य द्वैरूप्यस्यास्ति चित्रता ॥ १३५ ।। आवृत्य इति स्वस्वरूपगोपनात्मिकया मायाशक्त्या सोचवत्तामाभास्य इत्यर्थः । जडपदम् इति परप्रकाश्यभावराशिस्वरूपताम्-इत्यर्थः । विश्व निर्माणेच्छुर्हि परमेश्वर: प्रथमं स्वाव्यतिरिक्तमेव विश्वं प्रकाशयेत्, अयमेव च आदिसर्गः तत्र तत्रागमेषु उच्यते, अनन्तरं च यदास्य मायया सर्गचिकीर्षा भवति तदा स्वस्वातन्त्र्यात् स्वात्मदर्पणे अनन्तग्राह्यग्राहकद्वयाभाससन्ततीराभासयति, स्वाङ्गरूपभावराशिमध्यादेव हि देहप्राणबुद्धिशून्यानि स्वगताहन्तात्मककर्तृतार्पणेन के विषय में व्यापार सम्भव नहीं है-यह कहा जा चुका है। इसी प्रकार मन्त्र आदि का भी उस (= संविद्) के विषय में व्यापार सम्भव नहीं है। क्योंकि मन्त्र आदि वृत्ति का = विधि व्यापार रूप क्रिया का, धाम = आश्रय है । क्योंकि उनके बिना क्रिया की निष्पत्ति नहीं हो सकती । संविद् में वाच्य-वाचक, याज्य-याजक सम्बन्ध वाला कोई भी भेद सम्भव नहीं है । बोध एक ही है और वह आदि सिद्ध है- यह निश्चित है । यदि ऐसा है तो फिर यह जड़ चेतन रूप विश्व का विस्तार कैसे है? – यह शङ्का कर कहते हैं (जब) वह यह (= बोध अथवा संविद्) अपने को ढंक कर स्थित होता है (तब) जड होता है । आवृत और अनावृतस्वरूप (वह) देवता से लेकर स्थावर पर्यन्त रहने वाला है । जड और अजड (= चेतन) इस दो रूप वाले की भी (तार मन्द्र ज्ञान सन्तान आदि भेदों से) अनेक-रूपता है ।। -१३४-१३५ ।। आवरण कर = अपने स्वरूप को छिपाने वाली मायाशक्ति के द्वारा सङ्कोचवत्ता को आभासित कर । जडपद को = परप्रकाश्य भावराशिस्वरूपता को । विश्वरचना की इच्छा वाला परमेश्वर पहले अपने से अभिन्न विश्व को प्रकाशित करता है । यही भिन्न-भिन्न आगमों में आदि सृष्टि कही जाती है । बाद में जब इसके अन्दर माया के द्वारा सृष्टि करने की इच्छा होती है तब अपने स्वातन्त्र्यवश वह स्वात्मरूपी दर्पण में अनन्त ग्राह्य-ग्राहक रूप युग्मको की परम्परा का आभास कराता है । १४४ श्रीतन्त्रालोकः ग्राहकीभावयति, तदपरं शब्दादि च इदन्ताविषयतया चिद्रूपतातिक्रमणेन ग्राह्यतामापादयति, अत एव च देहादिः कर्तृतां ज्ञातृतां च स्वात्मनि धत्ते, तदितरच्च कार्यतां ज्ञेयतां च । अत एव चैषां जडाजडव्यपदेशः. तदाह ‘आवृतानावृतात्मा’ इति । एवमपि चास्य प्रकारवैचित्र्येण आनन्त्यम् इत्याह ‘जड’ इत्यादि, चित्रता इति तत्र जडस्य तावच्छब्दादिभेदेन, तस्यापि तारमन्द्रादिभेदेन बहुप्रकारत्वम्, अजडस्यापि सन्तानभेदेन आनन्त्येऽपि बन्धत्रयस्य तारतम्यादिभेदेन नानात्वम् । संकुचिता प्रमातारो हि तत्तत्कर्माशयानुसारेण परिभ्राम्यन्तः तत्तदवस्थासु एकमपि स्वात्मानं धर्माधर्मादिबुद्धिभावरहितत्वेन तत्तदिच्छापरिष्कृतत्वेन च नानाकारतया वैचित्र्येण जानते, जडं च विषयं सुखदुःखादिकारितया नानात्वेन परिविन्दन्ति इति ।। १३४-१३५ ।। एवं वैचित्र्यस्य किं निमित्तम् इत्याशङ्कयाह तस्य स्वतन्त्रभावो हि किं किं यन्न विचिन्तयेत् । तदुक्तम् त्रिशिरःशास्त्रे सम्बुद्ध इति वेत्ति यः ॥ १३६ ॥ स्वाङ्गरूप पदार्थों की राशि के मध्य से ही देह प्राण बुद्धि से रहित अपने अन्दर अहंकर्तृत्व को उत्पन्न कर ग्राहक बनाता है । उसके बाद अपनी चिद्रूपता का अतिक्रमण कर इदन्ता के विषय के रूप में शब्द आदि को ग्राह्य बनाता है । इसीलिये देह आदि अपने को कर्त्ता और ज्ञाता समझते हैं और उससे भिन्न को कार्य और ज्ञेय । इसलिये इनको जड़ और अजड़ कहा जाता है । वही कहा आवृत और अनावृत रूप। इस प्रकार वह प्रकार की विचित्रता के कारण अनन्त है-यह कहते है-जड़ इत्यादि । चित्रता-(को स्पष्ट करते हैं)-जड़ भी शब्द आदि के भेद से और फिर उन (शब्द आदि) के तीव्र मन्द आदि भेद से अनेक प्रकार हैं । अजड़ भी सन्तानभेद से अनन्त होते हुए तीन बन्धन (= आणव, मायीय और कार्म) के तारतम्य आदि के भेद से अनेक हैं । संकुचित प्रमातागण भिन्न-भिन्न कर्माशयों के अनुसार भिन्न-भिन्न योनियों में भ्रमण करते हुए एक ही स्वात्मा को धर्म अधर्म आदि ज्ञान से रहित के रूप में और भिन्न-भिन्न इच्छाओं के परिष्कार के कारण विचित्र अनेक रूपों में जानते हैं । और जड़ विषय को सुख दु:ख आदि का कारक समझकर अनेक रूपों में जानते हैं ।। १३४-१३५ ।। इस प्रकार की विचित्रता का कारण क्या है ?-यह शङ्का कर कहते हैं - कौन सी ऐसी वस्तु है जिसको उसका स्वातन्त्र्य नहीं सोचता वही बात त्रिशिरोभैरव में कहीं गई है कि ‘भली-भाँति ज्ञात है’ ऐसा जो जानता हैं (इस प्रकार अनेक प्रकार से उसकी चर्चा की गई है) ।। १३६ (१) ।प्रथममाह्निकम् १४५ एतदेवार्थद्वारकं संवादयति-तदुक्तम् इत्यादिना । इति वैचित्र्यं यो वेत्ति स संबुद्धः-सम्यग्बुद्धः इत्यर्थः । त्रिशिर:शास्त्रे इति श्रीत्रिशिरोभैरवे । तत्र हि ‘अन्यथा स्वल्पबोधस्तु तन्तुभिः कीटवद्यथा । मलतन्तुसमारूढः क्रीडते देहपञ्जरे ।’ इत्युपक्रम्य ‘सम्यग्बुद्धस्तु विज्ञेयः ……………. ।’ इत्यादिना च ‘नानाकारैर्विभार्वैश्च भ्राम्यते नटवद्यथा । स्वबुद्धिभावरहितमिच्छाक्षेमबहिष्कृतम् ।।’ इत्यन्तं बहूक्तम् ।। १३६ ।। ननु देहादिर्गाहकतया अभिमतोऽपि जाड्याज्ज्ञेय एव इति तस्य कथमेवंविधं ज्ञानम् ? इत्याशङ्कयाह ज्ञेयभावो हि चिद्धर्मस्तच्छायाच्छादयेन्न ताम् ॥ १३६ ॥ ज्ञेयत्वं हि ज्ञानधर्मः, नहि अर्थ जानामि इत्यर्थस्य कश्चिदतिशयः, अपि तु इसी की अर्थ द्वारा सङ्गति बैठाते हैं—तदुक्तम् इत्यादि । इस वैचित्र्य को जो जानता है वह सम्बुद्ध = पूर्णरूप से ज्ञानवान् है । त्रिशिर:शास्त्र = त्रिशिरोभैरव । वहाँ ‘इसके विपरीत जो अल्प ज्ञान वाले हैं वे देहपञ्जर में उसी तरह फंसे रहते हैं जैसे (मकड़ी के) लाला से निकले हुए तन्तु के ऊपर आरूढ़ मकड़ी (अथवा दूसरा कीड़ा)’ । इस प्रकार प्रारम्भ कर ‘सम्यक् बुद्ध (उसे) समझना चाहिये…’ ।। इत्यादि तथा— ‘जैसे नट अनेक प्रकार के आकार और हाव-भाव के द्वारा (कठपुतली को) घुमाता है उसी प्रकार आत्मविवेक से रहित और भगवदिच्छा के योग से बहिष्कृत व्यक्ति को (परमेश्वर या उसकी माया) नचाती है ।’ यहाँ तक बहुत कहा गया है ।। १३६ (१) ।। यदि देह आदि ज्ञाता के रूप में माने गये हैं तो फिर भी जड़ होने के कारण वे ज्ञेय ही हैं फिर उनको ऐसा ज्ञान कैसे हो?यह शङ्का कर कहते हैं ज्ञेयत्व चैतन्य का धर्म है इसलिए उस (= ज्ञेय शरीर आदि) की छाया उस (= चैतन्य) को आवृत नहीं करती ।। १३६ (२) ।। ज्ञेयता ज्ञान का धर्म है । ‘मैं अर्थ को जानता हूँ’ ऐसे ज्ञान में अर्थ का कोई १४६ श्रीतन्त्रालोकः ज्ञानस्यैव तज्ज्ञानरूपता । तदुक्तमत्रापि च ……………. ज्ञेयस्य ज्ञेयता ज्ञानमेव ।’ इति । अत एव च तेषां ज्ञेयानां सतां देहादीनां छाया स्वेनैव स्वस्य आवरकत्वायोगात् न चितम् आच्छादयेत् आवृणुयात्, येनैवंविधं ज्ञानं न स्यात्, तेन देहादावात्माहेऽपि आत्मनो न काचिच्चिद्रूपताहानिः । तदुक्तं तत्रैव ‘ज्ञेयस्वभावश्चिद्रूपस्तच्छाया नैव छादयेत् ।’ इति ।। १३६ ।। अत एवाह तेनाजडस्य भागस्य पुद्गलाण्वादिसंज्ञिनः । अनावरणभागांशे वैचित्र्यं बहुधा स्थितम् ॥ १३७ ॥ तेन इति–चिदनाच्छादनेन हेतुना । अनावरण इति-शुद्धसंविद्रूपे आत्मनि -इत्यर्थः । देहादीनां हि संविद्रूपत्वेऽप्यामुखे ज्ञेयत्वेन अवभासादशुद्धत्वमपि सम्भवेत् ।। १३७ ।। ननु संविदि भेदानुपपत्तेः कथं वैचित्र्यं सङ्गच्छताम् ? इत्याशङ्क्या आतिशय्य नहीं है अपि तु (वह) ज्ञान की ही ज्ञानरूपता है । वही यहाँ भी कहा गया ‘… ज्ञेय की ज्ञेयता (और कुछ नहीं) ज्ञान ही है ।’ इसलिए उन देह आदि ज्ञेयों की छाया, अपने द्वारा ही अपना आवरण सम्भव न होने से, संविद् का आच्छादन = आवरण नहीं करती जिस कारण ऐसा ज्ञान नहीं होता। इसलिए देह आदि को आत्मा मानने पर भी आत्मा के स्वरूप को कोई क्षति नहीं पहुँचती । वही वहाँ कहा गया ‘ज्ञेय का स्वभाव चिद्रूप है । उसकी छाया उसका आवरण नहीं कर सकती’ ।। १३६ (२) ।। इसीलिये कहते हैं इस (= अनाच्छादन) के कारण पुद्गल अणु आदि संज्ञा वाले उस अजड (= चेतन) अंश की, शुद्धसंविद्प अंश में अनेक प्रकार की विचित्रता रहती है ।। १३७ ।। इस कारण = चित् का आवरण न होने से अनावरण होने पर शुद्ध संविद् रूप आत्मा में आवरण का न होने पर । यद्यपि देह आदि संविद् रूप है तो भी प्रथमदृष्ट्या ज्ञेय के रूप में अवभास होने के कारण (उस शरीर में) अशुद्धता भी सम्भव है ।। १३७ ।। संविद् में भेद सिद्ध न होने से वैचित्र्य कैसे सम्भव हैं?—यह शङ्का कर प्रथममाह्निकम् संविद्रूपे न भेदोऽस्ति वास्तवो यद्यपि ध्रुवे । तथाप्यावृतिनिहसितारतम्यात्स लक्ष्यते ॥ १३८ ॥ आवृते:-आणवस्य मलस्य, निर्हासः परिक्षयः तस्य तारतम्यम् मृदुमध्याधिमात्रात्मा अतिशयः, ततो लक्ष्यते, इति, न तु साक्षात् सम्भवति इत्यर्थः, अत एव पूर्वं ‘वास्तव:’ इति विशेषणमुपात्तम् ।। १३८ ।। किं च तत्तारतम्यम् ? इत्याशङ्कयाह तद्विस्तरेण वक्ष्यामः शक्तिपातविनिर्णये। समाप्य परतां स्थौल्यप्रसङ्गे चर्चयिष्यते ॥१३९ ।। वक्ष्यामः इति-यद्वक्ष्यति ‘तारतम्यप्रकाशे यस्तीव्रमध्यममन्दताः। ता एव शक्तिपातस्य प्रत्येकं त्रैधमास्थिताः ।।’ इत्यादि बहुप्रकारम्, चर्चयिष्यते इति-लक्ष्यते परीक्ष्यते च इत्यर्थः । इह हि सर्वस्यैव वक्ष्यमाणस्य प्रमेयजातस्य उद्देश्य एव भवेत् इति भावः । यद्वक्ष्यति कहते है ____यद्यपि ध्रुव संविद् रूप (तत्त्व) में वास्तविक कोई भेद नहीं है फिर भी आवरण और (मल के) निर्वास के तारतम्य से वह (भेद) लक्षित होता है ।। १३८ ।।। आवृति का = आणवमल का । निर्हास = परिक्षय । उसका तारतम्य = मृदुमध्य तीन रूप वाला अतिशय, उससे ज्ञात होता है न कि साक्षात् सम्भव है । इसीलिये (भेद के) पहले ‘वास्तव’ विशेषण दिया गया ।। १३८ ।। वह तारतम्य क्या है? - यह शङ्का कर कहते हैं शक्तिपातनिर्णय (वाले आह्निक) में (हम) उसकी विस्तारपूर्वक चर्चा करेंगे । परतत्त्व को समाप्त करके स्थूलता के प्रसङ्ग में (इसकी चर्चा की जाएगी) ।। १३९ ।। कहेंगे जो तारतम्य का प्रकाश तीन मध्य और मन्द रूप से होता है वे ही प्रत्येक शक्तिपात की तीन प्रकार की अवस्थायें होती हैं (वे है-तीव्र-तीव्र, तीव्र-मध्य, तीव्र-मन्द, मध्य-तीव्र, मध्य-मध्य, मध्य-मन्द तथा मन्द-तीव्र, मन्द-मध्य और मन्द मन्द ।) इत्यादि अनेक प्रकार से चर्चा की जायेगी = लक्षण बतलाया जायेगा और परीक्षा की जायगी । इस प्रकरण में समस्त वक्ष्यमाण प्रमेयसमूह का केवल नाम १४८ श्रीतन्त्रालोकः ‘विज्ञानभित्प्रकरणे सर्वस्योद्देशनं क्रमात् ।’ इति । तच्च अस्माभिम्रन्थविस्तरभयात् प्रातिपद्येन न दर्शितम् इति स्वयमेव अवधार्यम् ।। १३९ ।। एवं मलनिसितारतम्यानुसारमेव आत्मनां भगवत्स्वरूपमपि प्रथते इत्याह अतः कंचित्प्रमातारं प्रति प्रथयते विभुः। पूर्णमेव निजं रूपं कंचिदंशांशिकाक्रमात् ॥ १४० ॥ कञ्चित् इति–तीव्रनि सतावृतितारतम्यम्, अंशांशिकाक्रमात् इति-आवृति निसितारतम्यमन्दादिप्रायत्वात् ।। १४० ।। ननु किं नाम पारमेश्वरस्य रूपस्य पूर्णत्वमपूर्णत्वं च ? इत्याशङ्कयाह विश्वभावैकभावात्मस्वरूपप्रथनं हि यत् । अणूनां तत्परं ज्ञानं तदन्यदपरं बहु ॥ १४१ ॥ विश्वेषां नीलसुखादीनां भावानां य एको भाव: प्रकाशमानत्वान्यथानुपपत्त्या बतलाया जायेगा । जैसा कि कहेंगे ‘विज्ञानभिद् प्रकरण में सबका क्रम से नाम सङ्कीर्तन होगा ।’ ग्रन्थ विस्तार के भय से हमने उसे प्रतिपद नहीं दिखाया । उसे स्वयं समझ लेना चाहिए ।। १३९ ।। मलक्षय के तारतम्य के अनुसार ही आत्माओं को भगवान् का स्वरूप भी प्रकट होता है-यह कहते हैं इसलिए व्यापक (परमेश्वर) किसी प्रमाता के लिए अपना पूर्णरूप प्रकट करता है और किसी के लिए अंश-अंशिक क्रम से (प्रकाशित करता है) ।। १४० ।। किसी (प्रमाता) को-आवरण का तीव्रक्षय जिसे हुआ है उसको । अंशअंशी के क्रम से = आवरणक्षय के क्रम के मन्द आदि रूप होने से ।। १४० ।। परमेश्वर के रूप की पूर्णता अपूर्णता क्या है ? यह शङ्का कर कहते हैं जो समस्त भावों के एक (= प्रधान) भाव वाला स्वरूपप्रथन है वही अणुओं का परमज्ञान है । उससे अतिरिक्त जो (शाक्त आदि ज्ञान है) वह अपूर्ण और अनेक प्रकार का है ।। १४१ ।। __समस्त नील (= घट) सुख आदि भावों का जो, एक भाव = प्रकाशमानत्व की अन्यथा उपपत्ति न होने से परप्रकाशलक्षण वाली प्रधान सत्ता तत्स्वरूप जो स्व प्रथममाह्निकम् १४९ परप्रकाशलक्षणा प्रधाना सत्ता, तदात्म यत् स्वस्य आत्मनो रूपं तस्य यत्प्रथनम्-अविकल्पवृत्त्या साक्षात्करणम्, तत् एव अणूनां परं पूर्ण पारमेश्वरं ज्ञानम्, तत एवंविधात् पूर्णात् ज्ञानात् अन्यत् विकल्पात्मकं शाक्तादि ज्ञानम्, अपरं चित्स्वरूपप्रथाविरहादपूर्णम्, बहुवक्ष्यमाणप्रकारेण अनेकप्रकारम् इत्यर्थः ।। १४१ ।। तदेव बहुप्रकारत्वं दर्शयति तच्च साक्षादुपायेन तदुपायादिनापि च । प्रथमानं विचित्राभिर्भगीभिरिह भिद्यते ॥ १४२ ॥ तत् इति–परमपरं वा ज्ञानम् । साक्षादुपायेन इति-शाम्भवेन । तदेव हि अव्यवहितं परज्ञानावाप्तौ निमित्तम्, स एव परां काष्ठां प्राप्तश्चानुपाय इत्युच्यते । अत एव अनुपायः इति नोपायनिषेधमात्रम् इति वक्ष्यते । तस्य शाम्भवस्य उपायः शाक्तः, आदिशब्दात् तस्यापि उपाय आणवः । भिद्यते इति औपचारिक भेदमेति—इत्यर्थः ।। १४२ ।। न केवलमेवं यावदन्यदपि एतद्वैचित्र्ये निमित्तमस्ति—इत्याह तत्रापि स्वपरद्वारद्वारित्वात्सर्वशोंऽशशः । = अपना रूप, उसका जो प्रथन = निर्विकल्पक वृत्ति से साक्षात्कार, वही जीवात्माओं के लिये पारमेश्वर ज्ञान होता है । उससे = इस प्रकार के पूर्ण ज्ञान से, भिन्न जो विकल्पात्मक शाक्त आदि ज्ञान है वह अपर = चित्तस्वरूप प्रसरण से भिन्न अपूर्ण तथा बहु = वक्ष्यमाण रीति से अनेक प्रकार का है ।। १४१ ।। उसी बहुप्रकारता को दिखला रहे है वह (पर अथवा अपर ज्ञान) साक्षात् उपाय के द्वारा अथवा उस (= साक्षात् अर्थात् शाम्भ्व उपाय) के उपाय (= शाक्तोपाय आदि) के द्वारा विस्तृत होता हुआ विचित्र भंगिमाओं के द्वारा (अनेक रूपों में) भिन्न होता है ।। १४२ ।। तत् = पर या अपर ज्ञान । साक्षात् उपाय के द्वारा = शाम्भवोपाय के द्वारा, वहीं पर ज्ञान की प्राप्ति में अव्यवहित कारण है । और वही (= शाम्भवोपाय) जब चरम अवस्था को प्राप्त हो जाता है तो अनुपाय कहलाता है । इसीलिये अनुपाय का अर्थ उपाय का निषेधामात्र नहीं है-यह कहेंगे । उसका = शाम्भवोपाय का, उपाय शाक्तोपाय है । आदि शब्द से उसका भी उपाय आणवोपाय है । भिन्न होता है-औपचारिक भेद को प्राप्त करता है ।। १४२ ।। केवल यही नहीं इस वैचित्र्य के अन्य भी कारण हैं—यह कहते हैं उसमें भी स्व-पर, द्वार-द्वारि होने से सर्वांशतः एवं पूर्णांशत: १५० श्रीतन्त्रालोकः ____व्यवधानाव्यवधिना भूयान्भेदः प्रवर्तते ॥ १४३ ॥ स्वेन, यथा- शाम्भवेन शाम्भवम्, अत एव स्वपरलक्षणेन द्वारेण, द्वारि सोपायम् । सर्वश: इति–पूर्णात्मना । अंशश इति-अपूर्णेन । व्यवधान इति–साक्षादुपायत्वाभावात् । एवं प्रथमं तावदुपायस्त्रेधा-शाम्भवादिभेदात्, तेषां च द्वारद्वारिभावेन प्रत्येकं द्वैधे षट्, तत्रापि प्रत्येकं पूर्णत्वापूर्णत्वेन द्वैधे द्वादश, तेषां च प्रत्येकं व्यवहिताव्यवहितत्वेन द्वैधे चतुर्विंशतिः । व्यवधानं च बहुभिर्विजातीयैः, इति भेदानां भूयस्त्वम् ।। १४३ ।। ___ ननु ज्ञानं तावदुपेयतया प्रतिज्ञातम् इति, तत्र उपायेन केनचिद्भाव्यम्, सच न ज्ञानमेव, उपेयत्वात्, नापि अज्ञानम्, तदनौपयिकत्वात् तस्य, इति किं नाम उपायस्वरूपम् ? इत्याशङ्क्याह ज्ञानस्य चाभ्युपायो यो न तदज्ञानमुच्यते । ज्ञानमेव तु तत्सूक्ष्म परं त्विच्छात्मकं मतम् ॥ १४४ ॥ किं तु तत्सूक्ष्मम् वैकल्पिकस्थूलशाक्तादिज्ञानविलक्षणं मतम् इति–सम्बन्धः । अत एव परम्-शाम्भवम्-इत्यर्थः । अत एव ‘इच्छात्मकम्’–इत्युक्तम् । तथा व्यवधान और व्यवधानाभाव के द्वारा (उसका) अनेक भेद होता है) ।। १४३ ।। में अपने-जैसे के शाम्भव से शाम्भव, इसलिये स्वपरलक्षण वाले द्वार से, द्वारि = उपायसहित । सर्वश: = पूर्णरूप से । अंशश: = अपूर्ण रूप से । व्यवधान = साक्षात् उपाय न होने से । इस प्रकार शाम्भव आदि भेद से उपाय के प्रथम-प्रथम तीन प्रकार हैं । उनका फिर द्वार-द्वारि भाव से प्रत्येक का दो-दो भेद होने पर छः । उसमें भी प्रत्येक का पूर्ण-अपूर्ण भेद से दो प्रकार होने पर बारह और उनमे प्रत्येक का व्यवहित और अव्यवहित भेद से दो प्रकार होने से चौबीस । यह व्यवधान अनेक विजातीयों के कारण और भी प्रकार का हो सकता है इस विधि से भेदों के अनेक प्रकार हो जाते हैं ।। १४३ ।। ज्ञान को उपेय माना गया है तो फिर उसका कोई उपाय होना चाहिये और वह उपाय ज्ञान नहीं हो सकता क्योंकि वह उपेय है, अज्ञान भी नहीं हो सकता क्योंकि वह उसका उपाय ही नहीं हो सकता । फिर उपाय का स्वरूप क्या है ? -यह शङ्का कर कहते हैं जो ज्ञान का उपाय है वह अज्ञान नहीं कहा जा सकता अपितु (संविद्रूप ज्ञान का उपाय भी है) वह पर ज्ञान सूक्ष्म इच्छात्मक (वही) माना गया है ।। १४४ ।। किन्तु वह सूक्ष्म है = वैकल्पिक स्थूल शाक्त आदि ज्ञान से विलक्षण माना प्रथममाह्निकम् १५१ शाक्ताणवयोर्हि ज्ञानक्रियात्मकत्वं भवेत्-इति भावः ।। १४४ ।। ननु एवमपि कथमेकस्यैव उपायोपेयभावः सङ्गच्छते ? इत्याशङ्कयाह उपायोपेयभावस्तु ज्ञानस्य स्थौल्यविश्रमः । एषैव च क्रियाशक्तिर्बन्धमोक्षैककारणम् ॥ १४५ ॥ स्थौल्यम् चिदानन्दैकघनपरसूक्ष्मस्वरूपनिमज्जनादनन्तग्राह्यग्राहकात्मना भेदेन उल्लसनम्, तत्कृतोऽयं भ्रम:-यत् ‘इदमुपेयम्’ अयमुपायः’ इति । वस्तुतो हि परप्रकाशात्मा शिव एव उपेयः, स च सर्वत एवावभासते, तस्य क्वचिदपि अनपायात् । अत एव नात्र उपायानां किञ्चित्प्रयोजनम्, अज्ञातज्ञापकत्वात् तेषाम् । तदुक्तम् ‘अपरोक्षे भवत्तत्त्वे सर्वतः प्रकटे स्थिते । यैरुपाया: प्रतन्यन्ते नूनं त्वां न विदन्ति ते ।।’ इति । अनेनैव आशयेन च अनुपायनिरूपणं करिष्यते । ननु यद्येवं तत्कथमयं व्यवहार: प्ररोहमुपारोहते ? इत्याशङ्कयाह-एषैव इत्यादि । क्रियाशक्तिः इति तत्तद्भेदवैचित्र्यावस्थितिकारित्वात् । तेन परमेश्वरस्फार एवायम्-इत्याशयः । अत गया है । इसीलिये वह पर = शाम्भव है । इसीलिये ‘इच्छात्मक’ कहा गया । शाक्तोपाय और आणवोपाय ज्ञानरूप एवं क्रियारूप होता है ।। १४४ ।। - ऐसा होने पर भी एक ही ज्ञान उपाय और उपेय दोनों कैसे हो सकता है ? -यह शङ्का कर कहते हैं (एक ही) ज्ञान का उपायउपेयभाव (उसका) अनन्त ग्राह्यग्राहक रूप भेद से उल्लास वाला भ्रम मात्र है । और यही क्रिया शक्ति है जो बन्धन और मोक्ष का एकमात्र कारण है ।। १४५ ।। स्थूलता = चिदानन्दैकघन पर सूक्ष्म स्वरूप में निमज्जन करने से अनन्त ग्राह्यग्राहक रूप भेद से उल्लास । तो यह भ्रम कहाँ से हो गया कि यह उपेय है। वस्तुत: उपेय तो परप्रकाश रूप शिव ही है और वह सर्वत्र सब प्रकार से भासित होता है । उसका कहीं भी अभाव नहीं है । इसलिए इस विषय में उपयों का कोई प्रयोजन नहीं है। क्योंकि वे (= प्रयोजन) अज्ञात के ज्ञापक होते हैं । वही कहा गया (हे परमेश्वर !) तत्त्व स्वरूप आप जब अपरोक्ष और सर्वतः प्रकट रूप में वर्तमान हैं तो जो लोग (आपको जानने के लिये) उपाय ढूंढ़ते हैं वे निश्चित रूप से आपको नहीं जानते । इसी आशय से अनुपाय का निरूपण किया जायेगा । यदि ऐसा हो तो यह (उपाय-उपेय का) व्यवहार कहाँ से उत्पन्न होता है ? यह शङ्का कर कहते हैं श्रीतन्त्रालोकः एवायम् तथात्वेन अज्ञातो बन्धकः, ज्ञातस्तु मोचकः, तदाह ‘बन्धमोक्षककारणम्’ इति । यदुक्तम् ‘सेयं क्रियात्मिका शक्ति: शिवस्य पशुवर्तिनी । बन्धयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्ध्युपपादिका ।।’ इति ।। १४५।। नन् एवमपि अत्र किं नाम उपायतया संमतम् ? इत्याशङ्कयाह तत्राद्ये स्वपरामर्श निर्विकल्पैकधामनि । यत्स्फुरेत्प्रकटं साक्षात्तदिच्छाख्यं प्रकीर्त्तितम् ॥ १४६ ॥ तत्र एवं सति, आद्ये प्राथमिकालोचनज्ञानात्मनि, अत एव निर्विकल्पोत्थे, अत एव भिन्नस्य परामृश्यस्य अनुल्लासात् स्वपरामर्श स्फुरत्तामात्ररूपे यत् प्रकटं स्फुरेत्, साक्षात्कारात्मतया यत् स्फुरणं तत् साक्षात् इच्छाख्यं प्रकीर्तितम्, उपायान्तरनिरपेक्षत्वात्, अव्यवधानेच्छाशक्तिस्फाररूप: शाम्भवाख्य उपाय उक्तः -इत्यर्थः || १४६ ।। एतदेव दृष्टान्तोपदेशेन स्फुटीकर्तुमाह यही इत्यादि । तत्तद् भेदवैचित्र्य को बनाने के कारण वह क्रियाशक्ति है । इसलिये यह परमेश्वर का आनन्दोच्छलन ही है-यह आशय है । इसलिये यह वैसा (= यथार्थ स्वरूप में) ज्ञात न होने से बन्ध का कारण बनता है और उस रूप के ज्ञात होने पर मुक्तिप्रद हो जाता है । वही कहा—बन्ध और मोक्ष का (वह) एक मात्र कारण है । जैसा कि कहा गया ‘शिव की यह क्रियात्मिका शक्ति पशु के अन्दर रहती है । अपने मार्ग (= भेदप्रसार) में रहने पर वह बन्ध का कारण बनती है और ज्ञात होने पर सिद्धि (मोक्ष) को देती है ।। १४५ ।। फिर यहाँ उपाय के रूप में क्या माना गया ?– यह शङ्का कर कहते हैं इस स्थिति में प्राथमिक आलोचनात्मक निर्विकल्पक स्वरूप स्वपरामर्श में जो स्पष्टतया स्फुरित होता है साक्षात् (स्फुरित होने के कारण) वह इच्छोपाय नाम से कहा गया है ।। १४६ ।। ___ वहाँ = ऐसा होने पर, प्रथम = पहले आलोचन ज्ञान स्वरूप इसलिये निर्विकल्पक ज्ञान से उत्पन्न, इसलिए भिन्न का = परामृश्य का, उल्लासन होने से अपने परामर्श में = जो कि स्फुरत्तामात्र होता है उसमें, जो प्रकटरूप में स्फुरित होता है = साक्षात् रूप से जो स्फुरण होता है, वह साक्षात् इच्छा कहा गया है क्योंकि उसे किसी अन्य उपाय की अपेक्षा नहीं होती । तात्पर्य यह है कि वह व्यवधान इच्छाशक्ति का स्फार है और वही शाम्भवोपाय कहा जाता है ।। १४६ ।। यही बात दृष्टान्त देकर स्पष्ट करने के लिये कहते हैं प्रथममाह्निकम् १५३ यथा विस्फुरितदृशामनुसन्धिं विनाप्यलम् । भाति भावः स्फुटस्तद्वत्केषामपि शिवात्मता ॥ १४७ ॥ भयो भयो विकल्पांशनिश्चयक्रमचर्चनात । यत्परामर्शमभ्येति ज्ञानोपायं तु तद्विदुः ॥ १४८ ॥ तथैव ‘आत्मैवेदं सर्वम्’ इत्येवमात्मनो विकल्पस्य आत्मानात्माख्यांश द्वयाक्षेपित्वेऽपि प्रतियोगिनिषेधपूर्वको योऽयं पौन:पुन्येन अंशरूपो निश्चयः तस्य यत् क्रमेण चर्चनम् यथायथं स्फुटताभावित्वादिना संस्करणम्, ततो यत् विकल्प्यमानमात्मस्वरूपपरामर्शम् इत्थमेव इदम्’ इत्येवं प्रतीतिमभिन्नां साक्षात्कारात्मता मभ्येति, तज्ज्ञानोपायं विदुः-ज्ञानशक्तिस्फारात्मकं शाक्तमुपायं जानीयु:-इत्यर्थः । तु-शब्द: पूर्वस्माद्व्यतिरेचकः । इह हि विकल्प एव क्रमेण निर्विकल्पतामेति–इत्युक्तम् । तत्र पुनर्निर्विकल्पतयैव साक्षात्करणं रूपम्, अत एव च अनयोरिद्वारभावः ।। १४७-१४८ ।। यत्तु तत्कल्पनाक्लुप्तबहिर्भूतार्थसाधनम्। क्रियोपायं तदाम्नातं भेदो नात्रापवर्गगः ॥ १४९ ॥ तथा तत् आत्मस्वरूपं क्रियोपायमाम्नातम्-क्रियाशक्तिस्फारात्मकाणवो जिस प्रकार स्पष्ट दृष्टि वालों को विना किसी अनुसन्धि (= उपकरण) के पदार्थों का पर्याप्त स्पष्ट भान होता है उसी प्रकार कुछ लोगों को शिवात्मा (का आभास होता है) । बार-बार विकल्पांश के निश्चय के क्रम की चर्चा के द्वारा (साधक) जिस परामर्श को प्राप्त होता है उसे ज्ञानोपाय जानना चाहिए ।। १४७-१४८ ।। ‘यह सब आत्मा ही है। इस प्रकार आत्मा के विषय में उत्पन्न विकल्प आत्मा और अनात्मा नामक दो अंशो की अपेक्षा रखता है । इसमें प्रतियोगी (= अनात्मा) का निषेध करने के बाद जो यह बार-बार अंश रूप निश्चय होता है, उसकी जो क्रम से चर्चा होती है = यथार्थ रूप में प्रकटीकरण रूप संस्कार होता है, उससे ‘यह ऐसा ही है’-इस प्रकार का जो विकल्प्यमान आत्मस्वरूप का परामर्श = साक्षात्काररूपा अभिन्न प्रतीति होती है वही ज्ञानोपाय है (ऐसा विद्वान् लोग मानते हैं) = ज्ञानशक्ति का स्फार ही शाक्तोपाय है = ऐसा जानते हैं । ‘तु’ शब्द पूर्ववर्णित शाम्भवोपाय से भिन्नता को बतलाता है । यहाँ विकल्प ही क्रम से निर्विकल्पता को प्राप्त होता है-यह कहा गया । वहाँ निर्विकल्पक रूप में ही साक्षात्कार होता है । इसीलिये इन दोनों (शाक्तोपाय और शाम्भवोपाय) का द्वार-द्वारि सम्बन्ध है ।। १४७-१४८ ।। जो उस (= भेदप्रथावाली) कल्पना से कल्पित बाह्यभूत अर्थ का साधन है वह क्रियोपाय कहा गया है यहाँ अपवर्गगत भेद नहीं है ।। १४९ ।। १५४ श्रीतन्त्रालोकः पायसमधिगम्यं सर्वागमेषु उक्तम् । यतस्ताभिः भेदप्रथामयीभिः कल्पनाभिः, क्लुप्त: स्वशिल्पेन कल्पितः, बहिर्भूतोऽवच्छिन्नो योऽसौ उच्चारादि: अर्थ: तत्साधनम्, तुशब्दो व्यतिरेके । शाक्ते हि विकल्प एव अर्थः, इह तु बांह्योऽपि इति, अत एव न तत्र उच्चारादिः । ननु उपायभेदादुपेयभेदोऽपि स्याद् ? इत्याशङ्क्योक्तम् ‘भेदो नात्रापवर्गगः’ इति । स्वरूपप्रथनं हि अपवर्गः, तच्च सर्वैरव हि द्वारद्वारिभावेन भवति इति भावः ।। १४९ ।। ननु ज्ञानमेव उपायः इति सामान्येन प्रतिज्ञातम्, तत्कथमाणवे क्रियोपायत्वमुक्तम् ? इत्याशङ्क्याह यतो नान्या क्रिया नाम ज्ञानमेव हि तत्तथा । रूढेर्योगान्ततां प्राप्तमिति श्रीगमशासने ॥ १५०॥ अन्या इति अर्थाज्ज्ञानात्, यतः तज्ज्ञानमेव रूढेः प्ररोहात् योगस्यान्तः पराकाष्ठा, तत्त्वं प्राप्तं सत तथा ‘क्रिया’ इति सर्वत्र अभिधीयते-इत्यर्थः । नन अत्र किं प्रमाणम् ? इत्याशयोक्तम् ‘इति श्रीगमशासने’ इति, अर्थादुक्तम् इति शेषः ।। १५० ।।। तद् = आत्मस्वरूप । क्रियोपाय = क्रियाशक्ति के स्फारस्वरूप आणवोपाय से प्राप्य । आम्नात = सब आगमों में कहा गया । क्योंकि उनके द्वारा भेदप्रथामयी कल्पनाओं के द्वारा, क्लुप्त = अपनी शिल्पकला के द्वारा कल्पित । बहिर्भूत = अवच्छिन्न, जो यह उच्चार आदि अर्थ, उसका साधन । (श्लोक में) ‘तु’ शब्द भिन्नता को बतलाता है । शाक्तोपाय में विकल्प ही अर्थ (= विषय) होता है लेकिन यहाँ (आणवोपाय में) बाह्य पदार्थ भी (साधना के) विषय बनते हैं । इसलिये इसमें उच्चार आदि नहीं होते । प्रश्न है कि उपाय के भेद से उपेय का भेद भी होना चाहिये?—यह शङ्का कर कहा गया कि अपवर्ग में यह भेद नहीं होता । स्वरूप का भान ही अपवर्ग है और वह सभी (उपायों) के द्वारा द्वारद्वारि भाव से होता है ।। १४९ ।। __ज्ञान ही उपाय है-ऐसा सामान्य रूप से कहा गया । तो फिर आणवोपाय को क्रियोपाय कैसे कहा गया ?-यह शङ्का कर कहते हैं __क्रिया कोई दूसरी वस्तु नहीं है । वह ज्ञान ही है क्योंकि (वह ज्ञान ही) रूढि से योग की पराकाष्ठा को प्राप्त हआ है-ऐसा श्रीगमशास्त्र में (= कहा गया है) ।। १५० ।। (क्रिया) ज्ञान से भिन्न नहीं है । क्योंकि वह ज्ञान ही रूढ़ि अर्थात् प्ररोह के कारण योग का अन्त = पराकाष्ठा (= अन्तिम सीमा) है। तत्त्व प्राप्त होकर वैसा = क्रिया नाम से सर्वत्र उक्त होता है । इसमें क्या प्रमाण है?—यह शङ्का कर कहा गया-श्रीगमशास्त्र में । अर्थत: (यह बात कही गयी है ।। १५० ।।१५५ प्रथममाह्निकम् तत्रत्यमेव ग्रन्थं पठति योगो नान्यः क्रिया नान्या तत्त्वारूढा हि या मतिः । स्वचित्तवासनाशान्तौ सा क्रियेत्यभिधीयते ॥१५१॥ इति ।। १५१ ।। एतच्च स्वयमेव व्याचष्टे स्वचित्ते वासनाः कर्ममलमायाप्रसूतयः । तासां शान्तिनिमित्तं या मतिः संवित्स्वभाविका ॥ १५२ ॥ सा देहारम्भिबाह्यस्थतत्त्ववाताधिशायिनी । क्रिया सैव च योग: स्यात्तत्त्वानां चिल्लयीकृतौ ॥ १५३ ॥ ‘निमित्तम्’ इत्यनेन सप्तमी व्याख्याता । संवित्स्वभाविका इत्यनेन मतेर्ज्ञानार्थत्वमुक्तम् । सा मति: ‘प्रणवेन तु तत्सर्वं शरीरोत्पत्तिकारणम् । न्यसेत्क्रमेण देवेशि त्रिंशदेकं च संख्यया ।।’ इत्याद्युक्त्या तत्त्वदीक्षादिना साधारणानि तत्त्वानि अधिशयाना स्वचित्त वासनाशान्तिकारित्वात् क्रिया स्यात् । तथा सैव वहीं के ग्रन्थ को पढ़ते है योग कोई भिन्न वस्तु नहीं । क्रिया भी कोई भिन्न नहीं । जो तत्त्व को प्राप्त बुद्धि है, अपने चित्त की वासना के शान्त होने पर वह क्रिया कही जाती है ।। १५१ ।। इसकी स्वयं व्याख्या करते हैं अपने चित्त में कर्म मल एवं माया से उत्पन्न (जो) वासनाएँ है उनकी शान्ति के लिए जो संवित् स्वभाववाली बुद्धि है वहीं (शुद्ध) शरीर के आरम्भक (तत्त्व) तथा बाह्य तत्त्वसमूहों को अधिकृत करती हुई क्रिया मानी जाती है । और वही तत्त्वों का चित् में लय हो जाने पर योग (कही जाती है) ।। १५२-१५३ ।। श्लोकोक्त ‘निमित्तम्’ पद से सप्तमी कही गयी है । (इसलिये ‘निमित्तम्’ के स्थान पर ‘निमित्ते’ समझना चाहिये) । संवित्स्वभाविका-इस पद के द्वारा मति शब्द का अर्थ है-ज्ञान । वह मति ‘हे देवेशि ! शरीरोत्पत्ति के समस्त कारणों का प्रणव के द्वारा ३१ की संख्या से क्रमश: न्यास करना चाहिये ।’ इत्यादि उक्ति के द्वारा शुद्ध देह के आरम्भक तत्त्व असाधारण कहे जाते हैं । श्रीतन्त्रालोकः ‘योगमेकत्वमिच्छन्ति वस्तुनोऽन्येन वस्तुना ।’ इत्याद्युक्त्या तत्त्वानां चितियोजनाद्योग: स्यात् इति नानयोर्ज्ञानातिरेक: इति युक्तमुक्तम्-‘योगो नान्यः क्रिया नान्या’ इति ।। १५२-१५३ ।। ननु कथं ज्ञानमेव क्रिया भवेत् ? इति दृष्टान्तोपदर्शनेन उपपादयति लोकेऽपि किल गच्छामीत्येवमन्तः स्फुरैव या । सा देहं देशमक्षांश्चाप्याविशन्ती गतिक्रिया ॥ १५४ ।। अन्त: आत्मनि ‘गच्छामि’ इति या स्फुरा स्फुरणम् उद्यन्तृतात्मिका संवित्, सैव देहाद्याविशन्ती वैवश्याविष्करणेन स्वमयतामापादयन्ती गमनक्रिया भवति, इति युक्तमुक्तं ‘ज्ञानमेव हि तत्तथा’ इति । गन्तुर्हि ‘गच्छामि’ इति स्फुरणायां सत्यां कर्तृकरणकर्मात्मकशरीरपादग्रामाद्यावेशेन गमनक्रियासंपत्ति: स्यात् ।। १५४ ।। तथा हे वरानने ! हेय अध्वाओं को नीचे (= गौण) करते हुए उसे छोड़ना चाहिये। (यह प्रक्रिया तब तक चलनी चाहिये) जब तक समना स्तर की प्राप्ति न हो जाय । इत्यादि उक्ति के अनुसार बाह्यस्थ तत्त्वदीक्षा आदि तत्त्व साधारण कहे जाते हैं। (इन असाधारण और साधारण तत्त्वों में) रहने वाली (संवित्) अपने चित्त की वासना को शान्त करने के कारण क्रिया कही जाती है । और वही ‘एक वस्तु का दूसरी वस्तु से एकत्व ही योग (कहलाता) है ।’ इत्यादि उक्ति के अनुसार तत्त्वों का चैतन्य (= ज्ञान) से योजन ही योग है । इसलिये ये (क्रिया और योग) दोनों ज्ञान से भिन्न नहीं हैं । इस प्रकार ठीक ही कहा गया—योग (ज्ञान से) भिन्न नहीं और क्रिया (भी ज्ञान से) भिन्न नहीं है’ ।। १५२-१५३ ।। प्रश्न है कि ज्ञान ही क्रिया कैसे हो जाता है ? इसको दृष्टान्त के द्वारा सिद्ध करते हैं लोक में भी ‘जाता हूँ’ इस प्रकार जो अन्त:करण में स्फुरण होता है वही शरीर प्रदेश एवं इन्द्रियों में प्रवेश करती हुई गति क्रिया कहलाती है ।। १५४ ।। अन्तः = आत्मा में ‘जाता हूँ’ इस प्रकार का जो स्फुरण = गमनात्मिका संवित, वही देह आदि में आविष्ट होती हई (देह इन्द्रिय आदि) को विवश कर जब स्वमय (= संविन्मय) कर देती है तब वही गमन क्रिया बन जाती है । इसलिये ठीक ही कहा—वह उस प्रकार ज्ञान ही है ।’ जाने वाले के अन्दर ‘जाऊँ’ ऐसी स्फुरत्ता होने पर कर्ता, करण, कर्म रूप, शरीर, पैर आदि से आवेश के द्वारा प्रथममाह्निकम् तदेवोपसंहरति तस्मात्क्रियापि या नाम ज्ञानमेव हि सा ततः। ज्ञानमेव विमोक्षाय युक्तं चैतदुदाहतम् ।। १५५ ॥ तत: इति—क्रियाया ज्ञानात्मकत्वात् । तेन ‘दीक्षैव मोचयत्यूचं शैवं धाम नयत्यपि ।’ इत्यादिना क्रियाया अपि अपवर्गनिमित्तत्वमुक्तम् । एवं च युक्तमुक्तम्- ‘ज्ञानं मोक्षककारणम्’ इति । तदाह—‘युक्तं चैतदुदाहृतम्’ इति ।। १५५ ।। ननु ‘स्वतन्त्रात्मातिरिक्तस्तु’ इत्यादिना प्राक् आत्मज्ञानातिरिक्तो मोक्षो नाम न कश्चिदस्ति इत्युक्तम्, इति ज्ञानमेव विमोक्षाय इत्यनेन हेतुफलभावोऽनयोरुच्य मान: कथं सङ्गच्छते ? इत्याशङ्क्याह मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूपप्रथनं हि सः । स्वरूपं चात्मनः संविन्नान्यत्तत्र तु याः पुनः ॥ १५६ ॥ क्रियादिकाः शक्तयस्ताः संविद्रूपाधिका नहि । असंविद्रूपतायोगाद्धर्मिणश्चानिरूपणात् ॥१५७ ॥ गमनक्रिया सम्पन्न होती है ।। १५४ ।। उसी का उपसंहार करते हैं इसलिए जो क्रिया है वह भी ज्ञान ही है इसीलिए ज्ञान ही मोक्ष के लिए (उचित एवं समर्थ साधन है) यह ठीक ही कहा गया है ।। १५५ ॥ इस कारण = क्रिया के ज्ञानात्मक होने के कारण । इसलिये ‘दीक्षा ही (जीव को) मुक्त करती है और ऊर्ध्ववर्ती शैव धाम को ले जाती है। इत्यादि के द्वारा क्रिया को भी मोक्ष को कारण कहा गया है । इसीलिये ठीक कहा गया, ज्ञान ही मोक्ष का एकमात्र कारण है । ‘वही कहा-यह ठीक ही कहा गया’ ।। १५५ ।।
  • ‘स्वतन्त्र आत्मा के अतिरिक्त मोक्ष और कुछ नहीं है इत्यादि के द्वारा आत्मज्ञान से अतिरिक्त मोक्ष नाम की कोई और वस्तु नहीं है-ऐसा पहले कहा गया । इस प्रकार ‘ज्ञान ही विमोक्ष के लिये’ (समर्थ) है इस (कथन) के द्वारा इन दोनों (= ज्ञान और मोक्ष) का कारणकार्य भाव कैसे संगत होगा ?– यह शङ्का कर कहते हैं मोक्ष कोई दूसरी वस्तु नहीं, वह स्वरूप का विस्तार हैं । और स्वरूप आत्मसंवित् है दूसरा कुछ नहीं । उसमें जो क्रिया आदि १५८ श्रीतन्त्रालोकः नन् स्वरूपमेव नाम किं यस्यापि प्रथनं मोक्ष: स्यात् ? इत्याह-स्वरूपम् इति, तेन स्वस्य आत्मनो रूपम् संविञ्चैतन्यम्, तस्य प्रथनम् यथातत्त्वम् ज्ञानम्, स एव मोक्षः इति यथोक्तमेव युक्तम् । यः पुनरयं हेतुफलभाव उक्तः स काल्पनिक एव, न तात्त्विकः, यद्वक्ष्यति ___ ‘यतो ज्ञानेन मोक्षस्य या हेतुफलतोदिता । न सा मुख्या ……………………… ।। इति । अन्यत् इति संविदतिरिक्तम्-इत्यर्थः । ननु आत्मनः संविदतिरिक्तं यदि रूपं नास्ति, तत्कथमस्य शक्त्यन्तरयोगित्वं स्यात् ? इत्याशङ्कयाह-तत्र इत्यादि, तु-शब्द: चार्थे ।। १५६-१५७ ।। ननु ‘पत्युर्धर्माः शक्तयः स्युः …………… ।’ इत्याद्युक्त्या साक्षात्पत्युर्धर्मितया शक्तीनां च धर्मतया निरूपणं कृतम् इति धर्मिणश्च अनिरूपणात् इत्यसिद्धोऽयं हेतु: ? इत्याशङ्कयाह परमेश्वरशास्त्रे हि न च काणाददष्टिवत । शक्तियाँ हैं वे असंविद्पता का योग होने से तथा धर्मी का निरूपण न होने से संविद् रूप से नहीं है ।। १५६-१५७ ।। प्रश्न है कि स्वरूप ही क्या है जिसका विस्तार ही मोक्ष है? –(इस प्रश्न के उत्तर में) कहा-स्वरूप… । स्व-अपना, रूप = संवित्चैतन्य, उसका प्रथन = यथार्थ ज्ञान, वही मोक्ष है । इसलिये जैसा कहा गया वह ठीक है । और जो कारणकार्य भाव कहा गया वह काल्पनिक है तात्त्विक नहीं । जैसा कि कहेंगे _ ‘ज्ञान के द्वारा मोक्ष (होता है) यह जो कारणकार्य भाव कहा गया वह मुख्य नहीं है… ।’ अन्यत् = संविद् से भिन्न । प्रश्न है कि यदि आत्मा का संविद् से भिन्न कोई दूसरा रूप नहीं है तो यह (= आत्मा) दूसरी शक्तियों से सम्बद्ध कैसे होता है? यह शङ्का कर कहते हैं-वहाँ…। ‘तु’ शब्द का अर्थ ‘और’ है ।। १५६-१५७ ।। प्रश्न है कि ‘शक्तियाँ पति (= परमेश्वर) के धर्म हैं’ इत्यादि कथन के द्वारा साक्षात् पति को धर्मी और शक्तियों को धर्म कहा गया। धर्मी का निरूपण न होने से यहाँ हेतु ही असिद्ध है ?-यह शङ्का कर कहते हैं वैशेषिक दर्शन की भाँति परमेश्वरशास्त्र में धर्मरूपशक्तियों का कोई प्रथममाह्निकम् शक्तीनां धर्मरूपाणामाश्रयः कोऽपि कथ्यते ॥ १५८ ॥ यथा खलु काणादा: ‘आत्मत्वाभिसंबन्धादात्मा ।’ इत्यादिना धर्मिरूपमात्मानं निरूप्य, ‘तस्य गुणा बुद्धिसुखदु:खेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्म संस्कारसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागा: ।’ इत्यादिना तत्समवेतम् आगमापायि भिन्नं धर्मजातम् अभ्युपागमन, नैवमिह शक्तितद्वतोर्धर्मधर्मिभाव: कश्चिद् अभिधीयते । पर एव हि स्वतन्त्रो बोधस्तत्तदु पाधिवशात् तत्तच्छक्तिरूपतया व्यपदिश्यते इति न वस्तुतः कश्चित् शक्ति तद्वतोर्भेदः यदुक्तं प्राक् ‘मातृक्लुप्ते हि भावस्य तत्र तत्र वपुष्यलम्। को भेदो वस्तुतो वह्वेर्दग्धृपक्तृत्वयोरिव ।।’ इति ।। १५८ ।। ननु यदि काणादादिदर्शनवत् इहापि धर्मधर्मिभावस्य निरूपणं क्रियते, तदा । को दोष: स्यात् ? इत्याशङ्कयाह ततश्च दृक्तियेच्छाद्या भिन्नाश्चच्छक्तयस्तथा । आश्रय नहीं कहा गया है ।। १५८ ।। जैसे वैशेषिक दर्शन वाले ‘आत्मत्व जाति के समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध होने | के कारण आत्मा है’ (प्र. पा. भा. १२) ___इत्यादि के द्वारा धर्मीस्वरूप आत्मा का निरूपण कर ‘उस (आत्मा) के बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, संस्कार संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग, गुण हैं ।’ इत्यादि के द्वारा उस, (= आत्मा) में समवेत, आगम और विनाश से भिन्न धर्मसमूह को स्वीकार करते हैं । इस शैव दर्शन में शक्ति और शक्तिमान् का कोई धर्मधर्मीभाव कथित नहीं है । स्वतन्त्र परबोध ही भिन्न-भिन्न उपाधियों के कारण भिन्न-भिन्न शक्ति के रूप में व्यवहत होता है । इसलिये शक्ति और शक्तिमान में वस्तुत: कोई भेद नहीं है । जैसा कि पहले कहा गया प्रमाता के द्वारा कल्पित पदार्थों के उन-उन स्वरूपों में वस्तुत: कोई भेद उसी प्रकार नहीं है जैसे वह्नि और उसके दग्धृत्व और पक्तृत्व में’ ।। १५८ ।। यदि वैशेषिक आदि दर्शनों की भाँति इस दर्शन में भी धर्मधर्मी भाव का निरूपण किया जाय तो क्या दोष होगा?–यह शङ्का कर कहते है (यदि) वैशेषिक दर्शन की भाँति यहाँ भी शक्ति और शक्तिमान् के १६० श्रीतन्त्रालोकः एक: शिव इतीयं वाग्वस्तुशून्यैव जायते ॥ १५९ ॥ यदि हि शक्तितद्वतोर्धर्मधर्मिभावन्यायेन वास्तव एव भेद: स्यात्, तदा ‘इत्थं नानाविधैः रूपैः स्थावरैः जङ्गमैरपि । क्रीडया प्रसृतो नित्यमेक एव शिवः प्रभुः ।।” इत्यादौ “एक एव शिव’ इति इयमीश्वराद्वयप्रतिज्ञात्मिका वाक् अनेकेषां शक्तितद्वदात्मनाम् अर्थानां सम्भवाद् वस्तुशून्या-अभिधेयरहिता स्यात्, अद्वयवादखण्डना भवति इति यावत् ।। १५९ ।। नन् यदि वस्तुतः संवित्स्वभाव: शिव एव एकोऽस्ति, तत्कथमयं चिदादिनानाशक्त्यात्मा व्यवहारोऽन्यथा क्रियते ? इत्याशङ्काम् उपसंहारभङ्ग्या उपशमयितुमाह तस्मात्संवित्त्वमेवैतत्स्वातन्त्र्यं तत्तदप्यलम्। विविच्यमानं बह्वीषु पर्यवस्यपि शक्तिषु ॥ १६० ॥ एतच्च निर्णीतपूर्वम् इति पुनरिह नायस्तम् । यथोक्तम् ‘बहुशक्तित्वमप्यस्य तच्छक्त्यैवावियुक्तता ।’ इति ।। १६० ।। बीच धर्मधर्मी सम्बन्ध का निरूपण किया जाता तो इच्छा-ज्ञान-क्रिया आदि शक्तियाँ भिन्न होती तो ‘शिव एक है ।’ यह कथन वस्तुशून्य ही हो जाता है (अर्थात् अद्वयवाद का खण्डन हो जाता) ।। १५९ ।। यदि शक्ति और शक्तिमान में धर्मधर्मी भाव के न्याय से वास्तविक भेद होता तो इस प्रकार एक ही समर्थ शिव स्थावर, जङ्गम नानारूपों से खेल में नित्य लगा (फैला) हुआ है ।’ इत्यादि में एक ही शिव’ ऐसी ईश्वर के अद्वयभाव वाली वाणी शक्ति शक्तिमान् वाले अनेक अर्थों के सम्भव होने से वस्तुशून्य = अभिधेयरहित हो जायेगी अर्थात् अद्वयवाद का खण्डन हो जायगा ।। १५९ ।। संवित्स्वभाव शिव यदि वस्तुत: एक ही है तो यह चेतन आदि अनेक शक्तियों वाला व्यवहार अन्यथा (= विपरीत) कैसे किया जा सकता है ?-इस आशङ्का का उपसंहार की भंगिमा से समाधान करते हैं इसलिए यह संवित्त्व ही स्वातन्त्र्य है । वह भी विवेचन करने पर अनेक शक्तियों में पर्यवसित होता है ।। १६० ।। इसका निर्णय पहले ही हो चुका है इसलिये यहाँ पुनः उसका विस्तार नहीं किया गया । जैसा कि कहा गया प्रथममाह्निकम् १६१ इह ‘आत्मज्ञानमेव मोक्षः’ इति ज्ञानमोक्षयोः कार्यकारणभाव एव वस्तुतो नास्ति-इति ‘नावश्यं कारणानि कार्यवन्ति भवन्ति’ इति न्यायेन ज्ञानिनां सत्यपि ज्ञानाख्ये कारणे कार्यात्मा मोक्षो न स्यात् इत्यनिष्टापादनात्मायं प्रसङ्गो नाशङ्कनीयः? –इत्याह-. यतश्चात्मप्रथा मोक्षस्तन्नेहाशक्यमीदृशम् । नावश्यं कारणात्कार्यं तज्ज्ञान्यपि न मुच्यते ॥ १६१ ॥ ज्ञानिनो हि अवश्यभाविनी मुक्ति:-इति भावः । अत एव च ‘तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ।।’ इति । तथा “………………. ज्ञानी त्वात्मैव मे मतः ।’ इत्यादि गीतम् ।। १६१ ।। ___‘इस (परमेश्वर) की बहुशक्तिता भी उस शक्ति से अवियुक्त होना ही है’ ।। १६० ।। इस शास्त्र में ‘आत्मज्ञान ही मोक्ष है’-इस प्रकार का कार्यकारण भाव ही वस्तुत: नहीं है । फिर जितने कारण हैं सबका कोई न कोई कार्य अवश्य होता है ऐसी बात नहीं है—इस सिद्धान्त के अनुसार ज्ञानियों के पास ज्ञान रूप कारण के । रहते हुए भी मोक्ष रूप कार्य नहीं होगा—ऐसा अनिष्ट लाने वाला यह प्रसङ्ग है | ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये—यह कहते हैं चूँकि आत्म का ज्ञान ही मोक्ष है इसलिए यहाँ ऐसी आशङ्का नहीं करनी चाहिए कि कारण से कार्य अवश्य नहीं होता इस कारण ज्ञानी मुक्त नहीं होता (अर्थात् ज्ञानी की मुक्ति अवश्य होती है) ।। १६१ ।। __ज्ञानी की मुक्ति अवश्य होती है-यह तात्पर्य है । इसीलिये भगवद् गीता उन (= आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी) में नित्य (= गुरु में “एकीभाव से स्थित हआ) अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी उत्तम है । मैं ज्ञानी के लिये अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे अत्यन्त प्रिय है ।’ तथा ‘ज्ञानी को (मैं) अपनी आत्मा मानता हूँ ।’ इत्यादि कहा गया है ।। १६१ ।। ११ त प्र १६२ श्रीतन्त्रालोकः ननु ‘ज्ञानमेव विमोक्षाय …………….. इत्यादिना ज्ञानमोक्षयोः कार्यकारणभाव उक्त एव, इति कथं नायं प्रसङ्गः? इत्याह यतो ज्ञानेन मोक्षस्य या हेतुफलतोदिता । न सा मुख्या, ततो नायं प्रसङ्ग इति निश्चितम् ।। १६२ ॥ एतच्च निर्णीतचरम् इति नेह पुनरायस्तम् ।। १६२ ।। एतदुपसंहरन्नन्यदवतारयति एवं ज्ञानस्वभावैव क्रिया स्थूलत्वमात्मनि । यतो वहति तेनास्यां चित्रता दृश्यतां किल॥ १६३ ॥ ज्ञानस्वभावा इति–क्रियाया ज्ञानाविनाभावित्वात् । यदुक्तम् ………………. न ज्ञानरहिता क्रिया ।।’ इति । स्थूलत्वम् इति–अन्तर्ग्राह्यग्राहकात्मना भेदेन उल्लासात् । तेन इति प्रश्न है कि ‘मोक्ष के लिये ज्ञान ही (साधन) है । इत्यादि के द्वारा ज्ञान और मोक्ष का कारणकार्य भाव कहा ही गया । तो फिर से क्यों नहीं मानते ?-इसके उत्तर में कहते हैं चूँकि ज्ञान के द्वारा मोक्ष की जो कारणकार्यता कही गई है वह मुख्य नहीं है इसलिए यह प्रसङ्ग (= नावश्यं कारणानि कार्यवन्ति भवन्ति) नहीं है यह निश्चित है ।। १६२ ।। इसका पहले ही निर्णय हो चुका है इसलिये यहाँ चर्चा नहीं की गयी ।। १६२ ।। इसका उपसंहार करते हुए दूसरे (प्रसङ्ग) को कह रहे है इस प्रकार क्रिया ज्ञानस्वभाव वाली ही है और चूँकि (वह) अपने अन्दर स्थूलता रखती है इस कारण इस (= क्रिया) में चित्रता (= ग्राह्यग्राहक आदि भेदवैचित्र्य) देखिए ।। १६३ ।। (क्रिया) ज्ञानस्वभाव वाली है अर्थात् ज्ञान के बिना क्रिया हो नहीं सकती। जैसा कि कहा गया ‘क्रिया (कभी भी) ज्ञानरहित नहीं होती ।’ स्थूलता—इसलिये कि अन्दर (= आत्मा में) ग्राह्यग्राहक रूप भेद के रूप में प्रथममाह्निकम् स्थूलतावहनेन हेतुना । चित्रता इति-तत्तद्ग्राह्यादिभेदवैचित्र्यात् ।। १६३ ।। अत एवाह क्रियोपायेऽभ्युपायानां ग्राह्यबाह्यविभेदिनाम्। भेदोपभेदवैविध्यान्निःसंख्यत्वमवान्तरात् ॥१६४ ॥ ग्राह्या: उच्चाराद्याः । बाह्याः कुण्डमण्डलादयः । उच्चारादयो हि ग्राह्य भूमिगता: बाह्यत्वेन अवसिता अपि चक्षुरादिबाह्येन्द्रियागोचरत्वात् प्रमात्रन्तरा साधारणत्वाच्च न बाह्या: । कुण्डमण्डलादयः पुनर्बाह्येन्द्रियगोचरत्वात् साधारण्याच्च बाह्याः सन्तो ग्राह्याः इत्युक्तम्-‘ग्राह्यबाह्यविभेदिनाम्’ इति । एवं नियतभेदवत्त्वेऽपि एषामेव अवान्तरभेदात् भेदोपभेदनानात्वात् निःसंख्यत्वम् बहुप्रकारत्वम्-इत्यर्थः । तथाहि-उच्चारस्य प्राणादिभेदात् प्रथमे पञ्च भेदाः, तत्रापि विन्दुनादादयो बहव उपभेदाः, एवमपि उच्चार्यमाणानां मन्त्राणामानन्त्यम् इत्यसंख्यभेदत्वम् ।। १६४ ।। एवं च ‘यतो नान्या क्रिया नाम .. उल्लास होता है । इसके कारण = स्थूलता धारण करने से । चित्रता- इसलिये कि तत्तद् ग्राह्य ग्राहक भेद की विचित्रता है ।। १६३ ।। इसीलिये कहते हैं क्रियोपाय में ग्राह्य एवं बाह्य भेदवाले उपायों का, भेदोपभेदक विविधता एवं उनके अवान्तर भेद के कारण असंख्यता है ।। १६४ ।। ग्राह्य = उच्चार आदि । बाह्य = कुण्ड मण्डल आदि । उच्चार आदि यद्यपि ग्राह्य की स्थिति में होने से बाह्य के रूप माने जाते हैं तथापि चक्षु आदि बाह्य इन्द्रियों का विषय न होने से तथा दूसरे प्रमाताओं के ज्ञान का विषय न होने से वे बाह्य नहीं हैं । जबकि कुण्ड मण्डल आदि बाह्य इन्द्रियों का विषय होने से तथा सर्वसाधारण (के प्रत्यक्ष का विषय) होने से बाह्य होने के कारण ग्राह्य है । इसलिये कहा गया-ग्राह्य बाह्य भेद वाले का । इस प्रकार नियतभेद वाले होने पर भी इन्हीं का अवान्तर भेद तथा भेदोपभेद होने से अनेक होने के कारण नि:संख्यत्व = अनेक प्रकार, होते हैं । वह इस प्रकार-उच्चार के प्राण आदि भेद से पहले पाँच भेद होते हैं । उनमें भी बिन्दु नाद आदि बहुत से उपभेद होते हैं । इस प्रकार भी उच्चार्यमाण मन्त्र भी अनन्त है । इस प्रकार इनका असंख्य भेद है ।। १६४।। इस प्रकार ‘क्योंकि क्रिया नाम की कोई वस्तु नहीं है’ में श्रीतन्त्रालोकः इत्यादिना उपक्रान्तं क्रियाया ज्ञानात्मकत्वं युक्त्यागमाभ्यां निर्वाहितम् इत्येक एव ज्ञानात्मा मोक्षावाप्तावुपाय इति न उपायनानात्वम्, अत एव तत्फलभूते मोक्षेऽपि न कश्चिद्भेद:-इत्याह अनेन चैतत्प्रध्वस्तं यत्केचन शशङ्किरे । उपायभेदान्मोक्षेऽपि भेदः स्यादिति सूरयः ॥ १६५ ॥ यत्केचन सूरय इति शशङ्किरे- इति सम्बन्धः । केचन सूरय इति भेदवादिनः । तत्र हि हेतुफलयोर्वास्तव एव भेदः इति हेतुभेदात् फलभेदोऽपि स्यात् । इह पुन: ‘प्रदेशो ब्रह्मणः सार्वरूप्यमनतिक्रान्तश्चाविकल्प्यश्च ।’ इत्यादिनीत्या ‘संविदेव सर्वम्’ इति को नाम हेतुफलभेदः, काल्पनिके- ऽपि हेतुफलयो/दे ज्ञानात्मा एक एव उपायोऽभ्युपगतः इति उपायनानात्वस्यैव अभावात् को नाम फलभूतेऽपि मोक्षे भेद: स्यात् ।। १६५ ।। ननु ‘तच्च साक्षादुपायेन इत्यादि के द्वारा सन्दर्भित क्रिया की ज्ञानात्मकता का युक्ति एवं आगम के द्वारा निर्वाह किया गया । इसलिये केवल ज्ञान ही मोक्ष की प्राप्ति में उपाय है । इस प्रकार मोक्ष के अनेक उपाय नहीं हैं । फलस्वरूप उस (ज्ञान) के फलभूत मोक्ष में भी कोई भेद नहीं है—यह कहते हैं इस कारण जो कुछ (भेदवादी) विद्वान् शङ्का किए कि उपायों का भेद होने से मोक्ष में भी भेद हो जाएगा, यह (शङ्का) ध्वस्त हो गयी ।। १६५ ।। ‘जो कुछ विद्वानों ने आशङ्का की’-इस प्रकार सम्बन्ध जोड़ना चाहिये । कुछ विद्वान् = भेदवादी विद्वान् । इस विषय में हेतु और फल में वास्तविक भेद नहीं है जिससे कि हेतु के भेद से फलभेद हो जाय । और यहाँ ‘ब्रह्म का प्रदेश सार्वरूप्य का न तो अतिक्रमण करता है न उसका विकल्प है।’ इत्यादि नीति के द्वारा ‘संविद् ही सब कुछ है’ । इसलिये हेतु और फल में भेद कैसा । हेतु और फल का काल्पनिक भेद होने पर भी ज्ञानरूप उपाय एक ही माना गया है इसलिये अनेक उपाय न होने से फलभूत मोक्ष मे भेद कैसा ? ।। १६५ ।। ‘वह भी साक्षात् उपाय के द्वारा… ।‘प्रथममाह्निकम् १६५ इत्यादिना साक्षात् उपायनानात्वमुक्तम् इति कथं न तद्भेदादुपेयेऽपि भेदः? इत्याशङ्क्याह मलतच्छक्तिविध्वंसतिरोभूच्युतिमध्यतः । हेतुभेदेऽपि नो भिन्ना घटध्वंसादिवृत्तिवत् ॥ १६६ ॥ यत्र वास्तव एव हेतुफलभावोऽस्ति तत्रापि हेतोः दीक्षादेः भेदेऽपि तत्फलभूतस्य मलतच्छक्त्योर्विध्वंसादेः न कश्चिद्भेद:-कलातत्त्वभुवनादिना भेदेऽपि दीक्षायाः तस्य अविशेषात्, तथा च घटस्य मुद्गरकरभित्तिघटाद्युपायभेदेऽपि अविशिष्ट एव ध्वंसतिरोभावादिः । अतश्च अवश्यमेव हेतुभेदात् फलभेद: इति नायमेकान्तः । यत्र पुनः काल्पनिक एव उपायोपेयभावः, तत्र का नाम इयं वार्ता—इति भावः । तदेवम् इच्छाज्ञानक्रियात्मकत्वाद् उपायस्य त्रैविध्येऽपि तदुपेयभूतेऽपवर्गे न कश्चित् भेद:- इति सिद्धम् ।। १६६ ।। न केवलं यक्तित एव एतत्सिद्धं यावदागमतोऽपि-इत्याह तदेतत्रिविधत्वं हि शास्त्रे श्रीपूर्वनामनि । आदेशि परमेशित्रा समावेशविनिर्णये ॥ १६७ ॥ इत्यादि उक्ति के द्वारा साक्षात् उपाय की अनेकता कही गयी है फिर उसके भेद के कारण उपेय (= मोक्ष) में भेद क्यों नहीं होगा?—यह शङ्का कर कहते मल और उसकी शक्ति के विध्वंस तिरोभाव च्युति के बीच हेतु का भेद होने पर भी मुक्ति भिन्न नहीं है जैसे कि घटनाश आदि (के कारणों में भिन्नता रहने पर भी नाश रूप कार्य एक होता है उसी प्रकार ।। १६६ ।। जहाँ वास्तविक कारणकार्य भाव है वहाँ भी हेतु = दीक्षा आदि का भेद होने पर भी उसके फलभूत मल और उसकी शक्तियों के विध्वंस आदि में कोई भेद नहीं है क्योंकि कला तत्त्व और भुवन आदि का भेद होने पर भी उसके (संस्कार के नाश का कारण) दीक्षा सर्वत्र समान ही है । उदाहरण के लिये (घटध्वंस के लिये) मुद्गर, हाथ, भित्ति और (स्वयं दूसरा) घट रूप उपाय भिन्न होने पर भी घट का ध्वंस या तिरोभाव एक ही है । इसलिये हेतु के अनेक होने पर फल भी अनेक हों-यह नियम सर्वथा सर्वत्र लागू नहीं होता । जहाँ उपायउपेय का भेद काल्पनिक ही है (वास्तविक नहीं) वहाँ यह बात कैसे सम्भव है । तो इस प्रकार उपाय के इच्छा ज्ञान क्रिया रूप तीन प्रकार का होने पर भी उसके उपेयभूत अपवर्ग के विषय में कोई भेद नहीं है- यह सिद्ध हो गया ।। १६६ ।। यह बात केवल तर्क से ही नहीं आगम से भी सिद्ध है—यह कहते हैं (उपायों की) यह त्रिविधता परमेश्वर ने श्रीपूर्वनामकशास्त्र में १६६ श्रीतन्त्रालोकः तत्रत्यमेव ग्रन्थं पठति अकिञ्चिच्चिन्तकस्यैव गुरुणा प्रतिबोधतः । उत्पद्यते य आवेशः शाम्भवोऽसावुदीरितः ॥ १६८ ॥ उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयन् । यं समावेशमाप्नोति शाक्तः सोऽत्राभिधीयते ॥ १६९ ॥ उच्चारकरणध्यानवर्णस्थानप्रकल्पनैः । यो भवेत्स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥ १७० ॥ व्यत्यासपाठे च अयमाशयः– यद् उपायोपेयादिना द्वारद्वारिभावेन शाम्भवोपाये एव प्राधान्येन विश्रान्तिः इति ।। १६७-१७० ।। तदेव क्रमेण व्याचष्टे अकिञ्चिञ्चिन्तकस्येति विकल्पानुपयोगिता । तया च झटिति ज्ञेयसमापत्तिनिरूप्यते ॥ १७१ ।। समावेश निर्णय के प्रसङ्ग में कही है ।। १६७ ।। वहीं का ग्रन्थ पढ़ते हैं कुछ न सोचने वाले व्यक्ति के अन्दर गुरु के द्वारा उत्पन्न किए गए प्रतिबोध से जो आवेश उत्पन्न होता है वह शाम्भवोपाय कहा जाता है ।। १६८ ।। उच्चार से रहित वस्तु की केवल मन से चिन्ता करने वाला (साधक) जिस समावेश को प्राप्त करता है वह शाक्त (उपाय) कहलाता है ।। १६९ ।। उच्चार, इन्द्रिय, ध्यान, वर्ण, स्थान की कल्पनाओं के द्वारा जो उचितरूप में समावेश होता है वह आणव (उपाय) कहलाता है ।। १७० ।। (उपर्युक्त १६८ से १७० तक श्लोकों का) विपरीत क्रम से पाठ करने पर यह आशय है कि उपाय-उपेय आदि के द्वारा द्वार द्वारी भाव से शाम्भवोपाय में ही प्रधान रूप से विश्रान्ति होती है ।। १६७-१७० ।। उसी की क्रम से व्याख्या करते हैं उपर्युक्त श्लोक में ‘अकिञ्चिच्चिन्तकस्य’ (इस पद के द्वारा) विकल्पों की अनुपयोगिता (की ओर सङ्केत किया गया है) उसके द्वारा तुरन्त ज्ञेय की समापत्ति हो जाती है ।। १७१ ।। प्रथममाह्निकम् तया इति—विकल्पानुपयोगितया । विकल्पोपयोगे हि तदैव _ ‘यस्य ज्ञेयमयो भाव: स्थिर: पूर्णः समन्ततः ।’ इत्यादिदृष्ट्या ज्ञेयस्य अवश्यज्ञातव्यस्य पारमार्थिकस्य चिदात्मनो रूपस्य समापत्तिर्न स्यात. विकल्पो हि अभ्यासबलात स्वतल्यविकल्पान्तराविर्भावकतया विगलदस्फुटत्वादिना यथायथं सातिशयविकल्पजननाक्रमेण अविकल्पात्मक संवित्तादात्म्यम् अभ्येति । यद्वक्ष्यति ‘प्रविविक्षुर्विकल्पस्य कुर्यात्संस्कारमञ्जसा ।’ इत्याधुपक्रम्य ‘संविदभ्येति विमलामविकल्पस्वरूपताम् ।’ इति । अत एव शाक्तोपायादस्य भेदः ।। १७१ ।। ननु कथं विकल्पानुपयोगितयैव एतत् स्यात् ? इत्याशङ्कां दर्शयितुमाह सा कथं भवतीत्याह गुरुणातिगरीयसा । ज्ञेयाभिमुखबोधेन द्राक्प्ररूढत्वशालिना ॥ १७२ ।। उसके द्वारा = विकल्प के अनुपयोगी होने से । विकल्प का उपयोग होने पर उसी समय ‘जिसका ज्ञेयमय भाव स्थिर हो जाता है वह सब प्रकार से पूर्ण हो जाता है।’ इत्यादि दृष्टिकोण से ज्ञेय = अवश्य ज्ञातव्य = पारमार्थिक चिदात्मा के रूप की समापत्ति नहीं होगी । विकल्प ही अभ्यास के बल से अपने समान दूसरे विकल्प को उत्पन्न करता है । परिणामस्वरूप अस्फुटता समाप्त हो जाती है। फिर क्रमश: उत्तमोत्तम विकल्पों का जन्म होता है और पर्यन्त में (साधक) अक्रमिक अविकल्पात्मकरूपा संवित् के साथ तादात्म्य प्राप्त कर लेता है । जैसा कि कहेंगे (शैवीसाधना में) प्रवेश का इच्छुक साधक सरल विधि से विकल्पों का संस्कार करे ।’ इत्यादि प्रारम्भ कर ‘(अन्त में साधक) निर्विकल्पस्वरूपा निर्मल संवित् को प्राप्त करता है।’ यह (कहा गया) । इसीलिये शाक्तोपाय से इस (शाम्भवोपाय) का भेद सिद्ध हो जाता है ।। १७१ ।। विकल्प की अनुपयोगिता से ही यह (= ज्ञेय की समापनि) कैसे होती है। इस शंका को दिखाने के लिये कहते हैं वह (= ज्ञेय समापत्ति) कैसे होती है? इस विषय में कहते है १६८ श्रीतन्त्रालोक: प्रति: आभिमुख्ये, आभिमुख्यं च वस्त्वन्तरापेक्षम्, तच्च अत्र औचित्यात् चिन्मात्रम्-इत्युक्तम् ‘ज्ञेयाभिमुखेति’ । अतिगरीयस्त्वमेव व्याख्यातुं द्राक्प्ररूढ त्वेत्याधुक्तम्, द्राक् इत्यनेन यथोक्तविकल्पक्रमोपारोहाभावः सूचितः ।। १७२ ।। ननु कथमनयोभिन्नविभक्तिकयो: सामानाधिकरण्यम् ? इत्याशङ्कयाह तृतीयार्थे तसि व्याख्या वा वैयधिकरण्यतः । तृतीयार्थे तसि इति–तसि इत्यनुबन्धलोपे प्रयोगः । तृतीयार्थे इति सर्वविभक्त्यन्तात् प्रातिपदिकात् तस्येष्टेः । वा शब्द: पक्षान्तरे । वैयधिकरण्यत: इति गुरुणा कृतो यः प्रतिबोधः ततः-इत्यर्थः ।। आवेशश्चास्वतन्त्रस्य स्वतद्रूपनिमज्जनात् ॥ १७३ ॥ परतद्रूपता शम्भोराद्याच्छक्तयविभागिनः । गुरु की प्रेरणा से तुरन्त उत्पन्न होने वाले अतएव अत्यन्त गरीयान् ज्ञेयाभिमुखबोध के द्वारा (वह होती है) ।। १७२ ।। (श्लोक सं. १६८ में) ‘प्रति’ शब्द का प्रयोग आभिमुख्य अर्थ में है । आभिमुख्य का अर्थ है-दूसरी वस्तु की अपेक्षा । औचित्य के कारण यहाँ यह आभिमुख्य चिन्मात्र है । इसी को ज्ञेयाभिमुख शब्द से कहा गया । अतिशय गुरुता की व्याख्या करने के लिये ‘द्राक् प्ररूढ़’ (= झट से उत्पन्न) इत्यादि कहा गया । ‘द्राक्’ शब्द से यथोक्त विकल्प क्रम के उपारोह का अभाव बतलाया गया ।। १७२ ।। भिन्न विभक्ति वाले इन दोनों (गुरुणा और प्रतिबोधत:) में समानविभक्ति कैसे है —यह शङ्का कर कहते हैं (प्रतिबोधत: पद में) तृतीया के अर्थ में तसिल (का प्रयोग हुआ है) अथवा वैयधिकरण से व्याख्या (करनी चाहिए) ।। १७३- ।। - (श्लोक में) ‘तृतीयाथें तसि’ यहाँ ‘तसि’ का प्रयोग अनुबन्ध का लोप होने पर किया गया है । (तसिल् प्रत्यय में इल् अनुबन्ध है) । तृतीया के अर्थ में कहने का तात्पर्य है कि ‘तसिल्’ प्रत्यय का प्रयोग सभी विभक्तियों के अर्थ में होता है । ‘वा’ शब्द का प्रयोग दूसरे पक्ष में है । वैय्यधिकरण्य का तात्पर्य है कि गुरु के द्वारा किया गया जो प्रतिबोध उससे (यहाँ ‘तसिल’ का प्रयोग पञ्चमी अर्थ में मानना चाहिये)। अस्वतन्त्र = जड मितप्रमाता का अपने = असाधारण उस = संकुचित रूप के निमज्ज्न होने से पर = स्वतन्त्र शक्ति से अभिन्न आद्य शम्भु से अपने वाले के साथ तद्रूपता = तादात्म्य ही आवेश (कहलाता) है ।। -१७३,१७४- ।। प्रथममाह्निकम् १६९ अस्वतन्त्रस्य जडस्य बुद्ध्यादेः, मितस्य प्रमातुः, स्वम् असाधारणम्, तत् संकुचितं यत् रूपं तस्य निमज्जनम् गुणीभावः, तदवलम्ब्य परेण स्वतन्त्रेण बोधेन या तद्रूपता-तादात्म्यम्, स आवेशः इति सम्बन्धः । यदुक्तम् ‘मुख्यत्वं कर्तृतायास्तु बोधस्य च चिदात्मनः । शून्यादौ तद्गुणे ज्ञानं तत्समावेशलक्षणम् ।।’ इति । कुत: पुनरयमागत:? इत्याह-शम्भोः इति । न पुनः शक्तेरणोर्वा । आद्यात् इति–तत एव हि शक्तेरणोश्च प्रभवः इति भावः । अत एव शक्तिरत्र इच्छा, न तु ज्ञानं क्रिया वा-तयोः समावेशान्तरगतत्वेन अभिधास्य मानत्वात् ।। १७३ ।। इह पदार्थावगमपुर:सरीकारेण वाक्यार्थावगमः इति पदार्थयोजनानन्तरं वाक्यार्थमपि योजयितुमाह तेनायमन वाक्यार्थो विज्ञेयं प्रोन्मिषत्स्वयम्॥ १७४ ॥ विनापि निश्चयेन द्राक् मातृदर्पणबिम्बितम् । मातारमधरीकुर्वत् स्वां विभूतिं प्रदर्शयत् ॥ १७५ ॥ आस्ते हृदयनैर्मल्यातिशये तारतम्यतः । अस्वतन्त्र का = जड़का = बुद्धि आदि परिमित प्रमाता का, स्व = असाधारण, तत् = संकुचित, जो रूप उसका निमज्जन = गौण हों जाना । उसको आधार मानकर पर = स्वतन्त्र बोध के द्वारा जो तद्रूपता = तादात्म्य, वही आवेश कहलाता है-ऐसा अन्वय समझना चाहिये । जैसा कि कहा गया ‘जब स्वात्मकर्तृता’ और चिदात्मक बोध मुख्य हो जाते हैं और शून्य आदि (= जड़ पदार्थ) गौण समझे जाते हैं तो यह समावेश का लक्षण समझना चाहिये ।’
  • यह (= समावेश) कहाँ से आता है ?—इस विषय में कहते हैं-शम्भु से न कि शक्ति अथवा अणु से । आद्यात् का अर्थ है कि उसी (= शाम्भव) से ही शक्ति और अणु की उत्पत्ति होती है । इसीलिये यहाँ शक्ति का ताप्तर्य है इच्छा न कि ज्ञान अथवा क्रिया । क्योंकि वे दोनों समावेश के अन्तर्गत कही जायेंगी ।। १७३ ।। पदार्थ का ज्ञान होने के बाद वाक्यार्थ का ज्ञान होता है-इस नियम के अनुसार पदार्थ योजना के बाद वाक्यार्थ की योजना करने के लिये कहते है इसलिए यहाँ यह वाक्यार्थ है-बुद्धिरूपी दर्पण में प्रतिबिम्बित, परिमित प्रमाता को गौण करता हुआ, तरतम भाव से अपनी विभूति को प्रदर्शित करता हुआ विज्ञेय (= चिन्मात्र पारमार्थिक रूप) विमर्श की निर्मलता के अतिशयित होने पर (पराकाष्ठा पर पहुंचने के बाद) स्वयं प्रकाशित होता है ।। - १७४-१७६- ।। श्रीतन्त्रालोकः विज्ञेयम् चिन्मात्राख्यं पारमार्थिक रूपम्, माता-सकलकरणग्रामप्रसव निमित्तत्वाद् बुद्धिः, सैव चिच्छायासंक्रान्तिसहिष्णुत्वाद् दर्पणः, तत्र प्रतिबिम्बितं गृहीतात्मग्रहं परिमितं प्रमातारम् अधरीकुर्वत् बुद्ध्यादौ आत्माभिनिवेशनं गुणीभाव मापादयत् । एवं तरतमभावेन अनन्यसाधारणां विभूतिम् बोधात्मताप्रधानतां रचयत्, समनन्तरोक्तयुक्त्या विकल्पोपारोहमन्तरेण अनन्यापेक्षित्वात् झटिति ‘सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ।’ इत्याधुक्तेः हृदयम् विमर्शः, तस्य नैर्मल्यम् अनन्योन्मुखत्वादपरिम्लानत्वम्, तस्य अतिशयः पराकाष्ठा, तत्र स्वयं प्रोन्मिषदास्ते स्वप्रकाशतया प्रकाशते इत्यर्थः ।। १७४-१७५ ।। ननु ज्ञेयं तावत् जडाजडात्म द्विधा सम्भवति, तत्र संविदि जडेन नीलादिनापि आवेशोऽस्ति इति कथं ‘बोधात्मैव समावेश:’ इत्युक्तम् ? इत्याह ज्ञेयं द्विधा च चिन्मानं जडं चाद्यं च कल्पितम् ॥ १७६ ॥ इतरत्तु तथा सत्यं तद्विभागोऽयमीदृशः । जडेन यः समावेशः सप्रतिच्छन्दकाकृतिः ॥ १७७ ।। चैतन्येन समावेशस्तादात्म्यं नापरं किल । विज्ञेय = चिन्मात्र पारमार्थिक रूप । प्रमाता = बुद्धि क्योंकि वह समस्त इन्द्रियसमूह की उत्पत्ति का कारण है । वही चित् की छाया के संक्रमण का आधार होने से दर्पण है । उसमें प्रतिबिम्बित = अहङ्कारयुक्त आत्मा जो कि परिमित प्रमाता है उसको, अधरी कुर्वत् = बुद्धि आदि में आत्मभावना को गौण बनाता है । इस प्रकार (वह संवित्) तरतम के तारतम्य से अनन्य साधारण विभूति = बोधात्मक प्रधानता की रचना करती है । पूर्वोक्त युक्ति से (वह) विकल्प के बिना निरपेक्ष होकर तत्काल हृदयरूपी विमर्श की निर्मलता अर्थात् -अनन्योन्मुख होने के कारण मलिनताराहित्य, उसकी पराकाष्ठा के रूप में प्रोन्मिषित होता है = स्वयं प्रकाशित होता है ।। १७४-१७५ ।। प्रश्न है कि यह (= ज्ञेय) जड़ और अजड़ रूप से दो प्रकार का होता है । संविद् में जड़ नील आदि से भी आवेश होता है फिर कैसे कहा कि समावेश बोधात्मक ही होता है-उत्तर दे रहे हैं ज्ञेय दो प्रकार का है—चिन्मात्र (ज्ञेय) और जड (ज्ञेय); उन दोनों में पहला (= चिन्मात्र ज्ञेय) कल्पित है । दूसरा (= जड नील आदि) उस प्रकार (= ज्ञेय रूप में) सत्य है । यह उसका विभाग ऐसा है । जड के साथ जो समावेश है वह प्रतिच्छन्दक (= प्रतिम्बित प्रतिमा) की आकति वाला है (अर्थात तादात्म्य नहीं है और जो चैतन्य के साथ (समावेश है वह) तादात्म्य है दूसरा कुछ नहीं ।। - १७६-१७८- ।। प्रथममाह्निकम् नन् कथं स्वप्रकाशाया: चितोऽपरप्रकाश्यत्वं ज्ञेयत्वं नाम ? इत्याशक्योक्तम्-‘आद्यं च कल्पितम्’ इति । चः शङ्काद्योतकः, परमेश्वर एव हि स्वातन्त्र्याद् अपरिहतवेदकभावमपि स्वात्मानं भावनोपदेशादौ शिव एव सर्वक्रियाणां कर्ता विज्ञेयः इत्यादि परामर्श: अहंप्रतीतिम् अन्तरीकृत्य वेद्यतया प्रतिपादयति । इदमेव हि परं स्वातन्त्र्यम्-यत् स्वं स्वरूपं वेदकमेव सत् वेद्यत्वेन अवभासयति । अत एव कल्पितम् वस्तुशून्यम्-इत्युक्तम् । इतरत् इति–जडं नीलादि । तथा इति—ज्ञेयतया । तत्र नीलज्ञानम् इत्यादौ चितो नीलादिना दर्पणमुखन्यायेन प्रतिबिम्बनमात्रमेव समावेशार्थो न तु तादात्म्यम्, तथात्व हि नीलादेर्ज्ञानात्मी भतत्वात ज्ञानमेव अवशिष्यते इति प्रतिच्छन्दव्यवस्थैव न स्यात । संकचिताया चित: पुनरसंकुचितया चितैकात्म्यमेव, तस्या एव वस्तुतो भावात्, तेन बोधैकात्म्यमेव समावेशार्थः इति युक्तमुक्तम्, अस्वतन्त्रस्य परतद्रूपता नामावेश: इति ।। १७६-१७७ ।। । जो चित् स्वप्रकाश है वह परप्रकाश्य ज्ञेय रूप कैसे हो जाती है ? यह शङ्का कर कहा गया— ‘पहला कल्पित होता है’ । ‘च’ शङ्का का द्योतक है । परमेश्वर ही अपने स्वातन्त्र्य से वेदकभाव को न छोड़ते हुए भी अपने को भावनोपदेश आदि में शिव की समस्त क्रियाओं को कर्ता जानना चाहिये’- इत्यादि परामों के द्वारा अहंप्रतीति को छिपाकर वेद्य के रूप में प्रतिपादित करते हैं । (इनका) यही परमस्वातन्त्र्य है कि अपने वेदक स्वरूप को वेद्य के रूप में निश्चित कराते हैं । इसीलिये कहा गया—(चेतन का ज्ञेयत्व) कल्पित अर्थात् वस्तुशून्य है । इतरत् = जड़ नील आदि । तथा = ज्ञेय के रूप में । ‘नीलज्ञानम्’ इत्यादि स्थलों में चित् का ही नील आदि के रूप में दर्पणमुखन्याय’ से प्रतिबिम्ब ही समावेश कहलाता है न कि (चित् और नील का) तादात्म्य । वैसा (अभेद) होने पर नील आदि भी ज्ञानस्वरूप हो जायेंगे और फिर ज्ञान ही बच जायगा (न कि नील आदि)। फलस्वरूप पृथक्त्व की व्यवस्था समाप्त हो जायगी । संकुचित चिति का असंकुचित चिति के साथ ऐकात्म्य ही उस (= चित्) की वास्तविक सत्ता है । इसलिये (संकुचित जड़ आदि का) बोध के साथ ऐकात्म्य ही समावेश है । इसलिये ठीक ही कहा कि परतन्त्र का परतत्त्व के साथ एकरूप हो जाना ही आवेश है ।। १७६-१७७ ।। १. जिस प्रकार दर्पण में मुख की छाया दिखायी देती है न कि मुख उसी प्रकार नील आदि में चित् की छाया दिखायी देती है न कि चित् । इसलिए नील और चित् अभिन्न नहीं होता । १७२ श्रीतन्त्रालोकः तदेवोपसंहरति तेनाविकल्पा संवित्तिर्भावनाद्यनपेक्षिणी ॥ १७८ ॥ शिवतादात्म्यमापन्ना समावेशोऽत्र शाम्भवः । संवित्तिः अर्थात् संकुचितरूपा ।। १७८ ।। ननु अत्र उत्पत्तौ विकल्पापेक्षित्वं मा भूत् तथात्वे हि .शाक्तोपायादस्य भेदो न स्यात्, औत्तरकालिकाः पुनर्विकल्पा: किमत्र अपेक्ष्यन्ते न वा ? इत्याशङ्कयाह तत्प्रसादात्पुनः पश्चाद्भाविनोऽत्र विनिश्चयाः॥ १७९ ॥ सन्तु तादात्म्यमापन्ना न तु तेषामुपायता । तच्छब्देन निर्विकल्पकपरामर्शः । अविकल्पकयैवं संवित्त्या शिवात्मताधिगमः कृतः इति कृतस्य करणायोगात् तत्पृष्ठभाविनां विकल्पानां तत्र अकिञ्चित्करत्वम् -इत्याह-न तु तेषामुपायता’ इति ।। १७९ ।। अत एव च अविकल्पस्य विकल्पापेक्षं प्रामाण्यं वदन्तो निरस्ता: इत्याह उसी का उपसंहार करते है इसलिए भावना आदि की अपेक्षा न रखने वाली विकल्परहित संवित्ति (= संकुचितरूपा संवित्) जब शिव के साथ तादात्म्य को प्राप्त होती है तब शाम्भव समावेश होता है ।। -१७८, १७९- ।। संवित्ति से यहाँ संकुचित संवित्ति जानना चाहिये ।। १७८ ।। प्रश्न है कि यहाँ (= शाम्भव समावेश की) उत्पत्ति में विकल्पों की अपेक्षा नहीं होती क्योंकि वैसा होने पर इस (शाम्भव समावेश) का शाक्तोपाय से भेद नहीं होगा, किन्तु उत्तरकालिक विकल्पों की यहाँ अपेक्षा होती है या नहीं?—यह शङ्का कर कहते हैं उस (= निर्विकल्पक परामर्श) की कपा से (शाम्भव समावेश प्राप्त होने के बाद होने वाले विकल्प तादात्म्य को प्राप्त हो जाते हैं वे पुनः (समावेश) के कारण नहीं बनते ।। -१७९, १८०- ।। तत् शब्द से निर्विकल्पक परामर्श समझना चाहिये । निर्विकल्पक संवित के द्वारा ही शिवात्मता की उपलब्धि होती है । इस प्रकार किये गये कार्य का कारण नहीं होने से उसके बाद होने वाले विकल्प उस (= शिवतादात्म्य के विषय) में कोई महत्त्व नहीं रखते । इसलिये कहा कि वे उपाय नहीं बनते ।। १७९ ।। इसीलिये सविकल्प की अपेक्षा निर्विकल्पक (ज्ञान) को प्रमाण मानने वाले प्रथममाह्निकम् विकल्यापेक्षया मानमविकल्पमिति ब्रुवन् ॥ १० ॥ प्रत्युक्त एव सिद्धं हि विकल्पेनानुगम्यते । अनधिगतार्थविषयं खलु प्रमाणम् । यदाहुः ____ ‘अनधिगतविषयं प्रमाणम् अज्ञातार्थप्रकाशो वा ।’ इति निर्विकल्पकगृहीतमेव वस्तु च तत्पृष्ठभावी विकल्पः परिच्छिनत्ति इति, तस्य गृहीतग्राहकत्वात् स्वात्मन्येव प्रमाण्यं नास्ति-इति कथमन्यस्यापि प्रामाण्ये निमित्ततां यायात् । अत आह—‘सिद्धं हि विकल्पेनानुगम्यते’ इति । सिद्धम् इति-अधिगतम् । अनुगम्यते इति— अनु पश्चात् गम्यते अधिगम्यते इत्यर्थः ।। १८० ।। नन् प्रवर्ततां नाम गृहीतेऽर्थे विकल्पः, तत्र पुनरध्यवसायात्मकत्वादस्य ग्राहकत्वं न युज्यते इति गृहीतं गृह्णामि’ इति प्रतिपत्तिरस्य कथं स्यात् ? इत्याशङ्कयाह गृहीतमिति सुस्पष्टा निश्चयस्य यतः प्रथा ॥ १८१ ॥ (बौद्धों) का खण्डन हो जाता है—यह कहते हैं (इसलिए) निर्विकल्प विकल्प की अपेक्षा रखकर प्रमाण है ऐसा कहने वाले का खण्डन हो गया । क्योंकि विकल्प ज्ञात पदार्थ का ही अनुज्ञान कराता है (और प्रमाण वह होता है जो अज्ञात अर्थ को बताए) ।। -१८०, १८१- ।। प्रमाण उसे कहते है जो अज्ञात विषय को बतलाये । जैसा कि कहते हैं ‘प्रमाण वही है जो या तो अप्राप्त विषय की प्राप्ति या अज्ञात विषय का ज्ञान कराता हो ।’ निर्विकल्पक ज्ञान के द्वारा गृहीत वस्तु को ही उसके बाद होने वाला सविकल्पक ज्ञान बतलाता है । इस प्रकार उस (संविल्पक) ज्ञान के गृहीत-ग्राही होने के कारण वह अपने आप में ही प्रमाण नहीं है फिर दूसरे की प्रामाणिकता का कारण कैसे बनेगा इसलिये कहा- ज्ञात (पदार्थ) ही विकल्प के द्वारा बतलाया जाता है ।’ सिद्ध = ज्ञात । अनुगम्यते–अनु = पश्चात्, गम्यते = अधिगत होता है ।। १८० ।। प्रश्न है कि विकल्प ज्ञात अर्थ के विषय में भले ही प्रवृत्त हो किन्तु निश्चयात्मक होने से यह ग्राहक नहीं हो सकता । यदि ऐसा होता है तो फिर ‘मैं ज्ञात का ज्ञान कर रहा हूँ’ यह ज्ञान (ज्ञाता को) कैसे होगा?-यह शङ्का कर कहते हैं चूँकि ‘मैने जान लिया’ इस प्रकार निश्चय का सुस्पष्ट प्रसरण होता श्रीतन्त्रालोकः गृह्णामीत्यविकल्पैक्यबलात्तु प्रतिपद्यते । गृहीतमिति प्रथा हि विकल्पस्य भावादौपपत्तिकी, गृहीत एवार्थे अस्य प्रवृत्तेः, यत्तु गृह्णामि इति प्रतिपद्यते तत् दृश्यविकल्प्याथैकीकारादिना निर्विकल्पकैकात्म्या वलम्बनबलात् इति युक्तमुक्तम्-‘विकल्पेन गृहीतं गृह्यते’ इति ।। १८१ ।। ननु ज्ञानं खलु ज्ञापकं न तु कारकम् इति, तेन वस्तुनो ज्ञप्ति: स्यात् न तु सिद्धिः इति कथमुक्तम्–‘सिद्धं विकल्पेनानुगम्यते’ ? इत्याशङ्कयाह अविकल्पात्मसंवित्तौ या स्फुरत्तैव वस्तुनः ॥ १८२ ॥ सा सिद्धिर्न विकल्पात्तु वस्त्वपेक्षाविवर्जितात्। आभासवादे हि आभासमानतेव सिद्धिः इत्युक्तम् स्फुरत्तैव वस्तुन: सिद्धिः । ननु विकल्पानामपि स्वात्मनि अविकल्पकत्वात् स्फुरद्रूपता अस्ति इति किमिति न ततोऽपि वस्तुनः सिद्धि: स्यात् ? इत्याशङ्कयाह—‘न विकल्पात्’ इति ‘सर्वो विकल्प: स्मृतिः’ इति नीत्या विकल्पानां तावत् स्मृतिरेव रूपम्, सा च असंनिहिते पूर्वानुभूत एव अभिप्रवर्तते इति विकल्पानां वस्त्वनपेक्षित्वम्, यद्यपि है । ‘जान रहा हूँ; यह निश्चय निर्विकल्पक ज्ञान की एकता के आधार पर होता है ।। -१८१, १८२- ।। ‘ज्ञात हो गया’ इस प्रकार का ज्ञान विकल्प के रहने से युक्ति के आधार पर है क्योंकि यह (= विकल्प) ज्ञात अर्थ में ही प्रवृत्त होता है । और जो ‘ज्ञान कर रहा है। ऐसा ज्ञान होता है वह दृश्य अतएव विकल्प्य अर्थ के साथ एकात्मता होने से निर्विकल्पक के साथ ऐकात्म्य के आधार पर होता है। इसलिये ठीक कहा कि ‘विकल्प के द्वारा ज्ञात का ज्ञान होता है’ || १८१ ।। प्रश्न-ज्ञान ज्ञापक होता है कारक नहीं । इसलिये वस्तु का ज्ञान होता है न कि सृष्टि । इसलिये कैसे कहा कि ‘विकल्प के द्वारा सिद्ध का अनुगमन होता है यह शङ्का कर कहते हैं ___निर्विकल्पक आत्मज्ञान होने पर वस्तु का जो स्फुरण होता है वही सिद्धि है न कि वस्तु की अपेक्षा से रहित विकल्प से (वस्तु की सिद्धि होती है) ।। -१८२, १८३- ।। ___ आभासवाद में आभासमानता ही सृष्टि होती है । इसलिये कहा गया कि वस्तु की स्फुरत्ता ही सृष्टि है । प्रश्न है कि विकल्प भी अपने आप में निर्विकल्प ही है इसलिये उनकी भी स्फुरद्पता तो है ही फिर उनसे भी वस्तु की सृष्टि क्यों नहीं होती?-यह शङ्का कर कहते हैं-विकल्प से नहीं | ‘सभी विकल्प स्मृति होते हैं इस नीति के अनुसार स्मृति ही विकल्पों का रूप है । और वह (= स्मृति) दरस्थ पूर्वानुभूत वस्तु के विषय में प्रवृत्त होती है । इस प्रकार विकल्प वस्तु की अपेक्षाप्रथममाह्निकम् १७५ च स्वतन्त्रविकल्पादौ क्षेत्रज्ञनिर्मितानां योजनास्ति तथापि पूर्वानुभवसंस्कारजा एव तेऽर्थाः इत्युक्तम् ‘वस्त्वपेक्षाविवर्जितात्’ इति । यस्य च यदपेक्षा नास्ति स कथं तत्सिद्धौ निमित्ततां यायात्-इति भावः ।। १८२ ।। यद्येवं निर्विकल्पकसिद्ध एव अर्थे विकल्प: प्रवर्तते न अधिकं किञ्चित्करोति तत्किमिति तेन स क्वचिदपेक्ष्यते-इत्याह केवलं संविदः सोऽयं नैर्मल्येतरविश्रमः ॥ १८३ ।। यद्विकल्पानपेक्षत्वसापेक्षत्वे निजात्मनि । एवं संविद: सर्ववादिसिद्धं व्यवहारादौ विकल्पसापेक्षत्वं परिहत्य विकल्पान पेक्षत्वमेव स्फुटीकर्तुमुदाहरति निशीथेऽपि मणिज्ञानी विद्युत्कालप्रदर्शितान् ॥ १८४ ॥ तांस्तान्विशेषांश्चिनुते रत्नानां भूयसामपि । वैकटिको हि अचिरस्थायिनि परिमितेऽपि आलोके भूयसामपि रत्नानाम् अतिसूक्ष्मान् परस्परविशेषान् अवसायं विनापि अनुभवातिशयादेव जानीते, येन ‘इदमल्पम्, इदं महत्,’ ‘दमितोऽपि महद्रत्नम्’ इत्यस्य विवेकः नही रखते । यद्यपि. स्वतन्त्र विकल्प आदि में जीव द्वारा निर्मित (पदार्थों) की योजना रहती है फिर भी वे (= पदार्थ) पूर्वानुभवों के संस्कार से ही उत्पन्न रहते हैं। इसलिये कहा गया-वस्तु की अपेक्षा से रहित………. | जिसको जिस (वस्तु) की अपेक्षा नहीं रहती वह (वस्तु) उसकी सृष्टि में कारण कैसे बन सकती है? यह भाव है ।। १८२ ।। इस प्रकार यदि विकल्प की प्रवृत्ति निर्विकल्पक से सिद्ध अर्थ में ही होती है और (वह विकल्प) इससे अधिक कुछ नहीं करता तो फिर उस (अर्थ) के द्वारा कहीं-कहीं उस (विकल्प) की अपेक्षा क्यों की जाती है ?—यह कहते हैं यह संविद् की निर्मलता का दूसरा विभ्रममात्र है कि अपनी आत्मा में विकल्प की निरपेक्षता और सापेक्षता (दोनों अनुभव का विषय बनती हैं) ।। -१८३, १८४- ।। इस प्रकार व्यवहार आदि में संविद् की सर्ववादिसिद्ध विकल्पसापेक्षता का खण्डन कर विकल्पनिरपेक्षता को ही स्पष्ट करने के लिये उदाहरण दे रहे है मणि का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति अर्द्धरात्रि में भी अनेक रत्नों का विद्युत्कालप्रदर्शित (= अत्यन्त सूक्ष्म) उन-उन विशेषों को जानता है ।। -१८४, १८५- ।। जौहरी क्षणिक परिमित प्रकाश में भी बहुत से रत्नों के अति सूक्ष्म परस्पर विशेषों को अन्य साधन के द्वारा विहित निश्चय के बिना भी केवल अनुभव की १७६ श्रीतन्त्रालोकः स्यात् ।। १८४ ।। किं चात्र अनुभवातिशये निमित्तं येन विकल्पनैरपेक्ष्येणापि वस्तुनः सिद्धि: स्यात् ?–इत्याह नैर्मल्यं संविदश्चेदं पूर्वाभ्यासवशादथो॥ १८५ ॥ अनियन्त्रेश्वरेच्छात इत्येतच्चर्चयिष्यते । पूर्वाभ्यासो जन्मान्तरीयः इति, अत एव चर्चयिष्यते त्रयो दशाह्निकादौ ।। १८५ ।।। न केवलमस्य आवेशस्य त्रैविध्यमेव अस्ति, यावदवान्तरप्रकारत्वमपि इत्याह पञ्चाशद्विधता चास्य समावेशस्य वर्णिता ।। १८६ ।। तत्त्वषट्त्रिंशकैतत्स्थस्फुटभेदाभिसन्धितः । वर्णिता इति–श्रीपूर्वशास्त्रे । यदुक्तं तत्र ‘रुद्रशक्तिसमावेशः पञ्चधा ननु चर्च्यते । भूततत्त्वात्ममन्त्रेशशक्तिभेदाद्वरानने अतिशयिता के आधार पर जान लेता है । -यह छोटा है’, –यह बड़ा है’ यह इससे भी बड़ा रत्न है-यह विवेक जौहरी को हो जाता है ।। १८४ ।। ___ इस अनुभवातिशय का कारण क्या है जिससे विकल्प की अपेक्षा न रहने पर भी वस्तु की सिद्धि हो जाती है?– यह कहते हैं यह (= विशेष चयन) संविद् की निर्मलता ही है जो पूर्व (= जन्मान्तरीण) अभ्यास के कारण (उत्पन्न हो जाती है) इसके पीछे स्वतन्त्र ईश्वर की इच्छा कारण है-इसकी चर्चा आगे की जाएगी ।। -१८५, १८६- ।। पर्वाभ्यास = जन्मान्तरीय (अभ्यास) । इसी कारण चर्चा की जायेगी-तेरहवें आह्निक इत्यादि में ।। १८५ ।। इस आवेश के तीन ही नहीं अपितु अवान्तर प्रकार भी हैं—यह कहते हैं ३६ तत्त्व और उसमें वर्तमान स्फुट भेद के आधार पर इस समावेश के पचास भेद वर्णित हैं ।। -१८६, १८७- ।। वणित हैं—मालिनी विजयोत्तर तन्त्र में । जैसा कि वहाँ कहा गया ‘हे वरानने ! रुद्रशक्ति का समावेश भूत, तत्त्व, आत्मा, मन्त्रेश और शक्ति भेद से पाँच प्रकार का कहा जाता है । उनमें भूत नामक (समावेश) पाँच प्रकार प्रथममाह्निकम् पञ्चधा भूतसंज्ञोऽत्र त्रिंशद्धा तु तथापरः । आत्माख्यस्त्रिविधः प्रोक्तो दशधामन्त्रसंज्ञक: ।। द्विविध: शक्तिसंज्ञोऽपि ज्ञातव्यः परमार्थतः । पञ्चाशद्भेदभिन्नोऽयं समावेशः प्रकीर्तितः ।।’ इति । अत्र च हेतुः-तत्त्व इति । तत्त्वषट्त्रिंशकं च एतत्स्थानि तत्त्वषट् त्रिंशन्मध्यपतितानि पुमादीनि पृथग्व्याख्यास्यमानानि तत्त्वानि च, तेषां यो वक्ष्यमाणप्रकारः स्फुटो भेदः, तस्य अनुसंधानम् ॥ १८६ ।। तमेव भेदं निरूपयति एतत्तत्त्वान्तरे यत्’विद्याशक्त्यात्मकं त्रयम् ॥ १८७ ॥ अम्भोधिकाष्ठाज्वलनसंख्यैर्भेदैर्यतः क्रमात् । सद्भिन्नम् इत्यध्याहारः । अतस्तत्र पुमान्– ‘आत्मा चतुर्विधो ह्येषः ।’ इत्याधुक्त्या अम्भोधिभि:-सकलप्रलयाकलविज्ञानाकलशुद्धलक्षणैः चतुर्भि: भेदैभिन्नः, तथा विद्या काष्ठाभि:-वर्णबिन्द्वर्धचन्द्रनिरोधिनीनादनादान्तशक्ति व्यापिनीसमनोन्मनात्मभिर्दशभिः भेदैर्भिन्ना, तथा शक्तिः ज्वलनैः- इच्छाज्ञान क्रियात्मभिः त्रिभिर्भेदैः ।। १८७ ।। का, अगला तीस प्रकार का, आत्मा नामक (समावेश) तीन प्रकार का, मन्त्र दश प्रकार का, और शक्ति समावेश दो प्रकार का जानना चाहिये । परमार्थतः यह समावेश ५० भेदों वाला है । इन ५० भेदों का कारण तत्त्व हैं। छत्तीस तत्त्वों के बीच पुरुष आदि हैं जिनकी व्याख्या की जायेगी । उनका जो वक्ष्यमाण प्रकार, वही है स्फुट भेद, उसका अभिसन्धि = अनुसन्धान ।। १८६ ।। उस भेद का निरूपण कर रहे हैं’ इन तत्त्वों के बीच जो पुरुष शुद्धविद्या और शक्ति नामक तीन तत्त्व हैं वे अम्भोधि (= ४) काष्ठा (= १०) और ज्वलन (= ३) भेदों से भिन्न-भिन्न है (अर्थात् पुरुष चार प्रकार विद्या दश प्रकार और शक्ति तीन प्रकार की है) ।। -१८७, १८८- ।। ‘तदिन्न’ इतना जोड़ना चाहिये । इनमें से पुरुष ‘यह आत्मा चार प्रकार का है ।’ इस उक्ति के अनुसार अम्भोधि = (चार) सकल, प्रलयाकल, विज्ञानाकल और शुद्ध (= अकल) लक्षणों से चार प्रकार का है । उसी प्रकार विद्या-काष्ठा = वर्ण, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना और उन्मना नामक दश भेद वाली है । उसी प्रकार शक्ति-ज्वलन = (तीन) इच्छा, ज्ञान, १२ त. प्र. १७८ श्रीतन्त्रालोकः ननु किमिति इदमेव तत्त्वत्रयं भेदेन निर्दिष्टम् ? इत्याशङ्क्याह पुंविद्याशक्तिसंज्ञं यत्तत्सर्वव्यापकं यतः ॥ १८८ ॥ अव्यापकेभ्यस्तेनेदं भेदेन गणितं किल । अव्यापकेभ्यः इति–व्याप्येभ्यतत्त्वान्तरेभ्य:-इत्यर्थः । मायान्तं हि आत्म तत्त्वस्य, सदाशिवान्तं विद्यातत्त्वस्य, शिवान्तं च शक्तित्त्वस्य व्याप्तिः । यदुक्तम् ‘माया-सदाशिव-शिवप्रान्तव्याप्ती ननु क्रमात् ।’ इति ।। १८८ ।। न केवलमेतत् तत्त्वान्तरेभ्यो भिद्यते, यावदन्योन्यमपि–इत्याह ___ अशुद्धिशुद्ध्यमानत्वशुद्धितस्तु मिथोऽपि तत् ॥ १८९ ॥ पुमान् अशुद्धो-भेदमयत्वात्, विद्या शुद्धयमाना भेदाभेदमयत्वात्, शुद्धा शक्ति:-अभेदमयत्वात् ।। १८९ ।। ननु अस्तु एवम्, भूतानां पुन: पृथक् निर्देशे किं निमित्तम् ? इत्याशङ्कयाह क्रिया रूप तीन भेदों वाली है ।। १८७ ।। ये ही तीन तत्त्व क्यों भेदभिन्न हैं ? - यह शङ्का कर कहते है चूँकि जो पुरुष विद्या और शक्ति नामक तत्त्व हैं वे सर्वव्यापक हैं इसलिए अव्यापक तत्त्वों की अपेक्षा इनकी भेदपूर्वक गणना की गयी है ।। -१८८, १८९- ।। ___अव्यापक (तत्त्वों) से = व्याप्य तत्त्वान्तरों से । पुरुष तत्त्व की (व्याप्ति) माया तत्त्व तक, विद्या तत्त्व की व्याप्ति सदाशिव और शक्तितत्त्व की शिवतत्त्व तक व्याप्ति है । जैसा कि कहा गया ‘(पुरुष विद्या और शक्ति) क्रमश: माया, सदाशिव और शिव तत्त्व तक व्याप्त है’ ।। १८८ ।। ये केवल तत्त्वान्तरों से ही नहीं अपितु परस्पर भी भिन्न है-यह कहते हैं (वे तीनों तत्त्व पुन:) अशुद्धि शुद्ध्यमानत्व और शुद्धि वाले हैं ।। १८९ ।। पुरुष भेदमय होने से अशुद्ध है । विद्या भेदाभेदमय होने से शुध्यमान है और शक्ति अभेदमय होने से शुद्ध है ।। १८९ ।। प्रश्न है कि ऐसा ही हो । किन्तु भूतों के पृथक् निर्देश में क्या कारण है ? -यह शङ्का कर कहते हैं प्रथममाह्निकम् भूतान्यध्यक्षसिद्धानि कार्यहेत्वनुमेयतः । तत्त्ववर्गात्पृथग्भूतसमाख्यान्यत एव हि ॥ १९० ॥ भूतानि तावत् प्रत्यक्षसिद्धानि इति, तदेव एषां तत्त्वान्तरेभ्यो भेदेन उपादाने निमित्तम्, तानि हि नित्यानुमेयान्येव, तदाह- ‘कार्यहेत्वनुमेयत: तत्त्ववर्गात्’ इति । तथा चात्र भूतानि कारणपूर्वकाणि आचैतन्ये सति अनेकसंख्यायोपित्वात् घटादिवत्-इत्यनुमानम् । यच्चैषां कारणं तानि ‘तन्मात्रेभ्यश्च भूतानि……………… ।’ इत्याद्युक्तेः तन्मात्राणि इति, स्वकार्येभ्यो भूतेभ्य एषाम् अनुमेयत्वम् । एवम् अनेनैव अनुमानेन मायान्तः सकलतत्त्ववर्गोऽनुमातव्यः । एतच्च तत्त्वाध्वनि भविष्यति इति नेहायस्तम् । अत एव इति–प्रत्यक्षसिद्धत्वात् ।। १९० ।। ननु भूतानां प्रत्यक्षसिद्धत्वम् अनुमेयात् तत्त्ववर्गात् पृथक्त्वेऽस्तु निमित्तं कथं पुनर्भूतत्वेऽपि तदेव ? इत्याशङ्कयाह सर्वप्रतीतिसद्भावगोचरं भूतमेव हि । विदुश्चतुष्टये चात्र सावकाशे तदास्थितिम् ॥ १९१ ॥ पञ्चमहाभूत प्रत्यक्ष सिद्ध हैं । इसीलिए कार्यरूपी हेतु के द्वारा अनुमेय तत्त्ववर्ग से पृथक् रूप में कहे गए हैं ।। १९० ।। भूत प्रत्यक्ष सिद्ध है । दूसरे तत्त्वों से भेद मानने में यही कारण है । वे नित्य अनुमेय हैं । वही कहा - कार्य हेतु… । इस विषय में अनुमान है— भूत, कारणपूर्वक हैं, क्योंकि ये समस्त चेतन वर्ग में और अनेक संख्या वाले हैं, जैसे घट आदि । जो इनके कारण हैं वे ‘तन्मात्राओं से भूत (उत्पन्न हुए)।’ इत्यादि उक्ति से तन्मात्रायें हैं । अपने कार्यस्वरूप भूतों से इन (= तन्मात्राओं) का अनुमान होता है । इसी प्रकार अनुमान के द्वारा मायापर्यन्त समस्त तत्त्वसमूह का अनुमान करना चाहिये । यह ‘तत्त्वावा’ (प्रकरण में स्पष्ट) होगा इसलिये यहाँ विस्तार नहीं किया गया । इसलिये = प्रत्यक्ष सिद्ध होने के कारण ॥ १९० ।। भूतों का प्रत्यक्ष सिद्ध होना (इनकी) अनुमेय तत्त्वसमूह से पृथक्ता का कारण है । भूतत्व में भी क्या वही है ?—यह शङ्का कर कहते हैं चूंकि पञ्चभूत सभी (= पामरापामर उभय) की प्रतीति में सद्भाव के विषय हैं (अर्थात् पञ्चभूत की सत्ता सब मानते है) इसलिए विद्वान लोग आकाश सहित चार तत्त्वों के विषय में उस (= भूतत्त्व) की स्थिति को मानते हैं ।। १९१ ।। १८० श्रीतन्त्रालोकः सर्वेषां विदुषामविदुषां वा प्रतीतौ सता पारमार्थिकेन सत्ताया गोचरमेव हि भूतम् उच्यते । भूतं हि सत्यम्, तच्च सत्यम्, यत्र न कदाचिदपि कस्यचिदपि विप्रतिपत्तिः, अनुमेये पुनरविदुषंतावत् प्रतीतिर्नास्त्येव, विदुषां च प्रतीतावपि बहुप्रकारं परस्परं विप्रतिपत्तिः इति तत्र असत्यत्वसम्भावनापि भवेत्-इति भावः । चो हेतौ, अतश्च सर्व एवात्र अवकाशः तद्दातृत्वादाकाशः, तत्सहिते वाय्वन्ते चतुष्टये पृथिव्यादिभूतपञ्चके सर्वप्रतीतिसद्भावगोचरत्वात् तस्य भूतत्वस्य, आस्थितिम् अवस्थानं विदुः इति युक्तमुक्तं भूतसमाख्यान्यत एव’ इति । एवं भौत आवेशः पञ्चधा आत्मावेशश्च त्रिधा । एकोऽपि पुंस्तत्त्वरूप आत्मभेद: तत्त्वमध्येऽवस्थाप्यः, अन्यथा हि तात्त्व आवेश: त्रिंशद्धा न स्यात् । विद्यायाश्च समनन्तरोक्तेन सामान्यात्मना मान्त्रेण रूपेण दशधावेशः । विशिष्टेन तु मन्त्र-मन्त्रेश-मन्त्रमहेशात्मना रूपेण अस्यास्तत्त्वमध्ये परिगणनम् । एवं शक्तेरपि एकं भेदं तत्त्वमध्ये व्यवस्थाप्य तदीय आवेशो द्विधा । शिवस्तु समावेश्य एव इति न तत्रावेशोऽस्ति, तस्य परमाद्वयस्वभावत्वात्, तदपेक्षया समावेश्य समावेशकलक्षणभेदानुपपत्तेः । तद्युक्तमुक्तम् ‘अस्य समावेशस्य पञ्चाशद्विधत्वम्’ इति ।। १९१ ।। विद्वान् या अविद्वान् सबकी प्रतीति में पारमार्थिक रूप से सत्ता का विषय भी भूत कहा जाता है । भूत सत्य है । सत्य वह होता है जिसके विषय में कभी भी किसी को भी आपत्ति न हो । अनुमेय के विषय में अज्ञानियों को प्रतीति नहीं होती । विद्वानों को यद्यपि प्रतीति होती है तो भी उनमें अनेक प्रकार की परस्पर आपत्ति होती है । इसलिये उसमें (= अनुमान के विषय में) असत्य की सम्भावना रहती है । पूर्व श्लोक में ‘च’ का प्रयोग हेतु अर्थ में है इसलिये यहाँ सभी अवकाश वाले हैं । उस (अवकाश) का दाता होने से (व्योम) आकाश (कहलाता) है । उसके सहित वायु पर्यन्त चार को मिलाने से पृथिवी आदि पाँच भूत सबकी प्रतीति के विषय हैं इस कारण उसकी = भूत की , आस्थिति = अवस्थिति को (विद्वान्, अविद्वान् सब लोग) मानते हैं । इसलिये ठीक कहा- ‘इसीलिये इनका नाम भूत है ।’ इस प्रकार भूतों का आवेश पाँच प्रकार का है । आत्मा (पुरुष) का आवेश तीन प्रकार का हैं । एक होने पर भी पुंस्तत्त्वरूप आत्मभेद तत्त्व के मध्य में रखना चाहिये । अन्यथा तत्त्व का आवेश तीस प्रकार का नहीं होगा । विद्या का आवेश समनन्तरोक्त सामान्यात्मक मान्त्ररूप से दश प्रकार का होता है । विशिष्ट रूप से मन्त्र-मन्त्रेश-मन्त्रमहेश्वररूप से इस (= विद्या) के (आवेश) की गणना तत्त्व के मध्य में होती है । इसी प्रकार शक्ति यद्यपि एक ही है तथापि तत्त्व के मध्य में व्यवस्थापित कर उसका आवेश दो प्रकार का हो जाता है । शिव तो समावेश्य ही हैं इसलिये उसमें आवेश नहीं होता । क्योंकि वे परमअद्वय स्वभाव वाले हैं । उनकी अपेक्षा समावेश्यसमावेशक लक्षण वाला भेद सम्भव नहीं है । इस प्रकार ठीक ही कहा गया-यह समावेश ५० प्रकार का है ।। १९१ ।। प्रथममाह्निकम् १८१ ननु श्रीपूर्वशास्त्रे रुद्रशक्तिसमावेशस्य पञ्चधात्वचर्चनं प्रतिज्ञाय भूतादीनां _ स्वरूपनिरूपणं कृतम् ? इत्याह रुद्रशक्तिसमावेशः पञ्चधा ननु चर्च्यते । कोऽवकाशो भवेत्तत्र भौतावेशादिवर्णने ॥ १९२ ॥ प्रसङ्गादेतदितिचेत्समाधिः सम्भवन्नयम् । नास्माकं मानसावर्जी लोको भिन्नरुचिर्यतः ॥ १९३ ॥ कोऽवकाश इति— भौतावेशादीनाम् अप्रस्तुतत्वात्, इदमेव हि तदप्रस्तुता भिधानं यदन्यदुपक्रम्य अन्यदभिधीयते इति अश्चोदितम् ‘कोऽवकाशो भौता वेशादिवर्णने’ इति । अथ रुद्रशक्तिसमावेशवर्णने प्रतिज्ञातेऽपि प्रसङ्गादेतदुक्तम्, इति पुनस्तदप्ययुक्तम्-इत्याह ‘प्रसङ्गादेतत्’ इति । निर्णीतप्राये प्रक्रान्तेऽर्थे यत्किंचिदनुषक्तत्वेन अप्रकृतम् अभिधीयते तत्रायं समाधि: ‘प्रसङ्गादेतदुक्तम्’ इति । इह तु उद्दिष्टेऽपि प्रकृते लक्षणपरीक्षादि अनुक्त्वैव भूतावेशादीनाम् आकस्मिकमेव अभिधानं कृतम् इति को नामायं प्रसङ्गः । एवं हि अप्राकरणिकानां प्रमेयाणामानन्त्यात् अनन्तान्तरङ्गप्रमेयप्रतिपादनप्रसङ्गः स्यात् ? इत्युक्तं ‘नास्माकं प्रश्न-मालिनी विजयोत्तर तन्त्र में रुद्रशक्ति समावेश के पाँच प्रकार की चर्चा की प्रतिज्ञा कर भूत आदि का स्वरूप निर्वचन किया गया ? (ऐसा क्यों ?)- यह कहते हैं रुद्र शक्ति का समावेश पाँच प्रकार का कहा जाता है । तो (अप्रस्तुत होने के कारण) वहाँ भीत आवेश आदि के वर्णन का क्या अवसर है? यदि यह कहिए कि प्रसङ्गवश यह (= भूतों का वर्णन) किया गया? तो यह समाधान सम्भव होते हुए भी हम लोगों के मनको सन्तुष्ट करने वाला नहीं है क्योंकि समाज भिन्न-भिन्न रुचि वाला है ।। १९२-१९३ ।।। कहाँ अवसर है क्योंकि भूत आवेश आदि को प्रस्तुत नहीं किया गया । यही वह अप्रस्तुत का कथन है कि दूसरे की भूमिका प्रस्तुत कर दूसरा कह दिया जाता है । इसलिये कहा गया— ‘भौत आवेश आदि के वर्णन का अवसर कहाँ है ।’ रुद्रशक्तिसमावेश के वर्णन की प्रतिज्ञा करके भी प्रसङ्गवश इसे कह दिया—यह भी अनुचित है, यह कहते हैं—प्रसङ्गात् एतत् । प्रस्तुत विषय के प्राय: निर्णीत हो जाने पर जो कुछ अनुषक्त (= सम्बद्ध) के रूप में अप्रस्तुत कहा गया उस विषय में यह समाधान है-‘प्रसङ्गवश यह कहा गया।’ यहाँ प्रस्तुत का उद्देश (= नामग्रहण) होने के बाद भी लक्षण परीक्षा आदि को बिना कहे भूतआवेश आदि का आकस्मिक ही कथन कर दिया गया—इसका यहाँ क्या प्रसङ्ग था। इस प्रकार अप्राकरणिक प्रमेयों के अनन्त होने के कारण अनन्त अन्तरङ्ग प्रमेयों के प्रतिपादन का प्रसङ्ग हो जाएगा । इसलिये कहा-‘हमारे मन को प्रभावित करने १८२ श्रीतन्त्रालोकः मानसावर्जी’ इति ।। १९२-१९३ ।। यद्येवं तर्हि किं प्रतिपत्तव्यम् ?–इत्याह उच्यते द्वैतशास्त्रेषु परमेशाद्विभेदिता । भूतादीनां यथा सात्र न तथा द्वयवर्जिते ॥ १९४ ॥ अत्र इति—अद्वयशास्त्रे श्रीश्रीपूर्वे । सा इति–विभिन्नता । तनिषेधे तु द्वयवर्जितत्वं हेतुः ।। १९४ ।। ततश्च किं स्यात् ? इत्याशङ्कयाह यावान्षट्त्रिंशकः सोऽयं यदन्यदपि किञ्चन । एतावती महादेवी रुद्रशक्तिरनर्गला ॥ १९५ ॥ अन्यत् इति–तद्भेदा एव भुवनाद्याः । अनर्गला इति–व्यापकत्वाद प्रतिहता—इत्यर्थः । यदुक्तम् ‘त्वच्छक्तिचक्रात्मकमेव विश्वं ग्राह्यग्रहीतृग्रहणात्मनैतत् अन्तादिमध्येषु सदा विभाति नात्यन्तभिन्नं भवतोऽस्ति किञ्चित् ।।’ इति ।। १९५ ।। वाला नही है’ ।। १९२-१९३ ।। यदि ऐसा है तो क्या समझना चाहिये ?—यह कहते हैं द्वैतशास्त्रों में जिस प्रकार पञ्चभूत आदि की परमेश्वर से भिन्नता का वर्णन किया जाता है । द्वैतरहित इस शास्त्र में वैसा नहीं है ।। १९४।। यहाँ = अद्वयशास्त्र मालिनीविजय में । वह = भिन्नता, उसके निषेध में द्वयवर्जित्व हेतु है ।। १९४ ।। उससे क्या होगा ?-यह शङ्का कर कहते हैं जो यह छत्तीस तत्त्वों (का समूह) है और इससे अतिरिक्त जो कुछ (भुवन आदि) हैं यह सब प्रतिबन्धरहित (= स्वतन्त्र) महादेवी रुद्रशक्ति ही हैं ।। १९५ ।। अन्य = भवन आदि उसके भेद । अनर्गल = व्यापक होने के कारण अप्रतिहत । जैसा कि कहा गया (हे परमेश्वर) यह विश्व आपकी शक्तिपरम्परा ही है । ग्राह्य, ग्रहीता और ग्रहण के रूप में यह अन्त आदि और मध्य में सदा प्रकाशमान है । कोई भी वस्तु आपसे अत्यन्त भिन्न नहीं है ।। १९५ ।। प्रथममाह्निकम् १८३ एतच्च तत्रत्येनैव अर्थेन संवादयति तत एव द्वितीयेऽस्मिन्नधिकारे न्यरूप्यत । धरादेर्विश्वरूपत्वं पाञ्चदश्यादिभेदतः ।। १९६ ॥ तत एव इति–रुद्रशक्तेरेव तावत्स्फाररूपत्वात् । अस्मिन् इति श्रीपूर्वशास्त्रे। यदुक्तं तत्रैव ‘शक्तिमच्छक्तिभेदेन धरातत्त्वं विभिद्यते । स्वरूपसहितं तच्च विज्ञेयं दशपञ्चधा ।।’ इत्यादि …………शिव: साक्षान्न भिद्यते ।’ इत्यन्तम् । एतच्च तत्त्वभेदने भविष्यति, इति ग्रन्थविस्तरभयात् नेह आयस्तम् ।। १९६ ।। ननु यद्येवं तर्हि रुद्रशक्तावेवं-समावेशोऽभिधीयतां कि भूताधावेशेन इति स एव दोषः ? इत्याशङ्कां गर्भीकृत्य, एतदेव उपसंहारभङ्ग्या दृष्टान्तं दर्शयन् उपपादयति तस्माद्यथा पुरस्थेऽर्थे गुणाद्यंशांशिकामुरवात् । इसका वहीं (मालिनीविजय) के विषय से सम्वाद करते हैं (चूँकि यह सब रुद्रशक्ति का ही स्फार है) इसलिए (श्रीपूर्वशास्त्र के) दूसरे अधिकार में पाँच दश (५ + १० = १५) भेद से पृथ्वी आदि का ‘विश्वरूपत्व वर्णित है ।। १९६ ।। इसी कारण = रुद्र शक्ति का ही स्फार होने के कारण । इसमें = मालिनीविजय में । जैसा कि वहाँ कहा गया ‘शक्ति और शक्तिमान् के भेद से पृथ्वी तत्त्व भेदवान् होता है । अपने रूप के सहित वह पन्द्रह प्रकार का होता है ।’ । इत्यादि से लेकर ‘शिव साक्षात् भेदभिन्न नहीं होता ।’ यहाँ तक (कहा गया) । यह तत्त्वभेद प्रकरण में (उक्त) होगा इसलिये यहाँ नहीं कहा गया ।। १९६ ॥ प्रश्न-यदि ऐसा है तो रुद्रशक्ति में ही समावेश का कथन करना चाहिये । भूतादि आवेश की चर्चा से वही दोष आ जाता है?—इस शङ्का को मन में रखकर इसी को उपसंहार की दृष्टि से दृष्टान्त देते हुए बतलाते हैं १८४ श्रीतन्त्रालोकः निरंशभावसंबोधस्तथैवात्रापि बुध्यताम् ॥ १९७ ॥ यथा संनिहिते घटादौ अर्थे लौहित्याद्यंशाभासद्वारेण अनेकसामान्या भाससंमेलनात्मनो निरंशस्य-अखण्डस्य अर्थस्य सम्यक् स्वालक्षण्येन बोधो भवेत् तथैव अत्रापि भूता_शमुखेन निखिलरुद्रशक्त्यवभासः इत्यधि गन्तव्यम् ।। १९७ ।। एवमपि किं स्यात् ? इत्याशङ्क्याह अत एवाविकल्पत्वध्रौव्यप्राभववैभवैः । अन्यैर्वा शक्तिरूपत्वाद्धर्मैः स्वसमवायिभिः॥ १९८ ॥ सर्वशोऽप्यथ वांशेन तं विभुं परमेश्वरम् । उपासते विकल्पौघसंस्काराद्ये श्रुतोत्थितात् ॥ १९९ ॥ ते तत्तत्स्वविकल्पान्तःस्फुरत्तद्धर्मपाटवात् ।। धर्मिणं पूर्णधौघमभेदेनाधिशेरते ॥२०० ॥ अत एव इति धर्ममात्रावगममुखेन धर्मिण्यवगमात् । ध्रुवस्य भावो ध्रौव्यं नित्यत्वम् । अन्यैः इति पूर्णत्वादिभिः, स्वसमवायिभिः इति शक्तिरूपत्वादभिन्नैः इसलिए जैसे सामने वर्तमान (घट आदि पदार्थों के विषय में) गुण (संख्या परिमाण आकृति) आदि का आंशिक आभास होने के साथ निरंश (= एक अखण्ड घट व्यक्ति) का बोध होता है उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिए ।। १९७ ।। जैसे सन्निहित घट आदि विषय में लौहित्य आदि अंश के आभास के द्वारा अनेक गुणों के आभास का सम्मिलित रूप निरवयव = अखण्ड विषय का सम्यक् = स्वलक्षण के रूप में, बोध होता है उसी प्रकार यहाँ भी भूत आदि अंश के द्वारा सम्पूर्ण रुद्रशक्ति का अवभास होता है-यह समझना चाहिये ।। १९७ ।। इससे भी क्या होगा ?-यह शङ्का कर कहते हैं इसीलिए श्रुति से उत्पन्न विकल्पसमूह के संस्कार के कारण जो लोग अविकल्पत्व, नित्यत्व, प्रभुत्व, वैभव अथवा शक्ति रूप होने से अभिन्न अन्य (= पूर्णत्व आदि) धर्मों के द्वारा सर्वश: अथवा अंशत: उस व्यापक प्रभु की उपासना करते हैं वे उन स्वविकल्प के अन्दर स्फुरित होने वाले धर्म की पटुता (= प्रबोध) के कारण पूर्ण धर्मों के समूह उस धर्मी को प्राप्त करते हैं । ( उस रूप में स्फुरित होते हैं ) ।। १९८-२०० ।। अतएव = धर्म के ज्ञान के द्वारा धर्मी का ज्ञान होने से । ध्रुव का भाव ध्रौव्य = नित्यता । अन्यों के द्वारा = पूर्णत्व आदि के द्वारा । स्वसमवायि के द्वारा =१८५ प्रथममाह्निकम् इत्यर्थः । ये केचन श्रुतचिन्ताद्युत्थिततत्तन्नियतधर्मविषयस्य विकल्पौघस्य संस्कारम् अवलम्ब्य परमेश्वरं समनन्तरोद्दिष्टाभिः सर्वाभिरेव शक्तिभिः एकयैव वा शक्तया समाविशन्ति, ते समाविष्टाः सन्तः, ते ते ये विकल्पा: तेषाम् अन्तः स्वाकारतया स्फुरन्तः, ते नियता अनियता वा धर्माः शक्तयः, तेषां पाटवं प्रबोधः तदाश्रित्य पूर्णधौघम् अनन्तशक्तिखचितत्वेन पूर्णस्वभावं धर्मिणम् शक्तिमन्तं परमेश्वरम् अभेदेन अधिशेरते तद्रूपतया स्फुरन्ति–इत्यर्थः ।। १९८-२०० ।। नन् एकस्यापि नानाविधधर्मयोगिनोऽर्थस्य आखण्ड्येनैव प्रतीतिगोचरीभाव: सम्भवति न तु इतरथा इति किमेतदुक्तम् ? इत्याशङ्काशान्त्यर्थम् एतदेव संवादयति ऊचिवानत एव श्रीविद्याधिपतिरादरात् । तदेव पठति– त्वत्स्वरूपमविकल्पमक्षजा कल्पने न विषयीकरोति चेत् । अन्तरुल्लिखितचित्रसंविदो नो भवेयुरनुभूतयः स्फुटाः ॥ २०१ ॥ यदि नाम ऐन्द्रियिकी निर्विकल्पप्रतीति: अविकल्पम् अविभागमपि Cl शक्तिरूप होने के कारण अभिन्न । जो लोग श्रवण-मनन आदि के द्वारा उत्पन्न तत्तत् नियत धर्म वाले विकल्पसमूह के संस्कार के आधार पर पूर्वोक्त सभी शक्तियों या एक शक्ति के द्वारा परमेश्वर के समावेश को प्राप्त करते है वे समाविष्ट होकर उन-उन विकल्पों के भीतर अपने स्वरूप से स्फुरित होते हुए नियत अथवा अनियत शक्ति के प्रबोध के आधार पर पूर्णस्वभावरूप परशक्तिमान् परमेश्वर से अभिन्न होकर स्फुरित होते हैं ।। १९८-२०० ।। प्रश्न-नाना प्रकार के धर्म वाले एक ही अर्थ का अखण्ड रूप में भान सम्भव है दूसरे रूप में नहीं, फिर यह कैसे कहा ?-इस शङ्का को शान्त करने के लिये (दूसरे ग्रन्थ का) संवादन करते हैं इसीलिए श्री विद्यापति ने आदरपूर्वक कहा है उसी का पढ़ रहे हैं इन्द्रियों से उत्पन्न होने वाली (निर्विकल्पक प्रतीति) यदि आपके निर्विकल्पक (= विभागरहित) स्वरूप को कल्पना का विषय नहीं बनाती तो (स्वयं) स्फुट (= नियत एकधर्म के अवभास द्वारा धर्मी के स्वरूप के अवभास से युक्त) तथा अस्फुट रूप में भीतर-भीतर विचित्र ज्ञान का उल्लेख करने वाली अनुभूतियाँ नहीं होगी ।। २०१ ।। १८६ श्रीतन्त्रालोकः त्वत्स्वरूपम्, कल्पने नियततत्तद्धर्मविषयत्वेन भेदनमवलम्ब्य न विषयीकुर्यात् तत् स्फुटा नियतैकतरधर्मावभासमुखेन धर्मिस्वरूपावभासमय्यः, अन्त: अस्फुटाकार त्वेन, उल्लिखिताः चित्रा: अवान्तरनानाधर्मविषयाः संविदो यासां ता:, एवंविधा: अनुभूतयः अनुभवाः, नो भवेयुः न उत्पद्येरन्—इत्यर्थः। यदि हि सर्वधर्मा क्रान्त्या धर्मिणि सर्वे अनुभवाः स्युः तत् परिवाडित्यादौ एकैकस्यापि तिस्र: कल्पना भवेयुः, तेन स्वेच्छावशात्, अर्थित्वानुरोधाद्वा, नैपुण्याद्वा प्रतिप्रमातृ नियतधमविभासमुखेनैव धर्मिण्यवभासो भवेत् न तु इतरथा- इति युक्तम् एकतरशक्तयवभासमुखेन अनन्तशक्तावपि परमेश्वरेऽवभासः इति ।। २०१ ।। एतच्च न केवलं युक्तया सिद्धं यावदागमेनापि–इत्याह तदुक्तं श्रीमतङ्गादौ स्वशक्तिकिरणात्मकम् । अथ पत्युरधिष्ठानमित्याद्युक्तं विशेषणैः ॥ २०२ ॥ तस्यां दिवि सुदीप्तात्मा निष्कम्पोऽचलमूर्तिमान्। काष्ठा सैव परा सूक्ष्मा सर्वदिक्कामृतात्मिका ॥ २०३ ॥ यदि इन्द्रियजन्य निर्विकल्पक प्रतीति कल्पना = पदार्थ, में रहने वाले निश्चित भिन्न-भिन्न धर्म के विषय के रूप में भेद, का अवलम्बन कर आपके निर्विकल्पक स्वरूप को विषय न बनाये तो अन्तः = अस्फुट आकार में उल्लसित, चित्र = अवान्तर अनेक धर्मों वाली, स्फुट = नियत एक धर्मी के अवभास वाली धमों के स्वरूप की अवभासक अनुभूतियाँ उत्पन्न ही नहीं होगी । यदि सभी धर्मों का अतिक्रमण करने के साथ धर्मी में सारे अनुभव होंगे तो ‘परित्राट्’ इत्यादि को एक विषय में एक-एक की तीन-तीन कल्पनायें होंगी । इसलिये स्वेच्छा के कारण या अर्थित्व के अनुरोध वश अथवा निपुणता के कारण अलग-अलग प्रमाता के लिये धर्मी में अलग-अलग अवभास होता है । दूसरे प्रकार से नहीं । इसलिये एक-एक शक्ति के अवभास से अनन्त शक्ति वाले परमेश्वर में (पदार्थों का) अवभास होता है ।। २०२ ।। यह बात केवल तर्क से ही नहीं अपित आगम से भी सिद्ध है-यह कहते ___ यही बात मतङ्ग आदि शास्त्रों में कही गई हैं— स्वशक्तिरूपी किरणों वाली जो वस्तु है वह ‘पति का अधिष्ठान (= अभिव्यक्ति का आश्रय) इत्यादि विशेषणे के द्वारा कही गई है ।। २०२ ।। उस दीप्यमान (शक्ति) में महाप्रकाश शरीर वाला, कम्पनरहित तथा अचल मूर्ति वाला (शिव वर्तमान है, इस कारण) वही (= शक्ति ही) १. परिवाटकामुकशुनामेकस्यां प्रमदातनौ । कुणप: कामिनी भक्ष्य इति तिस्त्रो विकल्पनाः ।। प्रथममाह्निकम् १८७ प्रध्वस्तावरणा शान्ता वस्तुमात्रातिलालसा । आद्यन्तोपरता साध्वी मूर्तित्वेनोपचर्यते ॥ २०४ ॥ स्वशक्तिकिरणात्मकं यद्वस्तु तत् ‘पत्युरधिष्ठानम्’ इत्यादिभिः विशेषणैः अर्थात् विशिष्टमुक्तम्-इति सम्बन्धः । ‘अथ पत्युरधिष्ठानं स्वशक्ति किरणात्मकम् । इत्येवं-पाठ ऐश:, ग्रन्थकृता पुनरेवं विध्यनुवादभावदर्शनार्थम् अन्यथा पाठः कृतः, तान्येव विशेषणानि दर्शयितुं ‘तस्याम्’ इत्यादि ‘उपचर्यते’ इत्यन्तमागमः पठितः । स्वा: अनन्यसाधारणा याः शक्तयः ता एव अभिन्नत्व प्रकाशत्वानन्त्यादिना किरणा: रश्मयः तदात्मकम्, पत्युः शक्तिमतः, अधिष्ठानम् अभिव्यक्तिस्थानम्-इत्यर्थः । शक्तिरेव तज्ज्ञप्तावुपायः, यदुक्तम् ‘यथालोकेन दीपस्य किरणैर्भास्करस्य वा। ज्ञायते दिग्विभागादि तद्वच्छक्त्या शिवः प्रिये ।।’ इति । अत एव तस्याम् शक्तौ, दिवि द्योतमानायाम, सोऽपि सुष्ठ दीप्तात्मा महाप्रकाशवपुः, अत एव निष्कम्प: स्वस्मिन्नेव रूपे अवस्थितः, तस्य हि प्रकाशात्मनः स्वरूपात्प्रच्यावे सर्वमिदम् अन्धं स्यात्, अत एव च अचलया पराकाष्ठा (= अन्तिम विश्रान्तिधाम) है, वह सूक्ष्म, सभी दिशाओं में व्याप्त (अर्थात् जगत्स्वरूप) तथा अमृत (= नित्य) आवरणरहित शान्त, परमार्थिक स्वरूप की स्फुरत्ता वाली आदि एवं अन्त से रहित, साध्वी (शक्ति लक्षण के द्वारा परमेश्वर की) मूर्ति के रूप में मानी जाती है ।। २०३-२०४ ।। . परमेश्वर की शक्तिरूपी किरणस्वरूप जो वस्तु है वह ‘पति का अधिष्ठान’ इत्यादि विशेषणों के द्वारा अर्थात् विशिष्ट रूप से कही गयी है—ऐसा अन्वय है । आगम का पाठ-अथ पत्यरधिष्ठानं स्वशक्तिकिरणात्मकम् ।—इस प्रकार का है । ग्रन्थकार = अभिनवगुप्त ने पुन: विधि एवं अनुवाद भाव को दिखलाने के लिये पाठ के क्रम को बदल दिया । उन्हीं विशेषणों को दिखलाने के लिये ‘तस्यां’ से लेकर ‘उपचर्यते’ तक आगम का प्रतिपद पाठ किया । स्व = अनन्य साधारण जो शक्तियाँ, वे ही अभिन्नत्व प्रकाशत्व अनन्तत्व आदि के द्वारा किरण = रश्मियाँ, हैं। पति = शक्तिमान् का अधिष्ठान = अभिव्यक्ति का स्थान तदात्मक है । परमेश्वर के ज्ञान का उपाय शक्ति ही है । जैसा कि कहा गया जैसे प्रकाश के द्वारा दीपक का, किरणों के द्वारा सूर्य का दिक् विभाग आदि (= सूर्य या दीपक किस दिशा में है इत्यादि) जाना जाता है उसी प्रकार हे प्रिये ! शक्ति के द्वारा शिव का ज्ञान होता है । इसलिये उस द्योतमान शक्ति में ही वह सुदीप्तात्मा = महाप्रकाशस्वरूप इसलिये स्थिर अचल मूर्तिमान् (शिव) स्थित (और अनुभूत होते) हैं । यदि १८८ श्रीतन्त्रालोकः महाप्रकाशमय्या प्रशस्यया मूर्त्या युक्तः, यतश्च तस्यामेवंविधायाम् अयमेवंविधः, तत: सैव परा काष्ठा लोकोत्तरा विश्रान्तिभूः, अत एव सूक्ष्मा परिच्छेत्तुम शक्या-परप्रमात्रेकरूपत्वात्, अत एव वस्तुमात्रे पारमार्थिके रूपे अतिशयेन लालसा तत्स्फत्तात्मिका इति यावत् । एवं च प्रकर्षण नि:संस्कारतया ध्वस्तानि बाह्यावरणानि यया सा प्रशान्तभेदा इत्यर्थः, अत एव शान्ता चिन्मात्ररूपा इत्यर्थः । एवमपि सर्वदिक्का सर्वदिक्षु भवा स्थावरजङ्गमात्मकजगद्रूपत्वात् चित्रस्वभावा इति यावत्, तदपि अमृतात्मिका नित्या, अत एव आद्यन्तोपरता, अनित्ये हि आद्यन्तौ भवतः, अत एव साध्वी अनित्यत्वादिदोषकालष्यरहिता इत्यर्थः, एवंविधा च एषा शक्तिमतः परमेश्वरस्य मर्तित्वेन उपचर्यते गौण्या वृत्त्या तद्रूपतया अभिधीयत-इत्यर्थः ।। २०२-२०४ ।। ननु उपचारे मुख्यार्थबाधादिना त्रितयेन अवश्यभाव्यं तच्चात्र किमस्ति न वा? इत्याशङ्क्याह तथोपचारस्यात्रैतन्निमित्तं सप्रयोजनम् । निमित्तम् इति कारणम्, तद्वशादेव हि उपचारो भवेत् इति भावः । प्रकाशस्वरूप वह अपने स्वरूप से च्युत हो जाँय तो यह सब कुछ अन्धकारमय हो जायेगा । इसीलिये वे अचल = महाप्रकाशमयी प्रशंसा के योग्य मूर्ति से युक्त है । चूँकि उस प्रकार की शक्ति में उस प्रकार के शिव हैं इसलिये वही (शक्ति) पराकाष्ठा = लोकोत्तर विश्रान्तिधाम, सूक्ष्म = परिसीमन से परे है क्योंकि वह परप्रमातास्वरूप है । वह पारमार्थिक रूप में स्फुरण करती रहती है । संस्कारसहित समस्त आवरणों का नाश करने से वह भेदरहित है । इसीलिये वह शान्त अर्थात् चिन्मात्रस्वरूप वाली है। ऐसा होने पर भी वह सर्वदिक्का = समस्त दिशाओं में रहने वाली स्थावर जङ्गम रूप जगत् के कारण विचित्र स्वभाव वाली है । तो भी वह अमृतरूपा अर्थात् नित्य है । आदि अन्त से रहित है । आदि और अन्त अनित्य वस्तुओं में होते हैं । इसलिये वह साध्वी = अनित्यत्व आदि मालिन्य से रहित है । इस प्रकार की वह शक्ति शक्तिमान् परमेश्वर की मूर्ति के रूप में उपचरित होती है । अर्थात् गौणी वृत्ति के द्वारा उसी (परमेश्वर) के रूप में कही जाती है ।। २०२-२०४ ।। प्रश्न-उपचार में मुख्यार्थबाध आदि तीन’ होने चाहिये । वे यहाँ है या नही?—यह शङ्का कर कहते हैं उस लक्षण का प्रयोजनवान् यह निमित्त है ।। २०५- ।। निमित्त = कारण । उसी के कारण उपचार होता है । शक्ति जब शाक्तमान् १. मुख्यार्थबाध, शक्यार्थयोग, रूढ़ि अथवा प्रयोजन । प्रथममाह्निकम् १८९ तत्र शक्तेः शक्तिमद्रूपत्वाभिधाने बाधितस्तावत् मुख्योऽर्थः, संबन्धश्च तयोरुपायोपेयभावः ।। तदाह तन्मुखा स्फुटता धर्मिण्याशु तन्मयतास्थितिः ॥२०५ ॥ त एव धर्माः शक्त्याख्यास्तैस्तैरुचितरूपकैः। आकारैः पर्युपास्यन्ते तन्मयीभावसिद्धये ॥ २०६ ॥ सा शक्तिः मुखम् उपायो यस्याः, स्फुटता नाम किमुच्यते-इत्युक्तम् ‘आशु तन्मयतास्थितिः’ इति, आसादितायां शक्तावासादित एव शिव: इत्याशयः । एतदेव च मुख्यं प्रयोजनम् ।। २०६ ।। अत एवाह तत्र काचित्पुनः शक्तिरनन्ता वा मिताश्च वा । आक्षिपेद्धवतासत्त्वन्यायाद् दूरान्तिकत्वतः ॥ २०७ ॥ अनन्ता मिताश्च इत्यर्थाच्छक्ती: । धवतासत्त्वन्यायात’ इति-धवता हि अधवव्यावृत्ताः स्वव्यक्तीरेव आक्षिपति इत्यस्याः परिमितवस्त्वाक्षेपित्वम्, सत्त्वं का कथन करती है तो मुख्यार्थ का बाध होता है । मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थ का उपाय उपेय सम्बन्ध है । शक्ति उपाय है और शिव उपेय ।। २०५ ।। वही कहते हैं तन्मुखा (= शक्ति ही उपाय है जिसकी ऐसी) स्फुटता अर्थात् धर्मी (= शिव) में शीघ्र तन्मयता की स्थिति (ही प्रयोजन है)। शिवमयीभाव की सिद्धि के लिए, शक्ति नामक उन्हीं धर्मो की उन-उन उचित रूप वाले आकारों के द्वारा उपासना की जाती है ।। -२०५-२०६ ।। वह = शक्ति, मुख = उपाय, है जिसका । स्फुटता क्या है-इस विषय में कहते हैं-शीघ्र तन्मयता का होना । शक्ति के प्राप्त होने पर शिव प्राप्त हो ही जाते हैं—यह भाव है । और यही मुख्य प्रयोजन है ।। २०६ ।। इसीलिये कहते हैं उसमें कोई शक्ति, धवतासत्त्वन्याय से दूर और समीप होने से परिमित तथा अपरिमित वस्तुओं का आक्षेप करती है ।। २०७ ।। अनन्त और परिमित—यह शक्तियों का विशेषण है । धवतासत्त्वन्याय—धवता १. एक ही वस्तु में दो परस्पर विरोधी धर्मों का समावेश धवता सत्त्व न्याय है । जैसे धव (= एक प्रकार का पुष्प) में धवता है लेकिन अधवता नहीं है और सत्त्व धवता और अधवता दोनों में है। १९० श्रीतन्त्रालोक: पुनर्धवाधवात्मनि सर्वत्रैव अस्ति इत्यस्यानन्तवस्त्वाक्षेपित्वम् । अत एव च मितवस्त्वाक्षेपिण्यो दूराः, अव्यापकत्वेन सर्वत्र असन्निहितत्वात्, अनन्तवस्त्वा क्षेपिण्यस्तु आसनाः, व्यापकत्वात् सर्वत्रैव संनिहितत्वात् ।। २०७ ।। एतदेव प्रकृते योजयति तेन पूर्णस्वभावत्वं प्रकाशत्वं चिदात्मता। भैरवत्वं विश्वशक्तीराक्षिपेद्व्यापकत्वतः॥ २०८॥ सदाशिवादयस्तूर्ध्वव्याप्त्यभावादधोजुषः। शक्तीः समाक्षिपेयुस्तदुपासान्तिकदूरतः ॥ २०९ ॥ अधोजुषः इति-ईश्वरादिकाः शक्ती:, तदिति पूर्णस्वभावत्वसदाशिवत्वादेः व्यापकत्वाव्यापकत्वस्वभावत्वाद्धेतोः । पूर्णस्वभावे हि रूपे उपासन्नाः पूर्णमेव भुक्तिमुक्तिलक्षणं फलम् आसादयन्ति, अपूर्णस्वभावे पुनरपूर्णत्वमेव इत्युक्तम् ‘उपासान्तिकदूरतः’ इति । अत एव च दर्शनभेदः ।। २०८-२०९ ।। ननु विकल्प एव तत्कल्पनाबलान्नियत: सामान्यात्मा धर्मोऽवभासते इति तत्र कहने से अधवता का प्रत्याख्यान हो जाता है । इस प्रकार ‘धवता’ शब्द अपने वाच्य व्यक्तियों का ही आक्षेप करता है । इसलिये यह परिमित वस्तु का आक्षेपक है । इसके विपरीत ‘सत्त्व’ धवता और अधवता दोनों में रहता है इसलिये यह अनन्तवस्तु का आक्षेप करता है । परिमित वस्तु का आक्षेप करने वाली (शक्तियाँ) दूर होती है क्योंकि वे व्यापक न होने से सर्वत्र सन्निहित नहीं होती । अनन्त वस्तु का आक्षेप करने वाली (शक्तियाँ) आसन हैं क्योंकि वे व्यापक होने से सर्वत्र सन्निहित रहती हैं ।। २०७ ।। इसी को प्रस्तुत से जोड़ते हैं इसलिए व्यापक होने के कारण (शिव) पूर्णस्वभावता, स्वप्रकाशता, चिदात्मता, भैरवत्व एवं सम्पूर्ण शक्ति का आक्षेप करते हैं । जबकि सदाशिव आदि ऊर्ध्व व्याप्ति के न होने से उस (= शिव) की उपासना के अन्तिक एवं दूर होने से निम्न स्तर पर वर्तमान (ईश्वर आदि) शक्तियों का आक्षेप करते हैं ।। २०८-२०९ ।। ____ अधोजुषी नीचे रहने वाली-ईश्वर आदि शक्तियाँ । तत् = पूर्णस्वभावत्व सदाशिवत्व आदि के व्यापकत्व और अव्यापकत्व स्वभाव के कारण । पूर्णस्वभाव वाले रूप की उपासना करने वाले भोगमोक्षलक्षण वाले पूर्ण फल को प्राप्त करते हैं और अपूर्ण स्वभाववाले (के उपासक) अपूर्ण फल को, इसलिये कहा गया ‘उपासान्तिकदूरतः’ । इसीलिये दर्शनों का भेद है ।। २०८-२०९ ।।। प्रश्न-विकल्प में ही उसकी कल्पना के बल से निश्चित सामान्य धर्म भासित प्रथममाह्निकम् तन्मुखेन धर्मिणि अवभासो भवेत् इत्ययं क्रमः शाक्तोपाये स्यात् न तु अखण्डवस्त्ववभासात्मनि निर्विकल्पकस्वभावे शाम्भवे इति कथमिहैतदुक्तम् ? इत्याशङ्कयाह इत्थं-भावे च शाक्ताख्यो वैकल्पिकपथक्रमः । इह तूक्तो यतस्तस्मात् प्रतियोग्यविकल्पकम् ॥ २१० ॥ इह इति शाम्भवावसरे, तस्मात् इति— विकल्पात्, प्रतिपक्षे हि निरूपिते सुष्ठु पक्षनिरूपणं कृतं स्यात् इति–नैतदप्रस्तुतं किञ्चिदभिहितम्-इति भावः । विकल्पे हि क्रमेण अखण्डवस्त्ववभासो भवति अविकल्पे पुनरक्रमेण इति प्राप्ताविकल्पस्थितियंत्र कुत्रचिदवधत्ते तत्रास्य तदैव शिवतापत्ति: स्यात् ।। २१०।। तदाह अविकल्पपथारूढो येन येन पथा विशेत् । धरासदाशिवान्तेन तेन तेन शिवीभवेत् ॥ २११ ॥ एतदेव उदाहरति निर्मले हृदये प्राग्र्यस्फुरद्भूम्यंशभासिनि । होता है । इसलिये उस (धर्म) के माध्यम से धर्मी में अवभास होता है। यह क्रम शाक्तोपाय में है । अखण्ड वस्तु के अवभासस्वरूप निर्विकल्पक स्वभाव वाले शाम्भवोपाय में यह सम्भव नहीं है फिर इसको यहाँ कैसे कह दिया?—यह शङ्का कर कहते हैं ___ इस प्रकार की भावना में शाक्त नामक विकल्पयुक्त मार्ग का क्रम होता है । किन्तु यहाँ (= शाम्भव समापत्ति के प्रकरण में (उस विकल्प का) प्रतियोगी अविकल्प ही निरूपित है ।। २१० ।। ____ यहाँ = शाम्भवोपाय के प्रकरण में । उससे = विकल्प से । प्रतिपक्ष का निरूपण करने पर ही पक्ष का निरूपण भलीभाँति होता है । इसलिये कुछ भी अप्रासंगिक नहीं कहा गया—यह तात्पर्य है । विकल्प में अखण्डवस्तु का अवभास क्रम से होता है और अविकल्प में अक्रमपूर्वक । इसलिये अविकल्प की स्थिति प्राप्त करने वाला (साधक) जहाँ कहीं भी ध्यान लगाता है वहीं उसका शिव के साथ तादात्म्य हो जाता है ।। २१० ।। वही कहते हैं निर्विकल्पक मार्ग में आरूढ़ होने वाला व्यक्ति पृथ्वी से लेकर शिवपर्यन्त जिस-जिस मार्ग से समावेश का आधान करता है उसी-उसी मार्ग से शिवत्व को प्राप्त करता है ।। २११ ।। इसी को उदाहरण से सिद्ध कर रहे हैं श्रीतन्त्रालोकः प्रकाशे तन्मुखेनैव संवित्परशिवात्मता ॥ २१२ ॥ इह खलु निर्मले हृदये पूर्णाहंविमर्शात्मनि, अत एव प्राग्र्यम्-आखण्ड्येन प्रकृष्टम् कृत्वा, स्फुरदूमिलक्षण: तत्त्वान्तरापेक्षया अंश: षट्त्रिंशो भागः, तदाभासात्मनि प्रकाशे तद्भूम्यंशात्मनैव उपायेन संवित्परशिवात्मता तदावेश: स्यात्-इत्यर्थः ।। २१२ ।। एतदेव उपसंहरति एवं परेच्छाशक्त्यंशसदुपायमिमं विदुः । शाम्भवाख्यं समावेशं सुमत्यन्तेनिवासिनः॥ २१३ ॥ परा भट्टारिकारूपा च असौ इच्छाशक्तिः, तदात्मकश्च असौ अंश: …………….परं त्विच्छात्मकं मतम् ।’ इत्याधुक्तेः शाक्ताद्यपेक्षया साक्षादुपायत्वात् संश्चासौ उपायः तम्, सुमत्यन्ते निवासिनः इति-श्रीसोमदेवादयः । श्रीसुमतिनाथस्य श्रीसोमदेवः शिष्यः, तस्य श्रीशम्भुनाथः इति हि आयातिक्रमविदः । यद्वक्ष्यति ‘श्रीसोमतः सकलवित्किल शम्भुनाथ:… ।’ इति । निर्मल हृदय में अखण्ड रूप से प्रकृष्ट, स्फुरत् भूमि के आंशिक आभास से युक्त प्रकाश होने पर उसी के द्वारा संवित् आवेश (= शाम्भव समावेश) होता है ।। २१२ ।। ___ निर्मल हृदय = पूर्णअहंविमर्श वाला (हृदय) । इसलिये प्राग्र्य = अखण्ड रूप में स्फुरित होने वाला, पृथ्वी का अवभास अन्य तत्त्वों की अपेक्षा ३६वाँ है । उसके आभास वाले प्रकाश में उस भूमि अंश वाले ही उपाय से संवित् परशिवात्मता अर्थात् शिवावेश हो जाता है ।। २१२ ।। इसका उपसंहार करते हैं इस प्रकार सुमतिनाथ के शिष्य (= सोमदेव) पराभट्टारिकारूप इस इच्छा शक्ति के अंशभूत इस उपाय को शाम्भव समावेश भानते हैं ।। २१३ ।। परेच्छा = परभट्टारिका रूपा इच्छाशक्ति और उसका अंश । ‘…पर इच्छा रूप माना गया है । इत्यादि उक्ति के अनुसार (शाम्भवोपाय) शाक्तोपाय की अपेक्षा साक्षात् उपाय होने से सदुपाय है । सुमति के अन्तेनिवासी = सोमदेव आदि । श्रीसुमतिनाथ के शिष्य श्री सोमदेव उनके श्री शम्भुनाथ ऐसा आगमक्रम के विद्वान् मानते हैं । जैसा कि कहेंगे प्रथममाह्निकम् १९३ यत्तु ‘कश्चिद्दक्षिणभूमिपीठवसति: श्रीमान्विभुभैरव: पञ्चस्रोतसि सातिमार्गविभवे शास्त्रे विधाता च यः । लोकेऽभूत्सुमतिस्तत: समुदभूत्तस्यैव शिष्याग्रणी: श्रीमाञ्छम्भुरिति प्रसिद्धिमगमज्जालन्धरात्पीठतः ।।’ इत्यन्यत्रोक्तं तत्परमगुर्वभिप्रायेणैव योज्यम् । यद्वा ‘इति श्रीसुमतिप्रज्ञाचन्द्रिकापास्ततामसः । श्रीशम्भुनाथ: सद्भावं जाग्रदादौ न्यरूपयत् ।।’ इत्यादावपि ज्ञेयम् ॥ २१३ ।। इदानीं शाम्भवमुपायं प्रतिपाद्य, शाक्तमप्याह शाक्तोऽथ भण्यते चेतोधीमनोहंकृतिः स्फुटम् । सविकल्पतया मायामयमिच्छादि वस्तुतः ॥ २१४ ॥ ‘श्री सोमदेव से समस्त शास्त्रों के ज्ञाता शम्भुनाथ…’ और जो कि ‘दक्षिण भारतभूमि के पीठ में रहने वाले कोई श्रीमान् समर्थ भैरव (नामक गुरु थे) जिन्होंने पञ्चस्रोतस् सिद्धान्त के अतिशय व्यापक शास्त्र का प्रवर्तन किया । संसार में उनके शिष्य सुमतिनाथ और उनसे शिष्यों में अग्रणी श्री शम्भुनाथ हुए जो जालन्धर पीठ से प्रसिद्धि को प्राप्त किये। ऐसा अन्यत्र कहा गया वह परमगुरु के अभिप्राय से (उक्त) समझना चाहिये । अथवा ‘जहाँ तक इस गुरु (की शिष्यपरम्परा) का विस्तार होता है वहाँ तक एक ही गुरु माना जाता है।’ ___इत्यादि वक्ष्यमाण नीति के आधार पर इसकी व्याख्या करनी चाहिए ऐसा हो श्रीसुमतिनाथ की प्रतिभारूपी चन्द्रिका से समस्त (अज्ञानरूपी) अन्धकार नष्ट हो गया जिनका, ऐसे श्री शम्भुनाथ ने जाग्रत आदि अवस्थाओं में सद्भाव का निरूपण किया । इत्यादि (के विषय) में भी जानना चाहिये ।। २१३ ।। शाम्भव उपाय का प्रतिपादन कर अब शाक्त (उपाय) को कहते हैं अब शाक्तोपाय का वर्णन किया जाता है । यह चित, बुद्धि मन एवं अहङ्कार रूप है । सविकल्पक होने के कारण यह - मायामय है किन्तु वास्तविक रूप में यह इच्छा आदि (= ज्ञान, क्रिया) १९४ श्रीतन्त्रालोकः एतच्चात्र न मनोमात्रम्-इत्याह-धीमनोऽहंकृति इति । अत एव स्फुटम्-साक्षादभिव्यक्तस्वरूपम्-इत्यर्थः । ततश्च ‘सर्वो विकल्प: संसार:…………….. इत्यादिनीत्या भेदप्रथारूपम् इत्युक्तम्- ‘सविकल्पतया मायामयम्’ इति । एवमपि परमार्थतो यथायोगम् एतदिच्छाज्ञानक्रियात्मकम्-इत्युक्तम्-‘इच्छादि वस्तुतः’ इति । यथा खलु पतिरिच्छाद्याभिः शक्तिभिर्विश्वं निर्मिमीते तथैव विकल्पाद्यपि बुद्ध्याद्यन्त:करणत्रयेण पशु:-इत्याशयः विकल्पादौ हि प्राय: क्षेत्रज्ञस्यैव स्वातन्त्र्यम्, तन्निर्माणं च एतत्त्रयाधीनमेव इत्येवमुक्तम् ।। २१४ ।। अत आह अभिमानेन सङ्कल्पाध्यवसायक्रमेण यः । शाक्तः स मायोपायोऽपि तदन्ते निर्विकल्पकः ॥ २१५ ॥ इह हि स्वात्मनि अहङ्कारग्रहेण कर्तृत्वमभिमन्य बाह्यमेषणीयादि तदतद्रूपतया ही है ।। २१४ ।। ___ यह केवल मनोमात्र नहीं है इसलिये कहा—बुद्धि, मन और अहङ्कारमय । इसीलिये यह स्फुट है अर्थात् इसका स्वरूप साक्षात् अभिव्यक्त होता है । इसलिये ‘समस्त विकल्प ही (समस्त) संसार है ।’ इत्यादि नीति के अनुसार (यह उपाय) भेदप्रथारूप है । यही कहा गया सविकल्पक होने से मायामय है । ऐसा होने पर भी परमार्थतः योग के अनुसार यह इच्छाज्ञानक्रियात्मक है-यह कहा गया-इच्छादि वस्तुतः । जिस प्रकार परमेश्वर इच्छा आदि शक्तियों के द्वारा विश्व का निर्माण करते हैं उसी प्रकार पशु भी बुद्धि आदि अन्त: करणों से विकल्प आदि का निर्माण करता है । विकल्प आदि के विषय में क्षेत्रज्ञ (= जीव) स्वतन्त्र है और उस (क्षेत्र या संसार) का निर्माण इन तीन (बुद्धि आदि) के अधीन है ।। २१४ ।। इसलिये कहते हैं (अपने अन्दर कर्तव्य के) अभिमान के द्वारा सङ्कल्प एवं निश्चय के क्रम से जो शाक्त समावेश होता है वह मायोपाय (= भेदोपाय) होते हए भी अन्त में निर्विकल्पक (अर्थात् अभेदोपाय = शाम्भवोपाय) ह जाता है ।। २१५ ।। आत्मा में अहङ्कार के अभिमान से कर्तृत्व का अभिमान कर बाह्य एषणीयप्रथममाह्निकम् सङ्कल्प्य तदेव च अन्यापोहेन निश्चित्य ‘अहमेव सर्वत्र स्थित:’ ‘सर्वं वा मय्येव स्थितम्’ इत्येवमात्मा यः शाक्तो वैकल्पिक: प्रत्यय उदेति स यद्यपि विकल्पानां भेदनिष्ठत्वात् मायात्मक उपाय: तथापि तेषां विकल्पानाम् अभ्यासबलेन यथायथं सातिशयविकल्पजननात् अन्ते स्फुटतमार्थसाक्षात्कारात्मा निर्विकल्पक: शाम्भव: समावेश: स्यात्-इत्यर्थः । यद्वक्ष्यति ‘अनन्तराह्निकोक्तेऽस्मिन् स्वभावे पारमेश्वरे । प्रविविक्षर्विकल्पस्य कर्यात्संस्कारमञ्जसा ।।’ इत्याधुपक्रम्य ‘ततः स्फुटतमोदारताद्रूप्यपरिबृंहिता । संविदभ्येति विमलामविकल्पस्वरूपताम् ।।’ इति । अत एव हि शाक्तोपायस्य उपायोपायत्वमुक्तम् ।। २१५ ।। ननु अस्मदादेः सर्वस्यैव अयत्नोपनतः स्वारसिको निर्विकल्पक: प्रत्ययः स्थित: इति किं नाम तत्र शाम्भवावेशरूपत्वमुक्तम्, यदपि उपेयतया उपदिश्यते? इत्याशङ्कयाह पशोर्वै याविकल्पा भूर्दशा सा शाम्भवी परम् । (पदार्थों) की तत्तद् रूप में कल्पना कर उस (पदार्थ) का भिन्न पदार्थों के परित्याग के द्वारा निश्चय कर ‘मैं ही सर्वत्र स्थित हूँ’ अथवा ‘सब कुछ मुझ में स्थित है’ इस प्रकार का जो शाक्त वैकल्पिक प्रत्यय उत्पन्न होता है वह यद्यपि मायात्मक उपाय है क्योंकि विकल्प भेद में होते हैं, तथापि अभ्यास के बल से उन विकल्पों में कमिक अतिशयता के उत्पन्न होने से अन्त में स्फुटतम अर्थ के साक्षात्कार वाला निर्विकल्पक शाम्भव समावेश हो जाता है । जैसा कि आगे कहेंगे ‘पूर्व आह्निक में उक्त इस परमेश्वर स्वभाव में प्रवेश का इच्छुक साधक विकल्पों का तत्काल संस्कार करे ।’ यहाँ से प्रारम्भ कर ‘इसके बाद (वह साधक) स्फुटतम, उदार एवं तद्रूपता से संवर्धित निर्मल विकल्परहित संवित् को प्राप्त करता है ।’ यहाँ तक (विषय का वर्णन करते है) । इसीलिये शाक्तोपाय को उपायोपाय भी कहते हैं ।। २१५ ।। प्रश्न-हम सभी लोगों को बिना प्रयत्न के स्वाभाविक निर्विकल्पक प्रत्यय __होता है फिर इसको शाम्भव समावेश क्यों कहते हैं और वह भी उपेय के रूप में उपदिष्ट होता है ?—यह शंका कर कहते हैं श्रीतन्त्रालोकः अपूर्णा मातृदौरात्म्यात्तदपाये विकस्वरा ॥ २१६ ।। सा इति अविकत ‘तस्यां दशायामैश्वरो भावः पशोरपि ।’ इति । यद्येवं तर्हि अत्र किमुपदेशादियत्नेन ? इत्याह परमपूर्णा इति संकुचितस्य हि मातुः संकुचिते एव ज्ञानक्रिये भवतः, इति कथं तत्रास्य दुरात्मनः साक्षात् शाम्भवत्वं भवेत्-इति भावः, अत एव तस्य मातृदौरात्म्यस्य अपाये पूर्णतोल्लासे सा शाम्भवी दशा विकस्वरा पूर्णज्ञत्वकर्तृत्वादिशालिनी भवेत् इत्यर्थः, तेन संकुचितज्ञत्वकर्तृत्वाद्यपहस्तनपुरःसरं स्वात्मप्रत्यभिज्ञापनार्थम् अवश्योपादेयोऽयम उपदेशादियत्नः इति सिद्धम ।। २१६ ।। तदेव प्रकृते योजयति एवं वैकल्पिकी भूमिः शाक्ते कर्तृत्ववेदने । यस्यां स्फुटे परं त्वस्यां सङ्कोचः पूर्वनीतितः ॥ २१७ ॥ तथा सङ्कोचसम्भारविलायनपरस्य तु । सा यथेष्टान्तराभासकारिणी शक्तिरुज्ज्वला ॥ २१८ ॥ (अपने अन्दर) प्रमाता का अभिमान करने के कारण पशुप्रमाता की जो अपूर्ण विकल्पभूमि रहती है वह उस (मातृदौरात्म्य) का नाश होने पर विकस्वर (= पूर्णज्ञत्व आदि वाली निर्विकल्पक) परम शाम्भवी दशा हो जाती है ।। २१६ ।। वह = विकल्परहित भूमि । जैसा कि कहा गया “उस दशा में पशु का भी ईश्वरीय भाव हो जाता है।” यदि ऐसा है तो फिर उपदेश आदि प्रयत्न से क्या लाभ ?-इसके उत्तर में कहते हैं-परिपूर्णा… | संकुचित प्रमाता का ज्ञान और क्रिया भी संकुचित होती है फिर इस दुरात्मा (= संकुचित आत्मा वाले) को साक्षात् शाम्भव समावेश कैसे होगा? इसलिये उसका = मातृदौरात्म्य का, नाश होने पर जब पूर्णता का उल्लास होता है तब विकस्वर = पूर्णज्ञत्व कर्तृत्व आदि वाली शाम्भवी दशा होती है । इसलिये संकुचित ज्ञत्व कर्तृत्व आदि के अपसारण के बाद आत्मप्रत्यभिज्ञा के लिये उपदेश आदि प्रयत्न अवश्य करना पड़ता है ।। २१६ ।। उसी को प्रस्तुत में जोड़ते हैं वह विकल्पात्मक भूमि इस प्रकार की है जिसमें शाक्त ज्ञान और क्रिया स्फुट रहते हैं । किन्तु पूर्व नियम के अनुसार इसमें सङ्कोच रहता हैं पुनः सङ्कोच सम्भार का विलायन करने वाले के अन्दर वह उज्ज्वल शाक्त भूमि (विकसित) होती है जो प्रथममाह्निकम् १९७ ___ इह सविकल्पज्ञानात्मनि शाक्तोपाये यद्यपि निर्विकल्पापेक्षया स्फुटे ज्ञानक्रिये, तथापि मातृदौरात्म्यात् ते संकुचित एव, इति अत्रापि उपदेशादियत्नेन अवश्यं भाव्यं येन सर्वस्य तथा सङ्कोचविलायनपरतया सा शाक्ती भूः उज्ज्वला विकस्वरा, यदियम् उपेयत्वेन अभीप्सितम् अन्त: प्रमात्रैकात्म्यस्वभावम् आभासं करोति परप्रमात्रेकरूपतया स्फुरति—इत्यर्थः ।। २१७-२१८ ।। ननु शाक्तस्य शाम्भवाद्विकल्पाविकल्परूपत्वेन सिद्धो भेदः, विकल्पैक रूपात् पुनराणवादस्य कथं भेदः स्यात् ? इत्याशङ्कां प्रदर्श्य, तयोरेव भेदमभिधत्ते ननु वैकल्पिकी कि धीराणवे नास्ति तत्र सा । अन्योपायात्र तूच्चाररहितत्वं न्यरूपयत् ।। २१९ ॥ तत्र इत्यादिना समाधिः, अन्य इति उच्चारादयः । आणवे हि उच्चारादि बाह्यमेव अवलम्ब्य वैकल्पिकी बुद्धिरस्ति, अत्र शाक्ते पुनस्तद्रहितत्वेन इति यथेष्ट आन्तरिक आभास (= परप्रमाता के साथ ऐकात्म्य का आभास) कराती है ।। २१७-२१८ ।। इस सविकल्पक ज्ञान वाले शाक्तोपाय में यद्यपि निर्विकल्प की अपेक्षा ज्ञान और क्रिया स्फुट रहती हैं तथापि प्रमाता के दौरात्म्य के कारण वे संकुचित ही है । इसलिये यहाँ भी उपदेश आदि प्रयत्न आवश्यक होता है, जिसके द्वारा सबकी उस प्रकार सङ्कोच के अपसारण के द्वारा वह शक्ति सम्बन्धी भूमि उज्ज्वल अर्थात् विकस्वर हो उठती है । फलत: यह उपेय के रूप में अभीप्सित अन्तप्रमाता के साथ ऐकात्म्य वाले आभास को करती है अर्थात् पर प्रमाता के साथ तादात्म्यतया स्फुरित होती है ।। २१७-२१८ ।। प्रश्न-शाक्त समावेश का शाम्भव समावेश के साथ भेद विकल्प एवं अविकल्प रूप से सिद्ध है किन्तु विकल्प रूप आणव समावेश से इस शाक्त समावेश का भेद कैसे सिद्ध होगा (क्योंकि दोनों विकल्पात्मक है)?—इस शङ्का को दिखलाकर दोनों का भेद बतलाते हैं ____ क्या आणवोपाय में विकल्पता की बुद्धि नहीं हैं (जिससे इसका शाक्तोपाय से भेद सिद्ध होगा)? उत्तर है—(इस विषय में यह जानना चाहिए कि) वहाँ (= आणव उपाय में) वह अन्य (= उच्चार आदि बाह्य) उपाय वाली है । यहाँ (= शाक्तोपाय में) उच्चाररहितता है ऐसा निरूपण किया गया है ।। २१९ ।।। तत्र इत्यादि के द्वारा समाधान (प्रस्तुत करते हैं) । अन्य (उपाय) = उच्चार (करण) आदि । आणव समावेश में उच्चार आदि बाह्य पदार्थों को आधार मानकर १९८ श्रीतन्त्रालोकः विशेषः, अत एव चेतसैव इति सावधारणं चिन्तनमात्रम् अत्रोक्तम् ॥ २१९ ।। नन्वत्र किमुच्चारमात्रेणैव रहितत्वम्, उत करणादिभिरपि ?–इत्याह उच्चारशब्देनात्रोक्ता बह्वन्तेन तदादयः । शक्तयुपाये न सन्त्येते भेदाभेदौ हि शक्तिता ॥ २२० ॥ बह्वन्तेन इति बहवचनादाद्यर्थो हि लभ्यते इति भावः, तेन उच्चारैः रहितम इति विग्रहो दर्शयितव्यः । एते इति उच्चारकरणादयः । न सन्ति इति भेदैकानिष्ठत्वादेषाम् । अत्र हि बाह्योच्चारादिरहितत्वात् अभेदस्य विकल्पात्मक त्वाच्च भेदस्यापि सम्भव: इत्युभयमयत्वम्, तदाह-‘भेदाभेदौ हि शक्तिता’ इति । आणवे पुनर्भेदस्यैव प्राधान्यम् ।। २२० ।। तदाह अणु म स्फुटो भेदस्तदुपाय इहाणवः । विकल्पनिश्चयात्मैव पर्यन्ते निर्विकल्पकः ॥ २२१ ॥ वैकल्पिकी बुद्धि होती है । यहाँ = शाक्त समावेश में उस (= उच्चार आदि) से रहित होती है-यह अन्तर है । इसलिये ‘चेतसैव’ इस पद में एवकार के साथ केवल चिन्तन को ही यहाँ कहा गया है ।। २१९ ।। क्या यहाँ उच्चारण ही नहीं रहता या करण आदि भी?—यह कहते हैं यहाँ (= उक्त श्लोक में) बहुवचनान्त (= उच्चारैः) होने के कारण उच्चार शब्द से उच्चार आदि समझना चाहिए । शाक्तोपाय में सब (उच्चार करण आदि) नहीं है । (वहाँ) भेदाभेद (का प्राधान्य) रहता है ।। २२० ।। बह्वन्तेन पद में बहु पद का कथन करने से आदि अर्थ प्राप्त हो जाता है । इससे उच्चारों (= उच्चार आदि) से रहित-ऐसा विग्रह समझना चाहिये । ये उच्चार करण आदि (शाक्तोपाय में) नहीं रहते क्योंकि ये भेद वाले (समावेश) में रहते हैं । इस (= शाक्तोपाय) में बाह्य उच्चार आदि का अभेद न रहने से तथा विकल्पात्मक होने से भेद की सम्भावना रहती है । इसलिये यह दोनों वाला है । वही कहा—भेद और अभेद दोनों ही शाक्तोपाय में रहते हैं । और आणव समावेश में भेद की ही प्रधानता रहती है ।। २२० ।।। वह कहते हैं अणु का अर्थ है- स्पष्ट भेद । वही जिस उपाय में हो वह आणवोपाय (कहलाता) है । यह विकल्पों का निश्चय रूप है और प्रथममाह्निकम् १९९ पर्यन्ते निर्विकल्पकः इत्यनेन अस्यापि शाम्भव एव विश्रान्तिरिति दर्शितम् ।। २२१ ।। ननु ‘सदाशिवादयस्तूर्ध्वव्याप्त्यभावादधोजुषः । शक्तीः समाक्षिपेयुः ……………….. ।’ २२१ ।। इत्याधुक्तयुक्त्या बुद्ध्यादीनां शिवे व्यापृतिरेव नास्ति इति कथमेषां तदवाप्तावुपायत्वमपि उक्तम् ?–इत्याह ननु धीमानसाहंकृत्पुमांसो व्याप्नुयुः शिवम् । नाधोवर्तितया तेन कथितं कथमीदृशम् ॥ २२२ ।। एतदेव समाधत्ते उच्यते वस्तुतोऽस्माकं शिव एव तथाविधः । स्वरूपगोपनं कृत्वा स्वप्रकाशः पुनस्तथा ॥ २२३ ॥ अन्त में निर्विकल्पक हो जाता है (अर्थात् शाम्भवोपाय में विश्रान्त हो जाता है) ।। २२१ ।। ‘अन्त में निर्विकल्पक (हो जाता है)-इस कथन से इस (आणव समावेश) का भी अन्त शाम्भव में ही होता है-यह सङ्केत किया गया ।। २२१ ।। प्रश्न सदाशिव आदि ऊर्ध्व व्याप्ति के अभाव के कारण निम्नस्तर को प्राप्त होते है इसलिये वे शक्तियों का आक्षेप करते हैं…।।’ इत्यादि उक्त युक्ति के द्वारा शिव में बुद्धि आदि की व्याप्ति ही नहीं है फिर ये (बुद्धि आदि) उस (= शाम्भव समावेश) में उपाय कैसे कहे गये ? –यह कहते प्रश्न है कि बुद्धि और मन के वर्तमान अहङ्कार से युक्त पुरुषगण अधोवर्ती होने के कारण शिव को व्याप्त नहीं कर सकते फिर ऐसा (= बुद्धि आदि शिवसमावेश के उपाय है) कैसे कहा गया है? ।। २२२ ।। इसी का समाधान करते हैं उत्तर है-हम अद्वैतवादियों के मत में वस्तुतः शिव ही (अपने स्वातन्त्र्यात्मक) विधान के अनुसार (पहले) स्वरूप का गोपन करके पुन: उसी प्रकार स्वयं प्रकाशित होते हैं ।। २२३ ।। २०० श्रीतन्त्रालोकः वस्तुतो हि शिव एव अस्माकम्-अद्वैतवादिनां मते ‘शिव एव गृहीतपशुभावः ।’ इत्याधुक्तयुक्त्या स्वस्वातन्त्र्यमाहात्म्यादात्मानं प्रच्छाद्य तथाविध: बुद्ध्यादिरूप: परिमित: प्रमाता स्यात्, स एव पुन: उद्वेष्टनयुक्त्या बुद्ध्याद्यपायासादनक्रमेणैव तथा शिव एव स्वप्रकाशो भवति इति शिवेऽपि बुद्ध्यादयो व्याप्रियेरन् नो वा इति न कश्चिद्दोषः ।। २२३ ।। न केवलमेतदद्वैतशास्त्रेषु उक्तं यावत् द्वैतशास्त्रेष्वपि–इत्याह द्वैतशास्त्रे मतङ्गादौ चाप्येतत्सुनिरूपितम् । अधोव्याप्तुः शिवस्यैव स प्रकाशो व्यवस्थितः ।। २२४ ॥ येन बुद्धिमनोभूमावपि भाति परं पदम् ॥ २२५ ॥ यदुक्तं तत्र ‘इत्थं गुणवतस्तस्मात्तत्त्वात्तत्त्वमनिन्दितम् । स्फुरद्रश्मिसहस्राढ्यमधस्ताद् व्यापकं महत् ।।’ इति । एतदेव निगमयति ‘अधोव्याप्तुः’ इत्यादिना । स इति बुद्ध्यादिरूपः, येन ‘शिव ही पशुभाव ग्रहण कर…’ हम अद्वैत वादियों के मत में इत्यादि उक्त युक्ति के अनुसार शिव ही अपने स्वातन्त्र्य की महिमा से अपना गोपन कर उस प्रकार बुद्धि आदि वाला परिमित प्रमाता बन जाते हैं । और वही फिर उद्वेष्टन युक्ति से बुद्धि आदि उपाय की प्राप्ति के क्रम से उसी प्रकार स्वप्रकाश शिव बन जाते हैं । इसलिये बुद्धि आदि शिव में व्याप्त रहें या नहीं-कोई दोष नहीं होता ।। २२४ ।। यह केवल अद्वैत शास्त्र में ही नहीं अपितु द्वैत शास्त्र में भी कहा गया है यह कहते हैं मतङ्ग आदि द्वैतशास्त्र में भी यह बात अच्छी तरह निरूपित की गयी है । अधोव्यापी शिव का ही यह (= बुद्धि आदि) प्रकाश व्यवस्थित है जिससे बुद्धि और मन की भूमियों में भी परमपद का आभास होता है ।। २२४-२२५ ।। जैसा कि वहाँ कहा गया इस प्रकार के गुणवान् उस तत्त्व से निष्कलङ्क तत्त्व (उत्पन्न होता है) । स्फुरण होने वाली असंख्य रश्मियों से सम्पन्न वह महत् तत्त्व नीचे से (ऊपर की ओर ) व्यापक है।’ इसे ही ‘अधोव्याप्तः’ इत्यादि के द्वारा सिद्ध करते हैं । वह = बुद्धि २०१ प्रथममाह्निकम् इति बुद्ध्यादीनां शिवप्रकाशैकरूपत्वेन हेतुना ।। २२४-२२५ ।। एवमेतत्प्रसङ्गादभिधाय प्रकृतमेवाह द्वावप्येतौ समावेशौ निर्विकल्पार्णवं प्रति । प्रयात एव तद्रूढिं विना नैव हि किञ्चन ॥ २२६ ॥ प्रति:-आभिमुख्ये, तेन एतदुभयमपि परप्रकाशात्मनि शाम्भवावेशे एव विश्रान्तम्-इत्यर्थः । यद्धि तत्र न विश्रान्तं तदप्रकाशमानत्वात् न किञ्चित् स्यात् इत्युक्तम्-‘तद्रूढिं विना नैव हि किञ्चन’ इति । एवं च निर्विकल्पात्मा पर: प्रकाश एव सर्वेषामेषामुपाय: इत्युक्तं स्यात् ।। २२६ ।। न चैतदस्मदुपज्ञमेव–इत्याह संवित्तिफलभिच्चात्र न प्रकल्प्येत्यतोऽब्रवीत् । कल्पनायाश्च मुख्यत्वमत्रैव किल सूचितम् ॥ २२७ ॥ अत: इति—एकस्यामेव निर्विकल्पात्मिकायां संवित्तौ अनुप्रवेशात् । तदुक्तम् आदि रूपों वाला । जिससे = बुद्धि आदि के केवल शिवप्रकाश रूप होने के कारण ।। २२५-२२६ ।। प्रसङ्गतः इसका कथन कर अब प्रस्तुत को कहते हैं ये दोनों ही (= आणव और शाक्त) समावेश निर्विकल्पक अर्णव (= शाम्भव समावेश) को प्राप्त होते हैं । क्योंकि वहाँ तक पहुँचे बिना कुछ भी नहीं है ।। २२६ ।। ___ ‘प्रति’ शब्द का प्रयोग आभिमुख्य अर्थ में है । इससे (यह अर्थ निकलता है कि) ये दोनों ही परप्रकाशरूप शाम्भव समावेश के ही विश्राम को प्राप्त होते हैं । जो उसमें विश्रान्त नहीं है वह अप्रकाशमान होने से कुछ नहीं है-उस में रूढ़ि के बिना कुछ नहीं है’-से यही कहा गया । इस प्रकार निर्विकल्पस्वरूप परप्रकाश ही इन सब का उपाय है-यह कहा गया ।। २२६ ।। इसे हमने अपने मन से नहीं कहा-यह कहते हैं इसलिए (किसी मनीषी ने) कहा कि यहाँ संवित् के फल के भेद की कल्पना नहीं करनी चाहिए । यहाँ पर कल्पना की मुख्यता ही सूचित की गयी है ।। २२७ ।। __ इस कारण = एक ही निर्विकल्पकरूप संविद् में अनुप्रवेश करने के कारण । वही कहा गया २०२ श्रीतन्त्रालोकः ‘संवित्तिफलभेदोऽत्र न प्रकल्प्यो मनीषिभिः ।’ इति । अत्र च उपायानां नानात्वात् प्राप्तं तावत्फलभेदकल्पनम्, अन्यथा हि निषेधस्य प्राप्तिपूर्वत्वात् स एवात्र न स्यात् इति ‘न प्रकल्प्या’ इत्युक्त्या एतदाक्षिप्तम्-इत्याह-कल्पनाया इति । मुख्यत्वम् इति अभिधेयत्वम् । सूचितम् इति-न तु साक्षादभिहितम्-इति भावः ।। २२७ ।। न केवलमिह निर्विकल्पके विश्रान्तिसतत्त्वं यावदितो बाह्यानां मतेऽपि इत्याह विकल्पापेक्षया योऽपि प्रामाण्यं प्राह तन्मते । तद्विकल्पक्रमोपात्तनिर्विकल्पप्रमाणता ॥२२८ ॥ तस्य विकल्पापेक्षनिर्विकल्पप्रामाण्यवादिनो वैभाषिकादेः मतेऽपि, ते च ते विकल्पाः, तेषां यः क्रमः परम्परा, तया उपात्ता जनिता, निर्विकल्पस्यैव प्रमाणता-विकल्पोपारोहण निर्विकल्प एव विश्रान्ति:-इत्यर्थः ।। २२८ ।। एतदेव उदाहरति रत्नतत्त्वमविद्वान्प्राङ्निश्चयोपायचर्चनात् । ‘विद्वान् लोग इस (भूमि) पर संवित्ति के फल में भेद की कल्पना न करें ।’ उपायों के अनेक होने से फलभेद की कल्पना प्राप्त होती है । अन्यथा निषेध के प्राप्ति पूर्वक होने से वह (निषेध) ही यहाँ नहीं होता । इस प्रकार—‘न प्रकल्प्या ’ कथन से इस (= भेदप्राप्ति) का आक्षेप होता है-यह कहते हैं कल्पनाया । मुख्यत्व = अभिधेयत्व । सूचित है न कि साक्षात् (उक्त) ।। २२७ ।। इस निर्विकल्प में ही विश्रान्ति नहीं है वरन् इससे भिन्न मतवादियों के यहाँ भी यह है-यह कहते हैं जो भी विकल्प की अपेक्षा रखकर (निर्विकल्पक ज्ञान की) प्रमाणता को मानता है उस (वैभाषिक आदि) के मत में उन विकल्पों के क्रम द्वारा प्राप्त (= उत्पादित) निर्विकल्प का ही प्रामाण्य है ।। २२८ ।। उसके = विकल्प की अपेक्षा निर्विकल्प को प्रमाण मानने वाले वैभाषिक आदि के मत में भी । वे = विकल्प । उनका जो क्रम = परम्परा, उससे उपात्त = उत्पन्न हुई, निर्विकल्पक की ही प्रमाणता = विकल्प के माध्यम से निर्विकल्प में ही विश्रान्ति होती है ।। २२८ ।। इसी को उदाहरण से स्पष्ट करते हैं (जैसे रत्नतत्त्व को न जानने वाला पूर्वनिश्चयोपाय की चर्चा के प्रथममाह्निकम् २०३ अनुपायाविकल्पाप्तौ रत्नज्ञ इति भण्यते॥ २२९ ॥ यः कश्चन वैकटिकादि: आदौ अविकल्पवृत्या रत्नस्वरूपमजानानोऽपि ‘किमेवमस्य तत्त्वं न वा’ इत्यादिकल्पनामुखेन विचारमवलम्ब्य, अनुपायस्य स्वारसिकस्य अविकल्पस्य उत्थाने रत्नज्ञः तद्विषयतत्त्वं निर्विकल्पं जानान: इत्युच्यते-इति वाक्यार्थः । एवमाणवाद्यभिज्ञेऽपि वाच्यम् ।। २२९ ।। इह खलु भेदभेदाभेदाभेदात्मना त्रिधा ज्ञानं यदुक्तम् वस्तृतो हि त्रिधैवेयं ज्ञानसत्ता विजुम्भते । भेदेन भेदाभेदेन तथैवाभेदभागिना ।।’ इति, तत्र आणवं भेदप्रधानमुक्तम्, शाक्तं च भेदाभेदप्रधानं शाम्भवं पुन: कि प्रधानम् ? इत्याशङ्कयाह अभेदोपायमत्रोक्तं शाम्भवं शाक्तमुच्यते । भेदाभेदात्मकोपायं भेदोपायं तदाणवम् ॥ २३० ॥ ननु द्वारा उपायरहित (= स्वाभाविक) निर्विकल्पक ज्ञान की प्राप्ति होने पर रत्नज्ञ कहा जाता है (उसी प्रकार आणवोपाय आदि के ज्ञाता के विषय में भी जानना चाहिए) ।। २२९ ।। जो कोई जौहरी आदि पहले निर्विकल्पक वृत्ति के अनुसार रत्न के स्वरूप को न जानते हुए भी ‘यह इसका यथार्थ रूप है या नहीं-इत्यादि कल्पना के द्वारा विचार कर बाद में अनुपाय अर्थात् स्वाभाविक निर्विकल्प की उत्पत्ति होने पर रत्नज्ञ कहा जाता है क्योंकि उस (रत्न) के तत्त्व निर्विकल्प को वह जान लेता है । इसी प्रकार आणव समावेश आदि के ज्ञाता के बारे में भी कहना चाहिये । (अर्थात् वह अन्त में शाम्भव समावेश प्राप्त कर लेता है) ।। २२९ ।। भेद, भेदाभेद और अभेद रूप से ज्ञान तीन प्रकार का होता है । जैसा कि कहा गया ___‘वस्तुत: भेद, भेदाभेद और अभेद रूप में ज्ञानसत्ता तीन ही रूप में उल्लसित होती है। उनमें आणव भेदप्रधान और शाक्त भेदाभेदप्रधान कहा गया । शाम्भव ज्ञान में किसकी प्रधानता है-यह शङ्का कर कहते हैं (इस प्रकार) यहाँ अभेदोपाय को शाम्भव, भेदाभेदात्मक उपाय को शाक्त और भेदोपाय को आणवोपाय कहा जाता है ।। २३० प्रश्न २०४ श्रीतन्त्रालोकः ..मुक्तिश्च शिवदीक्षया । इत्याद्युक्तेः दीक्षादेः क्रियाया अपि मुक्त्त्युपायत्वमुक्तम् इति सा किमुपायान्तरमतिरिक्तम्, उत अत्रैव कुत्रचिदन्तर्भावमेति ? इत्याशङ्कयाह अन्ते ज्ञानेऽत्र सोपाये समस्तः कर्मविस्तरः। प्रस्फुटेनैव रूपेण भावी सोऽन्तर्भविष्यति ॥ २३१ ॥ सोपाये इति उच्चाराधुपायसहभूते-इत्यर्थः । अत एव तत्र ‘सोपाये’ इति प्रागुक्तम् । समस्त: कर्मविस्तरः इति दीक्षादिर्विचित्रः क्रियाकलाप:, भावी वक्ष्यमाण: । अन्तर्भविष्यति इत्यनेन-नैतदतिरिक्तम् उपायान्तरमस्ति–इत्या वेदितम् ।। २३१ ।। नन् सजातीये सजातीयस्य अन्तर्भावो न्याय्यो न तु इतरथा, इति कथं दीक्षादेः क्रियाया आणवज्ञानान्तर्भाव: स्यात् ? इत्याशङ्क्याह क्रिया हि नाम विज्ञानान्नान्यद्वस्तु क्रमात्मताम् । उपायवशतः प्राप्तं तत्क्रियेति पुरोदितम् ॥ २३२ ॥ तत् इति विज्ञानम्, पुरा इति–‘यतो नान्या क्रिया नाम’ इत्यादौ ।।२३२।। … मुक्ति शिवदीक्षा के द्वारा होती है।’ इत्यादि कथन से दीक्षा आदि क्रिया भी मुक्ति का उपाय कही गयी है । वह (दीक्षा) क्या अतिरिक्त उपाय है । अथवा इन्हीं (= आणव आदि) किसी में (उसका) अन्तर्भाव है-यह शङ्का कर कहते हैं आगे वर्णित होने वाला समस्त दीक्षा आदि कर्मकलाप स्पष्ट रूप से (उच्चार आदि बाह्य) उपायों से युक्त अन्तिम ज्ञान (= आणवोपाय) में अतभूत हो जाता है ।। २३१ ।। ____ सोपाये = जिसमें उच्चार आदि सहायक हों वह उपाय । इसीलिये वहाँ ‘सोपाये’ यह पहले कहा गया । समस्त कर्मविस्तार = दीक्षा आदि विचित्र कार्यसमूह जिसका वर्णन आगे किया जायगा । अन्तर्भूत होगा—इस कथन से यह कहा गया कि इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है ।। २३१ ।। प्रश्न-सजातीय में सजातीय का अन्तर्भाव उचित है न कि अन्य प्रकार (विजातीय) का (अन्तर्भाव) । फिर दीक्षा आदि क्रिया का विजातीय आणव ज्ञान में अन्तर्भाव कैसे ? यह शङ्का कर कहते हैं क्रिया, विज्ञान से भिन्न कोई वस्तु नहीं है । कोई भी वस्तु उपायवश क्रम को प्राप्त होने पर क्रिया होती है-ऐसा पहले कहा गया है ।। २३२ ।।।प्रथममाह्निकम् २०५ ननु ‘ज्ञानं मोक्षककारणम्’ इत्यादिना ‘ज्ञानान्मुक्तिः’ इति तावत्प्रतिज्ञातं तत्किं स्वाधिकरणं मोचकम, उत पराधिकरणम? स्वाधिकरणत्वे च तस्य किं दीक्षायां सत्यामसत्यां वा मोचकत्वम् ? असत्यां चेत् ‘न चाधिकारिता दीक्षां विना योगेऽस्ति शाङ्करे ।’ इत्याधुक्त्या ज्ञानाधिगमे एव अधिकारो नास्ति इति किं कस्य मोचक स्यात्, सत्यां चेत् परापेक्षात्मनैव स्वात्मनि दीक्षाकरणानुपपत्तेः, पराधिकरणत्वे च कारणमन्यत्र कार्यं च अन्यत्र इति महान् दोषः ? इत्याशङ्कयाह सम्यग्ज्ञानं च मुक्तयेककारणं स्वपरस्थितम् । यतो हि कल्पनामानं स्वपरादिविभूतयः ॥ २३३ ॥ कल्पनामात्रम् इति, वस्तुतो हि एकैव संवित् तत्तत्स्वपराद्याभासतया प्रस्फुरति—इत्यभिप्राय: ।। २३३ ।। अत एवाह तुल्ये काल्पनिकत्वे च यदैक्यस्फुरणात्मकः। गुरुः स तावदेकात्मा सिद्धो मुक्तश्च भण्यते ॥ २३४ ॥ वह = विज्ञान । पहले–‘यतो नान्या क्रिया नाम’ इत्यादि में ।। २३२ ।। प्रश्न-‘ज्ञान ही मोक्ष का कारण है’ इत्यादि के द्वारा ज्ञान से मुक्ति होती है यह प्रतिज्ञा की गयी। तो क्या वह ज्ञान स्वयं मोक्ष देता है या दूसरे के आधार पर ? यदि वह स्वयं मोचक है तो फिर क्या दीक्षा के होने पर या न होने पर । यदि (दीक्षा के) न होने पर (मोचक) है तो ‘दीक्षा के बिना शाङ्कर योग में अधिकार नहीं बनता ।’ - इत्यादि उक्ति से ज्ञानप्राप्ति में (साधन का) अधिकार ही नहीं है तो फिर कौन किसका मोचक होगा । यदि (दीक्षा के) होने पर मोक्ष होता है तो पर दीक्षा के रूप में दीक्षा अपने आप में अनुपपन्न हो जायेगी । पराधिकरण होने पर कारण अन्यत्र, और कार्य अन्यत्र यह महान् दोष होगा ?-यह शङ्का कर कहते हैं स्व और पर में वर्तमान सम्यक् ज्ञान ही मुक्ति का एकमात्र कारण है । क्योंकि स्व पर आदि विभूतियाँ (उसी परासंवित् के स्वातन्त्र्यवश) कल्पनामात्र है ।। २३३ ।। ‘कल्पनामात्र’ कहने का आशय यह है कि परमार्थतः = एक ही संवित् भिन्न-भिन्न स्व पर आदि आभास के रूप में उल्लसित होती है ।। २३३ ।। इसलिए कहते हैं (गुरु और अगुरु आदि की अपेक्षा रखकर स्व पर कल्पना) की श्रीतन्त्रालोकः ____ गुर्वगुर्वाद्यपेक्षया स्वपरकल्पनायाः साम्येऽपि येन शिष्येण गुरुणा वा यदैक्यम् एकीकारः तेन स्फुरणम् स्वपराद्याभासविभागाभावेन एकघनसंविद्रूपतया विमर्शनं तदात्मा यो गुरुः स तावान् ऐक्यस्फुरणावधि: एक आत्मा यस्य तथाभूत: सन् सिद्धो मुक्तश्च पारमैश्वर्यमात्रमुच्यते-इत्यर्थः । इदमुक्तं भवति–यावदस्य हि स्वसंविदेकात्मत्वेन परामर्श: तावदयम् एक एव प्राप्तपरप्रकाशैकात्म्यः परिस्फुरति इति । तदुक्तम् ‘एवं व्याप्तिं तु यो वेत्ति परापरविभागतः । स भवेन्मोचक: साक्षाच्छिव: परमकारणम् ।।’ इति ।। २३४ ।। अत एवाह यावानस्य हि संतानो गुरुस्तावत्स कीर्तितः । सम्यग्ज्ञानमयश्चेति स्वात्मना मच्यते ततः ॥ २३५ ॥ तत एव स्वसंतानं ज्ञानी तारयतीत्यदः । युक्तत्यागमाभ्यां संसिद्ध तावानेको यतो मुनिः ॥ २३६ ॥ संतानः शिष्यप्रशिष्यादिरूप इति, इति तावदात्मत्वेन एकस्यैवास्य तुल्यता होने पर जो एकघनसंविद् रूप में विमर्श वाला गुरु है वही एकात्मा, सिद्ध और मुक्त कहा जाता है ।। २३४ ।। ___ गुरु अगुरु आदि की अपेक्षा से स्व पर कल्पना के समान होने पर भी जिस शिष्य या गुरु के द्वारा जिसके साथ एकीकार होता है और उसके द्वारा स्फुरण अर्थात् स्व पर आदि का विभाग समाप्त होने से जो एकात्मता का उल्लास हो जाता है वही एकात्मा सिद्ध और मुक्त गुरु = परमेश्वर कहा जाता है । इसका तात्पर्य यह है कि जब इस (गुरु) के अन्दर स्वसंविद् के साथ ऐकात्म्य रूप में परामर्श उत्पन्न होता है तब यह परप्रकाश के साथ ऐकात्म्य को प्राप्त कर उल्लसित होता है | वही कहा गया ‘इस प्रकार की परापरमयी व्याप्ति को जो जानता है वही मोचक है और साक्षात् परम कारण शिव है’ || २३४ ।। इसीलिये कहते हैं जितनी दूर तक इस (= गुरु) का सन्तान होता है उतनी दूर तक (= उतनी शिष्यप्रशिष्यपरम्परा तक) वह गुरु कहा जाता है उसके बाद सम्यग् ज्ञान से युक्त होते हुए वह स्वयं मुक्त हो जाता है ।। २३५ ।। इसीलिए ज्ञानी अपनी परम्परा को मुक्त करा देता है । यह (बात) युक्ति और आगम से सिद्ध है क्योंकि उतनी दूर तक वह अकेला ही गुरु होता है ।। २३६ ।। प्रथममाह्निकम् २०७ स्फुरणात् । तत इति तावत: संतानात् । तावन्तं हि संतानमवलम्ब्य संविदै कात्म्यात् एक एवायं गुरुः इति यत् संतानिनो मुच्यन्ते, तत् स एव स्वात्मना मुच्यते इति स्वपरविभागस्य काल्पनिकत्वात् न कश्चिद्दोषः । अत एवाह-‘तत एव’ इत्यादि, तारयति इति । तदुक्तम् ‘आचार्य: स्वजनानां च कुलकोटिसहस्रशः । ज्ञानज्ञेयपरिज्ञानात्सर्वान्संतारयिष्यति ॥’ इति । अत्र हेतु: ‘तावानेको यतो मुनिः’ मुनिः इति गुरुः ।। २३५-२३६ ।। एवं च सति अयत्नेन परोक्तदूषणोद्धारः सिद्धः-इत्याह तेनात्र ये चोदयन्ति ननु ज्ञानाद्विमुक्तता । दीक्षादिका क्रिया चेयं सा कथं मुक्तये भवेत् ॥ २३७ ॥ ज्ञानात्मा सेति चेज्ज्ञानं यत्रस्थं तं विमोचयेत् । अन्यस्य मोचने वापि भवेत्किं नासमञ्जसम् । इति ते मूलतः क्षिप्ता यत्त्वत्रान्यैः समर्थितम् ।। २३८ ॥ सन्तान = शिष्यप्रशिष्यपरम्परा । इस कारण = उस रूप में एक ही इसके स्फुरण से । उससे = उस परम्परा से संविद् के साथ तादात्म्य के कारण उतनी परम्परा का आलम्बन कर एक ही गुरु उन सभी सन्तानियों को मुक्त कर देता है । तत् = वही अपने द्वारा मुक्त होता है । इस प्रकार स्वपर विभाग के काल्पनिक होने से कोई दोष नहीं है । इसलिये कहते हैं-इसी से इत्यादि, पार कर देता है वही कहा गया आचार्य अपने सभी आदमियों के करोड़ों वंश को ज्ञान ज्ञेय के वास्तविक बोध के द्वारा (संसार से) पार कर देता है।’ ___ इसमें कारण है-क्योंकि वहाँ–तक वह एक ही मुनि अर्थात् गुरु होता है ।। २३५-२३६ ।। ___ऐसा होने पर बिना प्रयत्न के परोक्त दोष का उद्धार सिद्ध होता है । यह कहते हैं ___ इसलिए जो लोग प्रश्न करते हैं कि यदि ज्ञान से मुक्ति होती है तो यह दीक्षादि क्रिया मुक्ति के लिए कैसे होगी? यदि वह (= दीक्षादि क्रिया) ज्ञान स्वरूप है तो जहाँ वह रहेगी उसी को मुक्त कराएगी । क्या अन्य (= दीक्षा रहित) की मुक्ति के विषय में वह समर्थ होगी? इस प्रकार मूल रूप में उनके प्रति आक्षेप हुआ है । और जिसका दूसरे लोगों (= भेदेश्वरवादियों) के द्वारा समर्थन किया गया है ।। २३७-२३८ ।। २०८ श्रीतन्त्रालोकः ये इति भेदवादप्रकाराः, ते इति एवं चोद्यविधायिनः, क्षिप्ता: प्रतिक्षिप्ताः । यन्मूलत एव ज्ञानक्रिययोरैक्यमभ्युपगतं स्वपरविभागस्य च काल्पनिकत्वम् इति तदेव च अत्र प्रतिसमाधानं नान्यत् इत्याह–‘यत्तु’ इत्यादि। यदन्यैर्भेदेश्वर वादिभिर्निरूपितं तत् पुरस्तात् निषेत्स्यामः-इति सम्बन्धः ।। २३७-२३८ ।। ननु यदि भेदवाद्युक्तं मलस्य द्रव्यरूपत्वं नाभ्युपेयते, तत्तस्य किं रूपम् ? इत्याशङ्कयाह मलो नाम किल द्रव्यं चक्षुःस्थपटलादिवत् । तद्विहन्त्री क्रिया दीक्षा त्वञ्जनादिककर्मवत् ॥ २३९ ॥ तत्पुरस्तान्निषेत्स्यामो युक्त्यागमविगर्हितम् । मलमायाकर्मणां च दर्शयिष्यामहे स्थितिम् ॥ २४० ॥ एतदेव अधिकावापेन उपसंहरति एवं शक्तित्रयोपायं यज्ज्ञानं तत्र पश्चिमम् ।। मूलं तदुत्तरं मध्यमुत्तरोत्तरमादिमम् ॥ २४१ ॥ पश्चिममिति आणवम्, मूलमिति, तस्यैव शाक्तक्रमेण शाम्भवे विश्रान्तिः । जो = भेदवाद के प्रकार । वे = इस प्रकार के नियम बनाने वाले । क्षिप्त = प्रक्षिप्त । जो मूलरूप में ज्ञान और क्रिया को एक माना गया और स्वपर विभाग को काल्पनिक कहा गया वही इस विषय में प्रतिसमाधान है अन्य नहीं । यह कहा- यत्तु इत्यादि । जो कि अन्य भेदेश्वरवादियों के द्वारा कहा गया उसका आगे चल कर निषेध करेंगे-ऐसा सम्बन्ध जोड़ना चाहिये ।। २३७-२३८ ॥ प्रश्न- यदि मल की द्रव्यरूपता, जो कि भेदवादियों के द्वारा कही गयी है, को आप नहीं मानते तो उस (= मल) का क्या रूप है-यह शङ्का कर कहते __ मल, चक्षु के ऊपर वर्तमान पर्दे के समान (एक) द्रव्य है । (उस पर्दे को हटाने के लिए आँख में) अञ्जन लगाने के समान दीक्षा उस मल को नष्ट करने वाली क्रिया है । युक्ति और आगम द्वारा निन्दित उस (मल) का हम आगे चल कर निषेध करेंगें । तथा मल, माया और कर्म की स्थिति को स्पष्ट करेंगे ।। २३९-२४० ।। इसको अधिक स्पष्ट करते हुए उपसंहार कर रहे हैं ____ इस प्रकार तीन शक्तियों (इच्छा ज्ञान क्रिया) से युक्त उपाय वाला जो ज्ञान है उसमें पश्चिम (= आणवोपाय) मूल (= आदि उपाय) है । उसके बाद वाला (= शाक्तोपाय) मध्यम और उत्तरोत्तर (= शाम्भवोपाय) आदि है ।। २४१ ।। २०९ प्रथममाह्निकम् तदाह-तदुत्तरम् इति, तस्मात् आणवात्, उत्तरम् विश्रान्तिस्थानत्वादधिकं शाक्तम् उत्तरात् शाक्तादपि उत्तरं शाम्भवम् । यदुक्तम् ‘विभुशक्त्यणुसम्बन्धात्समावेशस्त्रिधा मत: । इच्छाज्ञानक्रियायोगादुत्तरोत्तरसम्भृतः ॥ इति ।। २४१ ।। न केवलमाणवादेः विश्रान्तिधामतया शाम्भवमेव ज्ञानमुत्कृष्टम्, यावदस्मादनु पायाख्यम् अन्यत्-इत्याह ततोऽपि परमं ज्ञानमुपायादिविवर्जितम् । आनन्दशक्तिविश्रान्तमनुत्तरमिहोच्यते ॥ २४२ ॥ परमम् इति–उपेयैकरूपत्वात्, अत एवोक्तम्–‘उपायादिविवर्जितम्’ इति । अत एव च ‘आनन्दशक्तिविश्रान्तम्’–इत्युक्तम् । इच्छादीनां हि एषणीयादि विषयावच्छेदेन बाह्योन्मुखत्वात् भेदसम्भावनापि स्यात्, आनन्दशक्तिः पुन: ‘आनन्दो ब्रह्मणो रूपम् ……………… ।’ इत्याधुक्त्या हि चितस्तत्स्वरूपमेव इति, नात्र उपायगन्धोऽस्ति-इति तात्पर्यम् ।। २४२ ।।। पश्चिम अर्थात् आणवोपाय । उस आणव से उत्तर शाक्त समावेश है क्योंकि वह विश्रान्तिस्थान होने से अधिक है । उत्तर से अर्थात् शाक्त से उत्तर = शाम्भव समावेश है । जैसा कि कहा गया ‘विभु शक्ति और अणु के सम्बन्ध से समावेश तीन प्रकार का माना गया है । इच्छा, ज्ञान और क्रिया के योग से उत्तरोत्तर दृढ़ होता है ।। २४१ ।। विश्रान्तिस्थल होने के कारण शाम्भव ज्ञान है । आणव आदि की अपेक्षा उत्कृष्ट नहीं है अपितु अनुपाय नामक एक दूसरा भी ज्ञान है-यह कहते हैं उससे भी उत्कृष्ट (और अन्तिम एक) ज्ञान है जो उपाय आदि से रहित है । उसकी आनन्द शक्ति में विश्रान्ति है और वह अनुत्तर कहा जाता है ।। २४२ ।। परम है क्योंकि वह केवल उपेय है । इसीलिये ‘उपायविवर्जितम्’ कहा गया । और इसीलिये ‘आनन्दशक्तिविश्रान्तम्’ यह भी कहा गया । इच्छा आदि शक्तियों के एषणीय आदि विषयों से सम्बद्ध होने से बाह्योन्मुख होने के कारण (उनकी) भेदसम्भावना भी होती है किन्तु आनन्द शक्ति ‘आनन्द ब्रह्म का रूप है ।’ इत्यादि कथन के अनुसार चित् का अपना स्वरूप ही है । इसलिये यहाँ उपाय की रञ्चमात्र भी सम्भावना नहीं है-यह तात्पर्य है ।। २४२ ।। १४ त.प्र. २१० श्रीतन्त्रालोकः एतच्च न स्वोपज्ञम् अपि तु सर्वत्रैव आगमेषु उक्तम्-इत्याह तत्स्वप्रकाशं विज्ञानं विद्याविद्येश्वरादिभिः । अपि दुर्लभसद्भावं श्रीसिद्धातन्त्र उच्यते ॥ २४३ ॥ मालिन्यां सूचित चैतत्पटलेऽष्टादशे स्फुटम्। न चैतदप्रसन्नेन शङ्करेणेति वाक्यतः ॥ २४४ ।। इत्यनेनैव पाठेन मालिनीविजयोत्तरे । तत्र हि ‘अनायासमनारम्भमन्पायं महाफलम् । श्रोतुमिच्छामि योगेश योगं योगविदां वर ।।’ इति देव्या पृष्टे ‘शृणु देवि प्रवक्ष्यामि योगामृतमनुत्तमम् । यत्प्राप्य शिवतां मां लभन्त्यायासवर्जिताः ।। न चैतदप्रसन्नेन शङ्करेणोपदिश्यते । कथंचिदुपलब्धेऽपि वासना न प्रजायते ।।’ इत्याधुपक्रम्य ‘तस्मात्तदभ्यसेन्नित्यमविरक्तेन चेतसा । इसे (हमने) अपने मन से नहीं कहा बल्कि सभी आगमों में कहा गया है यह कहते हैं वह प्रकाश विज्ञान जो विद्या और विद्येश्वर आदि के द्वारा भी दुर्लभ है, श्रीसिद्धातन्त्र में कहा गया है मालिनीविजयोत्तर तन्त्र के अट्ठारहवें पटल में ‘यह अप्रसन्न शङ्कर के द्वारा उपदिष्ट नहीं होता इत्यादि वाक्यों से इसी पाठ के द्वारा स्पष्ट कहा गया है ।। २४३-२४५- ।। ___ वहाँ—‘हे योगेश्वर !, हे योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! मैं अनायास वाले, आरम्भ रहित महाफल वाले अनुपाय नामक योग को सुनना चाहती हूँ।’ इस प्रकार देवी के द्वारा पूछे जाने पर ‘हे देवि ! सुनो, मैं (उस) सर्वोत्कृष्ट योगामृत को कहूँगा जिसको प्राप्त कर मनुष्य लोग बिना प्रयास के शिवत्व को प्राप्त कर लेते हैं । शङ्कर अप्रसन्न रह कर इसका उपदेश नहीं करते । यदि किसी प्रकार यह उपलब्ध हो भी गया तो वासना उत्पन्न नहीं होती ।’ इत्यादि से शुरू कर प्रथममाह्निकम् स विसर्गो महादेवि यत्र विश्रान्तिमर्हति ।। गुरुवक्त्रं तदेवोक्तं शक्तिचक्रं तदुच्यते । तदेव सर्वमन्त्राणामुत्पत्तिस्थानमुत्तमम् ।।’ इत्याधुक्तम् ।। २४३-२४४ ।। अयमेव च शास्त्रार्थ:- इत्याह इति ज्ञानचतुष्कं यत्सिद्धिमुक्तिमहोदयम् । तन्मया तन्त्र्यते तन्त्रालोकनाम्न्यत्र शासने ॥ २४५ ॥ इतीति–तन्त्रालोके–तन्त्राणां पारमेश्वराणाम्, आलोक इव आलोकः, तानि आलोकयति प्रकाशयति इति वा । इति–उक्तस्वरूपं यत् ज्ञानचतुष्कम्, किं भूतम् ? सिद्धिमुक्त्योर्महान् उदयः अस्मिन् इति कृत्वा महोदयम्, तत् अत्र तन्त्रालोके शासने तन्त्र्यते विस्तरेण प्रकाश्यते-इत्यर्थः ।। २४५ ।। अथ ‘तत्र नानुपलब्धेऽथें न निर्णीते प्रवर्तते । किं तु संशयिते न्यायस्तदङ्गं तेन संशयः ।।’ ‘इस कारण इसका अभ्यास निरन्तर और विरक्तिपूर्वक करना चाहिये । हे महादेवि ! यह विसर्ग (सृष्टि) यहाँ विश्राम लेता है ।’ इसी को गुरुवक्त्र कहा गया । यही शक्तिचक्र कहा जाता है । वही सब मन्त्रों का उत्तम उत्पत्तिस्थान है । इत्यादि (पर्यन्त) कहा गया है ।। २४३-२४४ ।। इस (शैव शास्त्र) का तात्पर्य भी यही है—यह कहते हैं ये चार ज्ञान, जो कि सिद्धि और मुक्ति देने के कारण महान् उदय वाले है वे मेरे द्वारा तन्त्रालोक नामक इस शास्त्र में विस्तारपूर्वक कहे जायेंगे ।। २४५ ।। तन्त्रालोक में—पारमेश्वर शास्त्र के लिये प्रकाश के समान इस आलोक में, अथवा उन = पारमेश्वर तन्त्रों को जो आलोकित अर्थात् प्रकाशित करता है उसमें । पूर्वोक्त रूप वाला जो (आणव आदि) चार प्रकार का ज्ञान, वह कैसा है ?—(उत्तर में कहते हैं वह)-महोदय है अर्थात् इसमें सिद्धि और मुक्ति का महान् उदय है । वह इस तन्त्रालोक शास्त्र में विस्तार से कहा जायेगा ।। २४५ ।। _ ‘अनुपलब्ध (जैसे आकाशकुसुम आदि) और निर्णीत (= प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सिद्ध) विषय में शास्त्र प्रवृत्त नहीं होता किन्तु सन्दिग्ध विषय में (प्रवृत्त होता है)। इसलिये संशय उसका (= शास्त्रप्रवर्तन का अङ्ग बन जाता है)।’ २१२ श्रीतन्त्रालोकः इत्याद्युक्त्या प्रायः संशयिते एव अर्थे निर्णयात्मनः शास्त्रस्य प्रणयनमुक्तम् इति संशयस्य तदङ्गत्वात् प्रथमं तत्स्वरूपमेव निरूपयितुम् उपक्रमते तत्रेह यद्यदन्तर्वा बहिर्वा परिमृश्यते । अनुद्घाटितरूपं तत्पूर्वमेव प्रकाशते ॥ २४६ ॥ अन्त: मानसविज्ञानादौ, अनुद्घाटितरूपमिति अनुल्लिखितविशेषम्, सामान्य धर्मात्मकम्-इत्यर्थः ।। २४६ ।। अयमेव च प्राय: ‘संशयः’ इत्युच्यते-इत्याह तथानुद्घाटिताकारा निर्वाच्येनात्मना प्रथा । संशयः कुत्रचिद्रूपे निश्चिते सति नान्यथा ॥२४७ ॥ तथा—प्राथमिकत्वेन अनुद्घाटित: करचरणादिविशेषधर्मानवगमात् अनुन्मुद्रितो योऽसौ ऊर्ध्वतादि: सामान्यधर्मा आकारः तेन अनिर्वाच्येन अन्यतरधर्मिविशेष निश्चयाभावात् उभयांशावलम्बित्वेन नियतरूपतया वक्तुमशक्येन आत्मना स्वरूपेण विशिष्टा या प्रथा प्रतीति: सा संशयः, स हि ऊर्ध्वतादे: सामान्यात्मनो धर्मस्य अधिगमे वक्त्रकोटरत्वादीनां विशेषधर्माणां च अनधिगमे सति उदियात् । तदाह इत्यादि उक्ति के अनुसार प्रायः सन्दिग्ध अर्थ में ही निर्णयस्वरूप शास्त्र की प्रवृत्ति होती है । इस प्रकार संशय के उसका अङ्ग होने से उस (= संशय) के स्वरूप का निरूपण करने के लिये उपक्रम करते हैं ___जिस-जिस (पदार्थ) का अन्त:करण में या बाह्य रूप में परामर्श होता है, (विशेषतया) अनुद्घाटित रूपों वाला वह (पदार्थ सामान्य रूप में) पहले से ही (मन में) प्रकाशित हो जाता है ।। २४६ ।। अन्दर = मानसविज्ञान आदि में । अनुद्घाटित रूप = अनुल्लिखित विशेष वाला अर्थात् सामान्य धर्म वाला ॥ २४६ ।। यही प्राय: संशय कहा जाता है-यह कहते हैं जिसमें आकार का (विशेषरूप में) उद्घाटन नहीं हुआ है ऐसी अनिर्वाच्य स्वरूप से (युक्त) प्रतीति ही संशय (कहलाती है) । (यह संशय) (धर्मी के) कुछ रूप में निश्चित होने पर (उत्पन्न होता है) अन्यथा (= पूर्णतया निश्चय होने पर) नहीं ।। २४७ ।। ___उस प्रकार = पहले पहल । अनुद्घाटित = कर चरण आदि विशेष धर्मों का ज्ञान न होने से अस्पष्टतया प्रतीयमान ऊर्ध्वता आदि समान्य धर्म वाले आकार के कारण अनिवार्च्य अर्थात् किसी धर्म विशेष का निश्चय न होने से दोनों पक्षों को आधार बनाने के कारण निश्चित रूप से न कहे जा सकने वाला जो स्वरूप उसकी प्रतीति ही संशय है । वह प्रतीति ऊर्ध्वता आदि सामान्य धर्मों का ज्ञान होने से प्रथममाह्निकम् २१३ ‘कुत्रचित्’ इत्यादि-कस्मिंश्चित् सामान्यधर्मावच्छेदिनि धर्मिणि-इत्यर्थः । नान्यथा इति—सर्वात्मना निश्चिते धर्मिणि अनिश्चिते वा इति यावत् ।। २४७ ।। एतदेव विभज्य दर्शयति एतत्किमिति मुख्येऽस्मिन्नेतदंशः सुनिश्चितः । संशयोऽस्तित्वनास्त्यादिधर्मानुद्घाटितात्मकः ॥ २४८ ॥ एतत्किमिति–परामर्शात्मा संशयः, ‘स्थाणुर्वा पुरुषो वा’ इत्यादि परामर्शान्तरापेक्षया सर्वेषामेव विशेषधर्माणाम् अनुद्घाटितत्वात् मुख्यः, तत्र च किम् इत्यंशापेक्षया य एतदंशः स धर्मिमात्रग्रहणात् सुष्ठु निश्चित: । ननु ‘नियतोभयांशावलम्बी विमर्श: संशयः ।। इति संशयस्य लक्षणम्, तत्र चेत् एकः कश्चिदंशो निश्चित: तत्कृतं तेन, इत्याह ‘संशयः’ इत्यादि । अस्तित्वं च नास्तित्वं च तत् अस्तित्व नास्तित्वमादिर्येषां विशेषधर्माणां तैः अनुद्घाटित: अनुन्मद्रितः, आत्मा स्वरूपं यस्य स तथा, यत्र हि सत्त्वासत्त्वाख्ययोरपि धर्मयोरनिश्चितत्वात् उद्घाटनं न वृत्तं तत्र का वार्ता अन्येषां धर्माणाम् ? इति सर्वेषामेव धर्माणाम् अनुल्लिखिता और मुख अथवा कोटर आदि विशेष धर्मों का ज्ञान न होने से (यह स्थाणु = ह्ठा वृक्ष है या पुरुष) इस प्रकार का संशय उत्पन्न होता है । वही कहते हैं- ‘कहीं पर’ इत्यादि । अर्थात् किसी सामान्य धर्म से अवच्छिन्न (= युक्त, सीमित) धर्मी में। अन्यथा = सब प्रकार से निश्चित या अनिश्चित धर्मी में यह (संशयात्मक प्रतीति) नहीं होती ।। २४७ ।। इसी को विभाजन कर प्रदर्शित करते हैं ‘यह क्या है?’ इस मुख्य (= संशययुक्त स्थल) में ‘यह’ अंश सुनिश्चित है । अस्तित्त्व और नास्तित्त्व आदि (विशेष) धर्मों का जहाँ उद्घाटन नहीं हुआ है वहीं संशय होता है ।। २४८ ।। यह क्या है ?-इस प्रकार का परामर्श ही संशय है । ‘यह स्थाणु है या पुरुष’ इत्यादि अन्य परामर्श की अपेक्षा सभी विशेष धर्मों के स्पष्ट न होने के कारण (एतत् अंश) मुख्य है । ‘किम्’ इसकी अपेक्षा यह ‘एतत्’ अंश केवल धर्मी का ज्ञान कराने के कारण सुनिश्चित है । प्रश्न है कि ‘नियत दोनों पक्षों का अवलम्बन करने वाला विमर्श संशय होता है ।’ यह संशय का लक्षण है । ऐसी स्थिति में ‘स्थाणुर्वा पुरुषो वा’ यहाँ एक अंश निश्चित हो गया तब संशय कहाँ रहा?-इसका समाधान कहते हैं-संशय है… । अस्तित्व और नस्तित्व रूप विशेष धर्मों के द्वारा जो अनुद्घाटित है-वही संशय है। जहाँ सत्त्व और असत्त्व इन दोनों धर्मों के अनिश्चित होने से (उनका) उद्घाटन २१४ श्रीतन्त्रालोकः कारत्वात् नियतधर्मानवलम्बनात् अयं मुख्यः संशयः, किमित्यंशो हि अनुल्लिखितार्थाकाराभिधायक एव–इति भावः ।। २४८ ।। तदाह किमित्येतस्य शब्दस्य नाधिकोऽर्थः प्रकाशते । अधिकः इति—एतच्छब्दार्थात् ।। तर्हि किमर्थमुपाधीयते ? इत्याशङ्कयाह किं त्वनुन्मुद्रिताकारं वस्त्वेवाभिदधात्ययम् ॥ २४९ ॥ अयम् इति–किं-शब्द: ।। २४९ ।। संशयस्य च मुख्यत्वं क्वचिदमुख्यत्वे सति युज्यत इत्यस्यामुख्यत्वमपि दर्शयितुमाह स्थाणुर्वा पुरुषो वेति न मुख्योऽस्त्येष संशयः। भूयःस्थधर्मजातेषु निश्चयोत्पाद एव हि ॥ २५० ॥ न मुख्यः इति–पूर्ववत् सर्वेषामेव धर्माणाम् अनुद्घाटितरूपत्वाभावात्, यत: नहीं हुआ वहाँ अन्य धर्मों की क्या बात? इसलिये सभी धर्मों के आकार का उल्लेख न होने से अर्थात् निश्चित धर्म का अवलम्बन न होने से यह (= एतत्) मुख्य संशय है । ‘किम्’ यह अंश अनुल्लिखित अर्थ के आकार का वाचक है । वही कहते हैं ‘क्या’ इस शब्द का ‘यह’ शब्द (के अर्थ से) अधिक अर्थ नहीं प्रतीत होता ।। २४९- ।। अधिक का तात्पर्य है- ‘एतत्’ शब्द से अधिक ।। २४८ ।। तो किस लिये यह कहा जाता है ?-यह शङ्का कर कहते हैं किन्तु यह (= किम् शब्द) अनुद्घाटित आकार वाले पदार्थ का ही अभिधान करता है. ।। -२४९ ।। अयम् = किं शब्द ।। २४९ ।। संशय की मुख्यता किसी अमुख्य के रहने पर ही सङ्गत होती है, इसलिये इस (= संशय) की अमुख्यता भी दिखाने के लिये हैं ‘यह स्थाणु है या पुरुष?’ इस प्रकार का संशय मुख्य नहीं है अपितु (यह प्रत्यय) बहुत अधिक धर्मसमूहों में से (कुछ धर्मों का) निश्चय कराने वाला है ।। २५० ।।प्रथममाह्निकम् स्थाण्वादिनियतपरामर्शान्यथानुपपत्त्या भूयसामस्थाण्वादिवर्तिनां धर्माणाम् एष निश्चयात्मा प्रत्ययः ।। २५० ।। ननु यद्येवं तर्हि अत्र वा अर्थसंभेदसम्भवात् नियतस्य च अनिश्चयात् उदितानुदितहोमन्यायेन विकल्प एव भवेत् ? इत्याशङ्कयाह आमर्शनीयद्वैरूप्यानुद्घाटनवशात्पुनः संशयः स किमित्यंशे विकल्पस्त्वन्यथा स्फुटः ॥ २५१ ॥ आमर्शनीयम् स्थाणुपुरुषलक्षणं यत् द्वैरूप्यं, तस्य अनुद्घाटनम्-वक्त्रकोट रत्वादिविशेषरूपतयानाविष्करणम ततोऽयं प्रत्ययः किमित्यंशसंभेदात संशय एव । ‘स्थाणुर्वा पुरुषो वा’ इत्यत्र हि किं स्थाणुः किं पुरुषः इत्येव तात्त्विक: संशयार्थः, यदि परमेतत् किमिति केवले किमंशे सर्वेषामेव विशेषधर्माणाम् अनुद्घाटितरूपत्वात् मुख्यत्वम्, अत्र च नियतविशेषधर्मानवगमात् अमुख्यत्वम् इति विशेषः । विकल्पे पुनर्जीहियवयोरुभयोरपि निश्चितत्वे सति नानुद् पूर्व की भाँति सभी धर्मों के अनुद्घाटित होने से (‘स्थाणुर्वा पुरुषो वा’ यह संशय) मुख्य नहीं है । क्योंकि स्थाणु आदि नियत परामर्श की अन्यथा सिद्धि न होने से बहुत से अस्थाणु आदि में रहने वाले धर्मों का निश्चयात्मक ज्ञान होता है ।। २५० ।।। प्रश्न- यदि ऐसा है तो उक्त श्लोक में ‘वा’ से अर्थ की भिन्नता सम्भव होने से और नियत की अनिश्चितता के कारण उदित-अनुदित होम न्याय से विकल्प ही सम्भव है ?—यह शङ्का कर कहते हैं __आमर्शनीय दो रूप (= स्थाणु और पुरुष) का उद्घाटन न होने के कारण ‘किम्’ इस अंश में वह संशय है । अन्यथा (= दोनो रूपों की स्पष्ट प्रतीति होने पर) स्पष्टरूप में (यह) विकल्प है ।। २५१ ।। जब स्थाण और परुष दोनों का रूप आमर्शनीय है । उसका अस्पष्ट होना अर्थात् पुरुष का मुख आदि और स्थाणु का कोटर (= वृक्ष के तने में खोखला गड्डा) विशेष रूप से स्पष्ट नहीं होता तो यह ज्ञान ‘किम्’ अंश के बँट जाने के कारण ‘संशय’ कहलाता है । (किम् = ) क्या यह स्थाणु है ? या पुरुष ? यही संशय का तात्त्विक अर्थ है। “एतत् किम्’ इस स्थल में केवल ‘किमंश’ में ही सभी विशेष धर्मो का रूप अनुद्घाटित न होने से मुख्यत्व है और नियत विशेष धर्मों का ज्ञान न होने से अमुख्यत्व है । जहाँ विकल्प होता है वहाँ दोनों अंशों के निश्चित होने के कारण १. वेद में ‘उदिते जुहोति (= सूर्योदय होने पर हवन करना चाहिए) ओर ‘अनुदिते जुहोति’ (सूर्योदय के पहले हवन करना चाहिए) दोनों प्रकार का वाक्य मिलने से विकल्प उपस्थित होता है । २१६ श्रीतन्त्रालोक: घाटितरूपत्वम्, तदाह ‘विकल्पस्त्वन्यथा स्फुटः’ इति । अन्यथा इति आमर्शनीययोर्द्वयोरपि व्रीहियवयोर्विशेषधर्मात्मना निश्चयात्, एवंविधश्चायं संशयः शास्त्रप्रवृत्तौ निमित्ततां भजते इत्युक्तप्रायम् । शास्त्रं हि निर्णयात्म, निर्णयश्च प्राय संदिग्ध एवार्थे प्रवर्तते, नहि उपलब्ध एव संशयविषयता प्रतिपद्यते नानुपलब्ध:, संशयस्य च प्रमातृधर्मत्वात् यद्यपि केनचित्संशयानेन संदिग्धोऽर्थः प्रतिपद्यते तदा तस्योपलम्भः स्यात्, तत्प्रतिपादनमेव च प्रश्नः इति सोऽपि स्वकारणवत् शास्त्रप्रवृत्तौ निमित्ततां यायात्, तन्निर्णयाय च प्रारभ्यमाणस्य शास्त्रस्य त्रिविधा प्रवृत्तिः–उद्देशो, लक्षणं, परीक्षा च इति । नामधेयेन पदार्थाभिधानमात्रं चोद्देशः, तस्य च प्रथममवश्यमुपादानं कार्यम्, अनुद्दिष्टस्य लक्षणपरीक्षानुपपत्तेः, अतश्च उद्देशं विना लक्षणपरीक्षात्मशास्त्रस्य प्रणयनमेव न घटते-इत्यस्यापि तत्र अङ्गत्वम् ।। २५१ ।। ___ ननु एकेनैव शास्त्रप्रणयनसिद्धेः किमर्थ त्रितयम् ? इति चेत्, न चैतत् परस्परानुषक्ततयैव अत्र एषां निमित्तत्वाभिधानात् । संशयित एव हि अर्थ: केनचिदभिधीयमानः शास्त्रेण उद्देशादिद्वारेण निर्णीयते इति, अत एव च स्वरूपभेदेऽपि एवं शास्त्रप्रवृत्तौ अनुद्घाटितात्मप्रथात्मकेन समानेन रूपेण उनका रूप अनुद्घाटित नहीं रहता । जैसे ‘व्रीहिभिर्यजेत यवैर्वा’ यहाँ पर व्रीहि और यव दोनों का रूप स्पष्ट है । वही कहा—विकल्प तो स्फुट रहता है। अन्यथा का तात्पर्य है-आमर्शनीय व्रीहि और यव दोनों का विशेषरूप से निश्चय होने से । इस प्रकार का यह संशय शास्त्र के प्रवर्तन का कारण बनता है। शास्त्र निर्णयात्मक होता है उपलब्ध (= प्राप्त, ज्ञात) और निर्णय प्रायः सन्दिग्ध अर्थ में ही प्रवृत्त होता है । पदार्थ के विषय में संशय कभी नहीं होता कि यह उपलब्ध नहीं है । संशय प्रमाता का धर्म है इस कारण यद्यपि कोई संशय करने वाला किसी सन्दिग्ध अर्थ का ज्ञान होता है तब उसको (उस अर्थ की) प्राप्ति हो जाती है उसका ज्ञान ही प्रश्न है । वही अपने कारण की भाँति शास्त्र के प्रवर्तन में कारण बनता है और उसके निर्णय के कारण प्रारभ्यमाण शास्त्र की तीन प्रकार से प्रवृत्ति होती है-उद्देश, लक्षण और परीक्षा । नाम लेकर पदार्थ का कथन उद्देश है । इसको अवश्य पहले करना चाहिये । क्योंकि अनुद्दिष्ट की लक्षण और परीक्षा नहीं हो सकती । उद्देश के बिना लक्षण-परीक्षा रूप शास्त्र का प्रणयन ही नहीं होता-इसलिये यह (= उद्देश) भी उसमें (= शास्त्रप्रणयन में) अङ्ग है ।। २५१ ।। प्रश्न-एक ही (प्रवृत्ति) से शास्त्रप्रणयन की सिद्धि होने से तीन (प्रवृत्तियों) की क्या आवश्यकता ? परस्पर सम्बन्ध होने से ही यहाँ इनको निमित्त कहा गया है । संशय वाला ही विषय किसी के द्वारा उक्त होने पर शास्त्र के द्वारा उद्देश आदि के माध्यम से निश्चित किया जाता है । इसीलिये स्वरूप में भिन्नता होने पर प्रथममाह्निकम् कारणत्वमस्ति इति प्रतिपादयितुमाह तेनानुद्घाटितात्मत्वभावप्रथनमेव यत् । प्रथमं स इहोद्देशः प्रश्नः संशय एव च। २५२ ॥ तेन पूर्वोक्तेन न्यायेन अनुद्घाटितात्मत्वेन भावस्य वस्तुमात्रस्य प्रथमं यत् प्रथनं स एव इहोद्देश:–प्रश्न: संशयश्च इति, तत्र संशयस्य तावदेवंरूपत्वं समनन्तरमेव उक्तम्, उद्देशे च अनुद्घाटितत्वेनैव वस्तुनः प्रथनं रूपम् नामधेयमात्रेणैव पदार्थानामभिधानात् । प्रश्नेऽपि एवं वाच्यम्, अन्यथा हि निर्णयात्मत्वे प्रतिवचनादस्य विशेषो न स्यात् ।। २५२ ।। तत्र संशयितेऽर्थे प्रश्नः प्रवर्तते, इति तन्निर्णयानन्तरं निर्णेतव्य: प्रश्नः, इति प्राप्तावसरं तत्सतत्त्वमेव वक्तुमाह तथानुद्घाटिताकारभावप्रसरवर्त्मना । प्रसरन्ती स्वसंवित्तिः प्रष्ट्री शिष्यात्मतां गता ॥ २५३ ॥ इह अद्वयनये ‘परमार्थसती संविदेव सर्वम्’ इति प्रष्ट्रप्रतिवक्तृरूप गुरुशिष्याद्यात्मनो भेदस्य तावदनुपपत्तिः इति । तथा पूर्वोक्तेन प्रकारेण भी शास्त्र की प्रवृत्ति में ये तीनों समान रूप से कारण बनते हैं—यह प्रतिपादन करने के लिए कहते हैं इसलिए जिसका स्वरूप स्पष्ट नहीं किया गया है उसकी जो (प्राथमिक) प्रतीति वही यहाँ उद्देश प्रश्न और संशय है ।। २५२ ।। ___तेन = पूर्वोक्त न्याय से, पदार्थ के स्वरूप का निर्वचन न करते हुए केवल वस्तु (के नाम) का कथन ही उद्देश है । यही प्रश्न है और संशय भी । उसमें से संशय का रूप अभी पहले कह दिया गया । उद्देश में वस्तु के रूप का उद्घाटन न करते हुए परिचय देते हैं क्योंकि पदार्थों का नाम लेकर ही कथन होता है । प्रश्न में भी ऐसा ही कथन होता है अन्यथा निर्णय में इस (प्रश्न) का प्रतिवचन (= उत्तर) देने से (प्रश्न और निर्णय में) कोई अन्तर ही नहीं रह जायेगा ।। २५२ ।। ____संशययुक्त अर्थ में प्रश्न होता है । उस (= संशय) के निर्णय के बाद प्रश्न का निर्णय होता है । इसलिये अवसर के अनुकूल प्रश्न को ही कह रहे हैं उक्त रीति के अनुसार (अपने) आकार का उद्घाटन न करने वाली जो पूर्ण संवित् उसके पश्यन्ती आदि के रूप में अवरोह क्रम से संकुचित होती हुई अपनी संविद् ही (प्रमाता रूप शिष्य की भूमिका का निर्वाह करती हुई) शिष्यरूपता को प्राप्त होती है ।। २५३ ।। इस अद्वय शास्त्र में परमार्थ संविद् ही सब कुछ है । इस लिये प्रष्टा एवं २१८ श्रीतन्त्रालोक: अनुद्घाटिताकार:-सर्वभावनिर्भरत्वात् संविदेकरूपो योऽसौ भावः पारमार्थिक पूर्णस्वभावं वस्तु, तस्य यः प्रसरः पश्यन्त्यादिदशाक्रमणेन अवरोहः, तदेव वर्म, तेन प्रसरन्ती वैखर्यादिरूपतामासादयन्ती, स्वसंविदेव, संकुचिता, प्रमात्रात्माशिष्य भूमिकाम् अवभासयन्ती ‘प्रष्ट्री’ इत्युच्यते-इत्यर्थः ।। २५३ ।। कुत्र कथं चास्याः प्रष्टृत्वम् ? इत्याह तथान्तरपरामर्शनिश्चयात्मतिरोहितेः । प्रसरानन्तरोद्भूतसंहारोदयभागपि ॥२५४ ॥ यावत्येव भवेद्बाह्यप्रसरे प्रस्फुटात्मनि । अनुन्मीलितरूपा सा प्रष्ट्री तावति भण्यते ॥ २५५ ॥ तथा-परमाद्वयमयत्वेन, आन्तर:-प्रमात्रैगकात्म्यरूपः, योऽसौ परामर्शः, तस्य निश्चयो—दायम्, तदात्मनस्तिरोहितेः-उत्तरोत्तरस्य रूपस्य पूर्वपूर्वत्रा नवस्थिते:, प्रसरात्-बाह्योन्मुख्यात्, अनन्तरमुद्भूतौ यो संहारश्च-पराद्यात्मनो रूपस्य स्वात्मन्येव विश्रान्तिः, उदययश्च–पश्यन्त्याद्यात्मना रूपेण बहिरुद्भवः, तौ भजते, तद्रूपा हि सा संवित् यावति प्रस्फुटात्मनि–ग्राह्यग्राहक युगलकाद्याभासस्वभावे बाह्यप्रसरे, अनुन्मीलितरूपा–संविद्रूपत्वेन अनव भासमाना, भवेत् तावत्येव अनुद्घाटितात्मत्वेन प्रथनात् ‘प्रष्ट्री’ इत्युच्यते उत्तरदाता रूप शिष्य और गुरु का भेद असिद्ध हो जाता है । इस प्रकार पूर्वोक्त रूप से अनुदद्घाटित आकारवाला अर्थात् सर्वभावनिर्भर होने से मात्र संवितस्वरूप जो भाव = परम पूर्णस्वभाव वाली वस्तु, उसका जो प्रसर = पश्यन्ती आदि दशा के क्रम से अवरोह, उस रास्ते से प्रसार करती हुई अर्थात् वैखरी आदि रूपों को धारण करती हुई स्वसंविद् ही संकुचित होकर शिष्य के रूप में प्रष्टी कही जाती है ।। २५३ ।। कहाँ और कैसे यह प्रष्ट्री बनती है—यह कहते है परम अद्वयमय होने के कारण आन्तरिक (= केवल प्रमाता रूप) परामर्श के निश्चय स्वरूप तिरोधान के कारण, प्रसर (= बाह्य उन्मुखता) के बाद होने वाले संहार तथा उदय वाली (संवित्) जब तक स्पष्ट बाह्य प्रसर में (स्व = संविद् रूप में) भासमान नहीं होती तब तक प्रष्ट्री (= शिष्य) कही जाती है ।। २५४-२५५ ।। ____परम अद्वयमय होने से प्रमातृरूप परामर्श की दृढ़ता जब तिरोहित होने लगती है और बहिरुन्मुखता के कारण संहार = परा आदि के रूप में स्वात्म में विश्रान्ति और उदय अर्थात् पश्यन्ती आदि के रूप में बाह्य विकास को संवित् जब प्राप्त करने लगती है तथा संविद् रूप में प्रकाशमान न होती हुई ग्राह्यग्राहक आदि युग्मक के रूप में प्रकाशित होने लगती है तब अपने पूर्ण स्वरूप को प्रकट न प्रथममाह्निकम् -इत्यर्थः ।। २५४-२५५ ।। न केवलं संविदः प्रष्टत्वमेव अस्ति, यावत् प्रश्नादिरूपत्वमपि–इत्याह स्वयमेवं विबोधश्च तथा प्रश्नोत्तरात्मकः । गुरुशिष्यपदेऽप्येष देहभेदो ह्यतात्त्विकः ॥ २५६ ॥ तदुक्तम् ‘गुरुशिष्यपदे स्थित्वा स्वयं देवः सदाशिव: । पूर्वोत्तरपदैर्वाक्यैस्तन्त्रं समवतारयत् ।।’ इति । तथा ‘प्रष्ट्री च प्रतिवक्त्री च स्वयं देवी व्यवस्थिता ।’ इति । ननु गुरुशिष्ययोः परस्परं भेदः साक्षादुपलभ्यते इति किं नाम अनयोर्बोधरूपत्वम् ? इत्याह-एष इत्यादि । अतात्त्विकः इति–अवास्तवः । बोध एव हि स्वस्वातन्त्र्यमाहात्म्यात् स्वात्मनि तत्तद्देहादिभावम् आभासयति-इति भावः ।। २५६ ।। तदाह बोधो हि बोधरूपत्वादन्त नाकृती: स्थिताः । करने के कारण वह प्रष्ट्री कही जाती है ।। २५४-२५५ ।। संविद् केवल प्रष्ट्री ही नहीं प्रश्न भी बनती है-यह कहते हैं उसी प्रकार गुरु और शिष्य के रूप में प्रश्न और स्वरूपज्ञान भी वही है । शरीर का भेद अयथार्थ है ।। २५६ ।। वही कहा गया गुरु-शिष्य के रूप में सदाशिव ने स्वयं पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष प्रस्तुत कर तन्त्र की अवतारणा की । तथा ** ‘देवी स्वयं प्रष्ट्री और उत्तरदात्री बनती है।’ प्रश्न-गुरु और शिष्य का परस्पर भेद साक्षात् दिखलायी पड़ता है फिर ये दोनों संविद् कैसे हैं ?—यह कहते हैं- एष………। अतात्त्विक = अवास्तविक । संविद् ही अपने स्वातन्त्र्य की महिमा से अपने में तत्तत् देह आदि भाव को आभासित करती है ।। २५६ ।। वही कहते हैं २२० श्रीतन्त्रालोकः बहिराभासयत्येव द्राक्सामान्यविशेषतः ॥ २५७॥ बोधात्मा परमेश्वरो हि बोधनक्रियाकर्तृत्वलक्षणात् बोधरूपत्वात् अन्त:स्थिता नानाकृती:-तत्तद्भावजातम्, द्राक्-अनन्यापेक्षितया निर्विलम्बनमेव, सामान्यविशेषरूपत्वेन, बहिः-विच्छेदेन, अवभासयत्येव इति वाक्यार्थः ।। २५७ ।। तत्र सामान्यस्य किं नाम बहिरवभासनम् ?–इत्याह स्रक्ष्यमाणविशेषांशाकांक्षायोग्यस्य कस्यचित् । धर्मस्य सृष्टिः सामान्यसृष्टिः सा संशयात्मिका ॥ २५८ ।। स्रक्ष्यमाणा:-स्वालक्षण्येन उल्लासयिष्यमाणा ये विशेषांशाः, तत्र ‘निर्विशेषं हि सामान्यं भवेच्छशविषाणवत् ।’ इत्याधुक्तयुक्त्या तदविनाभावित्वेन आकांक्षा औन्मुख्यम्, तत्र योग्यस्य तदौन्मुख्याभावेऽपि सर्वगतत्वात् तत्स्वरूपानपायात् अनुगुणस्य, कस्यचित् नियतस्य गोत्वादेः धर्मस्य, बहिरवभासनात्मा सृष्टि: सामान्या सृष्टिः, सा एव च अनुद्घाटितात्मप्रथारूपत्वात् ‘संशयः’ इति-विशेषाकांक्षानुगुणसामान्यप्रतीतिरेव बोध रूप होने के कारण बोध द्राक् (= बिना किसी आधार के) (स्वयं) अपने अन्दर वर्तमान अनेक आकृतियों को सामान्य एवं विशेष रूप में बाहर आभासित करता है ।। २५७ ।। बोधस्वरूप परमेश्वर ही बोधन क्रिया का कर्त्तारूप बोध बनकर अपने अन्दर स्थित अनेक आकृतियों वाले तत्तद् पदार्थसमूह को बिना किसी की अपेक्षा और आधार के सामान्य विशेष रूप से आभासित करते हैं ।। २५७ ।। सामान्य का बाहर अवभास क्या है-यह कहते हैं भविष्य में रचे जाने वाले विशेषांश की आकांक्षा के योग्य किसी धर्म की सृष्टि सामान्य सृष्टि (कहलाती) है । वह संशयात्मिका होती है ।। २५८ ।। स्रक्ष्यमाण = स्वलक्षण के रूप में भविष्य में उल्लासित होने वाले, जो विशेषांश उसमें ‘विशेषरहित सामान्य खरगोश की सींग जैसा (= तुच्छ, असत्) होता है।’ इत्यादि उक्त युक्ति के अनुसार उसके साथ अवश्यंभावी रूप से जो उन्मुखता उसके अनुरूप किसी नियत गोत्व आदि धर्म की बाह्य अवभासन के रूप में जो सृष्टि होती है वह सामान्य सृष्टि होती है । वही जब आत्मस्वरूप का उद्घाटन नहीं करती तब संशय कहलाती है । इस प्रकार विशेष आकांक्षा के अनुकूल सामान्य प्रथममाह्निकम् संशयप्रतीति:-इत्यर्थः ।। २५८ ।। एवं विशेषसृष्टिरपि निश्चयप्रतीतिरूपा—इत्याह स्रक्ष्यमाणो विशेषांशो यदा तूपरमेत्तदा । निर्णयो मातृरुचितो नान्यथा कल्पकोटिभिः ॥ २५९ ॥ यदा पुनर्निश्चयोपयोगिना सर्वविशेषाणां सृष्टत्वात् स्रक्ष्यमाणो विशेषांश उपरमेत्-विशेषविषया सृष्टिः समाप्येत, तदा स एव उद्घाटितात्मप्रथारूप त्वात ‘स्थाणरेवायम’ इति प्रत्ययात्मा निश्चयः स्यात् । एतदत्पादे च प्रमात रिच्छैव निबन्धनम्-इत्युक्तम् ‘मातृरुचितः’ इति । प्रमाता हि यावदेव ‘ज्ञातं मया’ इति परितुष्येत्, तावदेव निश्चितं भवति–इति भावः, अन्यथा पुन: स कदाचिदपि न भवेत्, प्रमात्रिच्छायामेवाविश्रान्तेः । तदाह—‘नान्यथा कल्पकोटिभिः’ इति ।। २५९ ।।। न केवलमस्य निश्चयमात्ररूपत्वमेवास्ति, यावल्लक्षणादिरूपत्वमपि–इत्याह तस्याथ वस्तुनः स्वात्मवीर्याक्रमणपाटवात्। उन्मुद्रणं तयाकृत्या लक्षणोत्तरनिर्णयाः ॥ २६० ॥ की प्रतीति ही संशय की प्रतीति मानी जाती है ।। २५८ ।। इस प्रकार विशेष की सृष्टि भी निश्चय प्रतीति रूपा होती है-यह कहते हैं जब स्रक्ष्यमाण विशेषांश समाप्त हो जाता है तब प्रमाता के द्वारा ईप्सित निर्णय होता है । अन्यथा (= जब तक प्रमाता की इच्छा परितुष्ट नहीं होती तब तक) करोड़ो कल्पों से भी (निश्चय नहीं होता) ।। २५९ ।। ___ जब निश्चयोपयोगी (बोध प्रमाता) के द्वारा सब विशेषों की सृष्टि होने पर स्रक्ष्यमाण विशेषांश रुक जाता है अर्थात् विशेष विषयिणी सृष्टि समाप्त हो जाती है तब वही (बोध) अपने स्वरूप को स्पष्ट करने के कारण यह ‘स्थाणु ही है’-इस प्रकार का ज्ञान निश्चय (कहलाता) है । इसकी उत्पत्ति में प्रमाता की इच्छा ही कारण है । यही बात ‘प्रमाता की रूचि के कारण’ वाक्य से कही गयी है । प्रमाता जब ‘मैने जान लिया’ इस प्रकार (ज्ञान कर) सन्तुष्ट हो जाता है तब (तत्पदार्थ विषयक ज्ञान) निश्चित हो जाता है । अन्यथा फिर वह (= निश्चय) कभी भी नहीं होगा, क्योंकि (इस प्रकार के ज्ञान की) प्रमाता की इच्छा में विश्रान्ति नहीं हो रही है । वही कहा-अन्यथा करोंडो कल्पों के द्वारा भी (निर्णय नहीं हो सकता) ।। २५९ ।। _इसकी केवल निश्चयरूपता ही नहीं अपितु लक्षणादिरूपता भी है-यह कहते २२२ श्रीतन्त्रालोकः तस्य–विशेषात्मनो वस्तुनो यत् स्वात्मनो वीर्यम्-तदितरपरावृत्तत्वम्, तस्य आक्रमणम्-स्वात्मना विषयीकरणम्, तत्र पाटवम्-नैराकांक्ष्यात्तीव्रत्वम्, ततो यत् तेनैव आकारेण उन्मुद्रणम्-प्रतिनियतस्वस्वरूपाविष्करणम्, तत् उद्घाटिता त्मप्रथामयत्वस्य अविशेषात् ‘लक्षणम्’ इति ‘उत्तरम्’ इति ‘निर्णयः’ इति चोच्यते। तत्र-असाधारणस्तत्त्वावबोधको धर्मो लक्षणम्, तत्त्वावबोधोपकरणं दूषणोद्धरणमुत्तरम्, तत्त्वावबोधो निर्णयः ।। २६० ।। ननु तत्त्वावबोधसारत्वस्य अविशेषात्, परीक्षापि लक्षणेनैव निर्णयवत् कथं न संगृहीता ? इत्याशङ्कयाह निर्णीततावद्धर्मांशपृष्टपातितया पुनः । भूयो भूयः समुद्देशलक्षणात्मपरीक्षणम् ॥ २६१ ॥ निर्णीत:-निर्णयविषयीकृतः, तावान्—नियतलक्षणलक्ष्यः, योऽसौ धर्मांश: -तद्विषयतया पौन:पुन्येन यः समुद्देशः, यच्च लक्षणम्-साधारणासाधारण धर्मनिरूपणम्, तदात्मकं पुनः परित:-सर्वतो नि:शेषप्रतिपक्षप्रतिक्षेपेण उस (= विशेषात्म्क) वस्तु का अपने इतरव्यावृत्तत्व के विषय बनाने की तीव्र निराकांक्षा के कारण जो उसी आकार के रूप में निश्चित रूप का बन जाना वही लक्षण, उत्तर या निर्णय कहलाता है ।। २६० ।। उस विशिष्ट वस्तु के इतरव्यवर्त्तन का जो आक्रमण अर्थात् स्वयं के द्वारा स्व को विषय बनाना उसमें वर्तमान तीव्रता के द्वरा उसी अपने आकार से उन्मुद्रण अर्थात् अपने निश्चित स्वरूप का प्रकटीकरण लक्षण या उत्तर या निर्णय कहा जाता है । अर्थात् असाधारण तत्त्व को बतलाने वाला जो धर्म है वही लक्षण है । तत्त्वावबोध का साधन और दोष का उद्धार उत्तर है तथा तत्त्वावबोध निर्णय है ।। २६० ।। प्रश्न-(लक्षण और परीक्षा में) तत्त्वावबोधसार के समान होने से परीक्षा भी निर्णय की भाँति लक्षण से क्यों संगृहीत नहीं की गयी ? यह शङ्का कर कहते हैं निर्णीत निश्चित लक्षण के द्वारा ज्ञाप्य धर्मांश को विषय बनाकर बार-बार होने वाला जो समुद्देश एवं लक्षण तदात्मक, (सम्पूर्ण प्रतिपक्ष का खण्डन करते हुए ईक्षण को) परीक्षा (कहा जाता है) ।। २६१ ॥ निर्णीत = निर्णय का विषय किया गया निश्चित लक्षणलक्ष्य वाला जो धर्मांश = उसको विषय मान कर पुन: पुन: जो समुद्देश और जो साधारण और असाधारण धर्म का निरूपणस्वरूप लक्षण उसका सब प्रकार से पक्ष-प्रतिपक्ष के प्रथममाह्निकम् ईक्षणम्-परीक्षा-इति वाक्यार्थः ।। २६१ ।। एतच्च उद्देशादित्रयं सर्वत्रैवास्ति–इत्याह दृष्टानुमानौपम्याप्तवचनादिषु सर्वतः । उद्देशलक्षणावेक्षात्रितयं प्राणिनां स्फुरेत् ॥ २६२ ॥ एतदेव क्रमेण दर्शयति निर्विकल्पितमुद्देशो विकल्पो लक्षणं पुनः । परीक्षणं तथाध्यक्षे विकल्पानां परम्परा ॥ २६३ ॥ नगोऽयमिति चोद्देशो धूमित्वादग्निमानिति । लक्ष्यं व्याप्त्यादिविज्ञानजालं त्वत्र परीक्षणम् ।। २६४ ॥ उद्देशोऽयमिति प्राच्यो गोतुल्यो गवयाभिधः । इति वा लक्षणं शेषः परीक्षोपमितौ भवेत् ॥ २६५ ॥ स्व:काम ईदृगुद्देशो यजेतेत्यस्य लक्षणम् । अग्निष्टोमादिनेत्येषा परीक्षा शेषवर्तिनी ॥ २६६ ॥ उद्देशः इति-आलोचनमात्रस्य अनुद्घाटितात्मप्रथारूपत्वात् । लक्षणम् प्रतिक्षेपपूर्वक ईक्षण ही परीक्षा कहलाता है ।। २६१ ।। यह उद्देश आदि तीन सर्वत्र ही रहते हैं-यह कहते हैं प्रत्यक्ष अनुमान उपमान और शब्द आदि में सर्वत्र उद्देश लक्षण एवं परीक्षा ये तीनों (सभी) प्राणियों में स्फुरित होती हैं ।। २६२ ।। इसी को क्रम से दिखलाते हैं प्रत्यक्ष में विकल्पहीन (ज्ञान) उद्देश हैं विकल्प (ज्ञान) लक्षण हैं तथा विकल्पों की परम्परा परीक्षण है ।। २६३ ।। (अनुमान स्थल में) ‘यह पर्वत’–उद्देश है । ‘धूमयुक्त होने के कारण अग्निमान् है’–लक्ष्य है । इस विषय में व्याप्ति आदि समूह परीक्षा है ।। २६४ ।। उपमान में प्राच्य (= धर्मिविशेषानवाच्छिन्न) ‘अयम्’ (= यह) उद्देश है। गोतुल्य गवयनाम वाला है यह लक्षण है । बाकी (= दूध देने वाली इत्यादि) परीक्षा है ।। २६५ ।। ‘यजेत स्वर्गकामः’ स्वर्गकाम:-यह उद्देश्य है, यज्ञ करे यह लक्षण है। अग्निष्टोम आदि के द्वारा—यह शेषवर्तिनी (= अर्थवाद व्यापार वाली) परीक्षा है ।। २६६ ।। २२४ श्रीतन्त्रालोकः इति-नीलमिति, विकल्पेन निर्विकल्पस्यैव उद्घाटितात्मप्रथारूपत्वात् । विकल्पा नाम् इति—अर्थक्रियाज्ञानपूर्वापरभाविनाम्, तत एव च अर्थतथात्व- निश्चयोत्पादः इत्येषां परीक्षात्वम् । उद्देशः इति–नगोऽयम् इति धर्मिमात्रस्यैव अनुद्घाटित साध्यधर्मात्मत्वेन प्रथनात् । लक्ष्यमिति–साध्यधर्मविशिष्टतया उद्घाटितात्म प्रथारूपत्वात् । व्याप्तिः–अन्वयव्यतिरेको, तद्वशादेव हि साध्यसाधनयोरविना भावनिश्चयोत्पादः इत्यस्याः परीक्षात्मत्वम् । अयमिति—पुरोवर्तिनः पिण्डमात्रस्य अनुद्घाटितात्मत्वेन प्रथनात् । प्राच्यः इति–प्रथमो धर्मिविशेषानवच्छिन्नः इति यावत् । गोतुल्योऽयम् इति-प्रमाणदशायाम्, गवयशब्दवाच्योऽयम् इति फलदशायां च विशेषावच्छेदस्य भावित्वात् । वा-शब्द: समुच्चये, तेन प्रमाण दशायाः फलदशायाश्च उद्घाटितात्मप्रथारूपत्वात् लक्षणत्वम् । शेषः इति सास्नादिमद्वाहदोहादिकारी इत्यादिः परामर्शः। ईदृक् इति—स्व:कामः इत्येव । अस्य इति–स्व:कामस्य । लक्षणम् इति–अधिकारानुबन्धस्य विषयानुबन्ध मन्तरेणानिर्णयात् । शेषवर्तिनी इति ‘शेष: परमार्थत्वात् ।’ इति वचनात् सा अर्थवादव्यापारात्मा इतिकर्तव्यता- इत्यर्थः । इत्युक्तम्, न उद्देश में वस्तु का स्वरूप अनुद्घाटित रहता है । वह केवल आलोचन रूप होता है । ‘नीलम्’ (कहने) से निर्विकल्पक (वस्तु) का ही स्वरूप उद्घाटित होता है । विकल्प अर्थक्रियाज्ञान का पूर्वापरभावी होता है । इसीलिए वस्त की वास्तविकता के निश्चय की उत्पत्ति ही इन (विकल्पों) की परीक्षा है । ‘यह पर्वत है’ - यह उद्देश है क्योंकि इस साध्यधर्म का अनुद्घाटन है, केवल धर्मी का ही कथन है । साध्यधर्म विशिष्ट के रूप में अपने स्वरूप का उद्घाटन करने से ‘अग्निमान् धूमात्’ यह लक्ष्य है । व्याप्ति अन्वय और व्यतिरेक (भेद से दो प्रकार की) है । उसी के बल पर हेतु और साध्य के अविनाभाव के निश्चय की उत्पत्ति होती है—यह इस (= व्याप्ति) की परीक्षात्मता है । (‘अयं गवयपदवाच्यः’ इस वाक्य में ) अयं पद पुरोवर्ती पिण्डमात्र के अनुद्घाटित स्वरूप को बतलाता है । ‘प्राच्य’ का अर्थ है-प्रथम अर्थात् धर्मविशेष से अनवच्छिन्न । ‘अयं’ गोतुल्य: इस प्रमाणदशा में और ‘अयं गवयशब्दवाच्यः’ इस फलदशा में विशेषावच्छेद है । ‘वा’ शब्द का प्रयोग समुच्चय अर्थ में है । इसलिये प्रमाणदशा और फलदशा दोनों के उद्घाटित आत्मप्रथारूप होने से ये लक्षण हैं । शेष का तात्पर्य सास्नादिमान् वाहन, दोहन आदि करने वाला है । ईदृक् = स्वर्गकामना वाला । इसका = स्वर्ग चाहने वाले का । लक्षण इसलिये कि अधिकारानुबन्ध का निर्णय विषयानुबन्ध के बिना नहीं हो सकता । ‘शेष परमार्थ होने के कारण’ इस वचन से अर्थव्यापाररूपा वह (परीक्षा) इतिकर्त्तव्यता है। उद्देश और लक्षण के द्वारा ज्ञापित स्वर्गकामी के अधिकार को प्रकट करने के कारण (इतिकर्तव्यता) परीक्षा है ।। २६२-२६६ ।।प्रथममाह्निकम् च विशेषस्य आकांक्षणीयत्वमुचितम्-तदानीं तस्य भविष्यत्तया वार्तामात्रस्यापि अभावात् ? इत्याशङ्कां सोपस्कारप्रागुक्तलक्षणानुवादपुरःसरं प्रतिक्षिपति । विकल्पलक्ष्यमाणान्यरुचितांशसहिष्णुनः । वस्तुनो या तथात्वेन सृष्टिः सोद्देशसंज्ञिता ॥ २६७ ।। तदैव संविच्चिनुते यावत: स्रक्ष्यमाणता । विकल्पेन–तत्प्रधानेन प्रमात्रा सामान्यस्य सृष्टत्वात्, तदपेक्षया स्रक्ष्यमाणा: -लक्षणात् उल्लासयिष्यमाणाः, अत एव अन्ये-ये सामान्यव्यतिरिक्ताः प्रमातु: संतोषादायकत्वाच्च, रुचिता:-इष्टाः, ये अंशा:-विशेषाः, तान्-अर्थात् व्याप्यत्वेन सहते तच्छीलं यत् तस्यैवंविधस्य सामान्यात्मनो वस्तुनः, तथात्वेन स्रक्ष्यमाणत्वादिविशेषणविशिष्टविशेषसहिष्णुत्वेन, या सृष्टिः, तस्या उद्देश्य: अभिधानं, तत्र यावत: आकांक्षणीयस्य विशेषस्य स्रक्ष्यमाणता तावत्, तदव उद्देशावसरे, संवित् चिनुते-अनुसंधत्ते-इत्यर्थः ।। २६७ ।। तत्र हेतु: यतो ह्यकालकलिता संधत्ते सार्वकालिकम् ॥ २६८॥ प्रश्न–स्रक्ष्यमाण विशेष की आकांक्षा के अनुरूप सामान्य की सृष्टि उद्देश कहलाती है यह कहा गया । किन्त विशेष का आकांक्षणीय होना उचित नहीं है क्योंकि उस समय उस (विशेष) के भविष्यत्कालीन होने से (उसकी) बात भी नहीं होती ?—यह शङ्का कर और अधिक प्रशस्त रूप से पूर्वोक्त लक्षण का अनुवाद करते हुए समाधान करते हैं– - _ विकल्प के द्वारा भविष्य में रची जाने वाली और इसी कारण अन्य (= सामान्य से भिन्न इष्टविशेष) को स्वीकार करने वाली (सामान्यात्मक) वस्तु की जो उसी रूप में सृष्टि वह उद्देश कही गई है । उसी समय (= उद्देश के समय जितने (पदार्थों) की भविष्य में रचना होने वाली होती है संवित् उतने का चयन कर लेती है ।। २६७-२६८- ।। विकल्पप्रधान प्रमाता सामान्य की सृष्टि करता है । उसकी अपेक्षा स्रक्ष्यमाण = लक्षण के कारण उल्लासित किये जाने वाले जो सामान्य से भिन्न इष्टविशेष उनको सहन करने की शीलता वाले सामान्य पदार्थ की सृष्टि का कथन ही उद्देश है । उसमें जितने आकांक्षणीय विशेष हैं संविद् उनकी स्रक्ष्यमाणता का ही अनुसंधान करती है ।। २६७ ।। उसमें कारण है क्योंकि अकालकलित (संवित्) सभी काल में वर्तमान (पदार्थो का) २२६ श्रीतन्त्रालोकः हि-शब्दो वाक्यालङ्कारे ।। २६८ ।। ननु उद्घाटितात्मप्रथारूपत्वे सति लक्षणस्य सामान्यविशेषयोर्द्वयोरपि प्रथनात् किं लक्ष्यम्, किं वा लक्षणम् ? इत्यत्र विवेकाभावादनियम: स्यात् इत्याशङ्कयाह स्रक्ष्यमाणस्य या सृष्टिः प्राक्सृष्टांशस्य संहृतिः । अनूद्यमाने धर्म सा संविल्लक्षणमुच्यते ॥ २६९ ॥ इह विशेषसामान्यविषयसघिसंहतिमयी संवित लक्षणम_व्यवहरणबीजम - इति । तत्र सृज्यमानस्य विशेषांशस्य विधेयतया लक्षणत्वं वाच्यम् संह्रियमाणस्य च सामान्यांशस्य अनूद्यमानतया लक्ष्यत्वम् इत्यस्त्येव विवेकः ।। २६९ ।। ननु ‘भूयो भूयः समुद्रेशलक्षणात्म परीक्षणम् ।’ इत्युक्तम् तत्र च विरामनिमित्ताभावात् परीक्षाया अविश्रान्तिरेव स्यात् ? इत्याशङ्कामनुवादगर्भा प्रतिक्षिपति सन्धान करती है ।। -२६८ ।। श्लोक में ‘हि’ शब्द केवल वाक्यालङ्कार अर्थ में है ।। २६८ ।। प्रश्न-आत्मप्रथा रूप के उद्घाटित होने पर लक्षण के सामान्य और विशेष दोनों रूपों के स्फटीकरण से क्या लक्ष्य है और क्या लक्षण इसका भेद न होने से अव्यवस्था हो जायगी ? यहा शङ्का कर कहते हैं जिसकी भविष्य में रचना होने वाली थी वर्तमान में उसकी रचना, तथा पहले जिसकी रचना हो चुकी थी उसका संहार, इस प्रकार (संह्रियमाण) सामान्य धर्म का अनुवाद होने पर (जो होती है) वह संवित् लक्षण कहलाती है ।। २६९ ।। विशेष और सामान्य दोनों विषयों वाली सृष्टि की संहाररूपा संवित् लक्षण अर्थात् व्यवहार का कारण बनती है । उनमें से सृज्यमान विशेषांश विधेय होने के कारण लक्षण कहा जाता है और संह्रियमाण सामान्यांश अनूद्यमान होने के कारण लक्ष्य होता है-यह भेद है ।। २६९ ।। प्रश्न ‘उद्देश और लक्षण का बार-बार सब प्रकार से = समस्त प्रतिपक्ष का खण्डन ही परीक्षा है ।’ (त. आ. १.२६२) यह कहा गया । उसमें विराम का कारण न होने से परीक्षा की विश्रान्ति ही नहीं होगी-अनुवादसहित इस शङ्का का समाधान करते हैं प्रथममाह्निकम् तत्पृष्ठपातिभूयोंशसृष्टिसंहारविश्रमाः । परीक्षा कथ्यते मातृरुचिता कल्पितावधिः ॥ २७० ॥ ननु तत्र तत्र प्रत्यक्षादौ क्रमेण पश्यन्तीमध्यमावैखरीरूपतया स्वात्म चमत्कारमयी विमर्शशक्तिरेव विजृम्भते इत्युक्तम्, तत्कथमिह उद्देशाद्यात्मना स्वसिद्धान्ताप्रसिद्ध क्रमान्तरमासूत्रितम् ? इत्याशङ्कयाह प्राक्पश्यन्त्यथ मध्यान्या वैखरी चेति ता इमाः। परा परापरा देवी चरमा त्वपरात्मिका ॥ २७१ ॥ ननु संख्यासाम्यमात्रादेव उद्देशादित्रयस्य पश्यन्त्यादिरूपत्वम्, इति किमिदम् ? इत्याशङ्कयाह इच्छादि शक्तित्रितयमिदमेव निगद्यते । पूर्वेण संबन्धः । एतत्प्राणित एवायं व्यवहारः प्रतायते ॥ २७२ ॥ सकलः खलु अयं शुद्धाशुद्धात्मा व्यवहार: संविद्भित्तावेव अवभासते इति भावः । तदुक्तम् ‘इत्थमत्यर्थभिन्नार्थावभासखचिते विभौ । उस (= उद्देश्य एवं लक्षण) के बाद होने वाले अधिकांश की सृष्टि तथा संहार का विभ्रम, जो प्रमाता को इष्ट है और जिसकी सीमा कल्पित है, परीक्षा कही जाती है ।। २७० ।। प्रश्न- स्वात्मचमत्कारमयी विमर्शशक्ति ही प्रत्यक्ष आदि में क्रमशः पश्यन्ती मध्यमा वैखरी रूप में समुल्लसित होती है—यह कहा गया । तो फिर यहाँ उद्देश आदि रूप में दूसरे क्रम जो कि अपने (= शैव) सिद्धान्त में अप्रसिद्ध है, का आसूत्रण क्यों किया गया ?-यह शङ्का कर कहते हैं जो पहले पश्यन्ती फिर मध्यमा और वैखरी (कही गयी) हैं (वे क्रमश:) परा, परापरा देवी है और अन्तिम (= वैखरी) तो अपरा है ।। २७१ ।। प्रश्न- केवल संख्या समान होने से उद्देश आदि तीन को पश्यन्ती आदि के समान निरूपित किया गया-यह क्या है ?-यह शङ्का कर कहते हैं वहीं इच्छा आदि तीन शक्तियाँ कही जाती हैं । और इन्हीं से अनुप्राणित होकर यह (लोक) व्यवहार चलता है ।। २७२ ।। समस्त यह शुद्ध-अशुद्ध व्यवहार संविद् भित्ति में ही अवभासित होता है-यह तात्पर्य है । वही कहा गया २२८ श्रीतन्त्रालोकः समलो विमलो वापि व्यवहारोऽनुभूयते ।।’ इति ।। २७२ ।। न केवलमेषाम् एवंरूपत्वं यावत् ‘परो महानन्तरालो दिव्यो मिश्रस्त्वदिव्यकः । संबन्धः षड्विधस्तन्त्रे …………………. ।।’ इत्यादिना उक्तस्य संबन्धस्यापि–इत्याह एतत्प्रश्नोत्तरात्मत्वे पारमेश्वरशासने । परसंबन्धरूपत्वमभिसंबन्धपञ्चके ॥ २७३ ॥ एते समनन्तरोक्ततत्त्वे ये प्रश्नोत्तरे ते आत्मा स्वरूपं यस्य तस्य भावस्तत्त्वं, तस्मिन्सति— इत्यर्थः । प्रष्ट्रतद्वक्त्रोरेव संबन्धो भवति इति भावः । संबन्धपञ्चके इति महदादिके । षष्ठो हि पर: संबन्धः सर्वेषामेव एषाम् अनुप्राणकत्वेन अनुवर्तते, इति पृथगिह नोक्तः ।। २७३ ।। एतच्च स्वोपज्ञमस्माभिर्नोक्तम्-इत्याह यथोक्तं रत्नमालायां सर्वः परकलात्मकः । महानवान्तरो दिव्यो मिश्रोऽन्योऽन्यस्तु पञ्चमः ।। २७४ ॥ ‘इस प्रकार अत्यन्त भिन्न विश्वावभास से चित्रित सर्वसमर्थ परमात्मा में ही निर्मल तथा मलिन व्यवहार उल्लसित होता है’ ।। २७३ ।। इनका केवल यही रूप नहीं है बल्कि ‘पर, महान्, अन्तराल, दिव्य, मिश्र (= दिव्यादिव्य) और अदिव्य ये छः प्रकार के सम्बन्ध तन्त्र में (प्रवृत्ति के कारण है) ।’ इत्यादि के द्वारा उक्त सम्बन्ध की भी (चर्चा) है-यह कहते हैं प्रश्नोत्तर रूप पाँच सम्बन्ध (महान् अन्तराल) दिव्य दिव्यादिव्य और अदिव्य वाले शिवद्वयशास्त्र में परसम्बन्धरूपता है (अर्थात् ये पाँचों सम्बन्ध पर सम्बन्ध से अनुप्राणित हैं) ।। २७३ ।। ये पूर्वोक्त तत्त्व वाले जो प्रश्नोत्तर वे आत्मा अर्थात् स्वरूप हैं जिसकी उसके रहने पर- यह अर्थ है । सम्बन्ध प्रश्नकर्ता और उत्तरदाता में ही होता है-यह भाव है । सम्बन्ध पञ्चक अर्थात् महत् (अन्तराल) आदि । छठाँ जो पर सम्बन्ध है वह इन पाँचों के अनुप्राणक के रूप में सबमें रहता है इसलिए यहाँ पृथक् रूप से नहीं कहा गया ।। २७३ ।। इसको हमने अपनी बुद्धि से नहीं कहा है-यह कहते हैं जैसा कि कुलरत्नमाला में कहा गया है कि महान्, अवान्तर, प्रथममाह्निकम् रत्नमालायाम् इति— श्रीकुलरत्नमालायाम्, उक्तम् इति—अर्थतो न तु शब्दतः । तत्र ‘अदृष्टं निर्गुणं यच्च हेयोपादेयवर्जितम् । तत्तत्त्वं सर्वतत्त्वानां प्रधानं परिपठ्यते ।। अदृष्टविग्रहश्चैव स शान्त इति गीयते । तस्येच्छा निर्गता शक्तिस्तद्धर्मगुणसंयुता ।।’ इत्यादिना पारमेश्वरी परा शक्तिरेव तत्तत्संबन्धात्मना प्रसृता इति सर्वस्यैव महदादे: संबन्धस्य परकलात्मकत्वमुक्तम् । अत एव च एतदेव ‘सृष्टिमार्गानुसारेण आयातश्चावनीतले ।। कथितो देवि षष्ठस्तु यथावेशस्वरूपतः ।।’ इत्यनेन उपसंहृतम् । मिश्र:- दिव्यादिव्यः । अन्योऽन्यः इति-दिव्यापेक्षया अन्यो मिश्रः, तस्मादन्योऽपि अदिव्यः इति । दिव्यदिव्यादिव्यअदिव्यात्मना त्रिधैव हि सम्भवति विकल्प: । अत एवायमत्र इतरेतरशब्देन उक्तः । तदुक्तम् ‘महानवान्तरो दिव्यो दिव्यादिव्यश्चतुर्थकः । दिव्य, मिश्र और अन्य (= अदिव्य) जो कि पाँचवाँ है, सब परकलात्मक हैं ।। २७४ ।। रत्नमाला… कुलरत्नमाला । कहा गया है-अर्थ से न कि शब्द से । वहाँ ‘जो अदृष्ट, निर्गुण तथा हेयोपादेयतारहित है वही तत्त्व तब तत्त्वों में प्रधान कहा जाता है । जिसका शरीर इष्ट नहीं है वह शान्त कहा जाता है । उसकी इच्छा ही उससे निर्गत शक्ति है जो कि उसके गुण एवं धर्म से युक्त है । इत्यादि कथन के द्वारा परमेश्वर की पराशक्ति ही तत्तत् सम्बन्ध के रूप में सर्वत्र फैली हुई है। इसलिये महत् आदि समस्त सम्बन्धों को परकलात्मक कहा गया । और इसीलिये इसी का ‘हे देवि ! सृष्टि के मार्ग से पृथ्वीतल पर आया हुआ यह तत्त्व आदेश और स्वरूप के अनुसार छठा तत्त्व कहा गया है।’ इसके द्वारा उपसंहार किया गया है। अन्योऽन्य = दिव्य की अपेक्षा, अन्य = मिश्र । उससे अन्य अदिव्य । दिव्य, दिव्यादिव्य और अदिव्य रूप से तीन ही प्रकार का विकल्प सम्भव है। इसीलिये यहाँ ‘इतरेतर’ शब्द से कहा गया । वही कहा गया ‘महान्’ अवान्तर, दिव्य, दिव्यादिव्य और इतरेतर सम्बन्धों के माध्यम से २३० श्रीतन्त्रालोकः इतरेतरमार्गेण पञ्चधा भिन्नलक्षण: ।।’ इति । एतच्च सम्बन्धपञ्चकं शिवात् सदाशिवस्य, तस्मात् अनन्तनाथस्य, तस्मात् श्रीकण्ठनन्दिकुमारादीनाम्, तेभ्योऽपि सनत्कुमारादीनामृषीणाम्, तेभ्योऽपि मनुष्यादीनां क्रमेण अवगन्तव्यम् । यदुक्तं तत्रैव ‘शिवस्य परिपूर्णस्य परस्यामिततेजसः । तच्छक्तिश्चैव सादाख्या स्वेच्छाकर्तृत्वगोचरा ।। सत्त्वं तेन च सम्प्राप्तं संबन्धं प्रथमं विदुः । अवान्तरश्च योगेन सादाख्यात्क्रमशः पुनः ।। प्राप्तोऽनन्तेशदेवेन द्वितीयस्तेन कीर्तितः। तृतीयस्तु पुनर्देवि श्रीकण्ठो नन्दिना सह ।। द्वाभ्यां देवात्तु मत्वैवं तेन दिव्यः प्रकीर्तितः । व्याख्यानक्रमयोगेन विद्यापीठप्रपूजने ।। शिष्याचार्यस्वरूपेण पञ्चमस्त्वितरेतरः । इति पञ्चप्रकारोऽयं संबन्धः परिकीर्तित: ।।’ इति ।। २७४ ।। परकलात्मत्वमेव व्याचष्टे भिन्नयोः प्रष्टुतद्वक्त्रोश्चैकात्म्यं यत्स उच्यते। विविधरूपों में (यह) पाँच प्रकार से अभिव्यक्त है” ____ यह सम्बन्ध शिव से सदाशिव, सदाशिव से अनन्तनाथ, उससे श्री कण्ठ नन्दिकुमार आदि, उनसे भी सनत्कुमार आदि ऋषियों, उनसे भी मनुष्यों में क्रम से आया । जैसा कि वहीं कहा गया ‘परात्पर, परिपूर्ण, परतेजस्वी शिव की शक्ति ही सदाशिव है । इसमें स्वेच्छाकर्तृत्व है । उस सदाशिव के द्वारा जो सत्त्व प्राप्त हुआ उसको (विद्वान् लोग) प्रथम सम्बन्ध मानते हैं । इसके योग से अवान्तर (सम्बन्ध) बने । पुन: सदाशिव से क्रमशः अनन्तनाथ ने प्राप्त किया । इस कारण यह द्वितीय (सम्बन्ध) कहा गया । हे देवि ! तीसरा (सम्बन्ध) श्रीकण्ठ और नंदी इन दो देवों के साथ हुआ । देव से सम्बद्ध होने के कारण यह दिव्य कहा गया । नन्दी ने संक्षेप में ऋषियों को बतलाया । इसलिये भगवान् ने इसे दिव्यादिव्य चौथा सम्बन्ध कहा । विद्यापीठ के पूजन में व्याख्यानक्रम के योग से शिष्य-आचार्य के रूप में यह पाँचवाँ सम्बन्ध इतरेतर रूप में (वर्णित) हआ । इस प्रकार सम्बन्ध पाँच प्रकार का कहा गया’ ।। २७४ ।। पर कलात्मक का सम्बन्ध की व्याख्या करते हैं प्रष्टा और उस (= प्रश्न) का उत्तर देने वाले दोनों भिन्न (व्यक्तियों) का जो तादात्म्य वही (परसम्बन्ध) कहलाता है ।। २७५- ।। है प्रथममाह्निकम् २३१ प्रष्टा यथा सदाशिवः, वक्ता यथा शिवः, तच्छब्देन प्रश्नक्रियापरामर्शः, तयोभिन्नत्वेऽपि तावत्यर्थे संविदाढ्बँकात्म्यात् संबन्धः, तस्य भेदाभेदरूपत्वात्, ऐकात्म्यभावे यदा भेदगन्धस्यापि विगलनात् सर्वात्मतालक्षणा पूर्णता स्यात् तदा पर: संबन्धः ।। तदाह संबन्धः परता चास्य पूर्णैकात्म्यप्रथामयी ॥ २७५ ॥ परता हि पूर्णैकात्म्यप्रथालक्षणा । पूर्णे हि सर्वमस्ति, सर्वत्र च पूर्णमस्ति इत्येतत् पञ्चस्वपि संबन्धेषु अस्ति इति युक्तमुक्तम्-‘सर्वः परकलात्मकः’ इति । तदुक्तम् ‘संबन्धः परमेशानि सर्वः परकलामयः । महानवान्तरो दिव्यो मिश्रोऽदिव्यश्च तत्परः ।।’ इति ।। २७५ ।। संबन्धान्तरेष्वपि एतदेवातिदिशति अनेनैव नयेन स्यात्संबन्धान्तरमप्यलम् । शास्त्रवाच्यं फलादीनां परिपूर्णत्वयोगतः॥ २७६ ॥ एतदेव सङ्कलयति प्रष्टा = जैसे कि सदाशिव । उत्तर देने वाला = जैसे कि शिव । तत शब्द से प्रश्नक्रिया का परामर्श होता है। उन दोनों (= सदाशिव और शिव) के भिन्न होने पर भी उतने अर्थों (= प्रश्नोत्तर के विषय) में संविद् के साथ तादात्म्य के दृढ़ होने से सम्बन्ध बनता है क्योंकि वह (= सम्बन्ध) भेदाभेद रूप होता है । ऐकात्म्य होने पर जब भेद की गन्धमात्र भी नष्ट होने से सर्वात्मतारूप पूर्णता होती है तब जो सम्बन्ध होता है वह पर होता है । वही कहते हैं ___ पूर्ण ऐकात्म्यमय होना ही इस (= परसम्बन्ध) की परता है ।। -२७५ ।। परता = पूर्ण ऐकात्म्य प्रसरण वाली । पूर्ण में सब कुछ है और सर्वत्र पूर्ण है और यह सब सम्बन्धों में है । इसलिये ठीक ही कहा गया कि ‘सब परकलात्मक है ।’ वही कहा गया _ ‘हे परमेश्वरी ! महान, अवान्तर, दिव्य, दिव्यादिव्य और अदिव्य सब सम्बन्ध परकलात्मक होता है’ ।। २७५ ।। दूसरे सम्बन्धों में भी इसी का अतिदेश करते हैं इसी नियम के अनुसार फल आदि की परिपूर्णता होने के कारण दूसरे सम्बन्ध भी शास्त्रों द्वारा कहे जाते हैं ।। २७६ ।। २३२ श्रीतन्त्रालोकः इत्थं संविदियं देवी स्वभावादेव सर्वदा।। उद्देशादित्रयप्राणा सर्वशास्त्रस्वरूपिणी ॥ २७७ ॥ इत्थम्-उक्तेन प्रकारेण, सर्वदा संविदेव इयं भगवती स्वस्वानन्त्र्यात् उद्देशादित्रयप्राणेन सर्वात्मना शास्त्रेण स्वरूपिणी । शास्त्रात्मना संविदेव अवभासते-इत्यर्थः ।। २७७ ।। तत्र उद्देशस्वरूपमेव तावदाह तत्रोच्यते पुरोद्देशः पूर्वजानुजभेदवान् । विज्ञानभिद्गतोपायः - परोपायस्तृतीयकः ।। २७८ ॥ शाक्तोपायो नरोपायः कालोपायोऽथ सप्तमः । चक्रोदयोऽथ देशाध्वा तत्त्वाध्वा तत्त्वभेदनम् ॥ २७९ ॥ कलाद्यध्वाध्वोपयोग: शक्तिपाततिरोहिती । दीक्षोपक्रमणं दीक्षा सामयी पौत्रिके विधौ ॥ २८० ॥ प्रमेयप्रक्रिया सूक्ष्मा दीक्षा सद्यःसमुत्क्रमः । तुलादीक्षाथ पारोक्षी लिङ्गोद्धारोऽभिषेचनम् ॥ २८१ ॥ अन्त्येष्टिः श्राद्धक्लप्तिश्च शेषवृत्तिनिरूपणम् । लिङ्गार्चा बहुभित्पर्वपवित्रादि निमित्तजम् ॥ २८२ ॥ इसी का उपसंहार करते हैं इस प्रकार यह संवित् देवी सर्वदा स्वभाव के कारण उद्देश आदि तीन तत्त्वों वाली समस्त शास्त्र के रूप मे (भासित होती है) ॥२७७।। इत्थम् = उक्त प्रकार से । यह भगवती संविद् ही सर्वदा अपने स्वातन्त्र्य के कारण उद्देश आदि तीन वाले शास्त्र के द्वारा अवभासित है ।। २७७ ।। उसमें उद्देश के स्वरूप को बतलाते हैं उन (= उद्देश, लक्षण परीक्षा) में से पूर्वज और अनुज भेद वाले उद्देश का कथन किया जाता है । विज्ञानभेदक (= शाम्भवोपाय, शाक्तोपाय, आणवोपाय), गतोपाय (= अनुपाय) तीसरा परोपाय (= शास्त्रोपाय), शाक्तोपाय, नरोपाय, (= आणवोपाय) कालोपाय सातवाँ, चक्रोदय, देशाध्वा, तत्त्वाध्वा, तत्त्वभेदन, कालाध्वा, देशाध्वा, शक्तिपात, तिरोधान, दीक्षोपक्रमण, पौत्रिकविधि में समयी दीक्षा, प्रमेय-प्रक्रिया, सूक्ष्मा दीक्षा, सद्यः समुत्क्रमण दीक्षा, तुलादीक्षा, परोक्ष दीक्षा, लिङ्गोद्धार, अभिषेक, अन्त्येष्टि, श्राद्धकल्पना, शेषवृत्तिनिरूपण, लिङ्गार्चा, निमित्तज, बभित् पर्वपवित्रादि, रहस्यचर्या, मन्त्रौघ, मण्डल, २३3 प्रथममाह्निकम् रहस्यचर्या मन्त्रौधो मण्डलं मुद्रिकाविधिः । एकीकारः स्वस्वरूपे प्रवेशः शास्त्रमेलनम् ॥ २८३ ।। आयातिकथनं शास्त्रोपादेयत्वनिरूपणम् । सामान्यसंज्ञया कीर्तनं पूर्वज उद्देशः, विशेषसंज्ञया कीर्तनम् अनुज उद्देशः, स एव च विभाग: इत्यन्यत्र उक्तः । तत्र पूर्वजमुद्देशमाह-विज्ञानभित् इत्यादिना निरूपणम् इत्यन्तम्, विज्ञानानि शाम्भवादीनि भिद्यन्ते यत्र इति । गतोपाय: इति–अनुपाय: । पौत्रिके विधौ इति पौत्रिक विधिमाश्रित्य । दीक्षा इति पूर्वेण संबन्ध: । प्रमेयप्रक्रिया इत्यर्थात् पौत्रिके विधौ इति योज्यम् । यद्वक्ष्यति ‘तदाह्निकानुजोद्देशे कथितं पौत्रिके विधौ ।’ इति ।। २७८-२८३ ।। किमेवमियता ग्रन्थेन उपनिबद्धेन ? इत्याशङ्कयाह इति सप्ताधिकामेनां त्रिंशतं यः सदा बुधः ॥ २८४ ।। आह्निकानां समभ्यस्येत् स साक्षाद्धैरवो भवेत् । सप्तत्रिंशत्सु सम्पूर्णबोधो यद्धैरवो भवेत् ॥ २८५ ॥ किं चित्रमणवोऽप्यस्य दृशा भैरवतामियुः । मुद्रिकाविधि, एकीकार, स्वस्वरूप में प्रवेश, शास्त्रमेलन, आयाति कथन, शास्त्रोपादेयत्वनिरूपण-(इतने विषयों की चर्चा इस ग्रन्थ में होगी है) ।। २७८-२८४- ।। ___सामान्य नाम का कथन पूर्वज उद्देश है । विशेष नाम का कथन अनुजोद्देश है । वही विभाग कहलाता है-यह अन्यत्र कहा गया है इनमें से ‘विज्ञानाभेद्…’ से लेकर ‘निरूपणम्’ पर्यन्त पूर्वज उद्देश को कहते हैं । विज्ञानभिद् का अर्थ है जिसमें शाम्भव आदि विज्ञानों का भेदकथन होता है । गतोपाय = अनुपाय । पौत्रिक विधि में = पौत्रिक विधि को आधार मानकर । प्रमेयप्रक्रिया पौत्रिक विधि में कही गयी है । जैसा कि कहेंगे ____‘अनुजोद्देश के आह्निक के पौत्रिकविधि प्रकरण में वह (= प्रमेयप्रक्रिया) कही गयी है’ ।। २७८-२८३ ।। इतने बड़े ग्रन्थ की रचना से क्या लाभ?-यह शङ्का… ___ जो विद्वान् इन सैंतीस आह्निकों का सम्यक् अभ्यास करता है वह साक्षात् भैरव हो जाता है ।। -२८४, २८५- ।। ___ सैंतीस आह्निकों के विषय में पूर्णज्ञान रखने वाला यदि भैरव हो जाता है तो इसमें आश्चर्य क्या? अणु भी इसके ज्ञान के द्वारा भैरवत्व २३४ श्रीतन्त्रालोकः इत्येष पूर्वजोद्देशः कथ्यते त्वनुजोऽधुना ॥ २८६ ॥ विज्ञानभित्प्रकरणे सर्वस्योद्देशनं क्रमात् । द्वितीयस्मिन्प्रकरणे गतोपायत्वभेदिता ॥ २८७ ॥ विश्वचित्प्रतिबिम्बत्वं परामर्शोदयक्रमः । मन्त्राद्यभिन्नरूपत्वं परोपाये विविच्यते ॥ २८८ ॥ विकल्पसंस्क्रिया तर्कतत्त्वं गुरुसतत्त्वकम् । योगाङ्गानुपयोगित्वं कल्पिता धनादरः ।। २८९ ॥ संविच्चक्रोदयो मन्त्रवीर्यं जप्यादि वास्तवम् । निषेधविधितुल्यत्वं शाक्तोपायेऽत्र चर्च्यते ॥ २९० ॥ बुद्धिध्यानं प्राणतत्त्वसमुच्चारश्चिदात्मता । उच्चारः परतत्त्वान्तःप्रवेशपथलक्षणम् ॥ २९१ ॥ करणं वर्णतत्त्वं चेत्याणवे तु निरूप्यते । चारमानमहोरात्रसंक्रान्त्यादिविकल्पनम् ॥ २९२ ॥ संहारचित्रता वर्णोदयः कालाध्वकल्पने । चक्रभिन्मन्त्रविद्याभिदेतच्चक्रोदये भवेत् ॥ २९३ ॥ को प्राप्त हुए ।। -२८५, २८६- ।। यह पूर्वज उद्देश (= सामान्यात्मना कथन) है । अब अनुजोद्देश का कथन किया जाता है ।। -२८६ ।। विज्ञानभित् प्रकरण में सब (विषयों) का क्रमिक नामोच्चारण है । दूसरे प्रकरण में गतोपाय का भेद वार्णित है ।। २८७ ।। परोपाय में विश्व की चित्प्रतिबिम्बता, परामर्शोदय, क्रममन्त्र आदि की (परासंवित् से) अभिन्नरूपता का विवेचन किया जाएगा ।। २८८ ।। शाक्तोपाय में विकल्पों के संस्कार, तर्कतत्त्व, गुरुतत्त्व योगाङ्गों की अनुपयोगिता, कल्पित अर्चादि का अनादर, संवित्चक्र का उदय, मन्त्रवीर्य, वास्तविक जप्य आदि, निषेध और विधि की तुल्यता की चर्चा होगी ।। २८९-२९० ।। आणवोपाय (नामक आह्निक) में बुद्धि, ध्यान, प्राणतत्त्व का समुच्चार, चिदात्मता, उच्चार, परतत्त्वान्तः प्रवेशपथलक्षण, करण और वर्णतत्त्व का निरूपण किया जाएगा ।। २९१, २९२- ।। कालाध्व प्रकरण में चारमान, अहोरात्रसंक्रान्ति आदि की कल्पना, संहारचित्रता और वर्णोदय (का निर्वचन होगा) ।। -२९२, २९३- ।।प्रथममाह्निकम् परिमाणं पुराणां च संग्रहस्तत्त्वयोजनम् । एतद्देशाध्वनिर्देशे द्वयं तत्त्वाध्वनिर्णये ॥ २९४ ।। कार्यकारणभावश्च तत्त्वक्रमनिरूपणम् । वस्तुधर्मस्तत्त्वविधिर्जाग्रदादिनिरूपणम् ॥२९५ ॥ प्रमातृभेद इत्येतत् तत्त्वभेदे विचार्यते । कलास्वरूपमेकत्रिपञ्चाद्यैस्तत्त्वकल्पनम् ॥२९६ ॥ वर्णभेदक्रमः सर्वाधारशक्तिनिरूपणम् । कलाद्यध्वविचारान्तरेतावत्प्रविविच्यते ॥२९७ ॥ अभेदभावनाकम्पहासौ त्वध्वोपयोजने । संख्याधिक्यं मलादीनां तत्त्वं शक्तिविचित्रता ॥ २९८ ॥ अनपेक्षित्वसिद्धिश्च तिरोभावविचित्रता । शक्तिपातपरीक्षायामेतावान्वाच्यसंग्रहः ॥२९९ ॥ तिरोभावव्यपगमो ज्ञानेन परिपूर्णता । उत्क्रान्त्यनुपयोगित्वं दीक्षोपक्रमणे स्थितम् ॥ ३०० ॥ शिष्यौचित्यपरीक्षादौ स्थानभित्स्थानकल्पनम्। चक्रभेद, मन्त्रविद्याभेद-ये (विषय) चक्रोदय में (वर्णित) होंगे ।। -२९३ ।। ___पुरों का परिमाण, संग्रह, तत्त्वयोजन ये देशाध्वनिर्णय में विवेचित होंगे । ____ तत्त्वाध्वनिर्णय में कार्यकारण भाव, तत्त्वक्रमनिरूपण इन दो का निरूपण होगा । वस्तुधर्म, तत्त्वविधि, जाग्रत् आदि का निरूपण, प्रमातृभेद इन (सबका) विचार होगा ।। २९४, २९६- ।। कलाद्यध्वविचार में कलास्वरूप, एक तीन, पाँच आदि (भेदों से) तत्त्व की कल्पना, वर्णभेदक्रम, सर्वाधारशक्ति, के निरूपण का विवेचन होगा ।। -२९६, २९७ ।। अध्वोयपयोग में अभेदभावना तथा कम्पह्नास का तथा शक्तिपात परीक्षा में मल आदि का संख्याधिक्य. तत्त्वशक्तिविचित्रता. अनपेक्षित्व सिद्ध, तिरोभावविचित्रता (इन विषयों का संग्रह है) ।। २९८-२९९ ।। ___तिरोभाव का अपगम, ज्ञान के द्वारा परिपूर्णता, उत्क्रान्ति की अनुपयोगिता ये विषय दीक्षोपक्रम (नामक आह्निक) में स्थित है ।। ३०० ।। २३६ श्रीतन्त्रालोकः सामान्यन्यासभेदोऽर्घपात्रं चैतत्प्रयोजनम् ॥ ३०१ ॥ द्रव्ययोग्यत्वमर्चा च बहिारार्चनं क्रमात् । प्रवेशो दिक्स्वरूपं च देहप्राणादिशोधनम् ॥ ३०२॥ विशेषन्यासवैचित्र्यं सविशेषार्घभाजनम् । देहपूजा प्राणबुद्धिचित्स्वध्वन्यासपूजने ॥ ३०३ ।। अन्यशास्त्रगणोत्कर्षः पूजा चक्रस्य सर्वतः । क्षेत्रग्रहः पञ्चगव्यं पूजनं भूगणेशयोः ॥ ३०४ ॥ अस्त्रार्चा वह्निकार्यं चाप्यधिवासनमग्निगम् । तर्पणं चरुसंसिद्धिर्दन्तकाष्ठान्तसंस्क्रिया ॥ ३०५ ॥ शिवहस्तविधिश्चापि शय्याक्लप्तिविचारणम् । स्वप्नस्य सामयं कर्म समयाश्चेति संग्रहः ।। ३०६ ॥ समयित्वविधावस्मिन्स्यात्पञ्चदश आह्निके। मण्डलात्मानुसन्धानं निवेद्यपशुविस्तरः ॥ ३०७ ॥ अग्नितृप्तिः स्वस्वभावदीपनं शिष्यदेहगः । अध्वन्यासविधिः शोध्यशोधकादिविचित्रता ॥३०८ ।। दीक्षाभेदः परो न्यासो मन्त्रसत्ताप्रयोजनम् । भेदो योजनिकादेश्च षोडशे स्यादिहाह्निके ॥ ३०९ ॥ सूत्रक्लृप्तिस्तत्त्वशुद्धिः पाशदाहोऽथ योजनम् । शिष्यौचित्यपरीक्षा आदि में स्थानभेद, स्थानकल्पना, सामान्य न्यासभेद, अर्घपात्र और उसका प्रयोजन, द्रव्ययोग्यता, अर्चा, बहिरार्चन क्रमश: मण्डपप्रवेश, दिक्स्वरूप, देहप्राण आदि का शोधन, विशेषन्यासवैचित्र्य, सविशेष अर्घपात्र, देहपूजा, प्राण बुद्धि चित् में अध्वन्यास तथा पूजन, अन्य शास्त्रसमूह का उत्कर्ष, चक्रपूजा, क्षेत्रग्रह, पञ्चगव्य, भूमि और गणेश का पूजन, अस्त्रपूजन, वह्निकार्य, अग्निसम्बन्धी अधिवासन, तर्पण, चरुसिद्धि, दन्तकाष्ठ, अन्तसंस्कार, शिवहस्तविधि, स्वप्नशय्याक्लूप्तिविचार, समयी कर्म, और समय ये पन्द्रहवें आह्निक में समयीविधि में (वर्णित) होंगे ।। ३०१-३०७- ।। सोलहवें आह्निक में मण्डलात्मानुसन्धान, निवेद्यपशु का विस्तार, अग्नितृप्ति, स्वस्वभावदीपन, शिष्यदेह में वर्तमान् अध्वन्यास की विधि, शोध्य शोधक आदि की विचित्रता, दीक्षाभेद, परन्यास, मन्त्रसत्ताप्रयोजन भेद और योजनिका दीक्षा आदि का भेद वर्णित होगा ।। -३०७-३०९।। पौत्रिक विधि में सूत्रक्लूप्ति, तत्त्वशुद्धि, पाशदाह, योजन और प्रथममाह्निकम् २३७ अध्वभेदस्तथेत्येवं कथितं पौत्रिके विधौ ॥ ३१० ॥ जननादिविहीनत्वं मन्त्रभेदोऽथ सुस्फुटः । इति संक्षिप्तदीक्षाख्ये स्यादष्टादश आह्निके ।। ३११ ॥ कलावेक्षा कृपाण्यादिन्यासश्चारः शरीरगः । ब्रह्मविद्याविधिश्चैवमुक्तं सद्यःसमुत्क्रमे ॥ ३१२ ।। अधिकारपरीक्षान्तः संस्कारोऽथ तुलाविधिः । इत्येतद्वाच्यसर्वस्वं स्यादिशतितमाह्निके ॥ ३१३ ॥ मृतजीवद्विधिर्जालोपदेशः संस्क्रियागणः । बलाबलविचारश्चेत्येकविंशाह्निके विधिः ॥ ३१४॥ श्रवणं चाभ्यनुज्ञानं शोधनं पातकच्युतिः । शङ्काच्छेद इति स्पष्टं वाच्यं लिङ्गोधृतिक्रमे ॥ ३१५ ॥ परीक्षाचार्यकरणं तद्वतं हरणं मतेः । तद्विभागः साधकत्वमभिषेकविधौ त्वियत् ॥ ३१६ ॥ अधिकार्यथ संस्कारस्तत्प्रयोजनमित्यदः । चतुर्विशेऽन्त्ययागाख्ये वक्तव्यं परिचर्च्यते ॥ ३१७ ॥ अध्वभेद, कहा गया है ।। ३१० ।। संक्षिप्त दीक्षा नामक अट्ठारहवें आह्निक में जननादिहीनता और स्फुट मन्त्रभेद (कहे गए हैं) ।। ३११ ।। सद्यः समुत्क्रमण में कलावेक्षा, कृपाण आदि न्यास शरीराचार और ब्रम्हविद्या विधि कही गई है ।। ३१२ ।। बीसवें आह्निक में आधिकारपरीक्षा, अन्त:संस्कार, तुलाविधि ये प्रतिपाद्य हैं ।। ३१३ ।। इक्कीसवें आह्निक में मृतजीवविधि, जालोपदेश, संस्कारसमूह, बलाबल विचार विधि है ।। ३१४ ।। लिङ्गोद्वारक्रम में, श्रवण, अभ्यनुज्ञा, शोधन, पातकच्युति, शङ्काच्छेद ये स्पष्टतया वाच्य हैं ।। ३१५ ।। अभिषेकविधि में परीक्षा, आचार्यकरण, उसका व्रत, मतिहरण और उसका विभागसाधकत्व (विषय वर्णित है) ।। ३१६ ।। अन्त्ययाग नामक चौबीसवें आह्निक में अधिकारी, संस्कार और संस्कार का प्रयोजन कथनीय है ।। ३१७ ।। २३८ श्रीतन्त्रालोकः प्रयोजनं भोगमोक्षदानेनात्र विधिः स्फुटः । पञ्चविंशाह्निके श्राद्धप्रकाशे वस्तुसंग्रहः ॥ ३१८ ॥ प्रयोजनं शेषवृत्तेर्नित्यार्चा स्थण्डिले परा । लिङ्गस्वरूपं बहुधा चाक्षसूत्रनिरूपणम् ॥ ३१९ ।। पूजाभेद इति वाच्यं लिङ्गार्चासम्प्रकाशने । नैमित्तिकविभागस्तत्प्रयोजनविधिस्ततः ॥३२० ॥ पर्वभेदास्तद्विशेषश्चक्रचर्चा तदर्चनम् । गुर्वाद्यन्तदिनाद्यर्चाप्रयोजननिरूपणम् ॥३२१ ॥ मृतेः परीक्षा योगीशीमेलकादिविधिस्तथा । व्याख्याविधिः श्रुतविधिर्गुरुपूजाविधिस्त्वियत्॥ ३२२ ॥ नैमित्तिकप्रकाशाख्येऽप्यष्टाविंशाह्निके स्थितम् । अधिकार्यात्मनो भेदः सिद्धपत्नीकुलक्रमः॥ ३२३ ॥ अर्चाविधिदौतविधी रहस्योपनिषत्क्रमः । दीक्षाभिषेकौ बोधश्चेत्येकोनत्रिंश आह्निके ॥ ३२४ ॥ मन्त्रस्वरूपं तद्वीर्यमिति त्रिंशे निरूपितम् । शूलाब्जभेदो व्योमेशस्वस्तिकादिनिरूपणम् ॥ ३२५ ॥ श्राद्धप्रकाश नाम पचीसवें आह्निक में भोग मोक्ष दान और प्रयोजन विषयों का संग्रह है ।। ३१८ ।। शेषवर्तन का प्रयोजन नित्यविधि स्थण्डिल परा पूजा (वर्णित है) तथा लिङ्गार्चा प्रकाशन में लिङ्गस्वरूप, अक्षसूत्रनिरूपण और पूजाभेद वाच्य है ।। ३१९ ।। पर्वभेद, उससे सम्बद्ध चक्रचर्चा, उस (= चक्र) का अर्चन, गुरु आदि की अन्तिम दिन आदि की पूजा के प्रयोजन का निरूपण, मृत्युपरीक्षा, योगीशीमेलक आदि विधि, व्याख्याविधि, श्रुतविधि, गुरूपूजा विधि इतना नैमित्तिक प्रकाश नाम अट्ठाईसवें आह्निक में स्थित है ।। ३२०-३२३- ।। अधिकारी, भेद, सिद्धपत्नी, कुलक्रम, अर्चाविधि, दौतविधि, रहस्योपनिषत्चर्चा, दीक्षा, अभिषेक और बोध-ये विषय उन्तीसवें आह्निक में है ।। -३२३, ३२४ ।। मन्त्रस्वरूप और उसका वीर्य तीसवें में निरूपित है ।। -३२४ ।। शूलाब्जभेद, व्योमेश, स्वस्तिक आदि निरूपण का विस्तार पूर्वक प्रथममाह्निकम् २३९ विस्तरेणाभिधातव्यमित्येकत्रिंश आह्निके । गुणप्रधानताभेदाः स्वरूपं वीर्यचर्चनम् ॥ ३२६ ।। कलाभेद इति प्रोक्तं मुद्राणां सम्प्रकाशने । इत्यादि न केवलमेवं यावत् अन्यदपि अस्य माहात्म्यं स्यात्-इत्याह ‘इति सप्ताधिकां, सम्प्रकाशने’ इत्यन्तम् । इह ग्रन्थकृता तत्त्वतः समस्तव्यस्तत्वेन सप्तत्रिंशदाह्निकानि उपनिबद्धानि इति । यथा पृथ्वीतत्त्वे भेदस्य प्राधान्यात् स्थूलेन रूपेण सर्वमस्ति, तथा इहापि वक्ष्यमाणम्-इत्युक्तम्- ‘सर्वस्योद्देशनं क्रमात्’ इति । परोपाये इति— शाम्भवोपाये, अस्य च अविकल्पकमेव रूपम् इत्युक्तप्रायं तच्च भेदाभावे सति भवेत्, स च वाच्यवाचकात्मनो विश्वस्य संविदेकरूपत्वे सति स्यात्, तत्र वाच्यात्मनो विश्वस्य चित्प्रतिबिम्बत्वेन सामान्यविशेषात्मतया द्विविधस्य, वाचकात्मनो विश्वस्य च परामर्शोदयक्रममन्त्राद्यभिन्नरूपत्वाभ्यां संविदनतिरेकात् तदेकरूपत्वमुच्यते इत्यत्र एतत्प्रमेयत्रयोपक्षेपः । शाक्तस्य च विकल्पकमेव रूपम् इति प्रथमं विकल्पस्यैव संस्कार उक्त:, स च हेयाद्यालोचनद्वारेण तर्केण अभिधीयते इति तदनन्तरं तत्तत्त्वम् । अन्यच्च शुद्धविद्यात्मनस्तर्कस्यैव विस्फूर्जितं यत् तद्वशादेव सद्गुरुप्राप्तिर्भवेत् इति तत्सतत्त्वमुक्तम् । तर्क एव च साक्षाद्योगस्याङ्गम् इति अन्येषां योगाङ्गानामनुप इकतीसवें आह्निक में कथन होगा ।। -३२५, ३२६- ।। गुणप्रधानताभेद, उनके स्वरूप वीर्य की चर्चा, कलाभेद-ये मुद्राप्रकाश (= मुद्रिकाविधि) में कहे गए हैं ।। -३२६, ३२७- ।। केवल इतना ही नहीं इसका अन्य भी महत्त्व है-इस बात को ‘इति सप्ताधिकां… से लेकर संप्रकाशने’ यहाँ तक कहा है । यहाँ ग्रन्थकार ने यथार्थतः समस्त व्यस्त रूप से ३७ आह्निकों का उपनिबन्धन किया है । जैसे पृथ्वीतत्त्व में भेद के प्राधान्य के कारण सब स्थूल रूप से है । उसी प्रकार यहाँ भी वक्ष्यमाण है । इसलिये कहा गया-सब का क्रम से उद्देशन है । परोपाय में = शाम्भवोपाय में । (परोपाय) वाच्यवाचक स्वरूप इस विश्व की संविद् के साथ एकरूपता होने पर होता है । इसमें वाच्यरूप विश्व के चित् में प्रतिबिम्बित होने पर सामान्य एवं विशेष इन दो रूपों वाले तथा वाचकात्मक विश्व का परामोदय क्रम एवं मन्त्र आदि से अभिन्न रूप होने से संविद् से अभिन्न होने के कारण उस (= संविद्) के साथ एकरूपता कही जाती है । यहाँ तीनों प्रमेयों (= सामान्य एवं विशेषरूप वाच्य तथा वाचक) का उपक्षेप होता है । शाक्तोपाय का रूप विकल्पक होता है । इसलिये पहले विकल्प का ही संस्कार कहा गया और वह (= संस्कार) हेय आदि के आलोचन वाले तर्क के द्वारा कहा जाता है । इसलिये उसके (= संस्कार के) बाद तर्क का कथन है । और भी शुद्धविद्यारूप सत्तर्क का ही यह चमत्कार है कि उसके कारण सद्गुरु की प्राप्ति होती है । इसलिये उस (= २४० श्रीतन्त्रालोकः योगित्वम् तर्कस्य च शुद्धविद्यात्मतया भेदभावकमायीयविकल्पप्रतिघातित्वात् कल्पितस्य अर्चादेरनादरः तत एवाविकल्पसंस्कारस्य दाात् संविच्चक्रोदय:, तदुदय एव च मन्त्राणां परं वीर्यम्, तथामर्श एव च वास्तवं जप्यादि, अत एव च संविदि भेदाभावात् निषेधविधितुल्यत्वम् इत्येतन्नवसंख्याकं प्रमेयमुपक्षिप्तम् । एवमाणवादावपि बुद्धिध्यानादेः साक्षात्तदौपयिकत्वम् इत्येतदस्माभिः स्पष्टत्वात् ग्रन्थविस्तरभयात् अग्रे च निणेष्यमाणत्वात् न प्रातिपद्येन व्याख्यातम् इति स्वयमेव अवधार्यम् ।। २८४-३२६ ।। ननु एकीकाराह्निकादौ किमिति न अनुजोद्देशः कृतः ? इत्याशङ्कयाह द्वात्रिंशतत्त्वादीशाख्यात्प्रभृति प्रस्फुटो यतः ॥ ३२७ ॥ न भेदोऽस्ति ततो नोक्तमुद्देशान्तरमत्र तत् । द्वात्रिंशं तत्त्वं स्वरूपं यस्य तन्मुद्राह्निकं तस्मात् द्वात्रिंशसंख्यादनन्तरं यत् ईशाख्यं त्रयस्त्रिंशमेकीकाराह्निकं तत आरभ्य भेदस्य प्राधान्याभावात अनज उद्देशो न कृतः-इत्यर्थः ।। ३२७ ।। सद्गुरु) का निर्वचन हआ। तर्क ही साक्षात् योग का अङ्ग है । इसलिये अन्य योगाङ्ग अनुपयोगी है । तर्क शुद्धविद्यास्वरूप है इसलिये भेद को उत्पन्न करने वाले मायीय विकल्पों का प्रतिघातक होने से कल्पित अर्चा आदि का आदर नहीं है । इस कारण निर्विकल्पक संस्कार के दृढ़ होने से संवित् चक्रों का उदय होता है । उसका उदय होने पर ही मन्त्रों का परमवीर्य (स्फुरित होता) है । उस प्रकार (वीर्य-सम्पन्न मन्त्रों का) आमर्श ही वास्तविक जप है । इसीलिये संविद् में भेदाभाव होने के कारण निषेध एवं विधि की तुल्यता रूप नव संख्या वाला प्रमेय कहा गया । इसी प्रकार आणवोपाय आदि में भी बुद्धि ध्यान आदि साक्षात् उसके उपाय है-यह बात स्पष्ट होने से, ग्रन्थ के विस्तार के भय से तथा आगे चलकर निर्णय होने से हमने इसका प्रतिपद व्याख्यान नहीं किया । इसे स्वयं समझ लेना चाहिये ।। २८४-३२६ ।। एकीकार आह्निक आदि में अनुजोद्देश क्यों नहीं किया गया? – यह शङ्का कर कहते है चूँकि बत्तीस तत्त्वों वाले ईश (= एकीकार) नामक तैतीसवें आह्निक से लेकर स्पष्टतया कोई भेद नहीं है, इसलिए यहाँ (तैतीसवें आह्निक में) अनुजोद्देश नहीं किया गया है ।। -३२७, ३२८- ।। बत्तीसवाँ तत्त्व = स्वरूप है जिसका वह मुद्रा आह्निक है । इस कारण बत्तीस संख्या के अनन्तर जो ईश नामक तैतीसवाँ एकीकार आह्निक है वहाँ से लेकर भेद का प्राधान्य न होने से अनुजोद्देश नहीं किया गया ।। ३२७ ।। २४१ प्रथममाह्निकम् ननु यद्यत: प्रभृति भेदो नास्ति तत्किमिति आह्निकान्तरपरिगणनमेव कृतम्? इत्याशङ्कयाह मुख्यत्वेन च वेद्यत्वादधिकारान्तरक्रमः ॥ ३२८ ॥ एतदुपसंहरन्नन्यदवतारयति इत्युद्देशविधिः प्रोक्तः सुखसंग्रहहेतवे । अथास्य लक्षणावेक्षे निरूप्येते यथाक्रमम् ॥ ३२९ ॥ अस्य इति–उद्दिष्टस्य प्रमेयजातस्य ।। ३२९ ।। इदानीमाह्निकार्थमेव संचिनोति आत्मा संवित्प्रकाशस्थितिरनवयवा संविदित्यात्तशक्ति व्रातं तस्य स्वरूपं स च निजमहसश्छादनाद् बद्धरूपः । आत्मज्योतिःस्वभावप्रकटनविधिना तस्य मोक्षः स चायं चित्राकारस्य चित्रः प्रकटित इह यत्संग्रहेणार्थ एषः ॥ ३३० ॥ इह आत्मनस्तावत् धामत्रयीबाह्यप्रकाशविलक्षण: संविद्रूप एव प्रकाश: यदि इसके बाद भेद नहीं है तो दूसरे आह्निकों की गणना ही क्यों की गयी?—यह शङ्का कर कहते हैं चूँकि अग्रिम आह्निकों के विषय मुख्यरूप से वेद्य हैं इसलिए आह्निक-भेद किए गए ।। -३२८ ।। इसका उपसंहार का दूसरे की प्रस्तावना करते हैं इस प्रकार सुखसंग्रह के लिए उद्देश विधि कही गई, इसके बाद लक्षण और परीक्षा क्रमश: निरूपित किए जाएँगें ।। ३२९ ।। इसका = उद्दिष्ट प्रमेयसमूह का ।। ३२९ ।। अब सम्पूर्ण आह्निक का संक्षेप बतलाते हैं आत्मा संविद् प्रकाश स्वरूप हैं । संवित् निरवयव अखण्ड है । क्रोडीकृत अनन्तशक्तियों का समूह उस (= आत्मा) का स्वरूप है और वह अपने महस् (= स्वरूप, तेज) का गोपन करने के कारण बद्ध है। अपने ज्योति:स्वभाव के प्रकटनविधि के द्वारा उसका मोक्ष होता है | और वह (= मोक्ष चित्राकार = विचित्रस्वभाव) वाले का विचित्र प्राकट्य है । इसलिए यहाँ (= इस आह्निक में) संक्षेप में यह विषय प्रकटित किया गया है ।। ३३० ।। तीन धाम (= ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय अथवा इच्छा ज्ञान क्रिया) वाला, बाह्य प्रकाश १६ त प्र २४२ श्रीतन्त्रालोकः स्वरूपम्, संविच्च निरवयवा इति एक एव अखण्डप्रकाशरूपः इति यावत् । अत एव च ‘शक्तिश्च नाम भावस्य स्वं रूपं मातृकल्पितम् ।’ इत्याधुक्तयुक्त्या तस्य आत्मनः क्रोडीकृतानन्तशक्तिकं स्वरूपम्, एवमद्वयात्मत्वेऽपि स एव अतिदुर्घटकारित्वलक्षणात् स्वस्वातन्त्र्यात्, निजस्य - अनन्यसाधारणस्य ज्ञत्वकृत्वलक्षणस्य, महसो गोपनात् ग्राह्यग्राहकात्मकं द्वन्द्वमाभासयन् । …………………..शिव एव गृहीतपशुभावः ।’ इत्याधुक्तयुक्त्या ‘बद्धः’ इत्युच्यते, एवमपि तस्य आत्मनः प्रत्यावृत्त्या ‘मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूपप्रथनं हि सः । स्वरूप चात्मनः सवित् ………………….. ।।’ इत्याधुक्तयुक्त्या ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणस्य स्वमहस एव प्रथनं मोक्षः, यदर्थमेव च तत्तदनन्तशास्त्रात्मक इयान् परिकरः । तदाह ‘स चायम्’ इत्यादि, स चायं मोक्ष:-तत्तद्गृहीताधरदर्शनभूमिकस्य अस्य ‘रागाद्यकलुषोऽस्म्यन्तः शून्योऽहं कर्तृतोज्झितः ।’ से विलक्षण संविद रूप प्रकाश ही आत्मा का स्वरूप है । और संवित निरवयव होने के कारण एक एवं अखण्डप्रकाशरूप है इसीलिये ‘भाव का प्रमाता के द्वारा कल्पित अपना रूप ही शक्ति है ।’ इत्यादि उक्त यक्ति के अनसार उस = आत्मा का स्वरूप अपने भीतर अनन्त शक्ति छिपाये रखता है । अद्वयरूप होने पर भी वह अतिदुर्घटकारित्वरूप अपने स्वातन्त्र्यवश अपने = अनन्य साधारण, सत्वकर्तृत्वलक्षण वाले तेज को छिपाकर ग्राह्यग्राहक रूप द्वन्द्व को आभासित करता है। ‘…शिव ही पशुभाव का ग्रहण कर (बद्ध होता है)। इत्यादि उक्त युक्ति से बद्ध कहा जाता है । इस प्रकार उस आत्मा की प्रत्यावृत्ति के द्वारा ‘मोक्ष कोई दूसरी चीज नहीं है । वह स्वरूप का विस्तार है । और स्वरूप अपनी संवित् ही है ।’ इत्यादि उक्त युक्ति से ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षण अपने तेज का विस्तार ही मोक्ष है। इसी के लिये भिन्न-भिन्न अनन्त शास्त्रों का इतना बड़ा समूह है । ‘स चायम्’ इत्यादि से वही कहते हैं । वह यह = मोक्ष । नीचे की तत्तद् दर्शन भूमियों का ग्रहण करने वाले इसको अर्थात् २४३ प्रथममाह्निकम् इत्याधुक्तयुक्त्या चित्रस्वभावस्य, यद्वा ‘तेनाजडस्य भागस्य पुद्गलाण्वादिसंज्ञिनः । अनावरणभागांशे वैचित्र्यं बहुधा स्थितम् ।।’ इत्यादिनीत्या चित्राकारस्य ‘अत: कंचित्प्रमातारं प्रति प्रथयते प्रभुः । पूर्णमेव निजं रूपं कंचिदंशांशिकाक्रमात् ।।’ इत्याधुक्त्या चित्र:-शाम्भवाद्यावेशात्मा प्रकटितः, इह इति—अस्मि नाह्निके । ययो:-बन्धमोक्षयोः संग्रहण-संक्षेपेण एषोऽर्थः प्रकटित: इत्यनेनैव सम्बन्धः ।। ३३० ।। ननु आत्मन: स्वरूपप्रथनमेव ‘मोक्षः’ इत्युक्तम्, आत्मा चैक एव अखण्ड: इति तत्प्रथात्मनो मोक्षस्यापि वैचित्र्यं कुतस्त्यम् ? इत्याशङ्कयाह मिथ्याज्ञानं तिमिरमसमान दृष्टिदोषान्प्रसूते तत्सद्भावाद्विमलमपि तद्भाति मालिन्यधाम । यत्तु प्रेक्ष्यं दृशि परिगतं तैमिरी दोषमुद्रां दूरं रुन्द्रेत्प्रभवतु कथं तत्र मालिन्यशङ्का ॥ ३३१ ॥ ‘राग आदि कलुष से रहित कर्तृता का त्याग करने वाला मैं भीतर से शून्य हो गया हूँ।’ इत्यादि उक्त युक्ति के अनुसार विचित्र स्वभाव वाले को, अथवा ‘अत: पुद्गल अणु आदि नाम वाले अजड़ भाग के अनावरण भागवाले अंश में वैचित्र्य अनेक प्रकार से स्थित है।’ इत्यादि नीति से विचित्र आकार वाले को, ‘इसलिये किसी प्रमाता के प्रति भगवान् अपने पूर्ण स्वरूप को प्रकट करते हैं, किसी के प्रति अंशांशिका के क्रम से ।’ इत्यादि उक्ति के द्वारा चित्र = शाम्भव आदि आवेश वाला रूप प्रकट करते हैं। यहाँ = इस आह्निक में । जिन दोनों का = बन्ध और मोक्ष का, संग्रहेण = संक्षेप में यह अर्थ प्रकट किया गया ।। ३३० ॥ आत्मा के स्वरूप का विस्तार ही मोक्ष है-यह कहा गया । आत्मा एक और अखण्ड है फिर उसके विस्तार रूप मोक्ष का वैचित्र्य कहाँ से आ गया ? यह शङ्का……… मिथ्याज्ञान रूप अन्धकार भेदरूपी दृष्टिदोष को उत्पन्न करता है । उसके रहने से निर्मल पूर्ण भी वह (= आत्मा) मलिनता (= २४४ श्रीतन्त्रालोकः तिमिरम्-आणवमलमेव मिथ्याज्ञानम् भेदप्रथात्मकम् अपूर्ण वेदनम्, दृष्टे: पूर्णाया: संवित्तेः, असमान्-आत्मनि अनात्माभिमानादिरूपान् दोषान् जनयति इति मिथ्याज्ञानसद्भावात् विमलम् पूर्णमपि तत् ज्ञानं मालिन्यधाम भाति स्वस्वातन्त्र्यादपूर्णेन आत्मना परिस्फुरति इत्येतावानर्थः इति व्यवह्रियते यत् पुनरुपेयत्वेन प्रेक्षणीयम्-अवश्यज्ञातव्यं परप्रमात्रेकात्म पूर्ण ज्ञानं नाहं प्राणो नैव शरीरं न मनोऽहं नाहं बुद्धिर्नाहमहङ्कारधियौ च । योऽत्र ज्ञांश: सोऽस्म्यहमेव… ………. ।। इत्यादिनीत्या उद्वेष्टनक्रमेण विमर्शपदवीमारूढं सत् मिथ्याज्ञानसमुत्थाम् अनात्मनि आत्माभिमानरूपां दोषमुद्रां दूरं रुन्ध्येत्-आत्मन्येव आत्माभिमानेन तिरस्कुर्यात्, तत्र का नाम मालिन्यशङ्का तत्र सम्भावनापि न भवेत् इति वस्तुवृत्तेन बन्धो मोक्षो वापि न नाम कश्चिदस्ति इति का नाम तत्र वैचित्र्यसम्भावना स्यात् । अनेन चाभिप्रायेण ‘संसारोऽस्ति न तत्त्वतस्तनुभृतां बन्धस्य वार्तेव का । बन्धो यस्य न जातु तस्य वितथा मुक्तस्य मुक्तिक्रिया ।। अपूर्णता) का आस्पद भासित होता है । यदि प्रेक्ष्य (= अवश्यज्ञातव्य पूर्ण ज्ञान, को प्राप्त करने के लिए विमर्श का आश्रय लिया जाय तथा) नेत्र में वर्तमान रात्र्यन्धतारूपी दोषमुद्रा को भलीभाँति हटा दिया जाय तो वहाँ मलिनता की आशङ्का कैसे हो सकती है ।। ३३१ ।। ___तिमिर = आणव मल । मिथ्याज्ञान = भेदप्रथा वाला, अर्थात् अपूर्ण ज्ञान । दृष्टि = पूर्ण संवित् । असमान = अनात्माभिमान आदि रूपों वाले दोषों को । उत्पन्न करती है = मिथ्याज्ञान के होने से निर्मल पूर्ण भी वह ज्ञान मलिनता का घर मालुम पड़ता है । अपने स्वातन्त्र्यवश अपूर्ण रूप से स्फुरित होता है । और जो उपेय के रूप में अर्थात् अवश्य ज्ञातव्य पर प्रमाता रूप मे पूर्ण ज्ञान प्रेक्षणीय ___ “मैं प्राण, शरीर, मन, बुद्धि, अहङ्कार, महत् भी नहीं हूँ । इनमें जो ‘ज्ञ’ का अंश है वही मैं हूँ ।’ ____ इत्यादि नीति से उद्वेष्टनक्रम से विमर्श का विषय होता हुआ मिथ्या ज्ञान से उत्पन्न होने वाली अनात्मा में आत्माभिमानरूपा दोषमुद्रा को दूर ही रोक देता है अर्थात् तिरस्कृत कर देता है उसमें मालिन्य की शङ्का कहाँ ? अर्थात् वहाँ सम्भावना भी नहीं है । बन्ध और मोक्ष वस्तु के रूप में कुछ नहीं है फिर उसमें वैचित्र्य की सम्भावना कैसे होगी इसी अभिप्राय सेप्रथममाह्निकम् २४५ मिथ्यामोहकृदेष रज्जुभुजगच्छायापिशाचभ्रमो । मा किञ्चित्त्यज मा गृहाण विरम स्वस्थो यथावस्थितः।।’ इत्यादि अन्यत्र उक्तम् । अथ च तिमिरेण नेत्ररोगविशेषेण दृष्टौ अन्यथाज्ञानात्मदोषजातमुत्पादितं प्रेक्ष्येण अञ्जनादिस्थानीयेन रोध्यते इति तत्र मालिन्यशङ्कापि न भवति इति औपम्यं ध्वनितम् ।। ३३१ ।। इदानीमस्य शास्त्रस्य परं गाम्भीर्यं मन्यमानो ग्रन्थकृत्, एतदर्थसतत्त्व मजानानैरपि अन्यैरन्यथाबोधेन यत्किंचित् उत्तानमेव अन्यथा उच्यते, तान्प्रति अप्रस्तुतप्रशंसया उपहसितुमाह भावव्रात ? हठाज्जनस्य हृदयान्याक्रम्य यन्नर्तयन् भङ्गीभिर्विविधाभिरात्महृदयं प्रच्छाद्य संक्रीडसे । यस्त्वामाह जडं जडः सहृदयंमन्यत्वदुःशिक्षितो मन्येऽमुष्य जडात्मता स्तुतिपदं त्वत्साम्यसम्भावनात् ॥ ३३२ ॥ हे भावव्रात-नीलाद्यर्थ ? आत्मनो हृदयं तेन आत्मतथ्यम् रूपं गोपयित्वा “शरीरधारियों के लिये संसार वस्तुतः नहीं है फिर बन्धन की बात ही कहाँ ? जिसका बन्धन नहीं उसकी मुक्तिप्रक्रिया भी व्यर्थ है । रस्सी में साँप के समान अथवा छाया में पिशाच के समान यह (संसार) मिथ्यामोह के द्वारा उत्पादित भ्रम है इसलिये न कुछ लो न कुछ छोड़ो । जैसे हो वैसे ही अपने में रहकर आनन्द उठाओ ।’ इत्यादि अन्यत्र कहा गया । तिमिर = नेत्र का रोग-रात्र्यन्धता, के द्वारा दृष्टि में अन्यथा ज्ञानरूप दोष उत्पन्न होने पर अञ्जनरूप प्रेक्ष्य के द्वारा वह रोक दिया जाता है फिर उसमें मालिन्य की शंका भी नहीं हो सकती । यह उपमा ध्वनित है ।। ३३१ ।। अब इस शास्त्र को परम गम्भीर मानते हुए ग्रन्थकार, इस ग्रन्थ के तात्पर्य को न जानने वाले अन्य लोगों के द्वारा विपरीत ज्ञान के कारण जो कुछ बिना सुरताल के अन्यथा कह देते हैं, उनके प्रति अप्रस्तुत प्रशंसा द्वारा उपहास करने के लिये कहते हैं हे पदार्थ समूह! (तुम) अपने चैतन्यस्वरूप का गोपन कर बलपूर्वक लोगों के हृदय पर आक्रमण कर अनेक भंगियों के द्वारा जो क्रीड़ा कर रहे हो (इसलिए) जो तुमको जड कहता है वह (असहदय) अपने को सहृदय मानने के कारण दूषित शिक्षा वाला (स्वयं) जड है। (मैं) समझता हूँ कि तुम्हारी समानता की सम्भावना के कारण उसकी जडता भी स्तुति का स्थान है ।। ३३२ ।। हे भाव समूह = घट आदि पदार्थ, अपने वास्तविक रूप को छिपाकर सभी २४६ श्रीतन्त्रालोकः जनस्य–सर्वस्यैव वादिनो हृदयानि-आशयान् बलात्कारेण आक्रम्य ‘अद्यास्मानसत: करिष्यति सत; किं नु द्विधा वाप्ययं किं स्थास्नूनुत नश्वरानुत मिथोभिन्नानभिन्नानुत । इत्थं सद्वदनावलोकनपरैर्भावैर्जगद्वर्तिभिर्मन्ये मौननिरुद्ध्यमानहृदयैर्दुःखेन तैः स्थीयते ।।’ इत्यादिस्थित्या विविधाभिर्भङ्गीभिः नर्तयन् यत् संक्रीडसे-नटवत् अतात्त्विकेन रूपेण समल्लससि, अत: स:-सर्वो वादी असहृदयमपि आत्मानं सहृदयत्वेन मन्यमानोऽत एव दुःशिक्षितो मिथ्याभिमानात् अकिञ्चिज्ज्ञः, त्वाम् भाववातम्, जडम्-अचेतनम् आह, अतोऽस्माभिरुत्प्रेक्ष्यते यत् अमुष्य वादिनी वस्तुतश्चैतन्यस्वभावेन भवता यत् साम्यं तस्य सम्भावनात् भाववत्त्वमेव जडात्मा इति यधुच्यते सा अस्य निन्दास्थाने स्तुतिः । भावानां हि तेषां न किञ्चिद्रूपं स्यात्, अतस्तदेव ये न जानते ते जडेभ्योऽपि जडाः इति कथं च तेषां चेतनात्मक वैः निन्दापर्यवसायि साम्यं स्यात्-इति भावः । एवं प्रकृतेऽपि अस्य ग्रन्थस्य यस्तत्त्वं न जानाति मा ज्ञासीत्, प्रत्युत अन्यथापि यत्किञ्चन वक्ति इत्यसावेव जडो न पुनरस्य ग्रन्थस्य कश्चिद्दोष:-इत्यर्थः ।। ३३२ ।। ननु यद्येवं तर्हि एतच्छास्त्राधिगमाय केषाञ्चन परेषां विदुषामभ्यर्थना क्रियता वादी लोगों के हृदय अर्थात् आशय को बलात् आक्रान्त कर ‘आज यह (मूर्ख) हमको असत् सिद्ध करेगा या सत् अथवा दोनों, क्या (यह हमें) अनश्वर अथवा नाशवान, परस्पर भिन्न अथवा अभिन्न (सिद्ध करेगा) । इस प्रकार सुन्दर मुख को देखने में लगे हुए तथा मौन के द्वारा निरुद्ध हृदय वाले वे संसार के पदार्थ, प्रतीत होता है कि बड़े दु:ख के साथ रह रहे हैं।’ ___ इत्यादि स्थिति के द्वारा अनेक भंगिमाओं के साथ नृत्य करने हए जो क्रीड़ा कर रहे हो अर्थात् जादुगर की भाँति मिथ्या समल्लसित हो रहे हो, इसलिये वह वादी असहृदय भी अपने को सहृदय मानते हुए मिथ्याभिमाने के कारण सर्वज्ञ समझता है और तुमको अर्थात् पदार्थसमूह को अचेतन कहता है तो हम समझते हैं कि यह वादी चैतन्यस्वभाव वाले आपके साथ जो साम्य रखता है अर्थात् आपको जड़ समझना है वह निन्दा के स्थान पर स्तुति ही है। पदार्थों का रूप वस्तुत: चेतन ही है । यदि वे चेतन नहीं हैं तो फिर उनका कोई रूप ही नहीं होगा । इस बात को जो लोग नहीं जानते वे जड़ से भी जड़ हैं । इसलिये उनका चेतन पदार्थों के साथ निन्दापर्यवसायी साम्य कैसे हो सकता है? इस प्रकार प्रस्तुत ग्रन्थ के विषय में भी जो इस ग्रन्थ का तत्त्व नहीं जानता, मत जाने, किन्तु जो उल्टा-पुल्टा बोलता है वह जड़ है । इस विषय में ग्रन्थ का कोई दोष नहीं है ।। ३३२ ।। प्रथममाह्निकम् २४७ यदत्र यथावस्त्वेव बुद्ध्वा द्वेषो मा कार्यः ? इत्याशङ्कयाह इह गलितमलाः परावरज्ञाः शिवसद्भावमया अधिक्रियन्ते । गुरवः प्रविचारणे यतस्तद् विफलाद्वेषकलङ्कहानियाज्ञा ॥ ३३३ ॥ इह द्वये पुरुषाः सन्ति-अनायातशक्तिपाता आयातशक्तिपाताश्च । तत्र पूर्वेषां शतशोऽभ्यर्थितानाम् एतदधिगमाय मनोऽपि न प्रसरति । इत्यत्र अवधातव्यम्, द्वेषो माकार्यः इत्यभ्यर्थनाया असामर्थ्यम् । अपरे च अनभ्यर्थिता अपि स्वयमेव एतदधिगमाय प्रवर्तन्ते इति तत्रापि एवमभ्यर्थनाया वैयर्थ्यम् । तदाह ‘द्वेषकलङ्कहानियाच्या’ इति । आयातशक्तिपाताश्च कीदृशाः? इत्याह-गलित मला: इति, गलितं मलम्-अज्ञानं येषां ते तथाविधाः, अत एव च परम् आदिमम् अनुत्तरम् अवरम अन्त्यम् विसर्ग च ये जानते ते पराहपरामशोत्मक मन्त्रवीर्यज्ञाः-इत्यर्थः अत एव शिवसद्भावमया:-परप्रमात्रेकात्मज्ञानशालिनः इति ___ यदि ऐसा है तो इस शास्त्र के ज्ञान के लिये किन्हीं दूसरे विद्वानों की प्रार्थना की जानी चाहिये, जिससे कि इसके विषय में यथार्थ ज्ञान कर द्वेष न करें । यह शङ्का कर कहते हैं ___इस (शास्त्र के) विचार-विमर्श में, विगलितमल वाले, पर (= प्रकाश अनुत्तर) और अवर (= विमर्श या सृष्टि) को जानने वाले (फलतः) शिव सद्भावमय गुरुजन ही अधिकारी हैं (क्योंकि उनके उपर शक्तिपात हो चुका है) । (जो शक्तिपात रहित हैं) चूँकि वे उस (सन्दर्भ = गलितमलत्व परावरज्ञत्व आदि) के विषय में विफल हैं (अत: उनसे इस ग्रन्थ के अध्ययन के लिए अभ्यर्थना करना) द्वेष कलङ्क और हानि की याचना (करने के समान है) ।। ३३३ ।। ____ इस संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं-अनायात शक्तिपात वाले और आयात शक्तिपात वाले । इनमें से पहली श्रेणी वाले व्यक्त्यिों की सैकड़ों बार प्रार्थना करने पर भी इस शास्त्र को जानने के लिये मन नहीं फैलता । यहाँ यह समझना चाहिये कि द्वेष न करने के लिये अभ्यर्थना समर्थ नहीं है ( अर्थात् अभ्यर्थना व्यर्थ है) । दूसरी श्रेणी के वे लोग हैं जो बिना प्रार्थना के भी स्वयं इस शास्त्र को जानने के लिये प्रवृत्त होते हैं । इसलिये वहाँ भी प्रार्थना व्यर्थ ही है । वही कहते हैं-द्वेष, कलङ्क और हानि देने वाली याच्या (व्यर्थ) है । आयातशक्तिपात (साधक) कैसे हैं?—यह कहते हैं-गलितमलाः । गलित (= नष्ट) हो गया है मल = अज्ञान जिनका वे लोग । इसलिये वे पर = आदिम, अनुत्तर = अवर और अन्त्य = विसर्ग को जानते हैं । अर्थात् वे पर अहं परामर्शरूप मन्त्र के वीर्य को जानने वाले होते हैं । ये ही लोग शिवसद्भावमय अर्थात् परप्रमाता के साथ ऐकात्म्य भाव २४८ श्रीतन्त्रालोकः यावत्, अत एव च गुरवः–तात्त्विकार्थोपदेशिनः इति—एतदधिगमाय त एव परमाधिकारिण: इत्युक्तं यतः प्रविचारणेऽधिक्रियन्ते इति, यद्वक्ष्यति ‘गुरोर्लक्षणमेतावदादिमान्त्यं च वेदयेत् । पूज्य: सोऽहमिव ज्ञानी भैरवो देवतात्मकः ।।’ इति ।। ३३३ ।। इह आह्निकादाह्निकान्तरस्य सञ्चयन्यायेन परस्परमनुस्यूततां दर्शयितुम् एकेनैव श्लोकेन तत्पर्यन्तप्रारम्भयोरुपसंहारोपक्रमौ करोति, इति अस्य ग्रन्थकारस्य शैली–इति श्लोकस्य प्रथमार्धेन आह्निकार्थमुपसंहरति तन्त्रालोकेऽभिनवरचितेऽ मुत्र विज्ञानसत्ता भेदोद्गारप्रकटनपटावाह्निकेऽस्मिन्समाप्तिः । ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तपादविरचिते श्रीतन्त्रालोके विज्ञानभेदप्रकाशनं नाम प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥ पटौ इति पाक्षिकः पुंवद्भाव: । इति शिवम् ।। को जानने वाले होते हैं । इसीलिये ये गुरु = तात्त्विक अर्थ के उपदेष्टा हैं । इस को जानने के लिये वे ही परम अधिकारी हैं । यही कहा गया कि जिस कारण वे विचार के लिये अधिकृत होते हैं | जैसा कि कहेंगे __ ‘गुरु का यही लक्षण है कि वह (शिष्य को) आदिम और अन्तिम तत्त्व का ज्ञान कराये । वही ज्ञानी भैरव और देवतात्मक है तथा हमारी भाँति पूज्य है’ ।। ३३३ ।। यहाँ पर सञ्चयन्याय से एक आह्निक की दूसरे आह्निक से परस्पर सम्बन्द्धता दिखलाने के लिये एक ही श्लोक से (प्रथम आह्निक का) अन्त तथा (द्वितीय आह्निक का) प्रारम्भ का उपसंहार और उपक्रम करते हैं-यह इस ग्रन्थकार की शैली है । इसलिये श्लोक के पूर्वार्द्ध से इस आह्निक के वक्तव्य का उपसंहार करते हैं अभिनवगुप्तरचित इस तन्त्रालोक में विज्ञानसत्ताभेदोद्वार को प्रकट करने में पटु इस आह्निक की समाप्ति की गयी है ।। ॥ इस प्रकार श्रीमदाचार्यअभिनवगुप्तपादविरचित श्रीतन्त्रालोक के प्रथम आह्निक की डॉ० राधेश्याम चतुर्वेदी कृत ‘ज्ञानवती’ हिन्दी टीका सम्पूर्ण हुई ॥१॥ ‘पटौ’ इस पद में वैकल्पिक पुंवद् भाव है । २४९ प्रथममाह्निकम् श्रीशृङ्गाररथादवाप्य कृतिनो जन्मानवद्यक्रम श्रीमच्छङ्घधरात्परं परिचयं विद्यासु सर्वास्वपि। श्रीकल्याणतनो: शिवादधिगमं सर्वागमानामपि व्याख्यातं प्रथमाह्निकं जयरथेनात्रावधेयं बुधैः ।। ॥ इति श्रीमन्महामाहेश्वराचार्यवर्यश्रीमदभिनवगुप्तविरचिते श्रीतन्त्रालोके श्रीजयरथविरचितविवेकाभिख्यव्याख्योपेते विज्ञानभेद प्रकाशन नाम प्रथममाह्निक समाप्तम् ॥ १ ॥ || श्रीशिवार्पणमस्तु ।। ___पुण्यवान् श्री शृङ्गाररथ से अनिन्द्य क्रम वाले जन्म को प्राप्त कर, श्री मान् शङ्खधर से समस्त विद्याओं का परिचय प्राप्त कर, शिवस्वरूप श्री कल्याणतनु से समस्त आगमों का अधिगम कर जयरथ ने प्रथम आह्निक की व्याख्या की । विद्वान् लोग इस पर ध्यान दें । श्रीमन् महामाहेश्वर आचार्यवर्य श्रीमान् अभिनवगुप्त द्वारा रचित तथा राजानक जयरथकृत विवेक नामक व्याख्या से युक्त तन्त्रालोक में विज्ञान भेद प्रकाशन नामक प्रथम आह्निक समाप्त हो गया । ॥ इस प्रकार आचार्यश्रीजयरथकृत श्रीतन्त्रालोक के प्रथम आह्निक की ‘विवेक’ नामक व्याख्या की डॉ० राधेश्याम चतुर्वेदीकृत ‘ज्ञानवती’ हिन्दी टीका सम्पूर्ण हुई ॥१॥